Do bailon ki katha ka saransh यानी मुंशी प्रेमचंद की कहानी “दो बैलों की कथा” का सार। यह कहानी झूरी नाम के किसान के दो बैलों, हीरा और मोती की है, जो आपस में सच्चे दोस्त हैं। उन्हें अपने मालिक से दूर भेजा जाता है, उन पर अत्याचार होता है, वे काँजीहौस में बंद होते हैं और क़साई के हाथ बिकते बिकते बचते हैं, पर आख़िर अपनी हिम्मत और एकता से अपने घर लौट आते हैं। यह कहानी NCERT कक्षा 9 की हिंदी किताब का पहला पाठ रही है। इस लेख में छोटा सारांश (परीक्षा के लिए), पूरा सारांश, हीरा मोती का चरित्र चित्रण, कहानी का उद्देश्य और प्रश्न उत्तर दिए गए हैं।
| बात | जानकारी |
|---|---|
| लेखक | मुंशी प्रेमचंद |
| कहानी संग्रह | मानसरोवर, भाग 2 |
| किताब | NCERT कक्षा 9 हिंदी (क्षितिज भाग 1 का पहला पाठ; नई किताब में भी) |
| मुख्य पात्र | हीरा और मोती (पछाईं नस्ल के दो बैल) |
| दूसरे पात्र | झूरी (किसान, बैलों का मालिक), झूरी की पत्नी, गया (झूरी का साला), भैरो की बेटी, काँजीहौस का चौकीदार, दढ़ियल (क़साई) |
| मुख्य भाव | मित्रता, स्वतंत्रता, अन्याय का विरोध, पशुओं के प्रति संवेदना |
विषय सूची
Do Bailon Ki Katha Ka Saransh: दो बैलों की कथा का सारांश (संक्षेप में)
झूरी काछी के पास हीरा और मोती नाम के दो सुंदर, मेहनती बैल थे, जो एक दूसरे से गहरा प्रेम करते थे। एक बार झूरी ने उन्हें अपने साले गया के साथ ससुराल भेज दिया। बैलों को लगा कि उन्हें बेच दिया गया है, इसलिए वे रात को रस्सियाँ तुड़ाकर घर लौट आए। झूरी की पत्नी ने उन्हें “नमकहराम” कहकर सिर्फ़ सूखा भूसा दिया। गया उन्हें फिर ले गया, मोटी रस्सियों से बाँधा, मारा और सूखा भूसा दिया। वहाँ भैरो की एक छोटी, बिन माँ की बच्ची रोज़ रात उन्हें चुपके से रोटियाँ खिलाती थी और एक रात उसी ने उनकी रस्सियाँ खोलकर उन्हें भगा दिया। रास्ता भूलकर दोनों ने एक साँड़ को मिलकर हराया, पर मटर का खेत चरते पकड़े गए और काँजीहौस में बंद कर दिए गए। वहाँ भूखे जानवरों को देखकर हीरा और मोती ने दीवार तोड़कर दूसरे जानवरों को भगा दिया, पर ख़ुद बँधे रहे और मार खाई। एक हफ़्ते भूखे रहने के बाद उन्हें नीलाम कर दिया गया और एक दढ़ियल क़साई ने उन्हें ख़रीद लिया। रास्ते में जाना पहचाना रास्ता देखकर वे दौड़कर झूरी के घर पहुँच गए। मोती ने दढ़ियल को गाँव से बाहर खदेड़ दिया। झूरी ने उन्हें गले लगाया और मालकिन ने भी आकर दोनों के माथे चूम लिए।
दो बैलों की कथा का पूरा सारांश
गधे और बैल पर प्रेमचंद की बात
कहानी की शुरुआत में प्रेमचंद कहते हैं कि गधे को सबसे मूर्ख जानवर माना जाता है, जबकि उसमें ऋषि मुनियों जैसे सारे गुण (सहनशीलता, संतोष) होते हैं; उसका सीधापन ही उसे “गधा” बना देता है। फिर वे कहते हैं कि बैल गधे का छोटा भाई है, पर वह कभी कभी अपना ग़ुस्सा और असंतोष भी दिखा देता है।
हीरा और मोती की दोस्ती
झूरी काछी के दो बैल थे, हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के, देखने में सुंदर और काम में चौकस थे। साथ रहते रहते उनमें भाईचारा हो गया था। वे मूक भाषा में बातें करते, एक दूसरे को चाटकर प्रेम जताते, खेल खेल में सींग मिलाते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ उठते बैठते। हल या गाड़ी में जुतने पर हर एक की यही कोशिश होती कि ज़्यादा बोझ उसकी अपनी गर्दन पर रहे।

गया के घर जाना और लौट आना
एक बार झूरी ने बैलों को अपने साले गया के साथ ससुराल भेज दिया। बैलों को लगा कि मालिक ने उन्हें बेच दिया है। वे बड़ी मुश्किल से गया के घर तक गए और वहाँ नाँद में मुँह तक नहीं डाला। रात को गाँव सोते ही उन्होंने ज़ोर लगाकर मोटे पगहे तोड़ डाले और घर की ओर चल पड़े। सुबह झूरी ने उन्हें अपनी चरनी पर खड़ा पाया, गले में आधे टूटे पगहे और घुटनों तक कीचड़। झूरी ने स्नेह से उन्हें गले लगा लिया, और गाँव के बच्चों ने तालियाँ बजाकर उनका स्वागत किया।
पर झूरी की पत्नी को यह अच्छा नहीं लगा। उसने उन्हें “नमकहराम” कहा, क्योंकि वहाँ एक दिन भी काम किए बिना भाग आए, और नौकर को कड़ा हुक्म दिया कि इन्हें सिर्फ़ सूखा भूसा दिया जाए।
गया का अत्याचार और छोटी लड़की का प्रेम
अगले दिन गया फिर दोनों को ले गया। इस बार उसने उन्हें गाड़ी में जोता, शाम को मोटी रस्सियों से बाँधकर मारा और सूखा भूसा डाला, जबकि अपने बैलों को खली चूनी दी। अगले दिन हल में जोतने पर दोनों ने पाँव नहीं उठाए। गया ने हीरा की नाक पर डंडे बरसाए, तो मोती ग़ुस्से में हल लेकर भाग खड़ा हुआ। मोती ने कहा कि अबकी मारेगा तो एक दो को गिरा दूँगा, पर हीरा ने समझाया: “नहीं, हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।”
उसी घर में भैरो की एक छोटी लड़की थी, जिसकी माँ मर चुकी थी और सौतेली माँ उसे मारती थी। इसीलिए उसे इन बैलों से अपनापन हो गया था। वह रोज़ रात चुपके से दोनों को एक एक रोटी खिला जाती। उसी प्रेम के प्रसाद से वे सूखा भूसा खाकर भी कमज़ोर नहीं हुए।
मोती का धैर्य जवाब देने लगा। वह किसी को सींग पर उठाकर फेंकना चाहता था, पर हीरा ने कहा कि उस प्यारी बच्ची के पिता को मारोगे तो वह अनाथ हो जाएगी, और मालकिन पर सींग चलाना ठीक नहीं, क्योंकि औरत पर हाथ उठाना मना है।
भागना और साँड़ से लड़ाई
एक रात दोनों रस्सियाँ चबाने की कोशिश कर रहे थे कि वही लड़की आई और बोली कि घर में सलाह हो रही है कि तुम्हारी नाक में नाथ डाल दी जाए, इसलिए चुपके से भाग जाओ। उसने रस्सी खोल दी, पर हीरा सोचने लगा कि इस अनाथ पर आफ़त आएगी। तभी लड़की ने ख़ुद ही चिल्लाकर कहा कि दोनों बैल भागे जा रहे हैं, ताकि उस पर शक न हो। गया दौड़ा, पर बैल भाग निकले।
भागते भागते वे रास्ता भूल गए। भूख लगी तो मटर का खेत चरा और आज़ादी की ख़ुशी में उछलने कूदने लगे। तभी एक भारी भरकम साँड़ आ पहुँचा। भागना कायरता थी और अकेले लड़ना मौत। दोनों ने मिलकर योजना बनाई: एक आगे से और दूसरा पीछे से वार करेगा। साँड़ ने कभी संगठित दुश्मनों से लड़ाई नहीं की थी। दोनों ने बारी बारी से उसके पेट में सींग चुभाए, तो वह घायल होकर भाग गया। मोती उसे मार डालना चाहता था, पर हीरा ने कहा: “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”
काँजीहौस में बंद
भूख मिटाने मोती फिर मटर के खेत में घुस गया। हीरा मना करता रहा। दो रखवाले लाठियाँ लेकर आ गए। हीरा मेड़ पर था, निकल सकता था, पर दोस्त को फँसा देखकर लौट आया: “फँसेंगे तो दोनों साथ फँसेंगे।” दोनों को काँजीहौस (आवारा पशुओं का बाड़ा) में बंद कर दिया गया।
वहाँ पूरा दिन खाने को एक तिनका नहीं मिला। बाड़े में कई भैंसें, बकरियाँ, घोड़े और गधे भूख से मरे से पड़े थे। रात को हीरा ने अपने सींगों से कच्ची दीवार तोड़नी शुरू की। चौकीदार ने उसे डंडों से पीटकर मोटी रस्सी से बाँध दिया। तब मोती ने दीवार पर वार किए और दो घंटे में आधी दीवार गिरा दी। घोड़ियाँ, बकरियाँ और भैंसें भाग निकलीं। गधे डर के मारे खड़े रहे, तो मोती ने उन्हें सींगों से धकेलकर बाहर निकाला। मोती चाहता तो भाग सकता था, पर उसने कहा: “तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो हीरा?” और बँधे हुए दोस्त के पास ही सो गया। सुबह उसकी भी ख़ूब पिटाई हुई और उसे भी बाँध दिया गया।
नीलामी और घर वापसी
एक हफ़्ते तक दोनों को चारे का एक तिनका नहीं मिला, बस कभी कभी पानी। दोनों की ठठरियाँ निकल आईं। फिर उनकी नीलामी हुई और एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल और चेहरा कठोर था, उन्हें ख़रीद ले गया। दोनों समझ गए कि वह क़साई है। हीरा ने कहा कि गया के घर से नाहक भागे। मोती ने भगवान से शिकायत की, तो हीरा बोला कि एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था, क्या अब नहीं बचाएँगे?
रास्ते में अचानक उन्हें सब पहचाना सा लगा: वही खेत, वही बाग़, वही कुआँ जिस पर वे पुर चलाते थे। उनकी सारी कमज़ोरी ग़ायब हो गई और वे बछड़ों की तरह उछलते हुए अपने थान पर जा खड़े हुए। झूरी धूप में बैठा था; उसने दौड़कर दोनों को गले लगा लिया। दढ़ियल ने रस्सियाँ पकड़कर दावा किया कि उसने बैल नीलाम में ख़रीदे हैं, पर झूरी ने कहा कि ये मेरे बैल हैं, मेरे द्वार पर खड़े हैं। दढ़ियल ज़बरदस्ती करने लगा, तो मोती ने सींग तानकर उसे गाँव के बाहर तक खदेड़ दिया और विजयी वीर की तरह उसका रास्ता रोककर खड़ा रहा। दढ़ियल हारकर चला गया।
थोड़ी देर में नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया। झूरी दोनों को सहला रहा था, गाँव में ख़ुशी की लहर थी, और उसी समय मालकिन ने भी आकर दोनों के माथे चूम लिए।
हीरा और मोती का चरित्र चित्रण
| पात्र | चरित्र की ख़ास बातें |
|---|---|
| हीरा | शांत, धैर्यवान, समझदार और नैतिक। मोती को हिंसा से रोकता है (“हमारी जाति का यह धर्म नहीं”, “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना”)। दोस्त के लिए लौट आता है। काँजीहौस की दीवार तोड़ने की पहल करता है। |
| मोती | जोशीला, ग़ुस्सैल पर बहादुर और सच्चा दोस्त। अन्याय सहन नहीं करता। काँजीहौस में दूसरे जानवरों को आज़ाद कराता है, पर बँधे हीरा को छोड़कर नहीं जाता। अंत में दढ़ियल को खदेड़ देता है। |
| झूरी | दयालु किसान, अपने बैलों से बेटों जैसा प्यार करता है; उन्हें फूल की छड़ी से भी नहीं छूता। |
| भैरो की बेटी | बिन माँ की, दुखी पर दयालु बच्ची। बैलों को रोटी खिलाती है और उन्हें आज़ाद कराती है। |
हीरा और मोती की तुलना (परीक्षा के लिए): दोनों बैल सच्चे मित्र हैं और मुसीबत में एक दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। हीरा अधिक धैर्यवान और विवेकी है, जबकि मोती अधिक उग्र और भावुक है। हीरा नैतिकता की बात करता है, मोती तुरंत जवाब देने की। पर दोनों ही आज़ादी के प्रेमी, मेहनती, स्वाभिमानी और दूसरों के दुख को समझने वाले हैं।
दो बैलों की कथा का उद्देश्य और संदेश
- स्वतंत्रता का मूल्य: हीरा और मोती अपमान और ग़ुलामी सहने की जगह आज़ादी के लिए बार बार संघर्ष करते हैं। कहानी आज़ादी के आंदोलन के समय लिखी गई, इसलिए इसे पराधीनता के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक के रूप में भी पढ़ा जाता है।
- सच्ची मित्रता: दोनों हर संकट में साथ रहते हैं, “फँसेंगे तो दोनों साथ फँसेंगे।”
- एकता की ताक़त: अकेले जिस साँड़ से बचना मुश्किल था, उसे दोनों ने मिलकर हरा दिया।
- सीधेपन पर व्यंग्य: जो बहुत सीधा और सहनशील होता है, दुनिया उसे मूर्ख समझती है (“हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता, इसी लिए कि हम इतने सीधे होते हैं”)।
- पशुओं के प्रति संवेदना: जानवर भी प्रेम, अपमान और दर्द महसूस करते हैं।
“दो बैलों की कथा” शीर्षक की सार्थकता
पूरी कहानी झूरी के दो बैलों, हीरा और मोती, के जीवन, उनकी दोस्ती, संघर्ष और घर वापसी की कथा है। हर घटना इन्हीं दोनों के इर्द गिर्द है और कहानी इन्हीं की नज़र से आगे बढ़ती है। इसलिए “दो बैलों की कथा” शीर्षक सरल, सीधा और पूरी तरह सार्थक है।
कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| काछी | सब्ज़ी उगाने वाली एक खेतिहर जाति |
| पछाईं | पश्चिम की ओर की एक अच्छी नस्ल (बैलों की) |
| गोईं | बैलों की जोड़ी |
| पगहा / गराँव | पशुओं को बाँधने की रस्सी |
| नाँद | पशुओं को चारा खिलाने का बड़ा बर्तन |
| खली, चोकर | पशुओं का पौष्टिक चारा (तेल निकले बीज का बचा हिस्सा, आटे का छिलका) |
| नमकहराम | एहसान न मानने वाला |
| काँजीहौस | आवारा पशुओं को बंद करने का सरकारी बाड़ा |
| ठठरी | हड्डियों का ढाँचा (बहुत दुबला शरीर) |
| दढ़ियल | दाढ़ी वाला |
| थान | पशुओं को बाँधने की जगह |
| कुलेल | उछल कूद, मस्ती |
दो बैलों की कथा के प्रश्न उत्तर
दो बैलों की कथा के लेखक कौन हैं?
दो बैलों की कथा के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं। यह उनके कहानी संग्रह मानसरोवर के दूसरे भाग में है।
हीरा और मोती किसके बैल थे?
हीरा और मोती झूरी काछी के बैल थे। दोनों पछाईं जाति के थे।
बैल गया के घर से क्यों भाग आए?
उन्हें लगा कि झूरी ने उन्हें बेच दिया है। नया घर और नए लोग उन्हें पराए लगे, इसलिए वे रात को पगहे तुड़ाकर अपने घर लौट आए।
झूरी की पत्नी ने बैलों को नमकहराम क्यों कहा?
क्योंकि बैल गया के घर एक दिन भी काम किए बिना भाग आए थे। उसे लगा कि बैल कामचोर हैं।
भैरो की लड़की ने बैलों की मदद कैसे की?
वह रोज़ रात चुपके से उन्हें रोटियाँ खिलाती थी, और एक रात उसने उनकी रस्सियाँ खोलकर उन्हें भगा दिया, फिर ख़ुद ही शोर मचाया ताकि उस पर शक न हो।
हीरा और मोती ने साँड़ को कैसे हराया?
दोनों ने मिलकर योजना बनाई: एक आगे से और दूसरा पीछे से वार करता। साँड़ को संगठित दुश्मनों से लड़ने का अनुभव नहीं था, इसलिए वह घायल होकर भाग गया।
काँजीहौस में मोती ने क्या किया?
मोती ने कच्ची दीवार तोड़कर भूखे जानवरों को आज़ाद कराया और डरे हुए गधों को भी धकेलकर बाहर निकाला, पर बँधे हुए हीरा को छोड़कर ख़ुद नहीं भागा।
कहानी का अंत कैसे होता है?
क़साई के साथ जाते हुए बैल अपना पुराना रास्ता पहचान लेते हैं और दौड़कर झूरी के घर पहुँच जाते हैं। मोती क़साई को भगा देता है, झूरी उन्हें गले लगाता है और मालकिन भी उनके माथे चूम लेती है।
दो बैलों की कथा का मुख्य संदेश क्या है?
स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना चाहिए, सच्ची मित्रता मुसीबत में साथ नहीं छोड़ती, एकता में बड़ी ताक़त है, और पशुओं के प्रति दया रखनी चाहिए।
मुंशी प्रेमचंद: एक छोटा परिचय
मुंशी प्रेमचंद (असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव) का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में और निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ। उन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है। उन्होंने गोदान, गबन, निर्मला जैसे उपन्यास और 300 से ज़्यादा कहानियाँ लिखीं, जो “मानसरोवर” के आठ भागों में संकलित हैं।
प्रेमचंद की और कहानियों के सारांश
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स्रोत: कहानी का मूल पाठ हिंदी विकिस्रोत पर मानसरोवर भाग 2 से पढ़कर यह सारांश अपने शब्दों में लिखा गया है। फ़ोटो: Pexels (प्रतीकात्मक)।
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