Bade bhai sahab kahani ka saransh यानी मुंशी प्रेमचंद की कहानी “बड़े भाई साहब” का सार। यह कहानी दो भाइयों की है, जो घर से दूर हॉस्टल में रहकर पढ़ते हैं। बड़े भाई साहब दिन रात किताबों में डूबे रहते हैं पर बार बार फ़ेल हो जाते हैं, और छोटा भाई खेलते कूदते भी हर साल अव्वल आता है। फिर भी कहानी के अंत में छोटे भाई को समझ आता है कि बड़े भाई का अनुभव और उनकी ज़िम्मेदारी किताबी नंबरों से कहीं बड़ी है। यह पाठ NCERT कक्षा 10 की हिंदी किताब “स्पर्श भाग 2” में है। इस लेख में छोटा सारांश (परीक्षा के लिए), पूरा सारांश, चरित्र चित्रण, उद्देश्य, शीर्षक की सार्थकता और प्रश्न उत्तर दिए गए हैं।
| बात | जानकारी |
|---|---|
| लेखक | मुंशी प्रेमचंद |
| कहानी संग्रह | मानसरोवर, भाग 1 |
| किताब | NCERT कक्षा 10, स्पर्श भाग 2 |
| कथावाचक | छोटा भाई (कहानी “मैं” की शैली में है) |
| मुख्य पात्र | बड़े भाई साहब (14 साल) और छोटा भाई (9 साल) |
| मुख्य विषय | रटने वाली शिक्षा पर व्यंग्य, बड़े भाई की ज़िम्मेदारी, अनुभव बनाम किताबी ज्ञान |
विषय सूची
Bade Bhai Sahab Kahani Ka Saransh: बड़े भाई साहब कहानी का सारांश (संक्षेप में)
कथावाचक (छोटा भाई) नौ साल का है और उसके बड़े भाई साहब चौदह साल के। दोनों घर से दूर हॉस्टल में पढ़ते हैं। बड़े भाई साहब बहुत पढ़ाकू हैं, हर समय किताब खोले बैठे रहते हैं और छोटे भाई के खेलने पर उसे लंबे लंबे उपदेश देते हैं। छोटे भाई का मन पढ़ाई में नहीं लगता; वह टाइम टेबल बनाता है पर उस पर चलता नहीं। सालाना परीक्षा में बड़े भाई फ़ेल हो जाते हैं और छोटा भाई कक्षा में प्रथम आता है। फिर भी बड़े भाई घमंड पर रावण का उदाहरण देकर उसे डाँटते हैं। अगले साल फिर यही होता है और दोनों के बीच बस एक कक्षा का अंतर रह जाता है। अब छोटा भाई लापरवाह होकर पतंग उड़ाने लगता है। एक दिन बड़े भाई उसे कटी पतंग के पीछे दौड़ते पकड़ लेते हैं और समझाते हैं कि वे उम्र और दुनिया के अनुभव में हमेशा पाँच साल बड़े रहेंगे, समझ किताबें पढ़ने से नहीं, दुनिया देखने से आती है। छोटा भाई शर्मिंदा होकर उनकी बात मान लेता है। बड़े भाई उसे गले लगाकर कहते हैं कि उनका भी पतंग उड़ाने को जी ललचाता है, पर ख़ुद बेराह चलें तो छोटे भाई की रक्षा कैसे करें। तभी एक कटी पतंग ऊपर से गुज़रती है, और लंबे बड़े भाई साहब उछलकर उसकी डोर पकड़ लेते हैं और हॉस्टल की तरफ़ दौड़ पड़ते हैं, छोटा भाई पीछे पीछे दौड़ता है।
बड़े भाई साहब कहानी का पूरा सारांश
दो भाई, एक हॉस्टल
बड़े भाई साहब कथावाचक से पाँच साल बड़े हैं, पर केवल तीन कक्षा आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, पर वे “बुनियाद मज़बूत” करने के लिए एक साल का काम दो, कभी तीन साल में करते हैं। उस समय बड़े भाई नौवीं कक्षा में हैं और छोटा भाई पाँचवीं में। बड़े भाई का मानना है कि छोटे भाई की देखभाल और निगरानी उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।
बड़े भाई साहब हर समय किताब खोले बैठे रहते हैं। दिमाग़ को आराम देने के लिए वे कॉपी और किताब के हाशिये पर चिड़ियों, कुत्तों और बिल्लियों के चित्र बनाते हैं, एक ही शब्द दस बीस बार लिख डालते हैं, या ऐसे शब्द जोड़ते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं निकलता।

छोटे भाई का खेल और भाई साहब की डाँट
छोटे भाई का मन पढ़ाई में नहीं लगता। मौक़ा मिलते ही वह मैदान में कंकरियाँ उछालने, काग़ज़ की तितलियाँ उड़ाने और दोस्तों के साथ खेलने निकल जाता है। कमरे में लौटते ही बड़े भाई का पहला सवाल होता है: “कहाँ थे?” फिर लंबा उपदेश शुरू होता है: अंग्रेज़ी पढ़ना हँसी खेल नहीं, रात दिन आँखें फोड़नी पड़ती हैं; मैं कभी मेले तमाशे देखने नहीं जाता, फिर भी एक एक दर्जे में दो दो तीन तीन साल लगते हैं; तुम खेलकर पास कैसे होगे; दादा की गाढ़ी कमाई क्यों बर्बाद करते हो।
डाँट सुनकर छोटा भाई रो पड़ता है और जोश में एक भारी भरकम टाइम टेबल बनाता है: सुबह छह बजे से रात ग्यारह बजे तक पढ़ाई ही पढ़ाई, खेल का नाम तक नहीं। पर पहले ही दिन से मैदान की हरियाली, फ़ुटबॉल, कबड्डी और वॉलीबॉल उसे खींच ले जाते हैं, और टाइम टेबल धरा रह जाता है।
पहली परीक्षा: भाई साहब फ़ेल, छोटा भाई प्रथम
सालाना परीक्षा में बड़े भाई साहब फ़ेल हो जाते हैं और छोटा भाई पास होकर कक्षा में प्रथम आता है। अब दोनों में केवल दो साल का अंतर रह जाता है। छोटे भाई को अपने ऊपर अभिमान होने लगता है और वह खुलकर खेलने लगता है।
एक दिन जब वह पूरा सवेरा गुल्ली डंडा खेलकर लौटता है, तो बड़े भाई उस पर टूट पड़ते हैं। वे कहते हैं कि घमंड तो रावण का भी नहीं रहा, जो पूरी धरती का चक्रवर्ती राजा था। वे शैतान और शाहे रूम के उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि तुम्हारा पास होना “अंधे के हाथ बटेर लगना” है। फिर अपनी कक्षा की पढ़ाई का डरावना चित्र खींचते हैं: अलजेब्रा और ज्योमेट्री के लोहे के चने, इंग्लैंड का इतिहास जिसमें आठ आठ हेनरी हुए, “अ ब ज” की जगह “अ ज ब” लिखा तो सारे नंबर कट गए, और “समय की पाबंदी” पर संक्षेप में चार पन्नों का निबंध! छोटा भाई डर जाता है, पर उसकी खेलने की आदत नहीं छूटती।
दूसरी परीक्षा: फिर वही नतीजा
अगले साल फिर छोटा भाई पास होकर प्रथम आता है और बड़े भाई साहब, जिन्होंने जी तोड़ मेहनत की थी, फिर फ़ेल हो जाते हैं। नतीजा सुनकर बड़े भाई रो पड़ते हैं और छोटा भाई भी रोने लगता है; उसकी ख़ुशी आधी रह जाती है। अब दोनों में सिर्फ़ एक कक्षा का अंतर बचता है। छोटे भाई के मन में एक पल को बुरा विचार आता है कि भाई साहब एक बार और फ़ेल हों तो वह उनके बराबर हो जाए, पर वह उस विचार को निकाल फेंकता है, क्योंकि भाई साहब उसके भले के लिए ही डाँटते हैं।
अब बड़े भाई साहब नरम पड़ गए हैं। छोटा भाई इसका फ़ायदा उठाता है। उसे लगता है कि वह पढ़े या न पढ़े, पास तो हो ही जाएगा। उसे पतंग (कनकौए) उड़ाने का नया शौक़ लग जाता है, जिसे वह भाई साहब से छिपकर पूरा करता है।

कटी पतंग और भाई साहब की असली सीख
एक शाम छोटा भाई बाज़ारी लड़कों के साथ एक कटी पतंग लूटने दौड़ रहा होता है कि बाज़ार से लौटते बड़े भाई साहब उसका हाथ पकड़ लेते हैं। वे कहते हैं कि अब तुम आठवीं कक्षा में हो, मुझसे सिर्फ़ एक दर्जा नीचे, कुछ तो अपनी हैसियत का ख़्याल करो। फिर वे वह बात कहते हैं जो कहानी का केंद्र है: “मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा।” तुम चाहे कितनी ही डिग्रियाँ ले लो, मेरे और तुम्हारे बीच के पाँच साल का अंतर कोई नहीं मिटा सकता। समझ किताबें पढ़ने से नहीं, दुनिया देखने से आती है।
वे उदाहरण देते हैं: अम्माँ ने कोई दर्जा पास नहीं किया और दादा भी शायद पाँचवीं छठी तक ही पढ़े, फिर भी उन्हें हमें समझाने का अधिकार हमेशा रहेगा, क्योंकि उनका अनुभव हमसे ज़्यादा है। अगर मैं बीमार पड़ जाऊँ तो तुम्हारे हाथ पाँव फूल जाएँगे, पर दादा पहले ख़ुद इलाज करेंगे। हम महीने का ख़र्च बीस बाईस तारीख़ तक उड़ा देते हैं, जबकि दादा ने उसके आधे में नौ लोगों का परिवार इज़्ज़त से चलाया। हेडमास्टर साहब ऑक्सफ़ोर्ड से एम. ए. हैं, पर उनका घर उनकी बूढ़ी माँ चलाती हैं।
यह सुनकर छोटे भाई को अपनी लघुता का एहसास होता है और बड़े भाई के लिए मन में श्रद्धा जागती है। वह आँखों में आँसू लिए कहता है कि आप जो कह रहे हैं वह बिल्कुल सच है। बड़े भाई साहब उसे गले लगा लेते हैं और कहते हैं: “मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता। मेरा भी जी ललचाता है। लेकिन करूँ क्या, ख़ुद बेराह चलूँ तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्तव्य भी तो मेरे सिर है।”
ठीक उसी समय एक कटी पतंग उनके ऊपर से गुज़रती है, जिसकी डोर लटक रही है। बड़े भाई साहब लंबे हैं ही; वे उछलकर डोर पकड़ लेते हैं और बेतहाशा हॉस्टल की तरफ़ दौड़ पड़ते हैं। छोटा भाई उनके पीछे पीछे दौड़ता है।
बड़े भाई साहब कहानी के पात्रों का चरित्र चित्रण
| पात्र | चरित्र की ख़ास बातें |
|---|---|
| बड़े भाई साहब | पढ़ाकू, अनुशासनप्रिय, उपदेश देने में कुशल, ज़िम्मेदार। बार बार फ़ेल होने पर भी छोटे भाई के भले के लिए अपनी इच्छाएँ (खेल, पतंग) दबाते हैं। रटने वाली पढ़ाई की कमियाँ समझते हैं, पर उसी में फँसे हैं। अंत में उनका स्नेह और बालमन दोनों दिखते हैं। |
| छोटा भाई (कथावाचक) | खेलकूद का शौक़ीन, कुशाग्र बुद्धि, थोड़ी मेहनत से भी अव्वल आने वाला। पास होने पर कुछ घमंडी और लापरवाह होता है, पर दिल का साफ़ है; भाई की बात समझते ही उनका सम्मान करने लगता है। |
बड़े भाई साहब का चरित्र चित्रण (परीक्षा के लिए): बड़े भाई साहब कहानी के नायक हैं। वे बहुत मेहनती और अध्ययनशील हैं, पर रटने वाली शिक्षा व्यवस्था के कारण बार बार फ़ेल होते हैं। वे ख़ुद को छोटे भाई का संरक्षक मानते हैं और उसे सही राह पर रखने के लिए अपना बचपन, खेल और पतंगबाज़ी का शौक़ तक दबा देते हैं। वे उपदेश देने में निपुण हैं और रावण, शैतान जैसे उदाहरणों से समझाते हैं। उनमें आत्मसम्मान है, पर अंत में उनका कोमल, स्नेही और बालसुलभ मन भी दिखता है। वे ज़िम्मेदार बड़े भाई का आदर्श हैं।
बड़े भाई साहब कहानी का उद्देश्य और संदेश
- रटने वाली शिक्षा पर व्यंग्य: प्रेमचंद ने बड़े भाई के मुँह से उस शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग्य किया है जो समझ की जगह रटने और नंबरों को महत्व देती है (“अ ब ज” और “अ ज ब”, चार पन्नों का संक्षिप्त निबंध)।
- अनुभव का महत्व: किताबी ज्ञान से बड़ा जीवन का अनुभव है; इसलिए माता पिता और बड़ों का सम्मान ज़रूरी है।
- बड़े भाई की ज़िम्मेदारी: बड़ा भाई छोटे के लिए उदाहरण बनने को अपनी इच्छाएँ त्याग देता है।
- पढ़ाई और खेल का संतुलन: न केवल किताबें, न केवल खेल; दोनों का संतुलन ज़रूरी है।
- घमंड से बचो: थोड़ी सफलता पर इतराना ठीक नहीं।
“बड़े भाई साहब” शीर्षक की सार्थकता
पूरी कहानी बड़े भाई साहब के व्यवहार, उनके उपदेशों, उनकी असफलता और अंत में उनकी ज़िम्मेदारी भरी सोच के आसपास घूमती है। कहानी के हर मोड़ पर वही केंद्र में हैं, और अंत में उनका असली रूप (स्नेही, त्यागी और भीतर से बच्चा) सामने आता है। छोटा भाई भी कहानी उन्हीं के बारे में सुना रहा है। इसलिए “बड़े भाई साहब” शीर्षक पूरी तरह सार्थक है।
कठिन शब्दों के अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तालीम | शिक्षा |
| जमात / दरजा | कक्षा |
| तम्बीह | डाँट डपट, चेतावनी |
| हाशिया | पन्ने के किनारे की ख़ाली जगह |
| लताड़ | फटकार |
| सूक्ति बाण | चुभने वाली उपदेश भरी बातें |
| अव्वल | प्रथम |
| कनकौआ | पतंग |
| मुमतहिन | परीक्षक |
| तजुर्बा | अनुभव |
| बेराह | ग़लत रास्ते पर |
| लघुता | छोटापन |
बड़े भाई साहब कहानी के प्रश्न उत्तर
बड़े भाई साहब कहानी के लेखक कौन हैं?
बड़े भाई साहब कहानी के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं। यह NCERT कक्षा 10 की हिंदी किताब स्पर्श भाग 2 में है।
बड़े भाई साहब छोटे भाई से कितने साल बड़े थे?
बड़े भाई साहब छोटे भाई से पाँच साल बड़े थे, पर पढ़ाई में केवल तीन कक्षा आगे थे। बड़े भाई चौदह साल के थे और छोटा भाई नौ साल का।
छोटा भाई टाइम टेबल का पालन क्यों नहीं कर पाता था?
क्योंकि टाइम टेबल में खेलकूद के लिए कोई जगह नहीं थी, और मैदान की हरियाली, फ़ुटबॉल, कबड्डी और वॉलीबॉल उसे अपनी ओर खींच ले जाते थे।
बड़े भाई साहब ने घमंड के बारे में किसका उदाहरण दिया?
उन्होंने रावण का उदाहरण दिया, जो चक्रवर्ती राजा था पर घमंड के कारण उसका नाम निशान मिट गया। साथ में शैतान और शाहे रूम के उदाहरण भी दिए।
बड़े भाई साहब के अनुसार समझ किससे आती है?
बड़े भाई साहब के अनुसार समझ किताबें पढ़ने से नहीं, दुनिया देखने और अनुभव से आती है।
बड़े भाई साहब अपनी इच्छाएँ क्यों दबाते थे?
क्योंकि वे छोटे भाई के सामने अच्छा उदाहरण रखना चाहते थे। उनके शब्दों में, अगर वे ख़ुद बेराह चलें तो छोटे भाई की रक्षा कैसे करेंगे।
कहानी का अंत कैसे होता है?
बड़े भाई छोटे भाई को गले लगाकर कहते हैं कि उनका भी पतंग उड़ाने को जी ललचाता है। तभी एक कटी पतंग गुज़रती है, बड़े भाई उछलकर उसकी डोर पकड़ लेते हैं और हॉस्टल की तरफ़ दौड़ते हैं, छोटा भाई पीछे पीछे दौड़ता है।
बड़े भाई साहब कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
केवल रटकर पास होना शिक्षा नहीं है; अनुभव का अपना महत्व है, बड़ों का सम्मान करना चाहिए, और पढ़ाई व खेल में संतुलन ज़रूरी है।
मुंशी प्रेमचंद: एक छोटा परिचय
मुंशी प्रेमचंद (असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव) का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में और निधन 8 अक्टूबर 1936 को हुआ। उन्हें “उपन्यास सम्राट” कहा जाता है। उन्होंने गोदान, गबन, निर्मला जैसे उपन्यास और 300 से ज़्यादा कहानियाँ लिखीं, जो “मानसरोवर” के आठ भागों में संकलित हैं।
प्रेमचंद की और कहानियों के सारांश
- ईदगाह कहानी का सारांश
- दो बैलों की कथा का सारांश
- माँ कहानी का सारांश
- छात्रों के लिए गीता के 15 श्लोक अर्थ सहित
bade bhai sahab kahani ka saransh (बड़े भाई साहब कहानी का सारांश) अपने सहपाठियों के साथ शेयर कीजिए। आप कहानी के किस भाई जैसे हैं, कमेंट में ज़रूर बताइए।
प्रेमचंद की कहानियाँ पढ़िए
स्रोत: कहानी का मूल पाठ हिंदी विकिस्रोत पर मानसरोवर भाग 1 से पढ़कर यह सारांश अपने शब्दों में लिखा गया है। फ़ोटो: Pexels (प्रतीकात्मक)।
नोट: इस लेख में Amazon के affiliate लिंक हैं। इनसे ख़रीदारी करने पर Storyshala को छोटा कमीशन मिलता है, आपके लिए क़ीमत नहीं बदलती।





