अकबर और बीरबल की पहली मुलाक़ात: महेश दास कैसे बने बीरबल, पूरी कहानी और सीख

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अकबर और बीरबल की पहली मुलाक़ात: जंगल के दोराहे पर घोड़े पर बैठे बादशाह और रास्ता बताता एक लड़का
जंगल के दोराहे पर बादशाह और महेश दास

Akbar birbal ki pehli mulaqat, यानी अकबर और बीरबल की पहली मुलाक़ात, अकबर बीरबल की सारी कहानियों की शुरुआत है। बीरबल एक दिन में दरबार नहीं पहुँच गए थे। पहले वे एक गाँव के लड़के थे, जिनका नाम महेश दास था। जंगल में भटके बादशाह से उनकी मुलाक़ात हुई, और फिर महल के दरवाज़े पर उन्होंने एक ऐसी चतुराई दिखाई कि बादशाह उन्हें हमेशा के लिए अपने पास रख लिया। नीचे पूरी कहानी बहुत आसान हिंदी में लिखी है।

बातजानकारी
पढ़ने का समय4 मिनट
किस उम्र के बच्चों के लिए6 से 12 साल
कहानी के पात्रबादशाह अकबर, महेश दास (बीरबल) और महल का एक पहरेदार
सीखसमझदारी उम्र या कपड़ों से नहीं, सोचने के तरीक़े से आती है

अकबर और बीरबल की पहली मुलाक़ात

एक दिन बादशाह अकबर शिकार पर निकले। शिकार का पीछा करते करते वे अपने साथियों से बहुत दूर निकल गए और जंगल में रास्ता भूल गए।

शाम ढलने लगी थी। चलते चलते वे एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ से दो रास्ते जाते थे। बादशाह सोच में पड़ गए कि किधर जाएँ।

दोराहे पर बैठा लड़का

वहीं एक पेड़ के नीचे एक दुबला पतला लड़का बैठा था। उसके कपड़े साधारण थे। बादशाह ने घोड़े पर से ही पूछा:

“ओ लड़के! इनमें से आगरा का रास्ता कौन सा है?”

लड़के ने सिर उठाकर कहा, “हुज़ूर, रास्ते तो चलते नहीं हैं। चलते तो आप हैं। पूछिए कि मुझे किस तरफ़ चलना चाहिए।”

बादशाह पहले चौंके, फिर मुस्कुरा दिए। उन्हें लड़के की बात में समझदारी दिखी। उन्होंने पूछा, “अच्छा, तो मुझे किधर चलना चाहिए?”

लड़के ने दाहिनी तरफ़ इशारा किया और पूरा रास्ता समझा दिया।

फिर उसने ऊपर देखकर कहा, “वैसे आप कोई आम आदमी नहीं लगते। आपका घोड़ा, आपकी तलवार और आपके बोलने का तरीक़ा बताता है कि आप कोई बड़े आदमी हैं। कहीं आप ख़ुद बादशाह अकबर तो नहीं?”

बादशाह हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, “तुम्हारा नाम क्या है?”

“महेश दास”, लड़के ने कहा।

बादशाह ने अपनी एक अंगूठी उतारकर उसे दे दी और कहा, “यह रखो। कभी आगरा आओ, तो यह अंगूठी दिखाकर महल में मुझसे मिलने आ जाना।”

महल के दरवाज़े पर

कुछ साल बीत गए। महेश दास बड़ा हुआ और एक दिन वह सच में आगरा पहुँच गया।

महल के दरवाज़े पर पहरेदार ने उसे रोक दिया। महेश दास के कपड़े साधारण थे, इसलिए पहरेदार ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा और कहा, “भाग जा यहाँ से।”

महेश दास ने अंगूठी दिखाई और कहा कि यह ख़ुद बादशाह ने दी है।

अब पहरेदार समझ गया कि यह लड़का सच में अंदर जाएगा और बादशाह इसे ज़रूर कुछ इनाम देंगे। वह लालच में आ गया। बोला:

“अंदर जाने दूँगा, पर एक शर्त है। बादशाह तुझे जो भी इनाम दें, उसका आधा हिस्सा मुझे मिलेगा।”

महेश दास ने एक पल सोचा और मुस्कुराकर कहा, “ठीक है, आधा तुम्हारा।”

महल के दरवाज़े पर पहरेदार से बात करता महेश दास, हाथ में अंगूठी
महल के दरवाज़े पर पहरेदार और महेश दास

दरबार में अनोखी माँग

अंदर पहुँचकर महेश दास ने बादशाह को अंगूठी दिखाई। बादशाह ने उसे तुरंत पहचान लिया और बहुत ख़ुश हुए।

उन्होंने कहा, “माँगो, क्या इनाम चाहिए? सोना, ज़मीन, जो माँगोगे मिलेगा।”

महेश दास ने हाथ जोड़कर कहा, “हुज़ूर, मुझे सोना नहीं चाहिए। मुझे सौ कोड़े चाहिए।”

पूरा दरबार सन्न रह गया। बादशाह बोले, “यह कैसा इनाम माँग रहे हो?”

महेश दास ने शांति से सारी बात बता दी: “हुज़ूर, दरवाज़े के पहरेदार ने मुझे अंदर आने के बदले इनाम का आधा हिस्सा माँगा था। मैंने वादा किया है। अब सौ में से पचास कोड़े उसके हुए।”

बादशाह पहले हैरान हुए, फिर ज़ोर से हँस पड़े। उन्होंने कहा, “तुम्हारी बुद्धि कमाल की है।”

बादशाह ने लालची पहरेदार को उसी दिन नौकरी से निकाल दिया, और महेश दास को अपने दरबार में जगह दे दी। उन्हें नया नाम मिला, बीरबल।

आगे चलकर यही बीरबल बादशाह अकबर के सबसे प्यारे और सबसे समझदार साथी बने।

कहानी की सीख

समझदारी उम्र, कपड़ों या पैसों से नहीं आती, सोचने के तरीक़े से आती है। और लालच का नतीजा हमेशा बुरा होता है। पहरेदार ने बिना मेहनत के आधा हिस्सा माँगा था, और आख़िर में उसे अपनी नौकरी गँवानी पड़ी।

5 लाइन में छोटी कहानी

  1. शिकार पर भटके बादशाह अकबर को जंगल के दोराहे पर महेश दास नाम का एक लड़का मिला।
  2. लड़के ने समझदारी से रास्ता बताया और पहचान भी लिया कि यह बादशाह हैं।
  3. बादशाह ने उसे अपनी अंगूठी देकर महल आने को कहा।
  4. महल के पहरेदार ने लालच में इनाम का आधा हिस्सा माँगा, तो महेश दास ने इनाम में सौ कोड़े माँग लिए।
  5. बादशाह ने लालची पहरेदार को निकाल दिया और महेश दास को बीरबल नाम देकर दरबार में रख लिया।

कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
दोराहावह जगह जहाँ से दो रास्ते अलग अलग जाते हैं
पहरेदारदरवाज़े पर पहरा देने वाला सिपाही
कोड़ापुराने ज़माने में सज़ा देने के लिए चमड़े की बनी चाबुक
शर्तकोई काम करने से पहले रखी गई माँग
लालचबिना मेहनत के ज़्यादा पाने की इच्छा
दरबारराजा की सभा

यह कहानी कहाँ से आई है?

यह कहानी एक लोककथा है, यानी यह सदियों तक लोगों के मुँह से मुँह तक चलती रही। इसके कई रूप मिलते हैं: कहीं पहरेदार की जगह एक दरबारी होता है, कहीं अंगूठी की जगह कोई और निशानी। हमने बच्चों के लिए कहानी को सरल रखा है और कोड़े वाली सज़ा की जगह सिर्फ़ नौकरी से निकाले जाने पर रुके हैं।

बीरबल असली इंसान थे। उनका असली नाम महेश दास था। जन्म लगभग 1528 में आज के कानपुर ज़िले (उत्तर प्रदेश) में हुआ। वे अकबर के नवरत्नों में से एक थे, उन्हें “राजा” की उपाधि और “कवि प्रिय” का सम्मान मिला, और वे लगभग तीस साल अकबर के साथ रहे। 16 फ़रवरी 1586 को मलंदरी दर्रे की लड़ाई में उनकी मृत्यु हुई। इतिहासकार कहते हैं कि चतुराई वाली ये कहानियाँ बाद में बनीं, ख़ासकर उन्नीसवीं सदी में। (बीरबल, विकिपीडिया)

बच्चों के लिए सवाल जवाब

बादशाह अकबर जंगल में क्यों भटक गए थे?

वे शिकार का पीछा करते करते अपने साथियों से बहुत दूर निकल गए थे।

महेश दास ने रास्ता पूछने पर क्या कहा?

उन्होंने कहा कि रास्ते चलते नहीं हैं, चलते तो आप हैं, इसलिए पूछिए कि मुझे किस तरफ़ चलना चाहिए।

पहरेदार ने अंदर जाने के लिए क्या शर्त रखी?

उसने कहा कि बादशाह जो इनाम देंगे, उसका आधा हिस्सा उसे मिलना चाहिए।

महेश दास ने इनाम में क्या माँगा?

उन्होंने सौ कोड़े माँगे, ताकि आधे यानी पचास कोड़े लालची पहरेदार के हिस्से में आएँ।

महेश दास को बीरबल नाम किसने दिया?

बादशाह अकबर ने।

बच्चों को कहानी सुनाने का आसान तरीका

  • कहानी शुरू करने से पहले बच्चे से पूछिए, “अगर कोई रास्ता भूल जाए तो तुम कैसे बताओगे?” फिर महेश दास का जवाब सुनाइए।
  • बीच में रुककर पूछिए, “पहरेदार की शर्त मानकर महेश दास ने क्या चाल चली होगी?” बच्चे को ख़ुद सोचने दीजिए।
  • बच्चे को बताइए कि बीरबल सच में एक असली इंसान थे। असली और कहानी का फ़र्क़ बच्चों को शुरू से समझ आना चाहिए।

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