Geeta Shlok for Students: छात्रों के लिए गीता के 15 श्लोक अर्थ सहित

अपडेट: 12 मिनट में पढ़ें
Geeta shlok for students: कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए
गीता का उपदेश एक उलझे हुए युवा, अर्जुन, को दिया गया था

Geeta shlok for students ढूँढने वाले ज़्यादातर छात्र एक जैसी परेशानियों से गुज़र रहे होते हैं: परीक्षा का डर, पढ़ाई में मन न लगना, फ़ोन का बार-बार हाथ में आ जाना। दिलचस्प बात यह है कि भगवद गीता का उपदेश भी एक उलझे हुए, घबराए हुए युवा को ही दिया गया था। वह युवा था अर्जुन। इसलिए गीता के कई श्लोक सीधे छात्र जीवन पर लागू होते हैं।

इस लेख में गीता के 15 ऐसे श्लोक हैं जो छात्रों के सबसे ज़्यादा काम के हैं। हर श्लोक के साथ तीन चीज़ें दी गई हैं: मूल संस्कृत, आसान हिंदी अर्थ, और पढ़ाई में उसे कैसे लागू करें। अंत में स्कूल असेंबली के लिए 5 छोटे श्लोक और श्लोक याद करने का आसान तरीका भी है।

श्लोकों का पाठ गीता प्रेस, गोरखपुर की श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार है, और हर श्लोक के साथ अध्याय व श्लोक संख्या दी गई है, ताकि आप ख़ुद मिलान कर सकें।

किस परेशानी में कौन सा श्लोक पढ़ें?

परेशानीश्लोकगीता
रिज़ल्ट की चिंता, परीक्षा का डरकर्मण्येवाधिकारस्ते2.47
“थोड़ा पढ़ने से क्या होगा?”नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति2.40
पढ़ाई में मन भटकता हैयतो यतो निश्चरति6.26
एकाग्रता नहीं बनतीअसंशयं महाबाहो6.35
फ़ोन और रील्स की लतध्यायतो विषयान्पुंसः2.62-63
ख़ुद पर भरोसा नहींउद्धरेदात्मनात्मानम्6.5
नींद और दिनचर्या बिगड़ी हुईयुक्ताहारविहारस्य6.17
टीचर से सवाल पूछने में झिझकतद्विद्धि प्रणिपातेन4.34
कम नंबर या एक बार की असफलतामात्रास्पर्शास्तु2.14
दोस्तों से तुलना, करियर चुननाश्रेयान्स्वधर्मो3.35

Geeta Shlok for Students: गीता के 15 श्लोक अर्थ सहित

1. कर्मण्येवाधिकारस्ते: रिज़ल्ट की चिंता छोड़ो (गीता 2.47)

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए फल को कर्म करने का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।

छात्र जीवन में: पेपर में क्या आएगा और नंबर कितने आएँगे, यह पूरी तरह आपके हाथ में नहीं है। लेकिन आज आपने कितने घंटे ईमानदारी से पढ़ा और कितने सवाल हल किए, यह पूरी तरह आपके हाथ में है। ध्यान उसी पर रखिए। और “रिज़ल्ट का तो पता नहीं, फिर पढ़ूँ ही क्यों” वाला बहाना? श्लोक की आख़िरी पंक्ति ठीक इसी को मना करती है।

2. नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति: थोड़ी मेहनत भी बेकार नहीं जाती (गीता 2.40)

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्॥

अर्थ: (निष्काम कर्म के) इस मार्ग में शुरू किया गया प्रयास कभी नष्ट नहीं होता, और इसमें उल्टा फल भी नहीं मिलता। इस धर्म का थोड़ा-सा पालन भी बड़े भय से बचा लेता है।

छात्र जीवन में: पूरा सिलेबस पहाड़ जैसा लगता है, इसलिए कई छात्र शुरू ही नहीं करते। गीता का भरोसा है कि रोज़ का आधा घंटा भी बेकार नहीं जाता। बड़े अध्याय को छोटे हिस्सों में बाँटिए और आज बस पहला हिस्सा पूरा कीजिए।

3. योगः कर्मसु कौशलम्: सही तरीके से पढ़ना (गीता 2.50)

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥

अर्थ: समबुद्धि वाला मनुष्य इसी जीवन में पुण्य और पाप, दोनों के बंधन से ऊपर उठ जाता है। इसलिए योग में लग जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।

छात्र जीवन में: पढ़ाई में कुशलता का मतलब घंटे गिनना नहीं, सही तरीका है: पढ़े हुए को दोहराना, किताब बंद करके ख़ुद से सवाल पूछना, पुराने पेपर हल करना। दो घंटे ध्यान से पढ़ना, पाँच घंटे बेमन से बैठने से बेहतर है।

4. उद्धरेदात्मनात्मानम्: अपने सबसे अच्छे दोस्त आप ख़ुद हैं (गीता 6.5)

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अर्थ: मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, अपने आप को नीचे नहीं गिराना चाहिए। मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

छात्र जीवन में: टीचर, कोचिंग और माता-पिता रास्ता दिखा सकते हैं, पर पढ़ना आपको ही है। “मुझसे नहीं होगा” कहने वाला मन आपका शत्रु बन जाता है, और “आज एक अध्याय पूरा करूँगा” कहने वाला मन आपका मित्र।

5. यतो यतो निश्चरति: जब पढ़ते समय मन भटके (गीता 6.26)

दीपक की रोशनी में ध्यान से लिखता हुआ युवा
मन भटके तो डाँटिए नहीं, बस लौट आइए, यही अभ्यास है
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥

अर्थ: यह चंचल और अस्थिर मन जिस-जिस ओर भागे, उस-उस ओर से इसे रोककर बार-बार अपने वश में लाना चाहिए।

छात्र जीवन में: पढ़ते समय मन का भटकना सामान्य है, गीता भी यही मानती है। उपाय यह नहीं कि ख़ुद को डाँटें। उपाय यह है कि जैसे ही ध्यान भटके, चुपचाप किताब पर लौट आएँ। हर बार लौटना ही अभ्यास है। एक काम की तरकीब: पढ़ाई के बीच जो ख़्याल आएँ, उन्हें एक कागज़ पर लिख लें और पढ़ाई ख़त्म होने के बाद देखें।

6. असंशयं महाबाहो: एकाग्रता अभ्यास से बनती है (गीता 6.35)

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

अर्थ: (श्रीकृष्ण कहते हैं) हे महाबाहो, निःसंदेह मन चंचल है और इसे वश में करना कठिन है; परंतु हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह वश में आ जाता है।

छात्र जीवन में: अर्जुन जैसे योद्धा ने भी माना था कि मन को काबू करना कठिन है (6.34)। श्रीकृष्ण ने इसे नकारा नहीं, बल्कि दो उपाय बताए। रोज़ एक तय समय और तय जगह पर पढ़ने बैठना अभ्यास है। पढ़ाई के समय फ़ोन को दूसरे कमरे में रख देना वैराग्य का छोटा-सा रूप है।

7. ध्यायतो विषयान्पुंसः: फ़ोन की लत की 8 सीढ़ियाँ (गीता 2.62-63)

रात में फ़ोन चलाता युवा, यहीं से ध्यान भटकना शुरू होता है
बस एक रील: यहीं से वह चेन शुरू होती है जिसे गीता 2.62 में बताती है
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

अर्थ: विषयों का चिंतन करते रहने से उनमें आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से कामना पैदा होती है, और कामना (पूरी न होने) से क्रोध। क्रोध से मूढ़ता आती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के भ्रम से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।

छात्र जीवन में: यही चेन फ़ोन की लत में दिखती है। पहले “बस एक रील” का ख़्याल, फिर आदत, फिर और देखने की इच्छा, कोई टोके तो चिढ़, और अंत में पढ़ा हुआ याद न रहना। इस चेन को पहली सीढ़ी पर तोड़ना सबसे आसान है: पढ़ाई के समय फ़ोन नज़र से दूर रखिए। यही श्लोक परीक्षा के समय गुस्से पर भी लागू होता है, क्योंकि घबराहट और गुस्से में याद किए हुए उत्तर भी भूल जाते हैं।

रील देखते-देखते दिमाग़ को क्या होता है: गीता 2.62 के 8 क़दम और रिसर्च (SanatanSci)

8. युक्ताहारविहारस्य: नींद और दिनचर्या का संतुलन (गीता 6.17)

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

अर्थ: जिसका खाना और घूमना-फिरना संतुलित है, जिसके कर्मों में प्रयास संतुलित है, और जिसका सोना-जागना संतुलित है, उसके लिए योग दुःखों का नाश करने वाला होता है।

छात्र जीवन में: परीक्षा से पहले रात-रात भर जागना और खाना छोड़ देना गीता के हिसाब से सही नहीं है। इससे ठीक पहले वाले श्लोक (6.16) में साफ़ कहा गया है कि बहुत ज़्यादा या बहुत कम खाने और सोने वाले का योग सिद्ध नहीं होता। पूरी नींद लेने से पढ़ा हुआ बेहतर याद रहता है।

9. तद्विद्धि प्रणिपातेन: सवाल पूछने से ज्ञान मिलता है (गीता 4.34)

कक्षा में शिक्षक की बात ध्यान से सुनते और सवाल पूछते छात्र
विनम्रता, सवाल और सम्मान: गीता के अनुसार सीखने के तीन तरीके
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

अर्थ: उस ज्ञान को तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर समझो। उन्हें विनम्रता से प्रणाम करके, उनकी सेवा करके और निष्कपट भाव से प्रश्न पूछकर। वे ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।

छात्र जीवन में: गीता सीखने के तीन रास्ते बताती है: विनम्रता (प्रणिपात), सवाल पूछना (परिप्रश्न) और सम्मान व सेवा। जो बात समझ न आए, क्लास के बाद टीचर से ज़रूर पूछिए। सवाल पूछना कमज़ोरी नहीं है। पूरी गीता भी अर्जुन के सवालों से ही आगे बढ़ती है।

10. श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्: ज्ञान पाने के तीन गुण (गीता 4.39)

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

अर्थ: श्रद्धा रखने वाला, लगन से जुटा हुआ और इंद्रियों को वश में रखने वाला मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है, और ज्ञान पाकर वह शीघ्र ही परम शांति पा लेता है।

छात्र जीवन में: ज्ञान के तीन गुण हैं: श्रद्धा (विषय और शिक्षक पर भरोसा), तत्परता (लगन) और संयम (ध्यान भटकाने वाली चीज़ों पर काबू)। तीनों में से कोई एक भी कमज़ोर हो तो पढ़ाई अधूरी रह जाती है।

11. न हि ज्ञानेन सदृशम्: ज्ञान से बढ़कर कुछ नहीं (गीता 4.38)

खुली पुस्तक और जलता दीपक
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते: ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। योग में सिद्ध हुआ मनुष्य समय आने पर उस ज्ञान को अपने भीतर स्वयं पा लेता है।

छात्र जीवन में: श्लोक का एक शब्द ध्यान देने लायक है: “कालेन”, यानी समय के साथ। समझ एक दिन में नहीं आती। रोज़ का थोड़ा-थोड़ा अभ्यास ही उसे धीरे-धीरे पक्का करता है, इसलिए एक-दो दिन में फ़र्क न दिखे तो हिम्मत मत हारिए।

12. मात्रास्पर्शास्तु: कम नंबर से टूटिए मत (गीता 2.14)

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

अर्थ: हे कौन्तेय, इंद्रियों और विषयों के मेल से सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख मिलते हैं। ये आते-जाते रहते हैं और स्थायी नहीं हैं, इसलिए हे भारत, इन्हें सहन करना सीखो।

छात्र जीवन में: एक टेस्ट में कम नंबर या एक बुरा दिन मौसम की तरह है, आता है और चला जाता है। उसे अपनी पूरी पढ़ाई या अपनी क़ाबिलियत का फ़ैसला मत बनने दीजिए। ग़लती देखिए, सुधारिए, और अगले दिन फिर बैठिए।

13. यद्यदाचरति श्रेष्ठः: आप किसी के आदर्श हैं (गीता 3.21)

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ: श्रेष्ठ मनुष्य जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो उदाहरण स्थापित करता है, लोग उसी का अनुसरण करते हैं।

छात्र जीवन में: इस श्लोक से दो सीख मिलती हैं। पहली: अपने आदर्श सोच-समझकर चुनिए, क्योंकि हम धीरे-धीरे उन्हीं जैसे बन जाते हैं। दूसरी: आपके छोटे भाई-बहन और जूनियर आपको देख रहे हैं, इसलिए आपका पढ़ने का तरीका उनके लिए उदाहरण बनता है।

14. श्रेयान्स्वधर्मः: दूसरों की नकल नहीं, अपना रास्ता (गीता 3.35)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

अर्थ: दूसरे के धर्म का अच्छी तरह पालन करने से, कमियों के बावजूद अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, जबकि दूसरे का धर्म भय देने वाला है।

छात्र जीवन में: विषय या करियर चुनते समय दोस्तों की नकल मत कीजिए, अपनी रुचि और क्षमता देखिए। अपने रास्ते पर साधारण शुरुआत भी, किसी और के रास्ते पर दिखावटी अच्छी शुरुआत से बेहतर है।

15. स्वाध्यायाभ्यसनम्: रोज़ पढ़ना भी तप है (गीता 17.15)

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

अर्थ: जो वचन किसी को परेशान न करे, सच्चा हो, प्रिय हो और हितकारी हो, तथा स्वाध्याय का नियमित अभ्यास, इसे वाणी का तप कहा गया है।

छात्र जीवन में: गीता के अनुसार रोज़ पढ़ना (स्वाध्याय का अभ्यास) अपने आप में एक तप है, यानी पढ़ाई भी साधना है। और दोस्तों से बात करते समय सच, मीठा और काम का बोलिए; बेवजह की बहस भी ध्यान और समय दोनों खाती है।

स्कूल असेंबली के लिए 5 छोटे गीता श्लोक (Geeta shlok for school assembly)

प्रार्थना सभा में बोलने के लिए छोटे और आसानी से याद होने वाले श्लोक:

  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (2.47): हमारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं।
  • योगः कर्मसु कौशलम् (2.50): कर्मों में कुशलता ही योग है।
  • न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (4.38): ज्ञान के समान पवित्र कुछ भी नहीं है।
  • उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् (6.5): अपना उद्धार स्वयं करो, अपने आप को गिरने मत दो।
  • यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (4.7): जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं (भगवान) स्वयं प्रकट होता हूँ।

असेंबली में एक मिनट का आसान क्रम: पहले श्लोक बोलें, फिर उसका अर्थ, और अंत में एक वाक्य कि आज इससे क्या सीखें।

गीता के श्लोक याद करने का आसान तरीका

  • रोज़ सिर्फ़ एक श्लोक लीजिए, पूरा अध्याय नहीं।
  • पहले अर्थ समझिए, फिर याद कीजिए। अर्थ पता हो तो श्लोक जल्दी याद होता है।
  • लंबे शब्दों को टुकड़ों में बोलिए, जैसे “कर्मण्ये वाधिकारस्ते” या “नेहाभि क्रमनाशोऽस्ति”।
  • सुबह पढ़िए और रात को सोने से पहले एक बार दोहराइए।
  • श्लोक किसी को सुनाइए। दूसरों को सिखाने से अपनी याद पक्की होती है।

छात्रों के लिए गीता की कौन सी किताब लें?

अगर आप रोज़ एक श्लोक पढ़ने की आदत डालना चाहते हैं, तो घर में अपनी एक गीता रखना सबसे अच्छा है:

पूरी गीता का सार सुनें

अगर आप गीता के मुख्य उपदेश एक साथ सुनना चाहते हैं, तो यह वीडियो देखिए:

भगवद गीता के 121 अनमोल वचन, श्रीमद्भगवद्गीता सार (SanatanSci)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

छात्रों के लिए गीता का सबसे अच्छा श्लोक (best Geeta shlok for students) कौन सा है?

सबसे लोकप्रिय श्लोक “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (2.47) है, क्योंकि यह रिज़ल्ट की चिंता छोड़कर मेहनत पर ध्यान देना सिखाता है। आत्मविश्वास के लिए “उद्धरेदात्मनात्मानम्” (6.5) भी उतना ही उपयोगी है।

पढ़ाई में मन न लगे तो गीता का कौन सा श्लोक पढ़ें?

अध्याय 6 के श्लोक 26 (“यतो यतो निश्चरति”) और 35 (“असंशयं महाबाहो”)। पहला बताता है कि भटकते मन को बार-बार वापस लाना है, दूसरा बताता है कि अभ्यास और वैराग्य से मन वश में आता है।

परीक्षा के डर के लिए गीता क्या कहती है?

गीता 2.47 के अनुसार अपना ध्यान मेहनत पर रखिए, नतीजे पर नहीं। और 2.14 के अनुसार सुख-दुःख और सफलता-असफलता आते-जाते रहते हैं, इसलिए एक परीक्षा पूरी ज़िंदगी का फ़ैसला नहीं है।

भगवद गीता में कितने अध्याय और श्लोक हैं?

भगवद गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। यह महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है, जिसमें कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं।

निष्कर्ष

ये 15 Geeta shlok for students सिर्फ़ याद करने के लिए नहीं हैं, रोज़ की पढ़ाई में आज़माने के लिए हैं। शुरुआत किसी एक श्लोक से कीजिए: जिस परेशानी से आप सबसे ज़्यादा जूझ रहे हैं, ऊपर की तालिका में उसका श्लोक चुनिए, उसका अर्थ समझिए और इस हफ़्ते उसे अपनाकर देखिए। Bhagwat Geeta shlok for students की यह सूची बुकमार्क कर लीजिए, ताकि परीक्षा के दिनों में फिर से पढ़ सकें।

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गीता, विदुर नीति और उपनिषद की ऐसी ही बातें वीडियो में देखने के लिए SanatanSci YouTube चैनल से जुड़िए।

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