Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi

दोस्तों इस लेख (Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi) के माध्यम से आप भगवान् गौतम बुद्ध के अनमोल विचारों (Mahatma Gautam Buddha Quotes in Hindi) को जानेंगे। दुनिया को अपने विचारो से नया रास्ता दिखाने वाले भगवान गौतम बुद्ध भारत के महान दार्शनिक, वैज्ञानिक, धर्मगुरु, एक महान समाज सुधारक और बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। 

भगवन गौतम बुद्ध का जीवन परिचय

गौतम बुद्ध का जन्म ईसा से 563 साल पहले नेपाल के लुंबिनी वन में हुआ। उनका जन्म नाम सिद्धार्थ रखा गया। सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन कपिलवस्तु के राजा थे। सिद्धार्थ की मौसी गौतमी ने उनका लालन-पालन किया, क्योंकि सिद्धार्थ के जन्म के सात दिन बाद ही उनकी माँ का देहांत हो गया था।

शाक्य वंश में जन्मे सिद्धार्थ का सोलह वर्ष की उम्र में दंडपाणि शाक्य की कन्या यशोधरा के साथ विवाह हुआ। यशोधरा से उनको एक पुत्र मिला, जिसका नाम राहुल रखा गया। बाद में यशोधरा और राहुल दोनों बुद्ध के भिक्षु हो गए थे।

विद्वानों ने महात्मा बुद्ध के बारे में शुद्धोदन को पहले ही सूचित कर दिया था कि यह बालक या तो चक्रवर्ती राजा होगा या विरक्त होकर संसार का कल्याण करेगा। पिता होने के नाते शुद्धोदन इस बात को लेकर चिंतित रहते थे। इस भविष्यवाणी को सुनकर राजा शुद्धोदन ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार सिद्धार्थ को दुःख से दूर रखने की कोशिश की।

फिर भी उनकी दृष्टि चार दृश्यों पर पड़ी—एक बूढ़े अपाहिज आदमी, एक बीमार आदमी, एक अंतिम संस्कार को ले जाती हुई लाश और एक साधु। इन चार दृश्यों को देखकर सिद्धार्थ समझ गए कि सबका जन्म होता है, सबका बुढ़ापा आता है, सबको बीमारी होती है और एक दिन सबकी मौत होती है।

उन्होंने अपना धनवान जीवन, जाति, पत्नी, बंधु सबको छोड़कर साधु का जीवन अपनाने का निर्णय ले लिया। ताकि वे जन्म, बढ़ापे, दर्द, बीमारी और मौत के बारे में कोई उत्तर खोज पाएँ।

भगवान् बुद्ध ने कहा है

भगवान् बुद्ध ने कहा है कि समस्त प्राणियों के कर्म दस बुराइयों में ही निहित हैं। अगर इनसे बचा जाए तो सबकुछ ठीक हो जाएगा। हत्या, चोरी तथा व्यभिचार ये तीनों बुराइयाँ शरीर की बुराइयाँ हैं।

झूठ बोलना, गाली देना, बकवास करना तथा निंदा करना ये चार बुराइयाँ जीवन की हैं। लालच, द्वेष तथा त्रुटि ये तीन मन की बुराइयाँ हैं। अगर इन दसों बुराइयों से मनुष्य बच जाए तो वह सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हो जाता।

महात्मा बुद्ध के उपदेश व उनके अनमोल विचार आज भी हमारे समाज और युवा वर्ग के लिए प्रेरणादायक हैं। उनके अनमोल विचारों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति सुखी व शांतिपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकता है।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi

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Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi

आइए जानते हैं भगवान बुद्ध के अनमोल वचन

महात्मा बुद्ध के अनुसार, मनुष्य क्रोध को प्रेम से, पाप को सदाचार से, लोभ को दान से और झूठ को सत्य से जीत सकता है ।

महात्मा बुद्ध के अनुसार, हजार योद्धाओं पर विजय पाना आसान है, लेकिन जो अपने ऊपर विजय पाता है, वही सच्चा विजयी है ।

घृणा घृणा से कभी कम नहीं होती, प्रेम से ही होती है ।

हम जो कुछ भी हैं वह हमने आज तक क्या सोचा इस बात का परिणाम है यदि कोई व्यक्ति बुरी सोच के साथ बोलता या काम करता है, तो उसे कष्ट ही मिलता है यदि कोई व्यक्ति शुद्ध विचारों के साथ बोलता या काम करता है, तो उसकी परछाई की तरह खुशी उसका साथ कभी नहीं छोड़ती

भगवन गौतम बुद्ध के अनुसार, जैसे मोमबत्ती बिना आग के नहीं जल सकती, मनुष्य भी आध्यात्मिक जीवन के बिना नहीं जी सकता ।

आपके पास जो कुछ भी है, उसे बढ़ा – चढ़ाकर मत बताइए, और न ही दूसरों से ईर्ष्या कीजिए, जो दूसरों से ईर्ष्या करता है उसे मन की शांति नहीं मिलती।

शक की आदत से भयावह कुछ भी नहीं है, शक लोगों को अलग करता है यह एक ऐसा जहर है, जो मित्रता खतम करता है और अच्छे रिश्तों को तोड़ता है यह एक काँटा है जो चोटिल करता है, एक तलवार है जो वध करती है ।

मनुष्य स्वयं ही अपना स्वामी है स्वयं ही वह अपनी गति है इसलिए तुम अपने आपको संयम में रखो, जैसे घुड़सवार अपने सधे हुए घोड़े को अपने वश में रखता है ।

भगवान बुद्ध के अनमोल वचन (9- 18)

भगवन गौतम बुद्ध के अनुसार, ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से  जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है।

जो बिना चित्त बिगाड़े, हनन और बंधन को सहन करता है , क्षमा – बल ही जिसका सेनानी है, मैं उसी को ब्राह्मण कहता हूँ ।

जो अक्रोधी है , व्रती है , शीलवान है , बहुश्रुत है , संयमी और अंतिम शरीरवाला है , उसे ही मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।

चित्त से ही जगत् की सत्ता है और जगत् की सत्ता चित्त है ।

भगवन गौतम बुद्ध ने कहा हैं, प्रमाद में मत फँसो। भोग – विलास में मत फँसो । कामदेव के चक्कर में मत फँसो । प्रमाद से दूर रहकर ध्यान में लगनेवाला व्यक्ति महासुख प्राप्त करता है।

भगवन गौतम बुद्ध ने कहा हैं, कंजूस आदमी देवलोक में नहीं जाते । मूर्ख लोग दान की प्रशंसा नहीं करते । पंडित लोग दान का अनुमोदन करते हैं । दान से ही मनुष्य लोक – परलोक में सुखी होता है ।

प्रमाद में मत फँसो। भोग-विलास में मत फँसो। कामदेव के चक्कर में मत फँसो। प्रमाद से दूर रहकर ध्यान में लगनेवाला व्यक्ति महासुख प्राप्त करता है।

Bhagwan Gautam Buddha अनुसार, प्रमाद न करने से, जागरूक रहने से अमृत का पद मिलता है, निर्वाण मिलता है। प्रमाद करने से आदमी बे-मौत मरता है। अप्रमादी नहीं मरते। प्रमादी तो जीते हुए भी मरे जैसे हैं।

कंजूस आदमी देवलोक में नहीं जाते। मूर्ख लोग दान की प्रशंसा नहीं करते। पंडित लोग दान का अनुमोदन करते हैं। दान से ही मनुष्य लोक-परलोक में सुखी होता है।

भगवान बुद्ध के अनमोल वचन (18-24)

Bhagwan Gautam Buddha अनुसार, तृष्णा की नदियाँ मनुष्य को बहुत प्यारी और मनोहर लगती हैं। जो इनमें नहाकर सुख खोजते हैं, उन्हें बार-बार जन्म, मरण और बुढ़ापे के चक्कर में पड़ना पड़ता है।

लोहे का बंधन हो, लकड़ी का बंधन हो, रस्सी का बंधन हो, इसे बुद्धिमान लोग बंधन नहीं मानते। इनसे कड़ा बंधन तो सोने का, चाँदी का, मणि का, कुंडल का, पुत्र का, स्त्री का है।

गृहस्थ को चाहिए कि वह किसी प्राणी की हिंसा न करे, चोरी न करे, असत्य न बोले, शराब आदि मादक पदार्थों का सेवन न करे, व्यभिचार से बचे और रात्रि में असमय भोजन न करे।

मन ही सारी प्रवृत्तियों का अगुवा है। प्रवृत्तियों का आरंभ मन से ही होता है। वे मनोमय हैं।

जब कोई आदमी दूषित मन से बोलता है या वैसा कोई काम करता है तो दुःख उसका पीछा उसी तरह करता है, जिस तरह बैलगाड़ी के पहिए बैल के पैरों का पीछा करते हैं।

Gautam Buddha अनुसार, सद्भाव से ही समाज निर्माण संभव है। जिससे एक व्यक्ति से दूसरे को अधिकाधिक हस्तांतरित होने पर श्रेष्ठ समाज की कल्पना को साकार किया जा सकता है।

जो आदमी शांत पद चाहता है, जो कल्याण करने में कुशल है, उसे चाहिए कि वह योग्य और परम सरल बने। उसकी बातें सुंदर, मीठी और नम्रता से भरी हों। उसे संतोषी होना चाहिए। उसका पोषण सहज होना चाहिए। कामों में उसे ज्यादा फँसा नहीं होना चाहिए। उसका जीवन सादा हो। उसकी इंद्रियाँ शांत हों। वह चतुर हो। वह ढीठ न हो। किसी कुल में उसकी आसक्ति नहीं होनी चाहिए।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan (25-32)

वह ऐसा कोई छोटे से छोटा काम भी न करे, जिसके लिए दूसरे जानकार लोग उसे दोष दें। उसके मन में ऐसी भावना होनी चाहिए कि सब प्राणी सुखी हों, सबका कल्याण हो, सभी अच्छी तरह रहें।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan के अनुसार, कोई किसी को न ठगे। कोई किसी का अपमान न करे। वैर या विरोध से एक-दूसरे के दुःख की इच्छा न करें।

माता जैसे अपनी जान की परवाह न कर अपने इकलौते बेटे की रक्षा करती है, उसी तरह मनुष्य सभी प्राणियों के प्रति असीम प्रेमभाव बढ़ाए।

खड़ा हो चाहे चलता हो, बैठा हो चाहे लेटा हो, जब तक मनुष्य जागता है, तब तक उसे ऐसी ही स्मृति बनाए रखनी चाहिए। इसी का नाम ब्रह्म-विहार है। ऐसा मनुष्य किसी मिथ्या दृष्टि में नहीं पड़ता।

शीलवान व शुद्ध दर्शनवाला होकर वह काम, तृष्णा का नाश कर डालता है। उसका पुनर्जन्म नहीं होता।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan के अनुसार, जैसे कच्ची छत में जल भरता है, वैसे ही अज्ञानी के मन में कामनाएँ जमा होती हैं।

मन सभी धर्मों का अगुआ है, मन ही प्रधान है, सभी धर्म मनोमय हैं, जब कोई व्यक्ति अपने मन को मैला करके कोई वाणी बोलता है अथवा शरीर से कोई कर्म करता है तब सुख उसके पीछे हो लेता है, जैसे कभी न छोड़नेवाली छाया संग-संग चलने लगती है।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan (33-41)

Gautam Buddha ke Anmol Vachan के अनुसार, जो निसार को सार और सार को निसार समझते हैं, ऐसे गलत चिंतन में लगे हुए व्यक्तियों को सार प्राप्त नहीं होता।

सार को सार और निसार को निसार जानकर शुद्ध चिंतनवाले व्यक्ति सार को प्राप्त कर लेते हैं।

जैसे अच्छी तरह छाए हुए घर में वर्षा का पानी नहीं घुस पाता है, वैसे ही भावित (शमथ और विपश्यना) चित में राग नहीं घुस पाता है।

जो यहाँ (इस लोक में) प्रसन्न होता है,वह मृत्यु के बाद भी प्रसन्न होता है, पुण्य करनेवाला (व्यक्ति) दोनों जगह प्रसन्न होता है। वह अपने कर्मों की शुद्धता देखकर मुदित होता है, प्रमुदित होता है।

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Gautam Buddha ke Anmol Vachan in hindi के अनुसार, जो इस लोक में संतप्त होता है, प्राण छोड़कर परलोक में संतप्त होता है, पापकारी दोनों जगह संतप्त होता है, मैंने पाप किया है—इस चिंतन से संतप्त होता है और दुर्गति को प्राप्त होकर और भी अधिक संतप्त होता है।

जो इस लोक में आनंदित होता है, प्राण छोड़कर परलोक में आनंदित होता है, पुण्यकारी दोनों जगह आनंदित होता है, मैंने पुण्य किया है—इस चिंतन से आनंदित होता है और सुगति को प्राप्त होकर और भी अधिक आनंदित होता है।

सतत ध्यान करनेवाले, नित्य दृढ़ पराक्रम करनेवाले, धीर पुरुष उत्कृष्ट योगक्षेमवाले निर्वाण को प्राप्त  कर लेते हैं।  

उद्योगशील, स्मृतिमान, दोषरहित कर्म करनेवाले, सोच-समझकर काम करनेवाले, संयमी, धर्म का जीवन जीनेवाले, व्यक्ति का यश खूब बढ़ता है।

Gautam Buddha ke Anmol Vachan in hindi (44-51)

मूर्ख, दुर्बुधि जन प्रमाद में लगे रहते हैं, जबकि मेधावी श्रेष्ठ धन के समान अप्रमाद की रक्षा करता है।

Bhagwan Gautam Buddha ke के अनुसार, जब कोई समझदार व्यक्ति प्रमाद को अप्रमाद से जीत लेता है तब वह प्रज्ञारूपी प्रासाद पर चढ़ा हुआ शोकरहित हो जाता है, ऐसा  शोकरहित मनुष्य शोकग्रस्त जनों को ऐसे ही करुण भाव से देखता है जैसे की पर्वत पर खड़ा हुआ कोई व्यक्ति धरती पर खड़े लोगों को देखे।

अप्रमाद के कारण इंद्र देवताओं में श्रेष्ठता को प्राप्त हुए पंडित जन अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं, इसलिए प्रमाद की सदा निंदा होती है।

जो साधक अप्रमाद में रत रहता है या प्रमाद में भय देखता है, वह अपने छोटे-बड़े सभी कर्म-संस्कारों के बंधनों को आग की भाँति जलाते हुए चलता है।

जो साधक अप्रमाद में रत रहता है या प्रमाद में भय देखता है, उसका पतन नहीं हो सकता, वह तो निर्वाण के समीप पहुँचा हुआ होता है।

चंचल, चपल, कठिनाइयों से संरक्षण और कठिनाई से ही निवारण योग्य चित्त को मेधावी पुरुष वैसे ही सीधा करता है जैसे बाण बनानेवाला बाण को।

Bhagwan Gautam Buddh ke के अनुसार, जैसे जल से निकलकर धरती पर फेंकी गई मछली तड़पती है, वैसे ही मार के फंदे से निकलने के लिए ये चित्त तड़पता है।

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi

Bhagwan Gautam Buddha ke Anmol Vachan in Hindi

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S.K. Choudhary

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