Top 100 Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit – कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे

दोस्तों इस आर्टिकल में, मैं आपसे कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे (Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit ~ कबीर के दोहे हिन्दी अर्थ सहित) आपसे साझा करूँगा। जैसा का आप सभी जानते है संत कबीर दास जी ने अपने दोहों के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर प्रहार किया एवं समाज का मार्गदर्शन किया है। संत कबीर दास जी के एक-एक शब्द का अर्थ बहुत गहरा होता है। इस पोस्ट में आपको मिलेंगे संत कबीर दास के प्रसिद्ध दोहे जो आपको जिंदगी जीने का रास्ता दिखाते हैं। तो चलिए शुरू करते है संत कबीर के पहले दोहे से।

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे (Popular Dohe of Kabir Das)

Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit
Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit

Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit ~ कबीर के दोहे हिन्दी अर्थ सहित

दोहा – 01

विषय सूची

अंत कतरनी जीभ रस, नैनों उपला नेह ।

ताकी संगति रामजी, सपनेहू मद देह ॥

हिंदी अर्थ: वह व्यक्ति जिसके दिल में बुरी भावना होती है, आँखों में स्नेह और होंठों पर मिठास, हे भगवन्, सपने में भी मुझे ऐसी संगत में जाने मत देना। यदि आपको किसी व्यक्ति की मंशा और कार्यों में दोहरापन नजर आता है तो यह जान लीजिए कि वह व्यक्ति ऐसा नहीं, जिसकी संगत में आपको रहना चाहिए। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


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दोहा – 02

हिये कतरनी जीभ रस, मुख बोलन का रंग ।

आगे भले पीछे बुरा, ताको तजिए संग ॥

हिंदी अर्थ: वह जो मीठी बोली बोलता है और जिसमें वाक्पटुता होती है, यदि वह आपके सामने कुछ और पीछे कुछ और बोलता है तो उससे भी बचिए। ऐसे लोग अपने विचार, अपना पक्ष और स्थान बदल सकते हैं।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 03

आगे दरपन ऊजला, पीछै विषम विवकार ।

आगे पीछे आरसी, क्यो न पड़े मुखछार ॥

हिंदी अर्थ: दर्पण का एक उजला और एक काला पक्ष होता है, जो दो-दो चेहरे रखते हैं, उन्हें आलोचना सहनी पड़ती है। चमकनेवाली हर चीज सोना नहीं होती। हर कोई जो सही बात कहता है, जरूरी नहीं कि उसकी मंशा भी सही हो। इस बात को लेकर सतर्क रहें कि आप किससे बात करते हैं और क्या बात करते हैं।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 04

कछु कहि नीच न छेडि़ए, भलो न वाको संग ।

पत्थर डारे कीच में, उछलि बिगाड़े अंग ॥

हिंदी अर्थ: बुरे लोगों का संग खतरनाक होता है, यदि आप कीचड़ में पत्थर फेंकेंगे, तो गंदगी आपके ऊपर ही आएगी।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 05

कबीर सो धन संचिए, जो आगे को होय ।

सीस चढ़ाए गाठरी, जात न देखा कोय ॥

हिंदी अर्थ: कबीर कहते हैं, ऐसे तरीके अपनाइए और सम्मान इस प्रकार हासिल कीजिए, जो टिकाऊ हो, जो मौजूदा समय और हालात से आगे भी बरकरार रहे। सच्चे रास्ते पर चलकर सम्मान हासिल करो; क्योंकि विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा के बिना सफलता न केवल खोखली, बल्कि लँगड़ी भी होती है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 06

खट्टा – मीठा चरपरा, जिभ्या सब रस लेय ।

चारों कुतिया मिलि गई, पहरा किसका देय ॥

कबीर कहते हैं, हम जो कुछ खाते हैं, उसके लिए जीभ को संरक्षक का कार्य करना चाहिए, ताकि हमारी सेहत का खयाल रखा जा सके। यह दुःखद है कि जीभ स्वाद का गुलाम बन जाता है और सिर्फ स्वाद को संतुष्ट करने लगता है, जिससे शरीर का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है। कुत्ते से अपेक्षा की जाती है कि वह हमारे घर की रखवाली करेगा। यदि कुत्ता चोरों से मिल जाए तो समझिए तबाही निश्चित है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 07

कबीर तहाँ न जाइए, जहाँ न चोखा चीत ।

परपूटा औगुण घना, मुहड़े ऊपर मीत ॥

हिंदी अर्थ: कबीर, वहाँ मत जाइए जहाँ नीयत साफ न हो, पीठ पीछे आपकी आलोचना करते हैं, लेकिन सामने दोस्त बने रहते हैं। कबीर हमें सुझाव देते हैं कि हमें साफ नीयतवाले लोगों की संगत में रहना चाहिए, ऐसे लोग जो दूसरों का बुरा नहीं चाहते, अपने विचार अकसर नहीं बदलते और सिर्फ अपनी स्थिति को बनाए रखने की प्रेरणा से काम करते हैं, जबकि साफ नीयत न रखनेवाले हमारी सोच को संकीर्ण बना देते हैं। वे ऐसे होते हैं, जो मुँह पर हमारी तारीफ करते हैं , लेकिन पीठ पीछे कुछ और ही कहते हैं। हमें जल्दी ही यह पता चल जाता है और अविश्वास की एक परत दिखने लगती है, जिसके कारण बातचीत में बनावटीपन आ जाता है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 08

कबीर तहाँ न जाइए, जहाँ कपट को हेत ।

नौ मन बीज जू बोय के, खाली रहेगा खेत ॥

हिंदी अर्थ: कबीर, वहाँ मत जाइए, जहाँ धोखा देने की नीयत हो। बोरी बीज से भरी क्यों न हो, खराब मिट्टी में फसल नहीं उगेगी। अच्छी फसल के लिए अच्छी मिट्टी चाहिए। ऐसी जमीन, जिसमें सही गुण न हों, उस पर अगर एक बोरी बीज भी डाल दिए जाएँ तो भी फसल नहीं उग सकती है। आप जिस संगत में रहते हैं, वह बिल्कुल ऐसी ही होती है। हम चाहे कुशाग्र, बुद्धिमान, सक्षम और काबिल क्यों न हों, गलत संगत में ज्यादा समय बिताने से हमारा उत्साह समाप्त हो सकता है, क्षमता कुंद पड़ सकती है और अधिक तथा बेहतर करने की प्रेरणा समाप्त हो सकती है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 09

पंडित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय ।

वह अक्षर इनमें नहीं, हसि दे भावै रोय ॥

हिंदी अर्थ: आप जितनी पुस्तकें पढ़ते हैं, उन सभी में ज्ञान है, किंतु यह ज्ञान नहीं कि उदास चेहरे पर मुसकान कैसे लाई जाए। कबीर ऐसे इनसान से कहते हैं कि उसे न सिर्फ किताबों, शब्दजाल और सिद्धांतों पर भरोसा करना चाहिए, बल्कि उसमें अन्य मनुष्यों के साथ जुड़ने की क्षमता भी होनी चाहिए। सच यही है कि चाहे कितने ही सिद्धांत क्यों न दिए गए हों, किसी में भी रोते इनसान को हँसा देने की क्षमता नहीं है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 10

हेत प्रीति से जो मिले, तासों मिलिए धाय ।

अंतर राखी जो मिलै, तासो मिले बलाय ॥

हिंदी अर्थ: जो सच्चे स्नेह से मिले, उससे खूब प्रेम से मिलिए, किंतु उससे बचिए, जिसके दिल में बुरी भावना है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 11

सोऊँ तो सुपनै मिलूँ, जागूँ तो मन मांहि ।

लोचन राता सुधि हरी, बिछुरत कबहूँ नांहि ॥

हिंदी अर्थ: सपनों में जब मैं सोता हूँ, विचारों में जब जागता हूँ, तुम्हारी खोज में आँखें लाल हो जाती हैं, मेरी प्रार्थना है कि आप कभी दूर न रहें। ~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 12

एक साधै सब सधे, सब साधै सब जाय ।

माली सीचै मूल को, फूलै फलै अघाय ॥

हिंदी अर्थ: एक पर ध्यान लगाएँगे तो सबकुछ मिल सकता है। सब पर ध्यान लगाइए और सबकुछ खो जाएगा। वह जो जड़ों को सींचता है, उसे फल और फूल का आनंद मिलता है। वे मानते हैं कि जब हमारा लक्ष्य एक होता है, तब हम उन सभी को एक ही समय में हासिल कर पाते हैं, लेकिन हमारा प्रयास जब सबको एक साथ हासिल करने का होता है, तो सबके विफल होने की आशंका रहती है। हम जब जड़ों की, सिर्फ जड़ों की देखभाल करते हैं, तब पूरा पौधा फल – फूल जाता है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 13

दोष पराया देखकर, चले हसंत हसंत ।

अपना याद न आवई, जाका आदि न अंत ॥

हिंदी अर्थ: तुम दूसरों की कमियों पर हँसते हो और अपनी याद नहीं रखते, जिनकी कोई सीमा नहीं है। दूसरों की गलतियाँ निकालना और उन पर टिप्पणी करना न केवल आसान होता है , बल्कि उनके समाधान सुझा देना भी सरल होता है। अपने अंदर की कमी का पता लगाना और देखना न केवल कठिन होता है, बल्कि उनमें सुधार भी कठिन होता है। हमारे अंदर जो अनुचित है, उसकी कोई सीमा नहीं होती। दूसरों की कमी का मजा उठाने की बजाय यहीं से शुरुआत क्यों न करें।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 14

हीरा पाया पारखी, घन मह दिन्हा आन ।

चोट सही फुटा नहीं, तब पाई पहचान ॥

हिंदी अर्थ: हीरे की पहचान तब होती है, जब उस पर हथौड़े से चोट की जाती है। चोट करने पर जब वह नहीं टूटता, तभी पता चलता है कि वह हीरा है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 15

सूरा के मैदान में, कायर फंदा आय ।

ना भाजै न लडि़ सकै, मन – ही – मन पछिताय ॥

हिंदी अर्थ: बहादुरी के मैदान में कायर व्यक्ति फँसकर रह जाता है। वह न तो भाग पाता है, न ही लड़ पाता है, और इस तरह से वह मन – ही – मन में पछताता रहता है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 16

साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि ।

धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधु नाहि ॥

हिंदी अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति धन का नहीं, प्रसिद्धि का भूखा होता है। जो सिर्फ धन की चाह रखते हैं, वे बुद्धिमान नहीं होते।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 17

आषा तजि माया तजे, मोह तजै अरु मान ।

हरष शोक निंदा तजै कहै कबीर सन्त जान ॥

हिंदी अर्थ: न कोई आकांक्षा, न मोह, न ही घमंड। न कोई जश्न, न निंदा, बुद्धिमान की दशा ऐसी ही होती है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 18

चर्चा करुं तब चौहटे, ज्ञान करो तब दाए ।

ध्यान धरो तब एकिला, और न दुजा कोय ॥

हिंदी अर्थ: चर्चा चार लोगों से होती है, ज्ञान के लिए दो लोग चाहिए, लेकिन सोचने और फैसला लेने का काम स्वयं करना पड़ता है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 19

कबीर तेई पीर है, जे जानै पर पीर ।

जे पर पीर न जानही, ते काफिर बे पीर ॥

हिंदी अर्थ: बुद्धिमान वह है, जो दूसरों की पीड़ा को समझता है, जो नहीं समझता, बुद्धिमान नहीं है।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 20

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ ।

मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ ॥

हिंदी अर्थ: आपको धन चाहिए, जो गहरे पानी में ही मिल सकता है, मैं तो डर से किनारे पर ही बैठा रहा। हमें मोती गहराई में मिलते हैं और सीप तट पर मिलता है। ज्ञान तभी मिलता है, जब हम उसकी गहराई में डूब जाते हैं। काम पहचान का स्रोत तभी बनता है, जब हम अपने आपको गहराई में डुबा लेते हैं।~ Kabir Das Ke Dohe


दोहा – 21

जो मन लागे एक सों, तो निरुवार जाय ।

तूरा दो मुख बाजता, घना तमाचा खाय ॥

हिंदी अर्थ: एक पर ध्यान केंद्रित करने से निर्णय सुनिश्चत हो जाते हैं, दो मुँहा ढोल तो बस पिटता रह जाता है। ~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 22

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय ।

बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय ॥

हिंदी अर्थ: आलोचक की संगत में रहिए, जो पानी या साबुन के बिना भी आपको स्वच्छ कर देता है।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 23

कबीर निंदक मर गया, अब क्या कहिए जाए ।

ऐसा कोई न मिले, बीड़ा ले उठाए ॥

हिंदी अर्थ: आलोचक की मृत्य हो गई, अब क्या कहा जाए? ऐसा कोई नहीं बचा, जो मुझमें सुधार की जिम्मेदारी उठा सके।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 24

कबीर चिंता क्या करे, चिंता सों क्या होय ।

चिंता तो हरि ही करे, चिंता करो न कोय ॥

हिंदी अर्थ: चिंता मत करो, क्योंकि चिंता करने से वैसे भी क्या हो जाता है? तुम अपनी चिंता मत करो, यह काम संसार को करने दो।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 25

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक ।

जो पै भीतर लखि परे, भीतर बाहिर एक ॥

हिंदी अर्थ: आप जो बाहर है, उसकी बात करते हैं, जो अंदर रहता है, उसपर विचार नहीं करते। यदि आप अपने अंदर से जुड़ जाएँ तो एकता अंदर और बाहर की स्थापित हो जाएगी।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit

कबीर के दोहे हिन्दी अर्थ सहित
कबीर के दोहे हिन्दी अर्थ सहित

दोहा – 26

साकट का मुख बिंब है, निकसत वचन भुवंग ।

ताकी औषधि मौन है, विष नहिं व्यापै अंग ॥

हिंदी अर्थ: मूल्यहीन व्यक्ति का मुख साँप के समान है, जो केवल जहर उगलेगा; इसका इलाज केवल चुप्पी है।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 27

रात गँवाई सोए कर, दिवस गँवायो खाय ।

हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाय ॥

हिंदी अर्थ: रात सोकर गुजारी, दिन खाते – पीते बेकार गया; हीरे की तरह अनमोल जीवन के साथ, कौडि़यों के मूल्य की तरह बरताव किया।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 28

सूरा सोइ सराहिए, लडै धनी के हेत ।

पुरजा पुरजा है पडे, तऊ न छाडै खेत ॥

हिंदी अर्थ: वह शूरवीर है, जो सिद्धांतों के लिए संघर्ष करता है, मरने के लिए तैयार रहता है, युद्ध भूमि से कभी नहीं भागता है।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 29

सूर चला संग्राम को, कबहुं न देवे पीठ ।

आगे चले पाछे फिरे, ताको मुख नाहि दिठ ॥

हिंदी अर्थ: शूरवीर कभी हार नहीं मानता। जो ऐसा करता है, उसे प्रश्रय नहीं देना चाहिए।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 30

खेत न छोडै़ सूरमा, जूझै दो दल माहि ।

आसा जीवन – मरन की मन में राखै नाहि ॥

हिंदी अर्थ: शूरवीर युद्ध भूमि से कभी नहीं भागता है, मृत्यु की आशंका या जीवन की संभावना से विचलित नहीं होता है।~ Kabir Das Ji Ke Dohe Arth Sahit


दोहा – 31

सिर सांटै मा खेल है, सो सूरन का काम ।

पहिले मरना आग में, पीछै कहना राम ॥

हिंदी अर्थ: शूरवीर अपने कर्म की बाजी लगा देते हैं , पहले आग में कूदते हैं , फिर भगवान् को याद करते हैं। ~ Kabir Ke Dohe in Hindi


दोहा – 32

धन रहै न जोबन रहै, रहै न गाँव न ठाव ।

कबीर जग में जसै रहै, करदे किसी का काम ॥

हिंदी अर्थ: धन, जीवन और आर्थिक लाभ हमेशा के लिए नहीं रहते, ख्याति हमेशा बनी रहती है और दूसरों को लाभ पहुँचाती है। ~ Kabir Ke Dohe in Hindi


दोहा – 33

पंडित और मसालची, दोनों सूझत नांहि ।

औरन को करै चाँदना, आप अँधेरे माहि ॥

हिंदी अर्थ: ज्ञानी और मशाल दोनों समझ नहीं पाते, वे दूसरों को भले ही रोशनी दें , लेकिन स्वयं अँधेरे में ही रहते हैं। ~ Kabir Ke Dohe in Hindi


दोहा – 34

कबीर पढ़ना दूर कर, अति पढ़ना संसार ।

पीर न अपजै जीव की, क्यों पावै करतार ॥

हिंदी अर्थ: किताबें पढ़ने और बौद्धिकता का दिखावा करने का कोई लाभ नहीं, जिसमें समानुभूति नहीं, वह ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता । ~ Kabir Ke Dohe in Hindi


दोहा – 35

तरा मंडल बैठि के, चाँद बड़ाई खाय ।

उदै भया जब सूर का, तब तारा छिपि जाय ॥

हिंदी अर्थ: चंद्रमा सिर्फ तारों के बीच प्रमुखता से दिखाई पड़ता है, किंतु जैसे ही सूर्य निकलता है, सब छिप जाते हैं।~ Kabir Ke Dohe in Hindi


दोहा – 36

रन जंग बाजा बाजिया, सूरा आए धाय ।

पूरा सो तो लड़त है, कायर भागे जाय ॥

हिंदी अर्थ: जैसे ही रणभेरी बजती है, वीर आगे आ जाते हैं, बहादुर लड़ते हैं, जबकि डरपोक भाग जाते हैं। ~ Kabir Das Dohe


दोहा – 37

जाति न पूछो साधु की, पूछ लिजिए ज्ञान ।

मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान ॥

हिंदी अर्थ: संत की जाति नहीं पूछनी चाहिए, उसका ज्ञान पूछना चाहिए। ठीक उसी तरह से जैसे कि महत्त्व तलवार का होता है, उसकी म्यान का नहीं।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 38

कायर का घर फूस का, भभकी चहुं पछीत ।

सूरा के कुछ डर नहीं, गज गोरी की भीत ॥

हिंदी अर्थ: कायर व्यक्ति फूस की तरह होता है, जो पल भर में आग पकड़ लेता है, जबकि साहसी लोग निडर होते हैं, उग्र हाथियों से भी हार नहीं मानते।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 39

जब घट प्रेम न संचरै, सो घट जानु मसान ।

जैसे खाल लुहार की, साँस लेत बिन प्रान ॥

हिंदी अर्थ: प्रेम के बिना शरीर किसी श्मशान के समान होता है, जैसे लुहार की धौंकनी, जो हवा खींचती और भरती है, लेकिन उसमें जीवन नहीं होता।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 40

हरि रस पीया जानिधे, उतरै नांहि खूमारि ।

मतवाला घुमत फिरे, नहि तो तन की सारि ॥

हिंदी अर्थ: आपकी तलाश तब सच्ची है, जब आप सदैव धुन में रहते हैं, मतवाला होकर घूमते रहिए, न किसी की परवाह कीजिए और न चिंता।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 41

मतवाला घुमत फिरै, रोम – रोम रस पूरे ।

छाड़ै आस सरीर की, देखे राम हजूर ॥

हिंदी अर्थ: वह शरीर और आत्मा से मतवाला होकर घूमता है, उस पर और किसी की नहीं, बस अपने लक्ष्य को पाने की धुन सवार है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 42

तन मन जोबन जरि गया, बिरह अगिनी घाट लाग ।

बिरहिन जानै पीर को, क्या जानेगी आग ॥

हिंदी अर्थ: तन, मन और आत्मा आपकी अनुपस्थिति में जल गए, अपनी वेदना सिर्फ मैं जानता हूँ, कष्ट का कारण अब तक मालूम नहीं है। किसी को उसके प्रेम के विषय से अलग कर दिया जाए तो विरह की अग्नि उसका तन, मन और उसकी आत्मा को जला देती है, जिससे एक ऐसी पीड़ा होती है, जिसे सिर्फ हम जानते हैं, आग को यह पता नहीं चलता कि उसने क्या किया और किसे जलाया।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 43

बिरह बड़ो बैरी भयो, हिरदा धरै न धीर ।

सूरत सनेही न मिले, मिटै न मन की पीर ॥

हिंदी अर्थ: बिरह ने मेरे हृदय को अपरिपूर्ण बना दिया है, तुम से मिले बिना ओ मेरी प्रिया, मेरी पीड़ा बनी हुई है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 44

अंखियन तो झाईं परी, पंथ निहार निहार ।

जिभ्या तो छाला पड़या, नाम पुकार पुकार ॥

हिंदी अर्थ: तुम्हारी प्रतीक्षा करते – करते आँखें पथरा गईं, तुम्हारा नाम ले – लेकर जीभ पर छाले पड़ गए।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 45

लाली मेरे लाल की, जित देखूँ तित लाल ।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥

हिंदी अर्थ: मैं जिसकी इच्छा रखती हूँ, उसका ऐश्वर्य कुछ ऐसा है कि वह मुझे हर जगह दिखाई देता है, हम जब मिलते हैं तो चाहनेवाला और चाहा गया दोनों ही एक हो जाते हैं।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 46

कबीर प्याला प्रेम का, अंतर लिया लगाय ।

रोम – रोम में रमि रहा, और अमल क्या खाय ॥

हिंदी अर्थ: कबीर, अब मैं प्रेम का प्याला पी रही हूँ, इसका नशा मुझ पर सवार हो गया है, मुझे और किसी की आवश्यकता नहीं है। ~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 47

नैना अंतर आव तूं, नैन झापि तूहि लेव ।

मैं न देखूँ और को, न तोहे देखन दूँ ॥

हिंदी अर्थ: तुम्हारे से लिए मेरा प्रेम ऐसा है कि मैं तुम्हें अपनी आँखों में बसा लूँगा और फिर उन्हें बंद कर लूँगा। न मैं स्वयं किसी और को देखूँगा, न तुम्हें देखने दूँगा। ~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 48

कबीर रेख सींदूर अरु, काजर दिया न जाय ।

नैनन प्रीतम रमि रहा, दुजा कहाँ समाय ॥

हिंदी अर्थ: सिंदूर की रेखा केवल एक के लिए होती है और आँखों का काजल भी। आँखों में भी केवल मेरा प्रेमी बसा है, और किसी के लिए कोई स्थान नहीं।~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 49

कबीर सीप समुद्र की, रटै पियास पियास ।

और बूँद को न गहे, स्वाति बूँद की आस ॥

हिंदी अर्थ: सीप में सिर्फ उस विशेष ओस की बूँद की प्यास होती है, पानी में घिरा होकर भी वह सिर्फ उस बूँद की प्रतीक्षा करता है।~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 50

कबीर सीप समुद्र की खारा जल नहि लेय ।

पानी पीवै स्वाति का, सोभा सागर देव ॥

हिंदी अर्थ:  समुद्र में रहकर भी सीप उसके खारे पानी को नहीं पीता है, वह आसमान से टपकनेवाली विशेष ओस की बूँद को ग्रहण करता है, फिर भी समुद्र की शोभा को ही बढ़ाता है।~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 51

एक जानि एकै समझ, एकै कै गुन गाय ।

एक निरख एके परख, एकै सो चित्त लाय ॥

हिंदी अर्थ: एक को जानिए, एक को समझिए, एक के ही गुण गाइए, एक को देखिए, एक को परखिए, एक से प्रेम कीजिए।~ Kabir Ji Ke Dohe


दोहा – 52

गुरु है गोविंद ते, मन में देखु विचार ।

हरि सिरजे ते वार है, गुरु सिरजे ते पार ॥

हिंदी अर्थ: आप जब वास्तव में आत्ममंथन करते हैं, तब पाते हैं कि गुरु गोविंद से ऊपर है। जिसे भगवान् ने बनाया है, वह इस जीवन को पार करता है। जिसे गुरु ने बनाया है, वह अगले को पार कर जाता है। ~ Kabir Das Dohe


दोहा – 53

जाके सिर गुरु ज्ञान है, सोई तरत भव माहि ।

गुरु बिन जानो जंतु को, कबहु मुक्ति सुख नाहि ॥

हिंदी अर्थ: जिसे गुरु के ज्ञान का आशीर्वाद प्राप्त है, वह इस संसार से तर जाता है। गुरु के ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिल पाती है। ~ Kabir Das Dohe


दोहा – 54

तीरथ न्हाये एक फल, साधु मिले फल चार ।

सतगुरु मिलै अनेक फल, कहै कबीर विचार ॥

हिंदी अर्थ: एक तीर्थ यात्री में एक गुण होता है, संत में चार होते हैं। लेकिन गुरु में अनेक गुण होते हैं।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 55

यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान ।

सीस दिए जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान ॥

हिंदी अर्थ: यह शरीर जहरीली लता के समान है, जबकि गुरु अमृत की खान है। गुरु के लिए सबसे बड़ा बलिदान भी किया जा सकता है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 56

शब्दै मारा खैचिं कर, तब हम पाया ज्ञानं ।

लगी चोट जो शब्द की, रही कलेजे खान ॥

हिंदी अर्थ: तुमने मुझे अपने शब्दों का चाबुक मारा, ताकि उनके माध्यम से मुझे ज्ञान मिले। हे गुरु ! आपके बहुमूल्य शब्दों ने मेरे हृदय को बेध दिया है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 57

गुरु बिन ज्ञान न ऊपजै, गुरु बिन मिलैन मोष ।

गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिटै न दोष ॥

हिंदी अर्थ: न तो ज्ञान का सृजन किया जा सकता है, न ही मुक्ति का, गुरु के बिना, न तो आप सत्य को देख पाते हैं, न ही अवगुणों को। कोच बहुमुखी होता है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 58

गुरु मिला तब जानिए, मिटे मोह तन ताप ।

हरष शोक व्यापै नहि, तब गुरु आपै आप ॥

हिंदी अर्थ: जब शरीर और आत्मा के प्रति मोह और चिंता दूर हो जाती है, जब आप सुख और दुःख से उदासीन रहते हैं, तब आप जान जाते हैं कि आप गुरु जितने ही अच्छे हैं।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 59

गुरुवा तो घर घर फिरै, दीक्षा हमरी लेहु ।

कै बूड़ौ के उबरौ, टका पर्दनी देहु ॥

हिंदी अर्थ: नकली गुरुओं की भरमार है, सब हमें अपना शिष्य बनाना चाहते हैं, उन्हें परवाह नहीं होती कि आप डूबें या उसके बाद तैरने लगें, उन्हें बस दान और उपहार से ही मतलब होता है।~ Kabir Das Dohe


दोहा – 60

निज मन सों नीचा किया, चरण कमल की ठौर ।

कहैं कबीर गुरुदेव बिन, नजर न आवै और ॥

हिंदी अर्थ: विनम्र शिक्षार्थी वह है, जो अपने गुरु के प्रति समर्पित होता है, जो किसी और से भ्रमित नहीं होता है। एक अच्छे शिक्षार्थी में दो गुण होते हैं। एक, उसे विनम्र होना चाहिए और दो, उसे अपने शिक्षक पर विश्वास होना चाहिए । ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 61

तन मन दिया जु क्या हुआ, निज मन दिया न जाय ।

कहै कबीर ता दास सों, कैसे मन पतियाय ॥

हिंदी अर्थ: मन को समर्पित किए बिना गुरु के प्रति समर्पण का दिखावा करनेवाला शिक्षार्थी कभी गुरु का स्नेह प्राप्त नहीं कर पाएगा। एक सच्चा शिक्षार्थी अपना तन – मन समर्पित कर देता है। अपने आपको समर्पित करने का अर्थ है, किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति  एक प्रतिज्ञा या वादा या एक दायित्व। ~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 62

गुरु बेचारा क्या करें, हिरदा भया कठोर ।

नौ नेजा पानी चढ़ा, पथर भीजी कोर ॥

हिंदी अर्थ: पत्थर – दिलवाले के लिए कोच क्या कर सकता है? पत्थर पर छप्पन बार पानी गिराने से भी उसके मूल को गीला नहीं किया जा सकता है। ~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 63

निंदक दूर न कीजिए, कीजै आदर मान ।

निरमल तन मन सब करै, बकै आन ही आन ॥

हिंदी अर्थ: आलोचना करनेवाले को अपने आप से दूर मत कीजिए, उसका आदर कीजिए। वह जो बोलता है, उससे आपको स्वच्छ कर देता है।~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 64

जो तूं सेवक गुरुन का, निंदा की तज बान ।

निंदक नियरै आय जब, कर आदर सनमान ॥

हिंदी अर्थ: यदि आप सच्चे अर्थों में शिक्षार्थी हैं, तो निंदा करने की प्रवृत्ति को छोड़ दीजिए, जब कोई आलोचक आपके पास आए तो उसका सम्मान कीजिए।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 65

निंदा कीजै आपनी, बंदन सतगुरु रूप ।

औरन सों क्या काम है। देखो रंक न भूप ॥

हिंदी अर्थ: अपनी आलोचना करो और अपने गुरु की प्रशंसा करो। दूसरे मायने नहीं रखते, चाहे वह कोई राजा हो या रंक।~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 66

कंचन को तजबो सहल, सहल त्रिया को नेह ।

निंदा केरो त्यागबो, बड़ा कठिन है येह ॥

हिंदी अर्थ: सोना और प्रेम को त्याग देना सरल है, लेकिन आलोचना करने की प्रवृत्ति को छोड़ना सरल नहीं होता है।~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 67

साईं इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय ।

मैं भी भूखा न रहूँ, साधु न भूखा जाय ॥

हिंदी अर्थ: भगवान्, मेरे विस्तृत परिवार के लिए पर्याप्त दीजिए, ताकि मैं भी भूखा न रहूँ, न ही मेरे अतिथि भूखे रह जाएँ।~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 68

बहुत पसारा जनि करै, कर थोड़े की आस ।

बहुत पसारा जिन किया, तेई गए निरास ॥

हिंदी अर्थ: कुछ लोग अधिक की इच्छा रखते हैं, आपको इच्छा पर संयम रखना चाहिए, जिन्हें बहुत अधिक प्यास लगती है, वे अतृप्त ही रह जाते हैं।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 69

आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस ।

तेली केरे बैल ज्यौ, घर ही कोस पचास ॥

हिंदी अर्थ: ध्यान, प्रार्थना और पूजा – पाठ से अधिक की इच्छा समाप्त नहीं होगी, जिस प्रकार तेल निकालने के लिए कोल्हू का बैल घूमता रहता है, आप भी गोल – गोल चक्कर लगाते रहेंगे। ~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 70

पढ़ी गुनी पाठक भये, समुझाया संसार ।

आपन तो समुझै नहीं, वृथा गया अवतार ॥

हिंदी अर्थ: संसार को पढ़ाने और सिखाने का कोई लाभ नहीं होगा, अपने आपको न जानना जीवन बरबाद करने के समान है। ~ Sant Kabir ke Dohe


दोहा – 71

पढ़ी गुनी ब्राह्मण भये, कीर्ति भई संसार ।

वस्तू की तो समझ नहि, ज्युं खर चंदन भार ॥

हिंदी अर्थ: किताबों ने आपको विद्वान् बना दिया, ऐश्वर्य दिलाया, लेकिन ज्ञान नहीं दिया, आप उसी प्रकार अपने ज्ञान से अनभिज्ञ रहते हैं जैसे कि अपनी पीठ पर चंदन ढोनेवाला खच्चर। ~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 72

जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु है मैं नाहि ।

कबीर नगरी एक में, दो राजा न समांहि ॥

हिंदी अर्थ: जब वहाँ मैं था, तब वहाँ कोई गुरु नहीं था। अब सिर्फ गुरु हैं, कोई मैं नहीं है। दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 73

कबीर सोई सुरमा, मन सों माड़ै जुझ ।

पाँचो इंद्री पकडि़ के, दूरि करै सब दूझ ॥

हिंदी अर्थ: हे कबीर, बहादुर वह है, जो अपने मन से लड़ता है, अपनी इंद्रियों को वश में रखकर अपनी दुविधा को दूर करता है। हे कबीर, बहादुर वह है, जो पाँच इंद्रियों को वश में करता है, वह जो ऐसा नहीं कर पाता है, कभी भगवान् को प्राप्त नहीं कर सकेगा।~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 74

सिर राखै सिर जात है, सिर काटै सिर सोय ।

जैसे बाती दिप की, कटि उजियारा होय ॥

हिंदी अर्थ: अहंकार से जीवन तबाह हो जाता है, इसे छोड़ने से जीवन बच जाता है। यह उसी प्रकार है, जिस प्रकार चिराग तभी रोशनी देता है, जब उसकी बाती को काटा – छाँटा जाता है।~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 75

हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाए ।

आपण तो समझे नहीं, औरहि ज्ञान सुनाए ॥

हिंदी अर्थ: वह जो भगवान् के गुण गाता है, जबकि उसके हृदय में कपट है, वह अपने आपको नहीं जानता, लेकिन संसार को शिक्षा देता है।~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 76

जो हंसा मोती चुगै, कांकर क्यु पतियाय ।

कांकर माथा न नवै, मोती मिले तो खाए ॥

हिंदी अर्थ: हंस सिर्फ मोती चुगता है, पत्थर नहीं । वह जिसे मोती की आदत है, वह कभी पत्थर से समझौता नहीं करेगा।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 77

हंसा बगुला एक सा, मानसरोवर माहिं ।

बगा ढिंढोरे माछरी, हंसा मोती खाहिं ॥

हिंदी अर्थ: हंस और बगुला एक जैसे ही दिखते हैं। बगुला मछली पकड़ता है, जबकि हंस मोती।~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 78

मेरा किया न कछु भया, तेरा कीया होय ।

तूं करता सबकुछ करै, करता और न कोय ॥

हिंदी अर्थ: ऐसा कुछ नहीं है, जिसे सिर्फ मैंने किया है, असली करनेवाले तो आप हैं। आपके ही माध्यम से सारे काम होते हैं।~ Kabir Dohe in Hindi


दोहा – 79

साधू सती औ सूरमा, कबहूँ न फेरे पीठ ।

तीनों निकसी बाहुरै, तिनका मुख नहि दीठ ॥

हिंदी अर्थ: साधु, सती और बहादुर पीछे नहीं हटते हैं और अगर वे ऐसा करते हैं, उन्हें सम्मान नहीं देना चाहिए। ~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 80

साधू सती औ सूरमा, इन पटतर कोय नाहिं ।

अगम पंथ को पग धरै, गिरि तो कहाँ समाहि ॥

हिंदी अर्थ: साधू, सती और निडर की किसी से तुलना नहीं हो सकती है, वे कड़े रास्ते पर चलते हैं; उन्हें गिरने पर कहीं जाने का रास्ता नहीं होता है।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 81

ये तीनों उलटे बुरे, साधू सती औ सूर ।

जग में हांसी होयगी, मुख पर रहे न नूर ॥

हिंदी अर्थ: साधू, सती और निडर को गलती नहीं करना चाहिए, क्योंकि वे मजाक का पात्र बनेंगे और अपनी महत्ता खो देंगे।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 82

कड़ी है धारा राम की, काचा टिकै न कोय ।

सिर सौपै सीधा लड़ै, सूरा कहिये सोय ॥

हिंदी अर्थ: सच्चाई का पथ मुश्किल है, नौसिखिए के लिए नहीं है। जो झुकता है, वह न्यायसंगत रूप से लड़ता है, वास्तव में बहादुर कहा जाता है।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 83

पर नारी का राचना, ज्यू लहसुन की खान ।

कोने बैठे खाइए, परगट होय निदान ॥

हिंदी अर्थ: दूसरे की स्त्री की अभिलाषा करना लहसुन खाने के समान है; अगर आप एक कोने में भी खाते हैं, तब भी महक फैल जाती है।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 84

पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय ।

कबहू छेडि़ न देखिए, हंसि हंसि खावे रोय ॥

हिंदी अर्थ: दूसरे की स्त्री पैनी छुरी है, विरले ही आप सकुशल बचेंगे; कभी उस पर फिदा मत हो; आप हँसी और आँसू में बरबाद हो जाएँगे।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 85

जो कुछ किया सो तुम किया, मैं कुछ किया नांहि ।

कहूँ कही जो मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ॥

हिंदी अर्थ: जो कुछ भी हासिल हुआ, तुमने किया — मैंने नहीं; अगर मैं कहूँ कि मैंने ही किया, तब भी मुझमे तुम्हीं थे।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 86

हम जाए तो भी मुआ, हम भी चालनहार ।

हमरे पीछे पूंगरा, तिन भी बाँधा भार ॥

हिंदी अर्थ: हमारे निर्माता जा चुके हैं, इसलिए हमें भी जाना होगा, हमारी अगली पंक्ति के लोग भी बोरिया – बिस्तर बाँधकर तैयार हो रहे हैं।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 87

साथी हमरे चलि गए, हम भी चालनहार ।

कागद में बाकी रही, ताते लागी बार ॥

हिंदी अर्थ: हमारे साथी जा चुके हैं, इसलिए हमें भी जाना होगा, थोड़ा – बहुत कुछ करना बाकी रह गया है; बस इसीलिए देरी हो रही है।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 88

आए हैं तो जाएँगे, राजा रंक फकीर ।

एक सिंघासन चढि़ चले, एक बाँधे जात जंजीर ॥

हिंदी अर्थ:  जो आए हैं, एक दिन उन्हें जाना होगा, चाहे वे राजा हों या रंक या फकीर। कुछ गद्दी पर चढ़कर जाएँगे और कुछ बेडि़यों में जकड़े हुए।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 89

कबीर साईं मुझको, सूखी रोटी देय ।

चूपड़ी माँगत मैं डरू, मत रूखी छिन लेय ॥

हिंदी अर्थ: हे भगवान्, मैं केवल सूखी रोटी का एक टुकड़ा चाहता हूँ, क्योंकि मुझे डर है, अगर मैं मक्खन लगी रोटी के लिए पूछता हूँ, तो मैं सूखी रोटी भी गँवा सकता हूँ।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 90

अंधे मिलि हाथी छुआ, अपने अपने ज्ञान ।

अपनी – अपनी सब कहें, किसको दीजे का ॥

हिंदी अर्थ: अंधों ने हाथी को छुआ, और सभी ने अपना – अपना ज्ञान प्रस्तुत किया। हर किसी के पास अपनी अलग राय है, तो आप किसका विश्वास करें।~ Kabir Ke Dohe


दोहा – 91

चोर भरोसें साहु के, लाया वस्तु चोराय ।

पहिले बाँधों साहु को, चोर आप बंधि जाय ॥

हिंदी अर्थ: अपने संरक्षक के द्वारा प्रोत्साहित किए जाने पर चोर ने चोरी की, उसने क्या किया; पहले संरक्षक को पकडि़ए, चोर अपने आप पकड़ा जाएगा। ~ Sant Kabir Das


दोहा – 92

भक्ति निसानी मुक्ति की, संत चढ़े सब धाय ।

जिन – जिन मन आलस किया, जनम जनम पछिताय ॥

हिंदी अर्थ: समर्पण निर्वाण से पहले आता है, संत इस पथ पर जाते हैं; आलसी कई जन्म पश्चात्ताप में बिताते हैं।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 94

लूटि सकै तो लूट ले, राम नाम की लूट ।

फिर पाछे पछिताहुगे, प्राण जाहिंगे छूट ॥

हिंदी अर्थ: अगर आप पकड़ सकते हैं, तो उसकी दानशीलता को पकडि़ए, जो ढेर सारा है, या फिर आप केवल पश्चात्ताप करते रहेंगे और एक दिन मर जाएँगे।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 95

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब्ब ।

पल में परलय होयगी, बहुरि करेगा कब्ब ॥

हिंदी अर्थ: जो कल करना है आज कर लें, जिसे आज करना है, उसे अभी कर लें। एक ही पल में प्रलय सारे अवसरों को दूर कर सकती है।~ Sant Kabir Das


दोहा – 96

दुःख में सुमिरन सब करै, सुख में करै न कोय।

जो सुख में सुमिरन करै, दुःख काहे को होय ॥

हिंदी अर्थ: हर कोई उसे दुःख के समय में याद करता है, सुख में नहीं; यदि उसे सुख के समय में याद किया जाए, तो कोई दुःख होगा ही नहीं। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 97

एक ही बार परखिए, ना बा बारंबार ।

बालू तौहू किरकिरी, जो छाने सौ बार ॥

हिंदी अर्थ: एक ही बार मूल्यांकन करिए, बार – बार नहीं; बालू किरकिरा ही रहता है, चाहे आप इसे सौ बार छानिए। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 98

ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय ।

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥

हिंदी अर्थ: ऐसी वाणी बोलिए, जो आपके मन को शांत करती है, जो दूसरों को शांत करती है और आपको शांत करती है। जिभ्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 99

आया एक ही देश ते, उतरा एक ही घाट ।

बिच में दुविधा हो गई, हो गए बारह बाट ॥

हिंदी अर्थ: सभी एक जगह से आए और एक ही स्थल पर उतरे, इसके बाद भ्रम हुआ और हर एक ने अपना रास्ता लिया। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


दोहा – 100

रूखा – सूखा खाय के, ठंडा पानी पीव ।

देखि पराई चूपड़ी, मत ललचावै जीव ॥

हिंदी अर्थ: जो कुछ भी तुम्हारे पास है, उसे खाओ और ठंडा पानी पियो; दूसरों की घी चुपड़ी रोटी देखकर लालच मत करो। ~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit

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दोहा – 101

आधी औ रूखी भली, सारी सोग संताप।

जो चाहेगा चूपड़ी, बहुत करेगा पाप ॥

हिंदी अर्थ: आधी सूखी रोटी बेहतर है; अधिक की खोज दुःख का कारण बनती है। जो मक्खन लगी रोटी के पीछे भागता है, वह कई पाप करेगा।~ Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit


Closing Remarks:

तो दोस्तों इस आर्टिकल (Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit) में बस इतना ही आपको ये आर्टिकल (Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit) कैसी लगी हमें कमेन्ट कर के जरूर बताये। अगर आप इस बुक का कम्पलीट वीडियो समरी देखना चाहते है तो ऊपर दिए लिंक से देख सकते है। लेटेस्ट वीडियो को देखने के लिए हमारे यूट्यूब चैनल को सब्सक्राइब करना न भूले।

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S.K. Choudhary

नमस्कार दोस्तों, हमारे इस ब्लॉग में आपका स्वागत है, मेरा नाम है S.K. Choudhary (ऐस. के. चौधरी) और मैं एक ब्लॉगर और यूटूबर हूँ। में एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ और मेरा highest एजुकेशन MBA Finance है। मुझे पढ़ने और पढ़ाने का शोख है इसलिए में पार्ट टाइम मैं ब्लॉग लिखता हूँ और यूट्यूब के लिए बुक समरी और मोटिवेशनल वीडियो बनता हूँ।

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