मुंशी प्रेमचंद, जिनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, हिंदी और उर्दू के सबसे बड़े कहानीकारों में गिने जाते हैं। उन्होंने एक दर्जन से ज़्यादा उपन्यास और 300 से अधिक कहानियाँ लिखीं। उनकी कहानी “माँ” उनके कहानी संग्रह मानसरोवर में शामिल है। इस लेख में आप माँ कहानी का छोटा सारांश, पूरी कहानी, पात्रों का चरित्र चित्रण, कहानी का उद्देश्य और परीक्षा में पूछे जाने वाले प्रश्न उत्तर पढ़ेंगे।
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विषय सूची
माँ कहानी का सारांश (संक्षेप में)
करुणा का पति आदित्य देश की आज़ादी के लिए काम करने के कारण तीन साल जेल में रहता है। जब वह लौटता है तो तपेदिक (टीबी) से इतना कमज़ोर हो चुका होता है कि कुछ ही दिनों में उसकी मृत्यु हो जाती है। करुणा अपने गहने बेचकर गाय भैंस ख़रीदती है, दूध बेचकर घर चलाती है और अपने बेटे प्रकाश को पढ़ाती है। उसका सपना है कि प्रकाश अपने पिता की तरह देश की सेवा करे। पर प्रकाश स्वार्थी और दिखावा पसंद निकलता है। बाढ़ और अकाल में लोगों की मदद करने के बजाय वह बहाने बनाता है। फिर उसे इंग्लैंड जाकर पढ़ने और मजिस्ट्रेट बनने का सरकारी वज़ीफ़ा मिलता है। करुणा इसका विरोध करती है, क्योंकि उसी सरकार ने उसके पति को सज़ा दी थी। अंत में बेटे का उदास चेहरा देखकर वह खुद उसे जाने देती है। प्रकाश के जाने के बाद करुणा गाँव के बच्चों और जानवरों की माँ बन जाती है। एक दिन वह सपने में प्रकाश को मजिस्ट्रेट की कुर्सी पर और आदित्य को कैदी के रूप में देखती है, और उसी रात उसका टूटा हुआ दिल हमेशा के लिए शांत हो जाता है।
माँ कहानी का पूरा सारांश
आदित्य की वापसी और मृत्यु
कहानी माँ हमें एक मज़बूत महिला चरित्र से मिलवाती है। करुणा पत्नी और माँ, दोनों की भूमिका पूरी लगन से निभाती है। वह प्यार करने वाली, देखभाल करने वाली और दिल से बहुत मज़बूत है। वह अपने पति और बेटे के लिए अपना पूरा जीवन लगा देती है। उसे बहुत से तूफ़ानों से गुज़रना पड़ता है, लेकिन वह हमेशा स्थिर रहती है।
कहानी की शुरुआत में करुणा अपने पति आदित्य का बेसब्री से इंतज़ार कर रही है। आदित्य अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ देश के लोगों के लिए काम करता था, इसलिए तीन साल पहले उसे गिरफ़्तार कर लिया गया था। करुणा ने पति के स्वागत के लिए घर साफ़ किया है और तीन वर्षों में कड़ी मेहनत से बचाई गई सारी रक़म तैयारी में लगा दी है।
उसने अपने छोटे बेटे को गले लगाया और सोचा कि इन सब मुश्किलों के बीच यही उसके जीवन की एकमात्र रोशनी है। इन तीन वर्षों में उसने बहुत कुछ सहा था, पर बेटे को देखकर ही सब कुछ सह लिया था।
उसने सोचा कि आदित्य अपने बेटे को देखकर कितना खुश होगा, और जेल के सारे कष्ट बच्चे की तोतली बातों में भूल जाएगा।
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। आदित्य हड्डियों का ढाँचा बनकर लौटा। वह लाठी के सहारे चल रहा था और चलते चलते खाँस रहा था। करुणा को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
आदित्य ने अपने बेटे को देखा और उसे लगा कि वह एक अच्छा पिता नहीं बन पाया। उसे ऐसा लगा जैसे बच्चा अपनी चुप्पी से उसे ज़िम्मेदार पिता न होने का दोष दे रहा हो।
करुणा की ज़िंदगी और कठिन हो गई, क्योंकि जल्द ही तपेदिक से आदित्य की मृत्यु हो गई।
मृत्यु से पहले आदित्य ने करुणा से कहा कि उसने उसके साथ बड़ा अन्याय किया और उसे कोई सुख नहीं दे सका। फिर उसने पूछा कि वह उसके जीवन को कैसे देखती है। करुणा ने उत्तर दिया कि उसने एक महान जीवन जिया है। अगर उससे किसी को आशीर्वाद देने के लिए कहा जाए तो वह यही आशीर्वाद देगी कि उसे भी ऐसा ही जीवन मिले। उसने कहा कि आदित्य ने देश की सेवा की है और उसका दिल सोने जैसा है। यह सुनकर आदित्य को संतोष हुआ।

करुणा का संघर्ष
नदी का पानी जीवन देता है, पर बाढ़ के समय वही पानी उग्र भी हो जाता है। उसी तरह एक माँ सबसे ज़्यादा देखभाल करने वाली भी होती है और सबसे मज़बूत भी। करुणा ऐसी ही है: बेहद प्यार करने वाली, और मुश्किल हालात को संभालना भी जानती है।
विधवा होने का सारा दर्द करुणा ने अपने अंदर दबा लिया। उसने अपने गहने बेचकर गाय और भैंसें ख़रीदीं और दूध बेचकर घर चलाना शुरू किया। दिन रात मेहनत करके उसने एक एक पैसा कमाया और बेटे के लिए माँ और पिता, दोनों बन गई।

बेटे का नाम प्रकाश था, और सच में वह उसके जीवन का प्रकाश था। उसकी रोशनी ने करुणा का सारा दर्द पिघला दिया और उसे रोज़ मेहनत करने की ताक़त दी। करुणा ने कभी किसी बात की शिकायत नहीं की, बस स्थिर रही और मेहनत करती रही।
उसे याद था कि पति ने बेटे की ज़िम्मेदारी उसे सौंपी थी। उसने प्रकाश के चरित्र का ध्यान रखा और उसे देश की सेवा करना सिखाया।

प्रकाश का स्वभाव
प्रकाश अपने पिता से बिल्कुल उलटा, आत्मकेंद्रित निकला। उसकी आत्मा माँ की बात मानना चाहती थी, पर उसका मन उसे ऐसा करने नहीं देता था। देश की सेवा से नाम और सम्मान तो मिल सकता था, पर पैसा और आराम नहीं। वह हमेशा अपनी सुख सुविधा की परवाह करता था और सोचता था कि उसकी पढ़ाई ही उसे बेहतर जीवन देगी।
वह पढ़ने में तेज़ था, स्कूल से छात्रवृत्ति पाता था और माँ से भी पैसे लेता था, फिर भी उसे संतोष नहीं होता था। वह सादा जीवन जी सकता था, पर फ़ैशन और दिखावे का शौक़ीन था।
उसे किसी भी चीज़ का त्याग करना पसंद नहीं था, और वह ग़रीबों को हीन नज़र से देखता था।
करुणा चाहती थी कि बेटा अपने पिता जैसा बने, जो देश की सेवा करना चाहता था। पर किस्मत ने उसे हमेशा धोखा दिया था, और इस बार भी कुछ अलग नहीं हुआ।
जब सिंध में बाढ़ आई तो वहाँ लोगों की मदद के लिए एक सेवा समिति बनी। प्रकाश ने बीमारी का बहाना बनाया और परीक्षा की तैयारी के लिए रुक गया। करुणा उसके इस फ़ैसले से दुखी हुई।
फिर उड़ीसा में अकाल पड़ा और कांग्रेस ने वहाँ लोगों की मदद की योजना बनाई। करुणा ने प्रकाश को उड़ीसा जाने को कहा, पर वह इतिहास की खोज के लिए लंका (श्रीलंका) चला गया। परीक्षा के बाद भी वह घर आने के बजाय एक अध्यापक के साथ कश्मीर घूमने चला गया। इससे करुणा फिर निराश हुई।
प्रकाश ने उसे दिलासा दिया कि वह एक बड़ा विद्वान बनकर देश की सेवा करेगा। विद्वानों का हमेशा सम्मान होता है, इसलिए वह जब चाहेगा तब आसानी से लोगों के लिए काम कर सकेगा। करुणा के मन में थोड़ी उम्मीद जगी, लेकिन उसकी ज़िंदगी ने फिर ठोकर खाई।
विलायत का प्रस्ताव
प्रकाश को रजिस्ट्रार का पत्र मिला। उसे इंग्लैंड जाकर पढ़ने का सरकारी वज़ीफ़ा मिला था, जिसके बाद वह मजिस्ट्रेट बन सकता था। उसने माँ को समझाया कि देश के लिए काम करने वाले को उतना सम्मान नहीं मिलता जितना एक मजिस्ट्रेट को मिलता है, और मजिस्ट्रेट बनकर वह देश की बेहतर सेवा कर सकेगा। यह एक ताक़तवर और अच्छी कमाई वाला पद है, और वह यह मौक़ा नहीं गँवाना चाहता।
उसने खुद को सही ठहराने के लिए बहुत तर्क दिए। पर करुणा के मन में यही बात बैठी थी कि उसके पति को भी एक मजिस्ट्रेट ने ही सज़ा दी थी। उसने कहा कि मजिस्ट्रेट वही होता है जो देश की सेवा करने वालों को दंड देता है। सरकार अपने अफ़सरों को अपनी मर्ज़ी से काम करने की आज़ादी नहीं देती, उन्हें सरकार के हुक्म पर चलना पड़ता है। इसलिए अगर वह मजिस्ट्रेट बना, तो उसे भी वैसा ही कठोर मजिस्ट्रेट बनना पड़ेगा।
करुणा ने कहा कि इसी सरकार ने उसके पिता की जान ली है, और वह यह सहन नहीं कर सकती कि उसका बेटा उसी सरकार का ग़ुलाम बने। उसने प्रकाश से सादा जीवन जीने और ज़रूरतमंदों की सेवा करने की विनती की।
उसने एक उदाहरण देकर समझाया: एक लड़की अपने पिता के घर को अपना घर मानती है, पर शादी के बाद वह पति के परिवार की हो जाती है और पुराना घर उसका नहीं रहता। उसी तरह मजिस्ट्रेट बनने के बाद प्रकाश कभी देश की सेवा के लिए आज़ाद नहीं रहेगा, और वह वही बन जाएगा जिसने उसके पिता को सज़ा दी थी।
प्रकाश यह सहन नहीं कर सका। उसने प्रस्ताव ठुकराने का पत्र तो लिख दिया, पर वह भीतर से परेशान और उदास रहने लगा। उसका चेहरा मुरझा गया और उसके अंदर की चमक बुझ गई।
करुणा बेटे की हालत समझ रही थी और उसने उसे खुश करने की बहुत कोशिश की, पर कुछ नहीं हुआ। प्रकाश ने खुद को घर में बंद कर लिया और अंदर ही अंदर घुलता रहा।
एक दिन करुणा ने उससे कहा कि अगर उसने वहाँ जाने का पक्का मन बना लिया है तो वह उसे नहीं रोकेगी। वह तो बस उसे देश की सेवा करते देखना चाहती थी, क्योंकि यही आदित्य का सपना था।
उसने प्रकाश से कहा कि आज ही रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर अपनी इच्छा पूरी कर ले, उसे माँ की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ चलने की कोई ज़रूरत नहीं। प्रकाश ने पत्र लिखने से मना कर दिया। तब करुणा खुद घर से निकली और देर शाम रजिस्ट्रार के पास से मुहर लगा पत्र लेकर लौटी।
करुणा को लौटने में देर हुई तो प्रकाश चिंतित था और खुद को दोषी भी महसूस कर रहा था। पर पत्र देखते ही वह सब भूल गया और जाने की तैयारी में लग गया।
करुणा ने बेटे के लिए सारी तैयारी की। वह अंदर से टूट चुकी थी, पर जानती थी कि किसी को ज़बरदस्ती नहीं रोका जा सकता। प्रकाश तो पहले ही सब तय कर चुका था, और करुणा उसे दुख नहीं देना चाहती थी।
करुणा का अंत
प्रकाश के इंग्लैंड जाने के बाद करुणा के जीवन ने नया मोड़ लिया। उसने हर उस चीज़ से दूर रहने की कोशिश की जो उसे उसके छोटे से परिवार की याद दिलाती थी। उसने अपने छोटे परिवार को बड़ा बना लिया: गाँव के बच्चों की मदद की, आसपास के जानवरों को खाना खिलाया, और अपने आसपास के हर प्राणी की माँ बन गई।
एक दिन उसे प्रकाश का पत्र मिला। उसने पत्र फेंक दिया, फिर उसके टुकड़े टुकड़े कर दिए। लेकिन उसके दिल में बेटे के लिए अपार प्यार अब भी था। वह पत्र पढ़ना चाहती थी, इसलिए उसने उन टुकड़ों को अपने दिल के टुकड़ों की तरह बटोरा और पत्र को फिर से जोड़ने की कोशिश करने लगी।
पूरी रात वह उस पत्र को जोड़ने की कोशिश करती रही, पर जोड़ नहीं सकी। थकी हुई आँखें कुछ देर के लिए लगीं तो उसने एक सपना देखा: एक सजा हुआ कमरा है, जहाँ ऊँची कुर्सी पर प्रकाश अफ़सर बनकर बैठा है, और सामने ज़ंजीरों में बँधा एक कैदी लाया जाता है। वह कैदी आदित्य था। करुणा की आँखें पीड़ा से खुल गईं।

करुणा का पूरा जीवन एक त्रासदी था। वह एक दिव्य और मज़बूत महिला थी जो हर मुश्किल से लड़ी। वह अपने बेटे से इतना प्यार करती थी कि उसने अपनी इच्छा भूलकर उसे वही करने दिया जो वह चाहता था।
उसने पत्र के सारे टुकड़े जलाकर राख कर दिए। उस राख में जैसे उसका बचपन, उसका विधवा जीवन और माँ के रूप में उसका सारा संघर्ष समा गया। उसी रात, पति की याद को अपने दिल से लगाए, उसकी आत्मा ने शरीर छोड़ दिया। कहानी के शब्दों में, पंछी पिंजरे से उड़ चुका था।
माँ कहानी के मुख्य पात्र (चरित्र चित्रण)
करुणा: कहानी की नायिका। एक त्यागी पत्नी, मेहनती माँ और सच्ची देशभक्त। पति के जेल जाने और फिर मृत्यु के बाद भी वह टूटती नहीं, दूध बेचकर बेटे को पढ़ाती है। उसका सबसे बड़ा गुण है उसका आत्मसम्मान और देश के प्रति प्रेम, और सबसे बड़ा दुख है बेटे का उसके आदर्शों से दूर जाना।
आदित्य: करुणा का पति, एक स्वतंत्रता सेनानी। देश के लिए उसने जेल काटी और अपना स्वास्थ्य और जीवन गँवा दिया। वह कहानी में त्याग और देशभक्ति का प्रतीक है।
प्रकाश: करुणा और आदित्य का बेटा। पढ़ाई में तेज़, पर स्वार्थी, दिखावा पसंद और सुख सुविधा का भूखा। वह नई पीढ़ी के उस वर्ग का प्रतीक है जो देश सेवा के बजाय अपनी तरक़्क़ी और सरकारी पद को ज़्यादा महत्व देता है।
माँ कहानी का उद्देश्य और संदेश
प्रेमचंद इस कहानी के ज़रिए कई बातें कहते हैं:
- एक माँ का प्यार इतना बड़ा होता है कि वह अपने आदर्श और अपनी ख़ुशी भी बच्चे के लिए छोड़ देती है।
- आज़ादी की लड़ाई में सेनानियों के परिवारों ने कितना कुछ सहा, यह कहानी उसका दर्द दिखाती है।
- सिर्फ़ पद, पैसा और दिखावा जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। सच्चा सम्मान सेवा और त्याग से मिलता है।
- पीढ़ियों के बीच सोच का अंतर: माँ के लिए देश पहले है, बेटे के लिए अपना करियर।
माँ कहानी से जुड़े प्रश्न उत्तर
माँ कहानी के लेखक कौन हैं?
माँ कहानी के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं। यह कहानी उनके कहानी संग्रह मानसरोवर में शामिल है।
माँ कहानी की नायिका कौन है?
माँ कहानी की नायिका करुणा है, जो आदित्य की पत्नी और प्रकाश की माँ है।
आदित्य की मृत्यु कैसे हुई?
तीन साल जेल में रहने के बाद आदित्य बहुत कमज़ोर होकर लौटा। उसे तपेदिक (टीबी) हो गया था, और कुछ ही दिनों में उसकी मृत्यु हो गई।
करुणा प्रकाश के इंग्लैंड जाने के विरोध में क्यों थी?
प्रकाश इंग्लैंड से पढ़कर मजिस्ट्रेट बनना चाहता था। करुणा का मानना था कि मजिस्ट्रेट सरकार का हुक्म मानने वाला अफ़सर होता है, और उसी अंग्रेज़ सरकार के एक मजिस्ट्रेट ने उसके देशभक्त पति को सज़ा दी थी। वह नहीं चाहती थी कि उसका बेटा उसी सरकार का ग़ुलाम बने।
माँ कहानी का अंत कैसे होता है?
प्रकाश के इंग्लैंड जाने के बाद करुणा गाँव के बच्चों और जानवरों की सेवा में लग जाती है। एक रात वह सपने में प्रकाश को मजिस्ट्रेट और आदित्य को कैदी के रूप में देखती है। वह प्रकाश के पत्र के टुकड़े जला देती है, और उसी रात उसकी मृत्यु हो जाती है।
माँ कहानी का शीर्षक सार्थक क्यों है?
पूरी कहानी करुणा के माँ वाले रूप के इर्द गिर्द घूमती है: बेटे के लिए उसका संघर्ष, त्याग, उसकी उम्मीदें और अंत में उसका टूटना। आख़िर में वह गाँव के हर बच्चे और प्राणी की माँ बन जाती है। इसलिए “माँ” शीर्षक पूरी तरह सार्थक है।
पूरी किताब पढ़िए
मानसरोवर (कहानी संग्रह)
लेखक: मुंशी प्रेमचंद
यह सारांश किताब की मुख्य बातें बताता है। पूरी किताब में कहानियाँ, उदाहरण और अभ्यास कहीं ज़्यादा हैं।
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