Five Steps Jo Hamari Safalta ya Asafalta Tay Karte Hai: शैड हेल्म्सटेटर की किताब “क्या कहें जब स्वयं से बात करें” से

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Five Steps Jo Hamari Safalta ya Asafalta Tay Karte Hai, यानी वे पाँच कदम जो तय करते हैं कि हम सफल होंगे या असफल। यह विचार अमेरिकी मनोवैज्ञानिक लेखक डॉ. शैड हेल्म्सटेटर (Shad Helmstetter) की मशहूर किताब “What to Say When You Talk to Your Self” (1982) से है, जिसका हिंदी अनुवाद “क्या कहें जब स्वयं से बात करें” नाम से मिलता है। इस लेख में आप समझेंगे कि हमारे नतीजे असल में कहाँ से शुरू होते हैं, और अपने आप से बात करने का तरीक़ा बदलकर उन्हें कैसे बदला जा सकता है।

छोटा जवाब: हेल्म्सटेटर के अनुसार हमारी सफलता या असफलता एक कड़ी से तय होती है: प्रोग्रामिंग → विश्वास → दृष्टिकोण → भावनाएँ → व्यवहार → नतीजे। बचपन से मिली प्रोग्रामिंग हमारे विश्वास बनाती है, विश्वास हमारा नज़रिया, नज़रिया हमारी भावनाएँ, भावनाएँ हमारे काम, और काम हमारे नतीजे। नतीजे बदलने हैं तो सबसे पहली कड़ी, यानी प्रोग्रामिंग, बदलनी होगी, और इसका सबसे आसान औज़ार है सही सेल्फ़ टॉक (ख़ुद से बात)।

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सफलता की कड़ी: 5 कदम एक नज़र में

प्रोग्रामिंग से विश्वास बनता है।

विश्वास से दृष्टिकोण बनते है।

दृष्टिकोण से भावनाएँ बनती है।

भावनाओं द्वारा कार्य निर्धारित होता है।

कार्यो से नतीजे निर्धारित होती है।

कदमक्या हैउदाहरण
1. प्रोग्रामिंगबचपन से सुनी, देखी और बार बार दोहराई गई बातें“तुम गणित में कमज़ोर हो” बार बार सुनना
2. विश्वासउस प्रोग्रामिंग से बनी पक्की धारणा“मैं गणित में कमज़ोर हूँ”
3. दृष्टिकोणकिसी चीज़ को देखने का नज़रिया“गणित मेरे बस का नहीं”
4. भावनाएँउस नज़रिए से उठने वाले भावगणित की किताब देखते ही घबराहट
5. व्यवहारभावनाओं से तय होने वाले कामगणित का अभ्यास टालना
नतीजाव्यवहार का फलगणित में कम नंबर, और विश्वास और पक्का

ध्यान दीजिए, यह कड़ी एक चक्र है: कम नंबर आने पर पुराना विश्वास और पक्का हो जाता है। इसी चक्र को तोड़ना है।

Five Steps Jo Hamari Safalta ya Asafalta Tay Karte Hai: पाँचों कदम विस्तार से

हेल्म्सटेटर इस कड़ी को नतीजे से उलटी तरफ़ समझाते हैं, क्योंकि हम सबसे पहले नतीजे ही देखते हैं, उनकी जड़ नहीं।

1. व्यवहार, यानी हमारे काम (Behavior)

हमारे नतीजे सीधे हमारे व्यवहार, यानी हमारे कामों से आते हैं। सही काम करेंगे, तो सही नतीजे मिलेंगे।

अगर आप अपनी नौकरी को पसंद करते हैं, समय पर सही काम करते हैं, तो पूरी संभावना है कि नौकरी में अच्छे नतीजे मिलेंगे। अगर आप नौकरी से चिढ़ते हैं, काम टालते हैं, या ऐसे तरीक़े अपनाते हैं जो आपके ख़िलाफ़ जाते हैं, तो नतीजे भी वैसे ही आएँगे।

पर सवाल यह है कि हम वह व्यवहार क्यों करते हैं? जवाब है अगला कदम।

2. भावनाएँ (Feelings)

हमारा हर काम हमारी भावनाओं से प्रभावित होता है। किसी चीज़ के बारे में हम कैसा महसूस करते हैं, उसी से तय होता है कि हम क्या करेंगे और कितनी अच्छी तरह करेंगे।

अपनी नौकरी, जीवनसाथी, परिवार, पैसे, सेहत या सफलता के बारे में आप जैसा महसूस करते हैं, उस क्षेत्र में आपका व्यवहार वैसा ही होता है। भावनाएँ सकारात्मक और उत्साह भरी हों, तो काम भी वैसे ही होते हैं। भावनाओं में डर, ऊब या चिढ़ हो, तो काम भी आधे मन से होते हैं।

3. दृष्टिकोण (Attitude)

हम ज़िंदगी को अपने दृष्टिकोण, यानी नज़रिए के चश्मे से देखते हैं। कुछ लोगों का नज़रिया ज़्यादातर चीज़ों के बारे में अच्छा होता है, कुछ का हर चीज़ के बारे में बुरा, और ज़्यादातर लोगों का मिला जुला।

किसी चीज़ के बारे में हमारा नज़रिया तय करता है कि हम उसके बारे में कैसा महसूस करेंगे, और वह भावना तय करती है कि हम क्या करेंगे। “सोमवार बहुत बुरा दिन है” वाला नज़रिया सोमवार सुबह से ही थकान और चिढ़ पैदा कर देता है।

4. विश्वास (Beliefs)

अपने बारे में आप जो विश्वास रखते हैं, वही आख़िरकार आपके कामों को चलाता है। अगर आप मानते हैं कि आप लोगों से बात करने में अच्छे नहीं हैं, तो आप वैसा ही व्यवहार करेंगे, और आपका विश्वास सही साबित हो जाएगा, चाहे वह असल में सच हो या न हो।

अगर आप ख़ुद से कहते रहते हैं कि “मुझसे नहीं होगा”, तो सच में नहीं होगा, क्योंकि आप पूरी कोशिश ही नहीं करेंगे। इसलिए हमेशा “मैं कर सकता हूँ” वाला नज़रिया रखें।

5. प्रोग्रामिंग (Programming)

हम उसी पर विश्वास करते हैं, जिसकी हमारी प्रोग्रामिंग हुई है। जिस दिन हम पैदा होते हैं, उसी दिन से प्रोग्रामिंग शुरू हो जाती है: माता पिता, शिक्षक, दोस्त, टीवी, समाज, सब हमें बताते हैं कि हम कौन हैं, क्या कर सकते हैं और क्या नहीं।

हेल्म्सटेटर के अनुसार बड़े होते होते एक आम बच्चा हज़ारों बार “नहीं”, “तुमसे नहीं होगा”, “ऐसा मत करो” सुन चुका होता है, जबकि “तुम कर सकते हो” बहुत कम बार। वे कहते हैं कि हमारे ज़्यादातर विचार, लगभग तीन चौथाई, आदतन नकारात्मक या बेकार होते हैं। यह प्रोग्रामिंग सही हो या ग़लत, सच हो या झूठ, उसका नतीजा हमारे विश्वास बनते हैं।

अच्छी ख़बर: दिमाग़ उसी बात को मानता है, जो उसे बार बार और भरोसे से बताई जाती है। जैसे ग़लत प्रोग्रामिंग बार बार दोहराने से बनी, वैसे ही नई, सही प्रोग्रामिंग बार बार दोहराकर बनाई जा सकती है।

सेल्फ़ टॉक के 5 स्तर

हेल्म्सटेटर बताते हैं कि हम ख़ुद से पाँच तरह से बात करते हैं:

स्तरनामकैसे वाक्यअसर
1नकारात्मक स्वीकार“मैं नहीं कर सकता”, “मेरी याददाश्त ख़राब है”सबसे नुकसानदेह, कमज़ोरी को पक्का करता है
2ज़रूरत पहचानना“मुझे यह करना चाहिए”, “काश मैं ऐसा कर पाता”अच्छी नीयत, पर अपराध बोध भी
3बदलने का फ़ैसला“अब मैं ऐसा नहीं करता”, “मैंने सिगरेट छोड़ दी है”बदलाव शुरू होता है
4नया बेहतर “मैं”“मैं आत्म विश्वासी हूँ”, “मैं काम समय पर करता हूँ”सबसे असरदार, नई तस्वीर बनाता है
5सबसे ऊँची एकता“मैं इस पूरी सृष्टि का हिस्सा हूँ”आध्यात्मिक शांति

सबसे ज़्यादा काम का स्तर 3 और 4 है। स्तर 1 के हर वाक्य को स्तर 4 में बदलने की आदत डालें:

पुरानी बात (स्तर 1)नई बात (स्तर 4)
मुझे सुबह उठना नहीं आतामैं हर सुबह समय पर ताज़गी से उठता हूँ
मैं पैसे नहीं बचा पातामैं हर महीने पहले बचत करता हूँ, फिर ख़र्च
मुझे लोगों से बात करने में झिझक होती हैमैं लोगों से आराम और भरोसे से बात करता हूँ
मैं हमेशा थका रहता हूँमैं अपनी सेहत का ध्यान रखता हूँ और ऊर्जा से भरा हूँ
मेरी याददाश्त कमज़ोर हैमैं ज़रूरी बातें ध्यान से सुनता और याद रखता हूँ

अपनी प्रोग्रामिंग बदलने के 5 तरीक़े

हेल्म्सटेटर नई सेल्फ़ टॉक को आदत बनाने के पाँच तरीक़े बताते हैं:

  1. मन में बोलना (Silent Self Talk): दिन भर मन में ख़ुद से सकारात्मक वाक्य कहना, और जैसे ही कोई नकारात्मक वाक्य निकले, उसे तुरंत बदल देना।
  2. ज़ोर से बोलना (Self Speak): अकेले में, शीशे के सामने, अपने नए वाक्य आवाज़ के साथ बोलना। आवाज़ में बोली बात दिमाग़ में ज़्यादा गहराई तक जाती है।
  3. ख़ुद से बातचीत (Self Conversation): किसी समस्या पर ख़ुद से ऐसे बात करना जैसे कोई समझदार दोस्त आपको समझा रहा हो।
  4. लिखना (Self Write): अपने नए वाक्य रोज़ एक कॉपी में लिखना, कार्ड पर लिखकर पर्स में रखना या शीशे पर चिपकाना।
  5. रिकॉर्ड करके सुनना (Tape Talk): अपनी आवाज़ में नए वाक्य रिकॉर्ड करके रोज़ सुबह और रात सुनना। आज के समय में फ़ोन की वॉइस रिकॉर्डिंग इसके लिए सबसे आसान है।

21 दिन का सेल्फ़ टॉक अभ्यास

हफ़्ताक्या करें
पहलाअपनी 10 सबसे आम नकारात्मक बातें लिखें, जो आप ख़ुद से कहते हैं
दूसराहर एक को स्तर 4 के वाक्य में बदलें, सुबह शाम ज़ोर से पढ़ें
तीसराये वाक्य अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करें और रोज़ सोने से पहले सुनें

हमारा दिमाग़ इसी तरह काम करता है। अगर आप अपने नतीजे बदलना चाहते हैं, तो कभी भी शुरू कर सकते हैं। पहले कदम से शुरू कीजिए, और अपनी प्रोग्रामिंग बदल दीजिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

वे 5 कदम कौन से हैं जो सफलता या असफलता तय करते हैं?

प्रोग्रामिंग, विश्वास, दृष्टिकोण, भावनाएँ और व्यवहार। प्रोग्रामिंग से विश्वास बनते हैं, विश्वास से दृष्टिकोण, दृष्टिकोण से भावनाएँ, भावनाओं से व्यवहार, और व्यवहार से नतीजे।

“What to Say When You Talk to Your Self” किताब किसने लिखी है?

अमेरिकी लेखक डॉ. शैड हेल्म्सटेटर (Shad Helmstetter) ने, 1982 में। इसका हिंदी अनुवाद “क्या कहें जब स्वयं से बात करें” नाम से मिलता है।

सेल्फ़ टॉक क्या है?

वह बातचीत जो हम दिन भर मन में ख़ुद से करते हैं, जैसे “मुझसे नहीं होगा” या “मैं कर लूँगा”। यही बातें धीरे धीरे हमारे विश्वास और व्यवहार बनाती हैं।

अपनी नकारात्मक प्रोग्रामिंग कैसे बदलें?

अपने नकारात्मक वाक्य पहचानें, उन्हें वर्तमान काल के सकारात्मक वाक्यों (“मैं … हूँ”) में बदलें, और उन्हें रोज़ बोलें, लिखें और अपनी आवाज़ में रिकॉर्ड करके सुनें।

नई सेल्फ़ टॉक का असर कितने दिन में दिखता है?

ज़्यादातर लोगों को 3 से 4 हफ़्ते के रोज़ के अभ्यास के बाद सोच और व्यवहार में बदलाव महसूस होने लगता है, पर इसे जीवन भर की आदत बनाना ही असली लक्ष्य है।

क्या सिर्फ़ अच्छी बातें बोलने से नतीजे बदल जाएँगे?

नई सेल्फ़ टॉक कड़ी की पहली कड़ी बदलती है। जब विश्वास और भावनाएँ बदलती हैं, तो व्यवहार बदलता है, और मेहनत भरे सही व्यवहार से ही नतीजे बदलते हैं।

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आप ख़ुद से सबसे ज़्यादा कौन सी नकारात्मक बात कहते हैं, और उसे किस नए वाक्य में बदलेंगे, कमेंट में ज़रूर बताइए। हमारे वीडियो देखने के लिए Storyshala YouTube चैनल से जुड़िए।

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