
Satyanarayan katha हिंदू घरों में सबसे ज़्यादा की जाने वाली पूजाओं में से एक है। भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप, यानी सत्यनारायण भगवान की यह पूजा पूर्णिमा के दिन तो होती ही है, साथ में गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन, नई नौकरी या किसी भी मनोकामना पूरी होने पर भी कराई जाती है। मान्यता है कि यह कथा स्कंद पुराण के रेवा खंड में आती है।
इस पेज पर सत्यनारायण व्रत कथा के पाँचों अध्याय सरल हिंदी में लिखे हैं, साथ में 2026 और 2027 में सत्यनारायण पूजा की सभी पूर्णिमा तारीख़ें, छोटी कथा, पूजा की विधि क्रम से, मंत्र, नियम, सामग्री की सूची और प्रसाद बनाने का तरीका भी है। पूजा के समय कथा पढ़ने के लिए इस पेज को बुकमार्क कर लीजिए।
विषय सूची
सत्यनारायण पूजा कब करें?
- पूर्णिमा: हर महीने की पूर्णिमा सत्यनारायण पूजा का सबसे प्रचलित दिन है। कई बार पूजा पूर्णिमा से एक दिन पहले भी होती है, जब पूर्णिमा तिथि पिछली शाम से शुरू हो जाती है। सही दिन अपने शहर के पंचांग में देखिए।
- शुभ अवसर: गृह प्रवेश, विवाह, बच्चे का जन्म या जन्मदिन, नया काम शुरू करना या कोई मनोकामना पूरी होना।
- समय: कथा में शाम के समय पूजा करने का विधान बताया गया है, पर कई घरों में सुबह भी पूजा होती है।
सत्यनारायण पूजा की तारीख़ें: 2026 और 2027 की पूर्णिमा
Drik Panchang के अनुसार (नई दिल्ली) सत्यनारायण पूजा के दिन:
| महीना | 2026 | 2027 |
|---|---|---|
| पौष | 3 जनवरी (शनिवार) | 22 जनवरी (शुक्रवार) |
| माघ | 1 फ़रवरी (रविवार) | 20 फ़रवरी (शनिवार) |
| फाल्गुन | 3 मार्च (मंगलवार) | 22 मार्च (सोमवार) |
| चैत्र | 1 अप्रैल (बुधवार) | 20 अप्रैल (मंगलवार) |
| वैशाख | 1 मई (शुक्रवार) | 20 मई (गुरुवार) |
| ज्येष्ठ | 29 जून (सोमवार) | 18 जून (शुक्रवार) |
| आषाढ़ | 29 जुलाई (बुधवार) | 18 जुलाई (रविवार) |
| श्रावण | 27 अगस्त (गुरुवार) | 16 अगस्त (सोमवार) |
| भाद्रपद | 26 सितंबर (शनिवार) | 15 सितंबर (बुधवार) |
| आश्विन | 25 अक्टूबर (रविवार) | 15 अक्टूबर (शुक्रवार) |
| कार्तिक | 24 नवंबर (मंगलवार) | 13 नवंबर (शनिवार) |
| मार्गशीर्ष | 23 दिसंबर (बुधवार) | 13 दिसंबर (सोमवार) |
2026 में अधिक मास होने के कारण 30 मई (शनिवार) को भी एक पूर्णिमा थी। पूर्णिमा व्रत का दिन कई बार कैलेंडर की पूर्णिमा से एक दिन पहले पड़ता है, क्योंकि पूजा उस दिन होती है जिस शाम पूर्णिमा तिथि हो। अपने शहर का पंचांग भी एक बार देख लें।
सत्यनारायण व्रत कथा (छोटी कथा)
जिनके पास समय कम है, उनके लिए Satyanarayan katha का छोटा रूप: नारद जी के पूछने पर भगवान विष्णु ने कलियुग में दुख दूर करने के लिए सत्यनारायण व्रत बताया। एक ग़रीब ब्राह्मण और एक लकड़हारे ने यह व्रत किया और उनके दिन फिर गए। साधु नाम के व्यापारी ने संतान होने पर व्रत का संकल्प लिया, पर बार बार टालता रहा, तो परदेस में जेल गया और धन खो बैठा। उसकी पत्नी लीलावती और बेटी कलावती ने व्रत किया तो वह छूटा, पर घमंड में झूठ बोला तो धन पत्ते बन गया। कलावती पूजा का प्रसाद छोड़कर पति से मिलने दौड़ी तो पति की नाव डूब गई, और प्रसाद खाने पर लौट आई। राजा तुंगध्वज ने ग्वालों का प्रसाद ठुकराया तो दुख पाया। सबकी सीख एक ही है: संकल्प निभाइए और प्रसाद का आदर कीजिए।

सत्यनारायण पूजा सामग्री सूची
- चौकी और उस पर बिछाने के लिए पीला या लाल कपड़ा
- भगवान सत्यनारायण (विष्णु) का चित्र या शालिग्राम
- केले के पत्ते या केले के खंभे (चौकी के चारों कोनों पर)
- जल से भरा कलश, आम के पत्ते और नारियल
- रोली, चावल, हल्दी, जनेऊ, पान, सुपारी, फूल, फूलमाला और तुलसी दल
- धूप, दीपक, घी और कपूर
- फल (ख़ासकर केले) और मिठाई
- प्रसाद के लिए आटा, घी, चीनी या शक्कर, और पंचामृत के लिए दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
- सत्यनारायण पूजा सामग्री किट
- सत्यनारायण व्रत कथा की किताब
- पूजा की चौकी
प्रसाद (पंजीरी) और पंचामृत कैसे बनाएँ
पंजीरी: कथा के अनुसार प्रसाद में गेहूँ का आटा, घी और शक्कर सवाया (सवा गुना) मात्रा में लिए जाते हैं। आटे को घी में धीमी आँच पर सुनहरा होने तक भूनिए, ठंडा होने पर उसमें पिसी शक्कर मिलाइए। ऊपर से कटे केले और तुलसी दल डालिए। कई घरों में आटे की जगह सूजी या धनिये की पंजीरी भी बनती है।
पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद और शक्कर को मिलाकर उसमें तुलसी दल डाल दीजिए।
सत्यनारायण पूजा विधि (क्रम से)
- तैयारी: पूजा की जगह साफ़ करके चौकी लगाइए, उस पर कपड़ा बिछाइए और भगवान सत्यनारायण का चित्र या शालिग्राम रखिए। चौकी के चारों कोनों पर केले के पत्ते या खंभे लगाइए।
- संकल्प: परिवार के साथ बैठकर हाथ में जल, फूल और चावल लेकर पूजा का संकल्प लीजिए।
- गणेश पूजा और कलश पूजा: सबसे पहले गणेश जी की पूजा कीजिए, फिर कलश की और नवग्रह की।
- सत्यनारायण पूजा: भगवान को स्नान (पंचामृत और जल), वस्त्र, जनेऊ, रोली, चावल, फूल, तुलसी दल, धूप और दीपक अर्पित कीजिए, फिर फल और प्रसाद का भोग लगाइए।
- कथा: नीचे दिए गए पाँचों अध्याय क्रम से पढ़िए या सुनिए। हर अध्याय के बाद शंख बजाने की परंपरा भी है।
- आरती: कथा के बाद भगवान सत्यनारायण की आरती कीजिए।
- प्रसाद: सबसे पहले भगवान को भोग लगाकर, फिर सभी को प्रसाद बाँटिए। कथा के अनुसार प्रसाद का अनादर बिल्कुल नहीं करना चाहिए, इसे ज़रूर ग्रहण करें।
सत्यनारायण व्रत कथा: पहला अध्याय
एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनक आदि ऋषियों ने सूत जी से पूछा: “हे मुनिवर, कलियुग में ऐसा कौन सा सरल उपाय है जिससे मनुष्य को मनचाहा फल मिले और उसके दुख दूर हों?”
सूत जी ने कहा: “यही प्रश्न एक बार नारद मुनि ने भगवान विष्णु से पूछा था। नारद जी पृथ्वी लोक पर घूमते हुए आए, तो उन्होंने देखा कि लोग अपने कर्मों के कारण तरह तरह के दुख भोग रहे हैं। यह देखकर वे भगवान विष्णु के पास गए और उनसे पूछा कि इन दुखों से मुक्ति का कोई सरल उपाय बताइए।”
भगवान विष्णु ने कहा: “हे नारद, एक व्रत है जो बहुत पुण्य देने वाला है, उसका नाम है सत्यनारायण व्रत। मनुष्य किसी भी दिन, ख़ासकर पूर्णिमा को, श्रद्धा से यह व्रत करे। शाम के समय अपने परिवार और मित्रों के साथ बैठकर सत्यनारायण भगवान की पूजा करे, कथा सुने और भक्ति से बना प्रसाद सबको बाँटे। जो ऐसा करता है, उसके सब दुख दूर होते हैं, धन धान्य बढ़ता है और अंत में उसे उत्तम लोक मिलता है।”
सत्यनारायण व्रत कथा: दूसरा अध्याय
सूत जी ने आगे बताया कि जिसने सबसे पहले यह व्रत किया, उसकी कथा सुनो। काशी नगरी में शतानंद नाम का एक बहुत ग़रीब ब्राह्मण रहता था। वह रोज़ भीख माँगकर किसी तरह अपना पेट भरता था। एक दिन भगवान एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर उसके पास आए और उसकी हालत पूछी। फिर उन्होंने उसे सत्यनारायण व्रत की विधि बताई।
अगले दिन ब्राह्मण को भिक्षा में अच्छा धन मिला। उसने उसी से श्रद्धा के साथ सत्यनारायण भगवान की पूजा और कथा की। भगवान की कृपा से उसकी ग़रीबी दूर हो गई और वह सुख से रहने लगा। वह हर महीने यह व्रत करता रहा।
एक दिन जब शतानंद अपने घर में कथा करा रहा था, तभी एक लकड़हारा, जो लकड़ियाँ बेचकर गुज़ारा करता था, प्यास से व्याकुल होकर वहाँ आया। उसने पूछा कि यह कौन सी पूजा है। ब्राह्मण ने उसे सत्यनारायण व्रत की महिमा बताई। लकड़हारे ने मन में संकल्प किया कि आज लकड़ी बेचकर जो पैसे मिलेंगे, उनसे वह भी यह पूजा करेगा। उस दिन उसकी लकड़ियाँ दोगुने दाम पर बिकीं। उसने पूरी श्रद्धा से पूजा की, और भगवान की कृपा से उसका जीवन भी सुख से भर गया।

सत्यनारायण व्रत कथा: तीसरा अध्याय
बहुत समय पहले उल्कामुख नाम के एक धर्मात्मा राजा थे। एक दिन वे अपनी रानी के साथ भद्रशीला नदी के किनारे सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे थे। उसी समय साधु नाम का एक व्यापारी अपनी नाव लेकर वहाँ से गुज़रा। उसने राजा से पूछा कि यह कौन सी पूजा है। राजा ने बताया कि यह सत्यनारायण का व्रत है, जिससे मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
व्यापारी की कोई संतान नहीं थी। उसने संकल्प किया: “अगर मुझे संतान हुई, तो मैं भी यह व्रत करूँगा।” घर लौटकर उसने अपनी पत्नी लीलावती को यह बात बताई। भगवान की कृपा से कुछ समय बाद उनके घर एक सुंदर बेटी हुई, जिसका नाम कलावती रखा गया।
लीलावती ने पति को उसका संकल्प याद दिलाया, पर व्यापारी ने कहा: “बेटी के विवाह के समय पूजा कर लेंगे।” बेटी बड़ी हुई, और उसका विवाह कंचनपुर के एक व्यापारी के बेटे से हुआ। पर व्यापारी इस बार भी व्रत करना भूल गया। इससे भगवान रुष्ट हो गए।
कुछ समय बाद व्यापारी अपने दामाद के साथ व्यापार करने रत्नसारपुर नगर गया, जहाँ राजा चंद्रकेतु का राज था। उसी समय कुछ चोरों ने राजा का धन चुराया और सिपाहियों से बचने के लिए उसे व्यापारी के ठिकाने के पास छोड़कर भाग गए। सिपाहियों ने धन वहाँ देखा तो व्यापारी और उसके दामाद को चोर समझकर पकड़ लिया। राजा ने दोनों को कारागार में डाल दिया और उनका सारा धन छीन लिया।
उधर घर पर भी लीलावती और कलावती पर मुसीबत आ गई। चोरी से घर का सारा धन चला गया और वे भूख से परेशान रहने लगीं। एक दिन कलावती ने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की पूजा होते देखी, कथा सुनी और प्रसाद लेकर देर से घर लौटी। माँ के पूछने पर उसने सब बताया। लीलावती को अपने पति का भूला हुआ संकल्प याद आया। उसने अगले दिन श्रद्धा से सत्यनारायण की पूजा की और प्रार्थना की कि उसके पति और दामाद सकुशल लौट आएँ।
भगवान ने प्रसन्न होकर राजा चंद्रकेतु को सपने में दर्शन दिए और कहा कि दोनों व्यापारी निर्दोष हैं, उन्हें छोड़ दो। अगली सुबह राजा ने दोनों को कारागार से निकाला, उनसे क्षमा माँगी और उनका धन दोगुना करके उन्हें सम्मान से विदा किया।
सत्यनारायण व्रत कथा: चौथा अध्याय
व्यापारी अपने दामाद के साथ नाव में धन भरकर घर की ओर चला। रास्ते में भगवान एक दंडी संन्यासी का रूप धरकर आए और पूछा: “तुम्हारी नाव में क्या है?” व्यापारी घमंड में था, उसने हँसकर कहा: “इसमें तो बस लता पत्र (बेल और पत्ते) भरे हैं।” संन्यासी ने कहा: “तुम्हारा वचन सत्य हो,” और चले गए।
कुछ देर बाद व्यापारी ने नाव देखी, तो सचमुच उसमें धन की जगह सिर्फ़ बेल और पत्ते भरे थे। वह बेहोश होकर गिर पड़ा। होश आने पर दामाद ने कहा: “यह उस संन्यासी का शाप है, उनकी शरण में चलिए।” व्यापारी दौड़कर संन्यासी के पैरों में गिर पड़ा और अपनी भूल के लिए क्षमा माँगी। भगवान ने उसे क्षमा कर दिया, और नाव फिर से धन से भर गई। व्यापारी ने वहीं सत्यनारायण की पूजा की और आगे बढ़ा।

जब नाव नगर के पास पहुँची, तो एक दूत ने लीलावती को ख़बर दी। लीलावती ने उस समय सत्यनारायण की पूजा पूरी की थी, उसने कलावती से कहा कि मैं तुम्हारे पिता को लेने जाती हूँ, तुम प्रसाद लेकर आ जाना। पर कलावती अपने पति को देखने की जल्दी में प्रसाद छोड़कर ही दौड़ पड़ी।
प्रसाद के अनादर से भगवान रुष्ट हुए, और देखते ही देखते कलावती का पति नाव समेत पानी में डूब गया। यह देखकर कलावती विलाप करने लगी और पति के बिना जीने से इनकार करने लगी। तभी आकाशवाणी हुई: “तुमने प्रसाद का अनादर किया है। घर जाकर प्रसाद ग्रहण करो, तुम्हारा पति लौट आएगा।” कलावती ने घर जाकर श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया, और लौटी तो उसका पति नाव समेत सकुशल किनारे पर था। उसके बाद व्यापारी का परिवार हर पूर्णिमा को सत्यनारायण का व्रत करने लगा।
सत्यनारायण व्रत कथा: पाँचवाँ अध्याय
तुंगध्वज नाम का एक राजा था। एक दिन वह शिकार के लिए वन में गया। वहाँ उसने देखा कि कुछ ग्वाले मिलकर सत्यनारायण भगवान की पूजा कर रहे हैं। राजा को अपने पद का घमंड था, इसलिए वह न तो पूजा में शामिल हुआ, न भगवान को प्रणाम किया। ग्वालों ने उसे प्रसाद दिया, तो उसने उसे भी वहीं छोड़ दिया और चला गया।
महल लौटा तो उसने देखा कि उसका सारा धन नष्ट हो चुका है और उसके सौ पुत्रों पर संकट आ गया है। राजा समझ गया कि यह प्रसाद के अनादर का फल है। वह तुरंत उसी जगह लौटा, ग्वालों के साथ बैठकर श्रद्धा से सत्यनारायण की पूजा की और प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से उसका धन और परिवार सब वापस मिल गया, और उसने जीवन भर यह व्रत किया।
सूत जी ने अंत में कहा कि जो मनुष्य श्रद्धा से यह व्रत करता है और कथा सुनता है, उसकी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। मान्यता है कि इस कथा के पात्रों ने अगले जन्मों में भी बड़ा पद पाया: शतानंद ब्राह्मण अगले जन्म में सुदामा बने, लकड़हारा निषादराज गुह, राजा उल्कामुख राजा दशरथ, साधु व्यापारी राजा मोरध्वज, और राजा तुंगध्वज स्वायंभुव मनु।

सत्यनारायण पूजा के मंत्र और नियम
- मुख्य मंत्र: ॐ श्री सत्यनारायणाय नमः (पूजा में और भोग लगाते समय)
- विष्णु मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
- आरती: कथा के बाद “जय लक्ष्मी रमणा” आरती की जाती है।
नियम:
- पूजा के दिन व्रत रखें, और कथा और प्रसाद के बाद ही भोजन करें। सेहत ठीक न हो तो फलाहार लें।
- कथा के पाँचों अध्याय पूरे सुनें, बीच में न उठें।
- प्रसाद (पंजीरी और पंचामृत) सबको दें और ख़ुद भी लें। कथा की सबसे बड़ी सीख यही है कि प्रसाद का अनादर न हो।
- प्रसाद में तुलसी दल ज़रूर डालें।
- जो संकल्प लिया हो, उसे समय पर पूरा करें, जैसे कथा में व्यापारी के उदाहरण से सीख मिलती है।
सत्यनारायण कथा की सीख
इस कथा की हर कहानी एक ही बात दोहराती है: सच्चे मन से किया गया संकल्प निभाइए, और भगवान के प्रसाद का आदर कीजिए। व्यापारी ने संकल्प टाला तो मुसीबत आई, घमंड में झूठ बोला तो धन पत्ते बन गया, कलावती और राजा तुंगध्वज ने प्रसाद छोड़ा तो दुख मिला, और श्रद्धा लौटी तो सब ठीक हो गया। यानी सत्यनारायण भगवान की पूजा का असली अर्थ है सत्य, विनम्रता और कृतज्ञता के साथ जीना।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
सत्यनारायण कथा में कितने अध्याय होते हैं?
सत्यनारायण व्रत कथा में पाँच अध्याय होते हैं। पूजा के समय पाँचों अध्याय क्रम से पढ़े या सुने जाते हैं।
अगली सत्यनारायण पूजा (पूर्णिमा) कब है?
2026 में 25 अक्टूबर (शरद पूर्णिमा), 24 नवंबर (कार्तिक पूर्णिमा) और 23 दिसंबर को। 2027 की सभी तारीख़ें ऊपर की तालिका में हैं।
सत्यनारायण पूजा किस दिन करनी चाहिए?
सबसे प्रचलित दिन पूर्णिमा है। इसके अलावा गृह प्रवेश, विवाह, जन्मदिन या किसी मनोकामना के पूरी होने पर किसी भी शुभ दिन यह पूजा की जा सकती है।
सत्यनारायण पूजा में क्या प्रसाद बनता है?
मुख्य प्रसाद पंजीरी है, जो भुने हुए गेहूँ के आटे, घी और शक्कर से बनती है और उसमें केले और तुलसी दल मिलाए जाते हैं। साथ में पंचामृत भी चढ़ाया जाता है।
क्या सत्यनारायण पूजा घर पर खुद कर सकते हैं?
हाँ। पंडित जी से पूजा कराना परंपरा है, पर श्रद्धा से परिवार के साथ बैठकर आप खुद भी विधि से पूजा और कथा कर सकते हैं। इस पेज पर दी गई विधि और पाँचों अध्याय इसके लिए काफ़ी हैं।
सत्यनारायण कथा की सबसे बड़ी सीख क्या है?
संकल्प को टालना नहीं चाहिए और प्रसाद का अनादर नहीं करना चाहिए। कथा सत्य, विनम्रता और कृतज्ञता से जीने की सीख देती है।
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हर पूर्णिमा पर कथा पढ़ने के लिए इस पेज को सेव कर लीजिए। आपके घर में सत्यनारायण पूजा किस अवसर पर होती है, कमेंट में ज़रूर बताइए।
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