
Dainik puja vidhi यानी घर के मंदिर में रोज़ की जाने वाली पूजा का सही क्रम। बहुत से लोग रोज़ दीपक और अगरबत्ती तो जलाते हैं, पर यह नहीं जानते कि पूजा किस क्रम में करनी चाहिए, कौन सा मंत्र कब बोलें, और कम समय हो तो छोटी पूजा कैसे करें। इस पेज पर रोज़ सुबह और शाम की पूजा का पूरा क्रम एक जगह, आसान हिंदी में दिया गया है।
पूजा का क्रम और मंत्र पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की कर्मकाण्ड भास्कर से लिए गए हैं, जिसमें पवित्रीकरण, आचमन, संकल्प, देव पूजन, षोडशोपचार पूजन, आरती, नैवेद्य, पुष्पांजलि और शयन तक की दैनिक पूजा विस्तार से दी गई है। हर मंत्र के साथ उसका काम हिंदी में भी लिखा है, ताकि पहली बार पूजा करने वाले भी आसानी से कर सकें।
छोटा जवाब: रोज़ की पूजा का मूल क्रम है: स्नान, पवित्रीकरण और आचमन, दीपक जलाना, संकल्प, गणेश वंदना, इष्ट देवता का ध्यान, पंचोपचार पूजन (गंध, फूल, धूप, दीप, भोग), मंत्र जप, आरती, क्षमा प्रार्थना और प्रसाद। पूरी पूजा 20 से 30 मिनट की है, और समय कम हो तो नीचे दी गई 10 मिनट की छोटी पूजा भी पूरी मानी जाती है।
विषय सूची
दैनिक पूजा: एक नज़र में
| बात | जानकारी |
|---|---|
| कब करें | सुबह स्नान के बाद, और शाम को संध्या के समय आरती |
| कितना समय | पूरी पूजा 20 से 30 मिनट, छोटी पूजा 10 मिनट |
| कहाँ | घर के मंदिर में, जो साफ़, शांत और रोशन हो |
| किसका मुँह किस ओर | पूजा करने वाले का मुँह पूर्व या उत्तर की ओर |
| किसकी पूजा | गणेश जी सबसे पहले, फिर अपने इष्ट देवता और परिवार के देवी देवता |
| मूल पूजा | पंचोपचार: गंध, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य (भोग) |
| सबसे ज़रूरी | श्रद्धा, सफ़ाई और रोज़ एक तय समय |
पूजा का सही समय
- सुबह की पूजा: सबसे अच्छा समय ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) या सूर्योदय के बाद का समय है। नौकरी या स्कूल वाले घरों में स्नान के बाद, नाश्ते से पहले पूजा करें।
- शाम की पूजा: सूर्यास्त के समय (गोधूलि बेला) दीपक जलाकर आरती करें।
- क्यों ये दोनों समय: कर्मकाण्ड भास्कर बताती है कि सुबह और शाम, ब्रह्म मुहूर्त और गोधूलि बेला, दिन और रात के संधिकाल हैं, और संधिकाल को उपासना के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है।
- सबसे ज़रूरी बात: जो भी समय चुनें, रोज़ उसी समय पूजा करने की कोशिश करें। तय समय पर रोज़ की थोड़ी पूजा, कभी कभी की लंबी पूजा से ज़्यादा फल देती है।
घर का मंदिर कैसा हो और किस दिशा में

वास्तु की परंपरा में घर के मंदिर के लिए ये बातें मानी जाती हैं:
- दिशा: मंदिर के लिए घर का उत्तर पूर्व (ईशान) कोना सबसे शुभ माना जाता है। वहाँ जगह न हो तो पूर्व या उत्तर दिशा।
- मुँह की दिशा: पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व या उत्तर की ओर हो, यानी मूर्तियों का मुँह पश्चिम या दक्षिण की ओर रहेगा।
- ऊँचाई: मंदिर ज़मीन पर सीधे न रखें, किसी चौकी या दीवार की ऊँची जगह पर रखें, ताकि बैठकर पूजा करते समय भगवान आपकी छाती के बराबर या थोड़ा ऊपर हों।
- किस जगह नहीं: बाथरूम की दीवार से लगा हुआ, सीढ़ियों के नीचे, या बेडरूम में पैरों की तरफ़ मंदिर न बनाएँ। जगह की कमी हो तो रसोई के ईशान कोने में भी छोटा मंदिर बनाया जाता है।
- मूर्तियाँ: घर के मंदिर में बड़ी मूर्तियों की जगह छोटी मूर्तियाँ या चित्र रखें। एक ही देवता की बहुत सारी मूर्तियाँ न रखें। टूटी या खंडित मूर्ति और फटे पुराने चित्र मंदिर में न रखें, उन्हें सम्मान से विसर्जित कर दें।
- सफ़ाई और रोशनी: मंदिर रोज़ साफ़ हो, वहाँ अंधेरा न रहे, और ऊपर कोई भारी सामान न रखा हो।
ये वास्तु की परंपराएँ हैं। फ़्लैट या छोटे घर में जो भी साफ़ और शांत जगह मिले, वहीं श्रद्धा से बनाया मंदिर पूरा है।
रोज़ की पूजा से पहले की तैयारी
- स्नान: सुबह स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। बिना नहाए पूजा न करें।
- मंदिर की सफ़ाई: पिछले दिन के बासी फूल (निर्माल्य) हटा दें, मंदिर पोंछ दें और दीपक साफ़ कर लें।
- आसन: ज़मीन पर सीधे न बैठें। ऊन, कुश या कपड़े का आसन बिछाएँ।
- थाली तैयार करें: पूजा शुरू करने से पहले सारी सामग्री थाली में रख लें, ताकि बीच में उठना न पड़े।
- मन शांत करें: मोबाइल दूर रखें। पूजा के 20 मिनट सिर्फ़ भगवान के लिए हों।
दैनिक पूजा सामग्री सूची

- पूजा की थाली और छोटी कटोरियाँ
- जल से भरा ताँबे का लोटा और आचमनी (छोटी चम्मच)
- घी का दीपक और रुई की बाती
- अगरबत्ती या धूप और कपूर
- रोली या कुमकुम, हल्दी, चंदन
- अक्षत (साबुत चावल, टूटे न हों)
- ताज़े फूल, तुलसी दल (भगवान विष्णु और कृष्ण के लिए), दूर्वा (गणेश जी के लिए), बेलपत्र (शिव जी के लिए)
- भोग: मिश्री, गुड़, फल, मेवा या घर का बना सात्विक भोजन
- पूजा की घंटी और शंख
- ऊन या कुश का आसन
- आरती की थाली या दीपक
Dainik Puja Vidhi: रोज़ की पूजा का पूरा क्रम (18 चरण)
यह क्रम कर्मकाण्ड भास्कर के दैनिक पूजन और सामान्य प्रकरण पर आधारित है। हर मंत्र के साथ उसका काम लिखा है। मंत्र याद न हों या बोलने में कठिन लगें, तो उस काम को भाव से करते हुए “ॐ नमः” या अपने इष्ट देवता का नाम लेकर आगे बढ़ें। भगवान भाव देखते हैं, उच्चारण नहीं।
चरण 1: जागरण (घंटी बजाकर भगवान को जगाना)
मंदिर का पर्दा या पट खोलें और घंटी बजाएँ। कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि परमात्मा कभी सोते नहीं, पर जब तक हम अपने अंदर उन्हें जाग्रत न करें, तब तक पूजा का असर नहीं दिखता। इसलिए जागरण का अर्थ है अपने मन को भगवान के लिए जगाना। देवी की पूजा करते हों तो यह मंत्र बोलें:
ॐ उत्तिष्ठ त्वं महादेवि, उत्तिष्ठ जगदीश्वरि। उत्तिष्ठ वेदमातस्त्वं, त्रैलोक्यमङ्गलं कुरु॥
चरण 2: पवित्रीकरण
बाएँ हाथ में थोड़ा जल लें, उसे दाहिने हाथ से ढकें, मंत्र बोलें और फिर वह जल अपने सिर और शरीर पर छिड़क लें। भाव करें कि आप तन और मन से पवित्र हो रहे हैं।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा, सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं, स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
अर्थ: कोई पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी हालत में हो, जो कमल नयन भगवान को याद करता है, वह भीतर और बाहर से पवित्र हो जाता है।
चरण 3: आचमन
दाहिनी हथेली में आचमनी से थोड़ा जल लेकर, हर मंत्र के साथ एक बार, कुल तीन बार जल पिएँ। यह वाणी, मन और अंतःकरण की शुद्धि के लिए है।
- ॐ अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा।
- ॐ अमृतापिधानमसि स्वाहा।
- ॐ सत्यं यशः श्रीर्मयि, श्रीः श्रयतां स्वाहा।
इसके बाद हाथ धो लें। बहुत से परिवारों में आचमन “ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः” बोलकर भी किया जाता है। दोनों तरीके सही हैं।
चरण 4: शिखा वंदन
दाहिने हाथ की उँगलियाँ गीली करके सिर पर शिखा (चोटी) के स्थान को छुएँ। जिनकी शिखा नहीं है, वे और महिलाएँ भावना से उस स्थान को स्पर्श करें। भाव करें कि मन में अच्छे विचार ही आएँ।
ॐ चिद्रूपिणि महामाये, दिव्यतेजः समन्विते। तिष्ठ देवि शिखामध्ये, तेजोवृद्धिं कुरुष्व मे॥
चरण 5: प्राणायाम
कमर सीधी करके बैठें। दाहिने अँगूठे से दाहिना नथुना बंद करके बाएँ से धीरे धीरे पूरी साँस लें, थोड़ा रोकें, फिर बायाँ नथुना बंद करके दाहिने से धीरे धीरे साँस छोड़ें। 3 बार करें। कठिन लगे तो दोनों हाथ गोद में रखकर बस गहरी और धीमी साँस लें और छोड़ें।
कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार साँस लेते समय भाव करें कि संसार की अच्छाइयाँ भीतर आ रही हैं, और छोड़ते समय भाव करें कि सारी बुराइयाँ बाहर निकल रही हैं।
चरण 6: पृथ्वी पूजन (आसन की शुद्धि)
दाहिने हाथ में थोड़े अक्षत, फूल और जल लेकर यह मंत्र बोलें, फिर उन्हें ज़मीन पर छोड़कर धरती माँ को हाथ से छूकर प्रणाम करें।
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका, देवि त्वं विष्णुना धृता। त्वं च धारय मां देवि, पवित्रं कुरु चासनम्॥
अर्थ: हे पृथ्वी माता, आपने सारे लोकों को धारण किया है और आपको भगवान विष्णु ने धारण किया है। आप मुझे भी धारण करें और मेरे आसन को पवित्र करें।
चरण 7: दीपक और धूप जलाना
घी का दीपक भगवान के सामने या परंपरा के अनुसार उनके दाहिनी ओर रखें और जलाएँ, फिर अगरबत्ती या धूप जलाएँ। दीपक जलाकर उसे प्रणाम करें, क्योंकि दीपक ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक है।
शुभं करोति कल्याणम्, आरोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय, दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
चरण 8: संकल्प
हाथ में थोड़ा जल, अक्षत और फूल लेकर अपने मन में या धीमे स्वर में बोलें:
“मैं (अपना नाम), आज (दिन) को, अपने परिवार की सुख शांति, अच्छे स्वास्थ्य और भगवान की कृपा के लिए श्रद्धा से यह पूजा कर रहा हूँ (कर रही हूँ)।”
फिर जल ज़मीन पर या थाली में छोड़ दें। कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि अच्छा काम घोषणा करके करना चाहिए, क्योंकि संकल्प से मन का ढीलापन दूर होता है और मनोबल बढ़ता है।
चरण 9: गणेश वंदना
हर पूजा गणेश जी से शुरू होती है, क्योंकि वे विवेक के प्रतीक और विघ्न दूर करने वाले प्रथम पूज्य हैं। हाथ जोड़कर बोलें:
ॐ अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं, पूजितो यः सुरासुरैः। सर्वविघ्नहरस्तस्मै, गणाधिपतये नमः॥
या आसान मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः। गणेश जी को दूर्वा, अक्षत और फूल चढ़ाएँ।
चरण 10: गुरु और माँ गौरी की वंदना
गुरु: गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः। गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्री गुरवे नमः॥
माँ गौरी: सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये, शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि, नारायणि नमोऽस्तु ते॥
चरण 11: इष्ट देवता का ध्यान और आवाहन
अब अपने इष्ट देवता (जैसे श्रीकृष्ण, श्रीराम, शिव जी, हनुमान जी या माँ दुर्गा) का ध्यान करें। आँखें बंद करके उनका रूप मन में देखें और बोलें:
ॐ (देवता का नाम) नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।
जैसे: “ॐ श्री कृष्णाय नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।”
चरण 12: मूर्ति की सफ़ाई और स्नान
कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार रोज़ की पूजा में मूर्ति को साफ़ गीले कपड़े से पोंछना काफ़ी है: पहले मुख, फिर हाथ और फिर चरण। पूरा श्रृंगार उतारकर स्नान कराने में समय लगता है, इसलिए यह सुबह के अलावा किसी भी सुविधा के समय, या हफ़्ते में एक बार किया जा सकता है। धातु की छोटी मूर्ति हो तो रोज़ जल या पंचामृत से स्नान कराकर पोंछ सकते हैं। चित्र हो तो सिर्फ़ जल छिड़क दें।
चरण 13: पंचोपचार पूजन
रोज़ की पूजा में ये पाँच चीज़ें अर्पित की जाती हैं:
- गंध: रोली, चंदन या हल्दी का तिलक लगाएँ।
- पुष्प: ताज़े फूल चढ़ाएँ। अक्षत भी अर्पित करें।
- धूप: अगरबत्ती या धूप दिखाएँ।
- दीप: दीपक दिखाएँ।
- नैवेद्य: भोग लगाएँ (अगला चरण)।
समय हो तो षोडशोपचार पूजन (16 उपचार) करें, जिसका पूरा क्रम नीचे अलग से दिया गया है।
चरण 14: नैवेद्य (भोग)
भोग की थाली भगवान के सामने रखें। कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि जो शुद्ध सात्विक भोजन हम अपने लिए बनाएँ, वही नैवेद्य के रूप में अर्पित करें। भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण के भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें। भोग के बाद थोड़ा जल (आचमन) भी अर्पित करें।
ॐ सत्पात्रसिद्धं नैवेद्यं, विविधभोज्यसमन्वितम्। निवेदयामि देवेश, सानुगाय गृहाण तत्॥
अर्थ: अच्छे बर्तन में बना, तरह तरह के व्यंजनों वाला यह नैवेद्य मैं आपको अर्पित करता हूँ, आप इसे स्वीकार करें। (कर्मकाण्ड भास्कर में यह मंत्र देवी के लिए “देवेशि” शब्द से है, देवता के लिए “देवेश” बोलें।)
चरण 15: मंत्र जप और पाठ
रुद्राक्ष या तुलसी की माला से अपने इष्ट मंत्र का 1 माला (108 बार) जप करें। समय हो तो गीता का एक अध्याय, हनुमान चालीसा, विष्णु सहस्रनाम या दुर्गा सप्तशती का पाठ करें।
गायत्री मंत्र: ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्॥

चरण 16: आरती
घी या कपूर का दीपक जलाकर आरती करें। कर्मकाण्ड भास्कर में आरती का क्रम यह है: पहले दीपक घुमाएँ, फिर दीपक रखकर छोटे शंख में जल भरकर 5 से 7 बार घुमाएँ, फिर अंत में वह जल वहाँ मौजूद लोगों पर छिड़क दें। घर में शंख न हो तो सिर्फ़ दीपक से आरती करें।
आरती घुमाने का प्रचलित तरीका: भगवान के चरणों के सामने 4 बार, नाभि के सामने 2 बार, मुख के सामने 1 बार, और फिर पूरे विग्रह के सामने 7 बार। आरती के बाद दोनों हाथ दीपक की लौ के ऊपर रखकर अपनी आँखों और सिर से लगाएँ।
सबसे प्रचलित आरती “ॐ जय जगदीश हरे” है। अपने इष्ट देवता की आरती गा सकते हैं।
चरण 17: पुष्पांजलि और क्षमा प्रार्थना
दोनों हाथों में फूल लेकर भगवान के चरणों में अर्पित करें। कर्मकाण्ड भास्कर का पुष्पांजलि मंत्र:
ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥
फिर हाथ जोड़कर पूजा में हुई भूल चूक के लिए क्षमा माँगें:
आवाहनं न जानामि, न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि, क्षमस्व परमेश्वर॥
अर्थ: हे परमेश्वर, मैं न तो आपको बुलाना जानता हूँ, न विदा करना, न पूजा करना जानता हूँ। मेरी भूल क्षमा करें।
चरण 18: प्रसाद और प्रणाम
भोग को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें और ख़ुद भी लें। भगवान को साष्टांग या हाथ जोड़कर प्रणाम करें, घर के बड़ों का आशीर्वाद लें, और फिर दिन का काम शुरू करें।
शाम की पूजा और रात का शयन
- संध्या दीपक: सूर्यास्त के समय मंदिर में और घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएँ। तुलसी के पास भी दीपक जलाया जाता है।
- शाम की आरती: कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार आरती का यही क्रम सुबह और शाम, दोनों समय रहता है।
- शयन: रात को सोने से पहले भगवान को प्रणाम करके मंदिर का पर्दा लगा दें। कर्मकाण्ड भास्कर में शयन की प्रार्थना है: ॐ इमां पूजां मया देव, यथाशक्त्युपपादिताम्। शयनार्थं महादेव, व्रज स्वस्थानमुत्तमम्॥ (पुस्तक में यह देवी के लिए “देवि” और “महादेवि” शब्दों से है।) अर्थ: हे प्रभु, मैंने अपनी शक्ति के अनुसार जो पूजा की, उसे स्वीकार करें और विश्राम के लिए अपने उत्तम स्थान पर पधारें।
षोडशोपचार पूजन: 16 उपचार और उनका मतलब
त्योहार, व्रत या जिस दिन समय हो, उस दिन पंचोपचार की जगह षोडशोपचार पूजन करें। कर्मकाण्ड भास्कर में यह क्रम इस तरह है (हर उपचार के साथ उसकी पंक्ति बोलें और वह चीज़ अर्पित करें, चीज़ न हो तो अक्षत चढ़ा दें):
| क्रम | मंत्र की पंक्ति | क्या अर्पित करें |
|---|---|---|
| 1 | आवाहयामि, स्थापयामि | भगवान का ध्यान करके बुलाना |
| 2 | आसनं समर्पयामि | आसन (फूल या अक्षत) |
| 3 | पाद्यं समर्पयामि | चरण धोने का जल |
| 4 | अर्घ्यं समर्पयामि | हाथ धोने का जल |
| 5 | आचमनं समर्पयामि | पीने का जल |
| 6 | स्नानं समर्पयामि | स्नान का जल या पंचामृत |
| 7 | वस्त्रं समर्पयामि | वस्त्र या कलावा |
| 8 | यज्ञोपवीतं समर्पयामि | जनेऊ (देवताओं को) |
| 9 | गन्धं विलेपयामि | चंदन या रोली |
| 10 | अक्षतान् समर्पयामि | साबुत चावल |
| 11 | पुष्पाणि समर्पयामि | फूल और माला |
| 12 | धूपं आघ्रापयामि | धूप या अगरबत्ती |
| 13 | दीपं दर्शयामि | दीपक |
| 14 | नैवेद्यं निवेदयामि | भोग |
| 15 | ताम्बूलपूगीफलानि समर्पयामि | पान, सुपारी, इलायची |
| 16 | दक्षिणां समर्पयामि | दक्षिणा (सिक्का) |
हर पंक्ति के आगे अपने देवता का नाम जोड़ें, जैसे “ॐ श्री गणेशाय नमः, आसनं समर्पयामि”। अंत में बोलें: “सर्वाभावे अक्षतान् समर्पयामि” यानी जो चीज़ नहीं थी, उसकी जगह अक्षत अर्पित करता हूँ।
10 मिनट की छोटी पूजा (कम समय वालों के लिए)
सुबह जल्दी हो, तो यह छोटा क्रम भी पूरी श्रद्धा से किया जाए तो पूरा माना जाता है:
- स्नान के बाद आसन पर बैठें, “ॐ अपवित्रः पवित्रो वा” बोलकर जल छिड़कें। (1 मिनट)
- दीपक और अगरबत्ती जलाएँ। (1 मिनट)
- “ॐ गं गणपतये नमः” बोलकर गणेश जी को प्रणाम करें। (30 सेकंड)
- अपने इष्ट देवता को तिलक, फूल और भोग (मिश्री या फल) अर्पित करें। (2 मिनट)
- इष्ट मंत्र या गायत्री मंत्र 11 या 21 बार बोलें। (3 मिनट)
- छोटी आरती करें और क्षमा प्रार्थना बोलें। (2 मिनट)
- प्रणाम करके प्रसाद लें। (30 सेकंड)
किस दिन किस देवता की पूजा
| दिन | देवता | आसान मंत्र |
|---|---|---|
| सोमवार | भगवान शिव | ॐ नमः शिवाय |
| मंगलवार | हनुमान जी | ॐ हं हनुमते नमः |
| बुधवार | गणेश जी | ॐ गं गणपतये नमः |
| गुरुवार | भगवान विष्णु, बृहस्पति देव | ॐ नमो भगवते वासुदेवाय |
| शुक्रवार | माँ लक्ष्मी, माँ दुर्गा | ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः |
| शनिवार | शनि देव, हनुमान जी | ॐ शं शनैश्चराय नमः |
| रविवार | सूर्य देव | ॐ घृणिः सूर्याय नमः |
रोज़ की पूजा में अपने इष्ट देवता की पूजा तो होती ही है, साथ में उस दिन के देवता का एक मंत्र और जोड़ दें। सोमवार और गुरुवार के व्रत की पूरी कथा और विधि यहाँ है: सोमवार व्रत कथा और बृहस्पतिवार व्रत कथा।
पूजा के नियम: क्या करें और क्या न करें
क्या करें:
- पूजा हमेशा स्नान के बाद, साफ़ कपड़ों में करें।
- सबसे पहले गणेश जी की पूजा करें।
- ताज़े और साफ़ फूल चढ़ाएँ।
- दीपक में घी या तिल का तेल इस्तेमाल करें।
- भोग में तुलसी दल डालें (विष्णु और कृष्ण के लिए)।
- पूजा के बाद प्रसाद ख़ुद भी लें और परिवार को भी दें।
- पुराने फूल (निर्माल्य) अगले दिन हटाकर गमले, पेड़ की जड़ में या बहते पानी में डालें, कूड़ेदान में नहीं।
क्या न करें (परंपरा के अनुसार):
- शिव जी पर तुलसी, केतकी का फूल और हल्दी नहीं चढ़ाई जाती।
- गणेश जी पर तुलसी नहीं चढ़ाई जाती, उन्हें दूर्वा प्रिय है।
- बासी या ज़मीन पर गिरे फूल न चढ़ाएँ।
- पूजा करते समय बीच में उठना, बात करना या मोबाइल देखना न करें।
- मंदिर में खंडित मूर्ति या फटा चित्र न रखें।
हर परिवार और क्षेत्र की परंपरा थोड़ी अलग होती है। जहाँ फ़र्क हो, वहाँ घर के बड़ों की रीति को ही मानें।
रोज़ पूजा करने से क्या होता है
कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि देव शक्तियों को किसी चीज़ की ज़रूरत नहीं होती, वे साधक की भक्ति और भावना से संतुष्ट होती हैं। जैसे घर आए सम्मानित मेहमान का हम अपनी क्षमता से प्रेम से स्वागत करते हैं, वैसे ही पूजा भी भाव से की जानी चाहिए। रोज़ की पूजा के कुछ सीधे फ़ायदे भी हैं:
- दिन की शुरुआत शांत मन से होती है, और जल्दबाज़ी कम होती है।
- रोज़ एक तय समय पर बैठने से अनुशासन बनता है।
- प्राणायाम और जप से ध्यान लगाने की आदत बनती है।
- बच्चे बड़ों को देखकर संस्कार सीखते हैं।
- परिवार साथ आरती करे तो आपस में जुड़ाव बढ़ता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
घर में रोज़ पूजा कैसे करें?
स्नान के बाद आसन पर बैठकर पवित्रीकरण और आचमन करें, दीपक जलाएँ, संकल्प लें, गणेश जी की वंदना करें, अपने इष्ट देवता को गंध, फूल, धूप, दीप और भोग अर्पित करें, मंत्र जप करें, आरती करें और क्षमा प्रार्थना करके प्रसाद लें। पूरा क्रम ऊपर 18 चरणों में दिया है।
रोज़ पूजा करने का सही समय क्या है?
सुबह ब्रह्म मुहूर्त या सूर्योदय के बाद स्नान करके, और शाम को सूर्यास्त के समय दीपक और आरती। सबसे ज़रूरी है कि रोज़ एक तय समय पर पूजा करें।
दैनिक पूजा में कौन से मंत्र बोलें?
पवित्रीकरण के लिए “ॐ अपवित्रः पवित्रो वा”, गणेश जी के लिए “ॐ गं गणपतये नमः”, इष्ट देवता का मंत्र, गायत्री मंत्र, और अंत में क्षमा प्रार्थना “आवाहनं न जानामि”। सभी मंत्र ऊपर क्रम से दिए हैं।
पंचोपचार और षोडशोपचार पूजा में क्या अंतर है?
पंचोपचार में पाँच चीज़ें अर्पित होती हैं: गंध, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य। षोडशोपचार में 16 उपचार होते हैं, जिनमें आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, स्नान, वस्त्र आदि भी शामिल हैं। रोज़ के लिए पंचोपचार काफ़ी है, त्योहार पर षोडशोपचार करें।
घर का मंदिर किस दिशा में होना चाहिए?
वास्तु की परंपरा में उत्तर पूर्व (ईशान) कोना सबसे शुभ माना जाता है, और पूजा करते समय आपका मुँह पूर्व या उत्तर की ओर हो।
अगर किसी दिन पूजा न हो पाए तो क्या करें?
घबराएँ नहीं। यात्रा, बीमारी या मजबूरी में मन ही मन भगवान का नाम लें और प्रणाम कर लें। अगले दिन से फिर नियम से पूजा शुरू करें।
क्या बिना मंत्र के पूजा हो सकती है?
हाँ। मंत्र न आते हों तो हर काम भगवान का नाम लेकर श्रद्धा से करें। भगवान भाव देखते हैं, उच्चारण नहीं।
पूजा के बाद पुराने फूलों का क्या करें?
पुराने फूल और निर्माल्य को कूड़ेदान में न डालें। उन्हें गमले या पेड़ की जड़ में डाल दें, या खाद बना लें, या बहते पानी में विसर्जित करें।
क्या पूजा में घी का दीपक ही जलाना चाहिए?
घी का दीपक सबसे शुभ माना जाता है। घी न हो तो तिल या सरसों का तेल भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
रोज़ की पूजा में कितना समय लगता है?
पूरी पूजा 20 से 30 मिनट में हो जाती है। समय कम हो तो ऊपर दी गई 10 मिनट की छोटी पूजा करें।
ये भी पढ़ें
- सोमवार व्रत कथा और सोलह सोमवार की कथा
- बृहस्पतिवार व्रत कथा: पूरी कथा, पूजा विधि और उद्यापन
- सत्यनारायण व्रत कथा: पाँचों अध्याय और पूजा विधि
- एकादशी व्रत कथा: 2026 और 2027 की सभी एकादशी
- दुर्गा पूजा विधि 2026: नवरात्रि कलश स्थापना और सप्तशती पाठ
- दिवाली लक्ष्मी पूजा विधि 2026: मुहूर्त, मंत्र और कथा
रोज़ पूजा के समय फ़ोन पर पढ़ने के लिए इस पेज को सेव कर लीजिए और परिवार के साथ शेयर कीजिए। आप रोज़ किस समय पूजा करते हैं, कमेंट में ज़रूर बताइए।
नोट: इस लेख में Amazon के affiliate लिंक हैं। इनसे ख़रीदारी करने पर Storyshala को छोटा कमीशन मिलता है, आपके लिए क़ीमत नहीं बदलती।