रमा एकादशी व्रत कथा 2026: पूरी कथा, पूजा विधि, पारण का समय और नियम

Rama Ekadashi vrat katha: तुलसी, दीपक, फल और पीले फूलों के साथ एकादशी की पूजा
रमा एकादशी पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा तुलसी दल, दीपक और फलों से होती है (प्रतीकात्मक चित्र)

रमा एकादशी व्रत कथा (Rama Ekadashi vrat katha) कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर पढ़ी और सुनी जाने वाली कथा है। यह एकादशी दिवाली से ठीक पहले आती है। “रमा” माता लक्ष्मी का ही एक नाम है, इसलिए इस दिन भगवान विष्णु के साथ माता लक्ष्मी की भी पूजा होती है। मान्यता है कि रमा एकादशी का व्रत करने से बड़े से बड़े पाप नष्ट होते हैं और घर में सुख समृद्धि आती है।

इस पेज पर रमा एकादशी 2026 की तारीख़ और पारण का समय, 2 मिनट में पढ़ने वाली छोटी कथा, राजा मुचुकुंद, चंद्रभागा और शोभन की पूरी कथा, पूजा विधि क्रम से, पूजा सामग्री, व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं, मंत्र, नियम और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, सब एक जगह दिए गए हैं। एकादशी के दिन कथा पढ़ने के लिए इस पेज को अभी बुकमार्क कर लीजिए।

विषय सूची

रमा एकादशी 2026 कब है?

रमा एकादशी का व्रत गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को रखा जाएगा, और व्रत का पारण अगले दिन शुक्रवार, 6 नवंबर को सुबह होगा।

बातजानकारी
व्रत की तारीख़गुरुवार, 5 नवंबर 2026
एकादशी तिथि शुरू4 नवंबर 2026, सुबह 11:03 बजे
एकादशी तिथि समाप्त5 नवंबर 2026, सुबह 10:35 बजे
पारण (व्रत खोलने) का समयशुक्रवार, 6 नवंबर 2026, सुबह 6:37 से 8:48 बजे तक
द्वादशी तिथि समाप्त6 नवंबर 2026, सुबह 10:30 बजे
महीना और पक्षकार्तिक कृष्ण पक्ष (अमांत कैलेंडर में आश्विन कृष्ण पक्ष)
किसकी पूजाभगवान विष्णु और माता लक्ष्मी
अगली रमा एकादशीसोमवार, 25 अक्टूबर 2027

ऊपर के समय Drik Panchang के अनुसार नई दिल्ली के हैं। आपके शहर में सूर्योदय के हिसाब से समय कुछ मिनट आगे पीछे हो सकता है, इसलिए पारण से पहले अपने शहर का पंचांग एक बार ज़रूर देख लें।

4 नवंबर को एकादशी तिथि सुबह 11 बजे के बाद शुरू होती है, यानी उस दिन सूर्योदय के समय दशमी है। इसलिए व्रत 5 नवंबर को रखा जाता है, जिस दिन सूर्योदय एकादशी तिथि में होता है।

रमा एकादशी का महत्व: इसे “रमा” क्यों कहते हैं?

  • रमा यानी लक्ष्मी: रमा, माता लक्ष्मी का नाम है। साल की 24 एकादशियों में यही एक है जो सीधे लक्ष्मी जी के नाम पर है, और यह दिवाली की लक्ष्मी पूजा से ठीक पहले आती है। इसलिए इस दिन विष्णु और लक्ष्मी, दोनों की पूजा का विधान है।
  • कार्तिक का महीना: कार्तिक का महीना भगवान विष्णु को बहुत प्रिय माना जाता है। इस महीने में दीपदान, तुलसी पूजा और एकादशी व्रत का फल कई गुना बताया गया है।
  • पापों से मुक्ति: कथा में श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं कि रमा एकादशी का व्रत ब्रह्महत्या जैसे बड़े पापों को भी नष्ट कर देता है, और जो इसकी कथा श्रद्धा से सुनता है, उसे भी पुण्य मिलता है।
  • दिवाली की शुरुआत: कई परिवारों के लिए रमा एकादशी से ही दिवाली के उत्सव की शुरुआत मानी जाती है। इसके बाद गोवत्स द्वादशी, धनतेरस, छोटी दिवाली और दिवाली आती है।

रमा एकादशी व्रत कथा (छोटी कथा)

जिनके पास समय कम है, उनके लिए Rama Ekadashi vrat katha का छोटा रूप:

राजा मुचुकुंद के राज्य में नियम था कि एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करेगा, यहाँ तक कि पशु भी नहीं। उनकी बेटी चंद्रभागा का विवाह राजकुमार शोभन से हुआ, जो शरीर से बहुत कमज़ोर थे।

एक बार शोभन ससुराल आए हुए थे और उसी समय रमा एकादशी आ गई। राज्य के नियम के कारण शोभन ने भी व्रत रखा, पर भूख और प्यास सहन नहीं कर सके और अगली सुबह उनकी मृत्यु हो गई।

व्रत के पुण्य से शोभन को मंदराचल पर्वत पर सोने का एक सुंदर नगर मिला, पर वह राज्य स्थिर नहीं था, क्योंकि व्रत मन से नहीं, मजबूरी में किया गया था। जब चंद्रभागा को यह पता चला, तो उसने बचपन से किए अपने एकादशी व्रतों का पुण्य पति को दे दिया। उस पुण्य से शोभन का राज्य स्थिर हो गया, और दोनों सुख से वहाँ रहने लगे।

Rama Ekadashi Vrat Katha: पूरी कथा (राजा मुचुकुंद, चंद्रभागा और शोभन)

यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में आती है। इसे भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाया था।

युधिष्ठिर का प्रश्न

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा: “हे जनार्दन, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष में कौन सी एकादशी आती है, उसका नाम क्या है और उसका व्रत करने से क्या फल मिलता है? कृपा करके मुझे विस्तार से बताइए।”

श्रीकृष्ण बोले: “हे राजन, कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा एकादशी है। यह बड़े से बड़े पापों का नाश करने वाली है। इसकी कथा ध्यान से सुनो।”

राजा मुचुकुंद का कठोर नियम

Rama Ekadashi katha: महल में नगाड़ा बजाकर एकादशी व्रत की घोषणा, बालकनी में शोभन और चंद्रभागा
राजा मुचुकुंद के राज्य में एकादशी से पहले नगाड़ा बजाकर व्रत की घोषणा होती थी (प्रतीकात्मक चित्र)

प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे। वे सत्यवादी थे और भगवान विष्णु के बड़े भक्त थे। देवराज इंद्र, यम, वरुण, कुबेर और विभीषण उनके मित्र थे। वे धर्म के अनुसार अपनी प्रजा का पालन करते थे।

राजा मुचुकुंद एकादशी का व्रत बहुत नियम से करते थे, और उनके राज्य में सभी लोग यह व्रत रखते थे। उनका नियम इतना कठोर था कि एकादशी के दिन मनुष्य ही नहीं, घोड़े, हाथी और दूसरे पशुओं को भी भोजन नहीं दिया जाता था।

राजा की एक बेटी थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उसका विवाह राजा चंद्रसेन के बेटे शोभन से हुआ था। शोभन स्वभाव से अच्छे थे, पर शरीर से बहुत दुर्बल थे। वे एक समय भी भूखे नहीं रह पाते थे।

शोभन का व्रत और उसकी मृत्यु

एक बार कार्तिक के महीने में शोभन अपनी ससुराल आए। उसी समय रमा एकादशी आने वाली थी। दशमी के दिन राज्य में नगाड़ा बजाकर घोषणा हुई कि कल एकादशी है और कोई भी भोजन नहीं करेगा।

घोषणा सुनकर शोभन चिंता में पड़ गए। उन्होंने चंद्रभागा से कहा: “प्रिये, मैं भूख सहन नहीं कर पाता। अब मैं क्या करूँ, कोई उपाय बताओ जिससे मेरे प्राण भी बचें और नियम भी न टूटे।”

चंद्रभागा बोली: “स्वामी, मेरे पिता के राज्य में एकादशी के दिन कोई भोजन नहीं करता, पशु भी नहीं। अगर आप यहाँ भोजन करेंगे तो सब आपकी निंदा करेंगे। आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरी जगह चले जाइए।”

शोभन ने कहा: “तुम ठीक कहती हो। मैं भी व्रत करूँगा। भाग्य में जो लिखा है, वही होगा।”

शोभन ने व्रत रखा, पर दिन बीतते बीतते वे भूख और प्यास से बहुत व्याकुल हो गए। रात भर जागरण हुआ, जो दूसरों के लिए आनंद का समय था, पर शोभन के लिए बहुत कष्ट का। अगली सुबह सूर्योदय होते होते शोभन के प्राण निकल गए।

राजा मुचुकुंद ने शोभन का अंतिम संस्कार करवाया। पिता के कहने पर चंद्रभागा अपने पिता के घर ही रहने लगी, और पहले की तरह श्रद्धा से एकादशी के व्रत करती रही।

मंदराचल पर्वत पर सोने का नगर

Rama Ekadashi vrat katha: बादलों के बीच पर्वत पर सोने का नगर, जहाँ एक ब्राह्मण यात्री पहुँचता है
रमा एकादशी के पुण्य से शोभन को मंदराचल पर्वत पर सुंदर नगर मिला (प्रतीकात्मक चित्र)

रमा एकादशी के व्रत के पुण्य से शोभन को मंदराचल पर्वत के शिखर पर एक बहुत सुंदर नगर मिला। उस नगर में सोने के खंभे थे, रत्नों से जड़े महल थे, और शोभन वहाँ एक राजा की तरह सिंहासन पर बैठते थे। गंधर्व और अप्सराएँ उनकी सेवा करते थे। ऐसा लगता था मानो दूसरे इंद्र बैठे हों।

एक दिन राजा मुचुकुंद के नगर का सोमशर्मा नाम का एक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करते हुए उस पर्वत पर पहुँचा। उसने शोभन को पहचान लिया और उनके पास गया। शोभन ने भी ब्राह्मण को पहचान लिया, आदर से बिठाया और अपने ससुर, अपनी पत्नी और नगर के सब लोगों का हाल पूछा।

सोमशर्मा ने हैरानी से पूछा: “राजन, आपको इतना सुंदर नगर कैसे मिला? ऐसा नगर तो मैंने कभी नहीं देखा।”

शोभन ने बताया: “यह सब कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी के व्रत का फल है। पर यह राज्य अध्रुव है, यानी स्थिर नहीं है, किसी भी समय ख़त्म हो सकता है। क्योंकि मैंने वह व्रत श्रद्धा से नहीं, मजबूरी में किया था। आप चंद्रभागा को यह बात बताइए, वही इसे स्थिर कर सकती है।”

चंद्रभागा के पुण्य से राज्य स्थिर हुआ

सोमशर्मा लौटकर चंद्रभागा के पास गया और सारी बात बताई। पहले तो चंद्रभागा को विश्वास नहीं हुआ, फिर वह बहुत प्रसन्न हुई और बोली: “मुझे वहाँ ले चलिए। मैं अपने पति से मिलना चाहती हूँ, और अपने व्रतों के पुण्य से उनके नगर को स्थिर करूँगी।”

सोमशर्मा चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के पास वामदेव ऋषि के आश्रम में पहुँचा। ऋषि के मंत्रों के प्रभाव से और एकादशी व्रतों के पुण्य से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया, और वह अपने पति के पास पहुँच गई।

शोभन अपनी पत्नी को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। चंद्रभागा ने कहा: “स्वामी, मैं आठ साल की उम्र से श्रद्धा के साथ एकादशी के व्रत करती आ रही हूँ। उन सब व्रतों का पुण्य मैं आपको देती हूँ। इससे आपका नगर प्रलय तक स्थिर रहेगा।”

चंद्रभागा के पुण्य से शोभन का राज्य स्थिर हो गया, और दोनों उस दिव्य नगर में सुख से रहने लगे।

कथा का फल

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: “हे राजन, यही रमा एकादशी की महिमा है। जो मनुष्य इस व्रत को श्रद्धा से करता है, उसके ब्रह्महत्या जैसे पाप भी नष्ट हो जाते हैं। जो इसकी कथा पढ़ता या सुनता है, वह भी पापों से मुक्त होकर विष्णु लोक को जाता है।”

रमा एकादशी व्रत कथा की सीख: व्रत का असली फल श्रद्धा से मिलता है, डर या दिखावे से नहीं। शोभन ने मजबूरी में व्रत किया तो फल अधूरा रहा, और चंद्रभागा ने सालों तक मन से व्रत किए तो उनका पुण्य इतना बड़ा था कि पति का राज्य भी स्थिर हो गया। दूसरी सीख यह कि पति पत्नी एक दूसरे के सुख दुख और पुण्य में भी साथी होते हैं।

रमा एकादशी व्रत विधि (क्रम से)

दशमी (4 नवंबर) की तैयारी

  1. दशमी के दिन शाम को सूर्यास्त से पहले एक बार सात्विक भोजन करें। इस भोजन में चावल, प्याज़ और लहसुन न लें।
  2. पूजा के लिए तुलसी दल दशमी को ही तोड़कर रख लें, क्योंकि एकादशी के दिन तुलसी नहीं तोड़ी जाती।
  3. रात को भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए सोएँ और मन में अगले दिन व्रत का निश्चय करें।

एकादशी (5 नवंबर) की पूजा

  1. स्नान: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ़ कपड़े पहनें। पीले रंग के कपड़े शुभ माने जाते हैं।
  2. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर भगवान विष्णु के सामने व्रत का संकल्प लें: “मैं आज रमा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए रख रहा हूँ (रख रही हूँ)।”
  3. चौकी: पूजा की जगह पर चौकी रखें, उस पर पीला कपड़ा बिछाएँ और भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की मूर्ति या चित्र रखें।
  4. अभिषेक: मूर्ति हो तो पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से।
  5. श्रृंगार और अर्पण: भगवान विष्णु को पीले फूल, पीला चंदन, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। माता लक्ष्मी को लाल फूल, कुमकुम और कमल गट्टा अर्पित करें।
  6. दीपक और धूप: घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  7. भोग: फल, मेवे, पंजीरी या पंचामृत का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल ज़रूर रखें, क्योंकि मान्यता है कि भगवान विष्णु तुलसी के बिना भोग स्वीकार नहीं करते।
  8. कथा: ऊपर दी गई रमा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या परिवार को सुनाएँ।
  9. मंत्र और आरती: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें, विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकें तो और अच्छा। फिर “ॐ जय जगदीश हरे” आरती करें।
  10. दिन भर: फलाहार या निर्जल, जैसा संकल्प लिया हो। शाम को तुलसी के पास और घर के मंदिर में दीपक जलाएँ।
  11. जागरण: रात को भजन कीर्तन करते हुए जागरण करने की परंपरा है। पूरी रात न जाग सकें तो देर रात तक भगवान का नाम लें।

द्वादशी (6 नवंबर) को पारण

  1. सुबह स्नान करके भगवान विष्णु की पूजा करें और भोग लगाएँ।
  2. किसी ब्राह्मण, ज़रूरतमंद या गाय को भोजन या अनाज का दान करें।
  3. पारण के समय (सुबह 6:37 से 8:48 बजे के बीच) तुलसी दल और भगवान के प्रसाद से व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।

पारण का सही तरीका: ये 4 बातें ध्यान रखें

  • द्वादशी के अंदर पारण: एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि ख़त्म होने से पहले खोलना ज़रूरी माना गया है। 2026 में द्वादशी 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे ख़त्म हो रही है।
  • हरि वासर में पारण नहीं: द्वादशी तिथि के पहले चौथाई हिस्से को “हरि वासर” कहते हैं। इस समय पारण नहीं किया जाता। ऊपर बताया गया पारण का समय इस बात का ध्यान रखकर ही निकाला गया है।
  • सुबह का समय सबसे अच्छा: पारण सुबह (प्रातःकाल) करना सबसे अच्छा माना जाता है। दोपहर (मध्याह्न) में पारण से बचें।
  • पहले दान, फिर भोजन: पारण से पहले थोड़ा दान करने की परंपरा है, और व्रत तुलसी दल या प्रसाद से खोला जाता है, सीधे भारी भोजन से नहीं।

रमा एकादशी पूजा सामग्री सूची

पूजा से एक दिन पहले यह सूची देखकर सारा सामान इकट्ठा कर लें:

रमा एकादशी व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं

एकादशी का व्रत लोग अपनी क्षमता के अनुसार रखते हैं: कोई निर्जल रहता है, कोई सिर्फ़ फल और पानी लेता है, और कोई दिन में एक बार फलाहार करता है।

Rama Ekadashi vrat food: साबूदाना खिचड़ी, मखाना, फल और दूध का फलाहार
एकादशी व्रत का फलाहार: साबूदाना खिचड़ी, मखाना, फल, दूध और कुट्टू (प्रतीकात्मक चित्र)

क्या खा सकते हैं:

  • सभी तरह के फल, दूध, दही, छाछ और पनीर
  • साबूदाना, कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और राजगिरा
  • आलू, शकरकंद, अरबी और कद्दू
  • मखाना, मूँगफली और सूखे मेवे
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा और हरी मिर्च

क्या नहीं खाना चाहिए:

  • चावल और चावल से बनी कोई भी चीज़ (एकादशी पर चावल पूरी तरह वर्जित है)
  • गेहूँ, दालें और दूसरे अनाज
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मछली, अंडा और शराब
  • साधारण नमक (सेंधा नमक ले सकते हैं)
  • बैंगन, गोभी जैसी कुछ सब्ज़ियाँ भी कई परिवारों में नहीं खाई जातीं

रमा एकादशी व्रत के नियम

  • एकादशी के दिन घर में किसी के लिए भी चावल न पकाएँ, भले ही परिवार के सब लोग व्रत न रख रहे हों।
  • इस दिन तुलसी के पत्ते न तोड़ें। तुलसी को जल भी नहीं चढ़ाया जाता, सिर्फ़ शाम को दीपक जलाया जाता है।
  • दिन में सोना वर्जित माना गया है। जितना हो सके, समय भगवान के नाम और कथा में लगाएँ।
  • झूठ, क्रोध, निंदा और किसी का दिल दुखाने से बचें। व्रत सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं, मन को भी शांत रखने का है।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • इस दिन बाल और नाख़ून काटने से भी लोग बचते हैं।
  • पारण द्वादशी के अंदर और तय समय पर ही करें।

रमा एकादशी के मंत्र

  • भगवान विष्णु का मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
  • माता लक्ष्मी का मंत्र: ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
  • विष्णु गायत्री मंत्र: ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्

इनमें से किसी भी मंत्र का एक माला यानी 108 बार जाप किया जा सकता है। पूजा के अंत में “ॐ जय जगदीश हरे” आरती और लक्ष्मी जी की आरती की जाती है।

रमा एकादशी से भाई दूज तक: 2026 की तारीख़ें

रमा एकादशी के साथ ही दिवाली का पूरा उत्सव शुरू हो जाता है। 2026 में ये त्योहार इन तारीख़ों पर हैं:

त्योहारतारीख़ (2026)
रमा एकादशीगुरुवार, 5 नवंबर
गोवत्स द्वादशी (वसु बारस)गुरुवार, 5 नवंबर (शाम)
धनतेरसशुक्रवार, 6 नवंबर
छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी)7 या 8 नवंबर (पंचांगों में मतभेद)
दिवाली, लक्ष्मी पूजारविवार, 8 नवंबर
गोवर्धन पूजा (अन्नकूट)मंगलवार, 10 नवंबर
भाई दूजबुधवार, 11 नवंबर

दिवाली की रात घर पर लक्ष्मी पूजा का पूरा क्रम यहाँ पढ़िए: दिवाली लक्ष्मी पूजा विधि 2026।

व्रत में सेहत का ध्यान

  • गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और जिन्हें डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर या कोई और बीमारी है, वे निर्जल व्रत न रखें। फल और दूध के साथ व्रत रखा जा सकता है, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर से सलाह ले लें।
  • दिन भर पानी, नारियल पानी या छाछ लेते रहें, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो।
  • पारण के समय एकदम भारी या तला हुआ भोजन न करें। पहले हल्का प्रसाद और फल लें।

कथा की सीख भी यही है: व्रत श्रद्धा से होता है, शरीर को कष्ट देकर नहीं। अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रमा एकादशी 2026 कब है?

रमा एकादशी का व्रत गुरुवार, 5 नवंबर 2026 को है। एकादशी तिथि 4 नवंबर सुबह 11:03 बजे शुरू होकर 5 नवंबर सुबह 10:35 बजे ख़त्म होगी। व्रत का पारण 6 नवंबर को सुबह 6:37 से 8:48 बजे के बीच होगा (नई दिल्ली का समय)।

रमा एकादशी का पारण कब और कैसे करें?

6 नवंबर 2026 को सुबह 6:37 से 8:48 बजे के बीच, द्वादशी ख़त्म होने (सुबह 10:30) से पहले। पूजा और दान के बाद तुलसी दल और प्रसाद से व्रत खोलें, फिर सात्विक भोजन करें।

रमा एकादशी को “रमा” एकादशी क्यों कहते हैं?

रमा, माता लक्ष्मी का एक नाम है। यह एकादशी दिवाली से ठीक पहले आती है, और इस दिन भगवान विष्णु के साथ लक्ष्मी जी की पूजा का विशेष महत्व है, इसलिए इसका नाम रमा एकादशी है।

रमा एकादशी पर किसकी पूजा होती है?

भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की। भगवान विष्णु को तुलसी दल, पीले फूल और पीला चंदन चढ़ाया जाता है, और लक्ष्मी जी को कमल गट्टा, लाल फूल और कुमकुम।

रमा एकादशी व्रत कथा किस ग्रंथ में है?

रमा एकादशी की कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण में आती है, जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को सुनाया था। इसमें राजा मुचुकुंद, उनकी बेटी चंद्रभागा और दामाद शोभन की कहानी है।

क्या एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?

नहीं। एकादशी पर चावल पूरी तरह वर्जित माना गया है, चाहे आप व्रत रख रहे हों या नहीं। इसलिए इस दिन घर में चावल पकाया ही नहीं जाता।

क्या रमा एकादशी का व्रत बिना पानी के रखना ज़रूरी है?

नहीं। निर्जल व्रत सबसे कठिन माना जाता है, पर आप फल, दूध और पानी के साथ भी व्रत रख सकते हैं। बीमार, बुज़ुर्ग और गर्भवती महिलाओं को निर्जल व्रत नहीं रखना चाहिए।

अगर गलती से व्रत टूट जाए तो क्या करें?

घबराएँ नहीं। भगवान विष्णु से मन ही मन क्षमा माँगें, “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करें, और अगली एकादशी पर पूरे नियम से व्रत रखें। कथा की सीख यही है कि भगवान श्रद्धा देखते हैं।

रमा एकादशी 2027 में कब है?

2027 में रमा एकादशी सोमवार, 25 अक्टूबर को है। वैष्णव परंपरा में यह 26 अक्टूबर को मनाई जाएगी।

रमा एकादशी के बाद अगली एकादशी कौन सी है?

रमा एकादशी के बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी आती है, जो 2026 में 20 नवंबर को है। इसी दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जागते हैं।

ये भी पढ़ें

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