सूरदास के पद अर्थ सहित: कक्षा 10 के 4 पद (भावार्थ, प्रश्न उत्तर) और बाल लीला के प्रसिद्ध पद

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Surdas ke pad: यशोदा और बाल कृष्ण के वात्सल्य का दृश्य
सूरदास को वात्सल्य रस का सबसे बड़ा कवि माना जाता है

Surdas ke pad हिंदी साहित्य में कृष्ण भक्ति के सबसे मधुर गीत हैं। सूरदास ने ब्रज भाषा में कृष्ण की बाल लीला, यशोदा का वात्सल्य और गोपियों का प्रेम इतने सहज ढंग से गाया कि आज भी ये पद मंदिरों में गाए जाते हैं और स्कूलों में पढ़ाए जाते हैं। कक्षा 10 की हिंदी पुस्तक क्षितिज (भाग 2) का पहला पाठ सूरदास के चार पद हैं, जो “भ्रमरगीत” से लिए गए हैं।

इस पेज पर कक्षा 10 के चारों पद मूल पाठ, कठिन शब्दों के अर्थ, प्रसंग, भावार्थ और काव्य सौंदर्य के साथ हैं, फिर महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर, और अंत में बाल लीला के पाँच प्रसिद्ध पद अर्थ सहित।

मुख्य बातें

  • कक्षा 10 के 4 पद: ऊधौ तुम हौ अति बड़भागी, मन की मन ही माँझ रही, हमारैं हरि हारिल की लकरी, हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
  • ये पद कहाँ से हैं: सूरसागर के भ्रमरगीत प्रसंग से; आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इनका चयन “भ्रमरगीत सार” में किया।
  • भाषा: ब्रज भाषा; रस: वियोग श्रृंगार; मुख्य भाव: गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और उद्धव के योग संदेश पर व्यंग्य।
  • बाल लीला के प्रसिद्ध पद: मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी, मैया मैं नहिं माखन खायौ, मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ।
  • “सूरदास के दोहे” खोजने वाले जान लें: सूरदास ने दोहे नहीं, गाए जाने वाले पद लिखे।

विषय सूची

सूरदास का परिचय

बातजानकारी
जन्मलगभग 1478 ई. (विक्रम संवत 1535), दिल्ली के पास सीही गाँव; कुछ विद्वान आगरा के पास रुनकता मानते हैं
देहांतलगभग 1583 ई., पारसौली (मथुरा के पास)
गुरुमहाप्रभु वल्लभाचार्य
संप्रदायपुष्टिमार्ग; अष्टछाप के कवियों में सबसे प्रमुख
रचनाएँसूरसागर, सूरसारावली, साहित्य लहरी
भाषाब्रज भाषा
ख़ास पहचानवात्सल्य रस के सम्राट; कृष्ण की बाल लीला और गोपी प्रेम

सूरदास वल्लभाचार्य के शिष्य थे और श्रीनाथ जी के मंदिर (गोवर्धन) में कीर्तन करते थे। उन्हें जन्मांध (जन्म से अंधा) माना जाता है, पर उनके पदों में रंग और दृश्य का इतना सूक्ष्म वर्णन है कि कई विद्वान मानते हैं कि उनकी आँखों की रोशनी बाद में गई। इस बारे में मतभेद है।

भ्रमरगीत क्या है? (चारों पदों की पृष्ठभूमि)

श्रीकृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा चले गए और लौटे नहीं। गोपियाँ उनके वियोग में दुखी थीं। कृष्ण ने अपने मित्र उद्धव को गोपियों के पास भेजा। उद्धव ज्ञानी थे और निर्गुण ब्रह्म और योग में विश्वास करते थे। उन्होंने गोपियों को समझाया कि कृष्ण को भूलकर योग साधना करो, निर्गुण ब्रह्म का ध्यान करो।

गोपियाँ कृष्ण के सगुण, साकार रूप से प्रेम करती थीं। उन्होंने उद्धव को सीधे जवाब देने की जगह, वहाँ उड़ रहे एक भ्रमर (भौंरे) को संबोधित करके उद्धव पर व्यंग्य किए। इसीलिए यह प्रसंग भ्रमरगीत कहलाता है। इन पदों में ज्ञान पर प्रेम की, और निर्गुण पर सगुण भक्ति की जीत दिखाई गई है।

Surdas ke pad class 10: चारों पदों का सार एक नज़र में
इन्फ़ोग्राफ़िक: सूरदास के 4 पद: एक नज़र में (Storyshala)

पद 1: ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी

ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति नदी मैं पाउँ न बोर्यौ, दृष्टि न रूप परागी।
'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥

कठिन शब्द: बड़भागी = भाग्यवान; अपरस = अछूता; तगा = धागा, बंधन; अनुरागी = प्रेम करने वाला; पुरइनि पात = कमल का पत्ता; दागी = दाग़, धब्बा; माहँ = में; गागरि = मटकी; प्रीति नदी = प्रेम की नदी; बोर्यौ = डुबोया; परागी = मोहित हुई; भोरी = भोली; गुर = गुड़; चाँटी = चींटी; पागी = चिपक गई।

प्रसंग: उद्धव कृष्ण का योग संदेश लेकर आए हैं। गोपियाँ व्यंग्य करते हुए उन्हें “बड़भागी” कहती हैं।

भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव, तुम तो बड़े भाग्यशाली हो, क्योंकि तुम प्रेम के धागे से बिल्कुल अछूते हो; तुम्हारा मन किसी से प्रेम नहीं करता। तुम कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से वैसे ही अलग रहे, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता, या जैसे तेल से चुपड़ी मटकी को पानी में डुबोने पर भी उस पर एक बूँद नहीं टिकती। तुमने कभी प्रेम की नदी में पैर तक नहीं डुबोया, और तुम्हारी आँखें कभी कृष्ण के रूप पर मोहित नहीं हुईं। पर हम भोली भाली अबलाएँ तो कृष्ण के प्रेम में ऐसे चिपक गईं, जैसे चींटी गुड़ से चिपक जाती है और फिर छूट नहीं पाती।

काव्य सौंदर्य:

  • “बड़भागी” में व्यंग्य है: असल में गोपियाँ उद्धव को अभागा कह रही हैं, जो प्रेम का सुख नहीं जानता।
  • पुरइनि पात, तेल की गागरि और गुड़ चींटी में उपमा और दृष्टांत अलंकार।
  • “प्रीति नदी” में रूपक अलंकार।
  • ब्रज भाषा, गेय पद, वियोग श्रृंगार रस।

पद 2: मन की मन ही माँझ रही

मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही।
अब इन जोग सँदेसनि सुनि सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही॥

कठिन शब्द: माँझ = में; अवधि = समय सीमा; अधार = आधार, सहारा; बिथा = व्यथा, दुःख; जोग सँदेसनि = योग के संदेश; दही = जली; गुहारि = रक्षा की पुकार; जितहिं तैं = जहाँ से; उत तैं = वहाँ से; धार = योग की धारा; धीर = धैर्य; मरजादा = मर्यादा; लही = रही, पाई।

प्रसंग: गोपियाँ उद्धव से अपने मन की पीड़ा कहती हैं।

भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव, हमारे मन की बात मन में ही रह गई। हम अपना दुःख किससे कहें, कहा भी नहीं जाता। कृष्ण लौट आएँगे, इसी आस के सहारे हमने तन और मन का सारा दुःख सहा था। अब तुम्हारे ये योग के संदेश सुन सुनकर हम विरहिनियाँ और भी जल उठीं। जिनसे (कृष्ण से) हम रक्षा की पुकार करना चाहती थीं, उन्हीं की ओर से योग की यह धारा आ गई। सूरदास कहते हैं कि गोपियाँ पूछती हैं, अब हम धैर्य कैसे रखें, जब कृष्ण ने ही प्रेम की मर्यादा नहीं रखी।

काव्य सौंदर्य:

  • “मन की मन ही माँझ रही” में मन की असहायता का सजीव चित्र।
  • “सुनि सुनि” में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार; “बिरहिनि बिरह” में अनुप्रास।
  • योग संदेश को विरह की आग में घी जैसा बताया गया है।

पद 3: हमारैं हरि हारिल की लकरी

हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस निसि, कान्ह कान्ह जक री।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥

कठिन शब्द: हारिल = एक पक्षी, जो पंजों में हमेशा एक लकड़ी पकड़े रहता है; क्रम = कर्म; उर = हृदय; दृढ़ = मज़बूत; जक री = रट लगाए रहती हैं; करुई = कड़वी; ककरी = ककड़ी; ब्याधि = रोग; करी = की, भोगी; चकरी = चकरी जैसा चंचल (स्थिर न रहने वाला)।

प्रसंग: गोपियाँ उद्धव को बताती हैं कि उनका प्रेम कितना दृढ़ है।

भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण हमारे लिए हारिल पक्षी की लकड़ी जैसे हैं। जैसे हारिल पक्षी लकड़ी को कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही हमने मन, कर्म और वचन से नंद के पुत्र कृष्ण को हृदय में कसकर पकड़ रखा है। जागते, सोते, सपने में, दिन और रात, हम बस “कान्ह कान्ह” रटती रहती हैं। तुम्हारा योग सुनकर हमें ऐसा लगता है, जैसे कड़वी ककड़ी खा ली हो। तुम हमारे लिए ऐसा रोग ले आए हो, जिसे हमने न कभी देखा, न सुना, न भोगा। सूरदास कहते हैं, गोपियाँ कहती हैं कि यह योग उन्हें जाकर सौंपो, जिनका मन चकरी की तरह चंचल है, यानी जिनका प्रेम कहीं टिकता नहीं।

काव्य सौंदर्य:

  • “हरि हारिल की लकरी” में रूपक और अनुप्रास; “कान्ह कान्ह” में पुनरुक्ति प्रकाश।
  • योग को “करुई ककरी” और “ब्याधि” कहकर व्यंग्य।
  • एकनिष्ठ, अनन्य प्रेम का सबसे सुंदर उदाहरण।

पद 4: हरि हैं राजनीति पढ़ि आए

पुरानी दीवार पर राधा कृष्ण का भित्ति चित्र
भ्रमरगीत में गोपियाँ कृष्ण को प्रेम और राजधर्म की याद दिलाती हैं
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए॥

कठिन शब्द: मधुकर = भौंरा (यहाँ उद्धव); हुते = थे; गुरु ग्रंथ = राजनीति के बड़े ग्रंथ; पठाए = भेजे; आगे के = पहले के; पर हित = दूसरों की भलाई; धाए = दौड़ते थे; फेर पाइहैं = वापस पा लेंगी; अनीति = अन्याय; सताए = सताई जाए।

प्रसंग: गोपियाँ कृष्ण पर व्यंग्य करती हैं कि मथुरा जाकर वे राजनीति सीख गए हैं।

भावार्थ: गोपियाँ कहती हैं कि लगता है कृष्ण ने राजनीति पढ़ ली है। इस भौंरे (उद्धव) की बातों से हमें सब समाचार मिल गए। कृष्ण तो पहले ही बहुत चतुर थे, अब उन्होंने बड़े बड़े ग्रंथ भी पढ़ लिए। उनकी बुद्धि कितनी बढ़ गई है, यह इसी से पता चलता है कि उन्होंने हमें योग का संदेश भेजा है। हे उद्धव, पहले के लोग भले थे, जो दूसरों की भलाई के लिए दौड़े चले आते थे। अब हम अपना मन वापस ले लेंगी, जिसे कृष्ण जाते समय चुरा ले गए थे। जो दूसरों को अन्याय से छुड़ाते हैं, वे ख़ुद अन्याय क्यों करें! सूरदास कहते हैं, गोपियाँ याद दिलाती हैं कि सच्चा राजधर्म यही है कि प्रजा को सताया न जाए।

काव्य सौंदर्य:

  • पूरे पद में व्यंग्य और उलाहना (शिकायत) है।
  • “राज धरम तौ यहै, जो प्रजा न जाहिं सताए” आज भी शासन का आदर्श वाक्य माना जाता है।
  • ब्रज भाषा की मिठास और गोपियों का वाक्चातुर्य (बात करने की चतुराई)।

महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न: गोपियों द्वारा उद्धव को “बड़भागी” कहने में क्या व्यंग्य है? उत्तर: गोपियाँ उद्धव को भाग्यशाली कहती हैं, पर असल में वे कहना चाहती हैं कि उद्धव अभागे हैं। वे कृष्ण के इतने पास रहकर भी उनके प्रेम का सुख नहीं जान पाए। प्रेम से अछूता रहना कोई सौभाग्य नहीं, बल्कि सबसे बड़ा दुर्भाग्य है।

प्रश्न: उद्धव के व्यवहार की तुलना किस किससे की गई है? उत्तर: कमल के पत्ते से, जो पानी में रहकर भी गीला नहीं होता, और तेल चुपड़ी मटकी से, जिस पर पानी की बूँद नहीं टिकती। दोनों उपमाओं का अर्थ है कि उद्धव कृष्ण के पास रहकर भी उनके प्रेम से अलग रहे।

प्रश्न: गोपियों ने अपनी तुलना किससे की है? उत्तर: गुड़ से चिपकी चींटी से। जैसे चींटी गुड़ पर चिपककर छूट नहीं पाती, वैसे ही गोपियाँ कृष्ण के प्रेम में बँध गई हैं।

प्रश्न: उद्धव के योग संदेश ने गोपियों की विरह अग्नि में घी का काम कैसे किया? उत्तर: गोपियाँ इस आस पर जी रही थीं कि कृष्ण लौटेंगे। लौटने की जगह जब कृष्ण ने योग साधने का संदेश भेजा, तो उनकी आख़िरी आशा टूट गई और विरह का दुःख और बढ़ गया।

प्रश्न: “मरजादा न लही” से गोपियों का क्या आशय है? उत्तर: प्रेम की मर्यादा यह थी कि प्रेमी लौटकर आए। कृष्ण ने लौटने की जगह योग संदेश भेजकर यह मर्यादा तोड़ दी। अब गोपियाँ धैर्य किस आधार पर रखें।

प्रश्न: गोपियों ने कृष्ण को हारिल की लकड़ी क्यों कहा? उत्तर: हारिल पक्षी अपने पंजों में हमेशा एक लकड़ी पकड़े रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता। गोपियों ने भी कृष्ण को मन, कर्म और वचन से कसकर पकड़ रखा है। यह उनके एकनिष्ठ प्रेम का प्रतीक है।

प्रश्न: गोपियों को योग कैसा लगता है? उत्तर: कड़वी ककड़ी जैसा, और एक ऐसे रोग जैसा जिसे उन्होंने कभी देखा सुना नहीं। वे कहती हैं कि यह योग उन्हें दो, जिनका मन चकरी की तरह चंचल है।

प्रश्न: गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या है? उत्तर: राजा का धर्म है कि वह प्रजा को न सताए, उसके हित में काम करे। गोपियाँ कृष्ण को याद दिलाती हैं कि वे राजा होकर अपनी ही प्रजा (गोपियों) को दुःख दे रहे हैं।

प्रश्न: गोपियाँ अपना मन वापस क्यों पाना चाहती हैं? उत्तर: कृष्ण मथुरा जाते समय उनका मन चुरा ले गए थे। अब जब कृष्ण ने योग का संदेश भेजकर उनका प्रेम ठुकरा दिया, तो वे अपना मन वापस लेना चाहती हैं।

प्रश्न: इन पदों के आधार पर गोपियों के वाक्चातुर्य की विशेषताएँ बताइए। उत्तर: गोपियाँ सीधे विरोध की जगह व्यंग्य से बात करती हैं; रोज़ के जीवन की उपमाएँ देती हैं (कमल पत्ता, तेल की मटकी, गुड़ चींटी, हारिल, ककड़ी); उनके तर्क में प्रेम की सच्चाई है; और वे ज्ञानी उद्धव को भी निरुत्तर कर देती हैं।

प्रश्न: भ्रमरगीत की मुख्य विशेषता क्या है? उत्तर: इसमें निर्गुण ब्रह्म और योग पर सगुण भक्ति और प्रेम की जीत दिखाई गई है। गोपियाँ भौंरे के बहाने उद्धव पर व्यंग्य करती हैं, इसलिए इसे भ्रमरगीत कहते हैं।

बाल लीला के प्रसिद्ध पद अर्थ सहित

सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट कहा जाता है। कृष्ण के बचपन की नटखट बातें और यशोदा का दुलार उन्होंने ऐसे गाया, जैसे वे वहीं खड़े सब देख रहे हों।

1. मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी

मैया, कबहिं बढ़ैगी चोटी?
किती बार मोहि दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी॥
तू जो कहति बल की बेनी ज्यौं, ह्वैहै लाँबी मोटी।
काढ़त गुहत न्हवावत जैहै नागिनि सी भुइँ लोटी॥
काँचौ दूध पियावति पचि पचि, देति न माखन रोटी।
सूरज चिरजीवौ दोउ भैया, हरि हलधर की जोटी॥

भावार्थ: बाल कृष्ण माँ यशोदा से पूछते हैं, माँ, मेरी चोटी कब बढ़ेगी? कितनी बार दूध पी लिया, फिर भी यह छोटी ही है। तू कहती थी कि दूध पीने से मेरी चोटी बलराम भैया की चोटी जैसी लंबी और मोटी हो जाएगी, और कंघी करते, गूँथते और नहलाते समय नागिन जैसी ज़मीन पर लोटेगी। तू मुझे बार बार कच्चा दूध पिलाती है, पर माखन रोटी नहीं देती। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण और बलराम की यह जोड़ी सदा जीती रहे।

2. मैया मैं नहिं माखन खायौ

मिट्टी की मटकियों के बीच बाल कृष्ण के रूप में सजा बच्चा
माखन चोरी के पद सूरदास की बाल लीला के सबसे प्रिय पद हैं
मैया मैं नहिं माखन खायौ।
ख्याल परैं ये सखा सबै मिलि, मेरैं मुख लपटायौ॥
देखि तुही सींके पर भाजन, ऊँचैं धरि लटकायौ।
हौं जु कहत नान्हे कर अपनै मैं कैसैं करि पायौ॥
मुख दधि पोंछि, बुद्धि इक कीन्ही, दोना पीठि दुरायौ।
डारि साँटि, मुसुकाइ जसोदा, स्यामहि कंठ लगायौ॥
बाल बिनोद मोद मन मोह्यौ, भक्ति प्रताप दिखायौ।
सूरदास जसुमति कौ यह सुख, सिव बिरंचि नहिं पायौ॥

भावार्थ: कृष्ण कहते हैं, माँ, मैंने माखन नहीं खाया। ये सारे सखा मेरे पीछे पड़ गए और उन्होंने मेरे मुँह पर माखन लगा दिया। तू ख़ुद देख, माखन की मटकी तो छींके पर इतनी ऊँची लटकी है, मैं अपने छोटे छोटे हाथों से वहाँ तक कैसे पहुँचता? यह कहते हुए कृष्ण ने चतुराई से मुँह का दही पोंछा और दोना पीठ के पीछे छिपा लिया। यह देखकर यशोदा ने छड़ी फेंक दी, मुस्कुराईं और कृष्ण को गले लगा लिया। सूरदास कहते हैं कि यशोदा को जो सुख मिला, वह शिव और ब्रह्मा को भी नहीं मिला।

3. मैया मोहि दाऊ बहुत खिझायौ

मैया मोहिं दाऊ बहुत खिझायो।
मो सों कहत मोल को लीन्हों तू जसुमति कब जायो॥
कहा करौं इहि रिस के मारें खेलन हौं नहिं जात।
पुनि पुनि कहत कौन है माता को है तेरो तात॥
गोरे नंद जसोदा गोरी तू कत स्यामल गात।
चुटकी दै दै ग्वाल नचावत हंसत सबै मुसुकात॥
तू मोहीं को मारन सीखी दाउहिं कबहुं न खीझै।
मोहन मुख रिस की ये बातैं जसुमति सुनि सुनि रीझै॥
सुनहु कान बलभद्र चबाई जनमत ही को धूत।
सूर स्याम मोहिं गोधन की सौं हौं माता तू पूत॥

भावार्थ: कृष्ण शिकायत करते हैं, माँ, दाऊ (बलराम) मुझे बहुत चिढ़ाते हैं। कहते हैं कि तुझे तो मोल (ख़रीद कर) लाया गया है, यशोदा ने तुझे कब जन्म दिया! इसी ग़ुस्से में मैं खेलने नहीं जाता। वे बार बार पूछते हैं कि तेरी माँ कौन है, पिता कौन है? नंद बाबा गोरे हैं, यशोदा माँ गोरी हैं, तू साँवला कैसे? ग्वाल बाल चुटकी बजा बजाकर मुझे नचाते और हँसते हैं। और तू भी मुझे ही मारना सीखी है, दाऊ पर कभी नहीं गुस्साती। कृष्ण की ये रूठी बातें सुनकर यशोदा मन ही मन खुश होती हैं और कहती हैं, सुनो कान्हा, बलराम तो जन्म से ही चुगलख़ोर और धूर्त है। गायों की सौगंध, मैं ही तेरी माँ हूँ और तू ही मेरा बेटा।

4. जसोदा हरि पालनैं झुलावै

जसोदा हरि पालनैं झुलावै।
हलरावै, दुलरावै मल्हावै, जोइ जोइ कछु गावै॥
मेरे लाल कौं आउ निंदरिया, काहैं न आनि सुवावै।
तू काहैं नहिं बेगहिं आवै, तोकौं कान्ह बुलावै॥
कबहुँ पलक हरि मूँदि लेत हैं, कबहुँ अधर फरकावै।
सोवत जानि मौन ह्वै कै रहि, करि करि सैन बतावै॥
इहिं अंतर अकुलाइ उठे हरि, जसुमति मधुरैं गावै।
जो सुख सूर अमर मुनि दुरलभ, सो नंद भामिनि पावै॥

भावार्थ: यशोदा कृष्ण को पालने में झुला रही हैं। कभी हिलाती हैं, कभी दुलारती हैं, कभी पुचकारती हैं, और जो मन में आए वह गुनगुनाती हैं: “ओ नींद, मेरे लाल के पास आ, आकर इसे सुला क्यों नहीं देती? तू जल्दी क्यों नहीं आती, तुझे कान्हा बुला रहा है।” कृष्ण कभी पलकें मूँद लेते हैं, कभी होंठ फड़काते हैं। उन्हें सोया जानकर यशोदा चुप हो जाती हैं और इशारों से दूसरों को चुप रहने को कहती हैं। इसी बीच कृष्ण अकुलाकर जाग उठते हैं, तो यशोदा फिर मीठे स्वर में गाने लगती हैं। सूरदास कहते हैं कि जो सुख देवताओं और मुनियों को भी दुर्लभ है, वह नंद की पत्नी यशोदा को मिल रहा है।

5. खेलन में को काको गुसैयाँ (कक्षा 11, अंतरा)

खेलन में को काको गुसैयाँ।
हरि हारे जीते श्रीदामा, बरबस हीं कत करत रिसैयाँ॥
जाति पाँति हमतैं बड़ नाहीं, नाहीं बसत तुम्हारी छैयाँ।
अति अधिकार जनावत यातै जातैं अधिक तुम्हारै गैयाँ।
रुहठि करै तासौं को खेलै, रहे बैठि जहँ तहँ सब ग्वैयाँ।
सूरदास प्रभु खेल्यौइ चाहत, दाऊँ दियौ करि नंद दुहैयाँ॥

भावार्थ: खेल में हार गए कृष्ण ग़ुस्सा करते हैं, तो सखा कहते हैं: खेल में कौन किसका मालिक! कृष्ण हारे और श्रीदामा जीते, फिर बेवजह ग़ुस्सा क्यों? जाति पाँति में तुम हमसे बड़े नहीं, न हम तुम्हारी छाया में रहते हैं। तुम केवल इसलिए अधिकार जता रहे हो कि तुम्हारे पास गायें ज़्यादा हैं। जो रूठे, उससे कौन खेले! यह कहकर सब ग्वाल बाल जहाँ तहाँ बैठ गए। सूरदास कहते हैं कि कृष्ण खेलना चाहते थे, इसलिए उन्होंने नंद बाबा की सौगंध खाकर अपना दाँव दे दिया। (इस पद में खेल में बराबरी की सुंदर सीख है।)

भक्ति का पद: चरन कमल बंदौं हरि राई

लकड़ी पर उकेरी बाँसुरी बजाते कृष्ण की मूर्ति
सूरसागर का आरंभ इसी वंदना पद से माना जाता है
चरन कमल बंदौं हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार बार बंदौं तेहि पाई॥

भावार्थ: मैं भगवान श्रीहरि के कमल जैसे चरणों की वंदना करता हूँ, जिनकी कृपा से लंगड़ा पहाड़ लाँघ लेता है, अंधे को सब कुछ दिखने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूँगा बोलने लगता है, और ग़रीब सिर पर छत्र धारण करके राजा की तरह चलता है। सूरदास कहते हैं कि ऐसे करुणामय प्रभु के चरणों में मैं बार बार प्रणाम करता हूँ।

सूरदास की काव्य विशेषताएँ

  • वात्सल्य रस: बाल लीला का इतना सजीव वर्णन हिंदी में कहीं और नहीं, इसलिए उन्हें वात्सल्य रस का सम्राट कहते हैं।
  • श्रृंगार रस: संयोग (राधा कृष्ण का मिलन) और वियोग (भ्रमरगीत), दोनों का सुंदर चित्रण।
  • भाषा: सरल, मधुर ब्रज भाषा; लोक जीवन के शब्द।
  • गेयता: सभी पद किसी न किसी राग में गाए जाने के लिए लिखे गए।
  • अलंकार: उपमा, रूपक, अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश सहज रूप से आते हैं।
  • भक्ति: सगुण कृष्ण भक्ति; सख्य (मित्र) भाव और वात्सल्य भाव प्रमुख।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

कक्षा 10 में सूरदास के कौन से पद हैं?

क्षितिज भाग 2 के पहले पाठ में चार पद हैं: “ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी”, “मन की मन ही माँझ रही”, “हमारैं हरि हारिल की लकरी” और “हरि हैं राजनीति पढ़ि आए”। चारों भ्रमरगीत प्रसंग से हैं।

सूरदास के पद किस भाषा में हैं?

ब्रज भाषा में, जो मथुरा, वृंदावन और आगरा के आसपास बोली जाती थी।

क्या सूरदास के दोहे भी हैं?

सूरदास की पहचान पदों से है, जो राग में गाए जाने के लिए लिखे गए। “सूरदास के दोहे” खोजने वाले ज़्यादातर इन्हीं पदों की बात करते हैं। कुछ संग्रहों का नाम “सूर दोहावली” भी है, पर उनमें भी पद ही हैं।

भ्रमरगीत किसे कहते हैं?

उद्धव जब कृष्ण का योग संदेश लेकर गोकुल आए, तो गोपियों ने एक भौंरे (भ्रमर) को संबोधित करके उद्धव पर व्यंग्य किए। इसी प्रसंग के पदों को भ्रमरगीत कहते हैं।

सूरदास के गुरु कौन थे?

महाप्रभु वल्लभाचार्य। उन्होंने सूरदास को पुष्टिमार्ग में दीक्षा दी और श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन का दायित्व सौंपा।

सूरदास की प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?

सूरसागर (सबसे प्रसिद्ध), सूरसारावली और साहित्य लहरी।

सूरदास को वात्सल्य रस का सम्राट क्यों कहते हैं?

क्योंकि उन्होंने बाल कृष्ण की शरारतों, यशोदा के दुलार और माँ बेटे के रिश्ते का जितना सजीव और विस्तृत वर्णन किया, उतना हिंदी के किसी और कवि ने नहीं किया।

“हारिल की लकरी” का क्या अर्थ है?

हारिल पक्षी हमेशा एक लकड़ी पंजों में पकड़े रहता है। गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण उनके लिए वही लकड़ी हैं, जिन्हें वे कभी नहीं छोड़ सकतीं।

सूरदास अष्टछाप के कवि क्यों कहे जाते हैं?

वल्लभाचार्य और उनके पुत्र विट्ठलनाथ के आठ शिष्य कवियों को अष्टछाप कहा गया, जो श्रीनाथ जी की सेवा में कीर्तन रचते थे। सूरदास इनमें सबसे प्रमुख थे।

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