तुलसीदास के दोहे अर्थ सहित: दोहावली के 30 दोहे और रामचरितमानस के 13 प्रसिद्ध दोहे व चौपाइयाँ (Tulsidas Ke Dohe)

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Tulsidas ke dohe यानी गोस्वामी तुलसीदास की वे पंक्तियाँ, जो रामभक्ति के साथ साथ जीवन, रिश्तों, दोस्ती और समझदारी की सबसे सीधी सीख देती हैं। इस लेख में तीन हिस्से हैं: पहले दोहावली और दूसरे संग्रहों के 30 दोहे, फिर रामचरितमानस के 13 सबसे प्रसिद्ध दोहे और चौपाइयाँ (कांड और दोहा संख्या के साथ), और आख़िर में वे चार दोहे जो तुलसीदास के नाम से बहुत चलते हैं पर जिनका स्रोत हमें पक्का नहीं मिला। हर दोहे का सरल अर्थ और एक लाइन की सीख दी गई है।

बातजानकारी
नामगोस्वामी तुलसीदास (बचपन का नाम रामबोला)
जन्मवर्ष पर मतभेद (1497, 1511 और 1532 ई. जैसे वर्ष बताए जाते हैं); राजापुर या सोरों, उत्तर प्रदेश
निधन1623 ई., वाराणसी
माता पिताहुलसी और आत्माराम दुबे
प्रमुख रचनाएँरामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमान बाहुक
भाषाअवधी (रामचरितमानस) और ब्रज (विनय पत्रिका, कवितावली)

विषय सूची

दोहा और चौपाई में फ़र्क़ क्या है?

दोहा दो पंक्तियों का छंद है, जिसकी हर पंक्ति के दो हिस्से होते हैं (13 और 11 मात्राएँ)। चौपाई में चार चरण होते हैं (हर चरण में 16 मात्राएँ) और रामचरितमानस का ज़्यादातर हिस्सा चौपाइयों में है; हर कुछ चौपाइयों के बाद एक दोहा आता है। सोरठा दोहे का उल्टा रूप है (11 और 13 मात्राएँ)। इस लेख में जहाँ चौपाई या सोरठा है, वहाँ साफ़ लिखा है।

दोहावली से तुलसीदास के दोहे: जीवन और कर्म

1. तुलसी काया खेत है

‘तुलसी’ काया खेत है, मनसा भयौ किसान।
पाप-पुन्य दोउ बीज हैं, बुवै सो लुनै निदान॥

अर्थ: तुलसीदास कहते हैं कि यह शरीर एक खेत है और मन उसका किसान। पाप और पुण्य, दोनों बीज हैं। मन जो बोता है, अंत में वही काटता है।

सीख: जैसा कर्म करेंगे, वैसा ही फल मिलेगा; बीज चुनना अपने हाथ में है।

तुलसी काया खेत है: खेत में बीज बोता हुआ किसान
शरीर खेत है, मन किसान; जैसा बोओगे, वैसा काटोगे

2. तुलसी साथी विपति के

‘तुलसी’ साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक।
साहस, सुकृत, सुसत्य-व्रत, राम-भरोसो एक॥

अर्थ: मुसीबत के समय के सच्चे साथी ये हैं: विद्या, विनम्रता, विवेक (समझ), साहस, अच्छे कर्म, सच बोलने का व्रत और भगवान राम पर भरोसा।

सीख: संकट में लोग साथ छोड़ सकते हैं, पर आपके गुण कभी नहीं छोड़ते।

3. तुलसी असमय के सखा

‘तुलसी’ असमय के सखा, साहस धर्म विचार।
सुकृत, सील, सुभाव रिजु, राम-चरन-आधार॥

अर्थ: बुरे समय के मित्र हैं: साहस, धर्म, सही विचार, अच्छे कर्म, शील (अच्छा आचरण), सीधा स्वभाव और राम के चरणों का सहारा।

सीख: अच्छे दिनों में ये गुण कमाइए, बुरे दिनों में यही काम आते हैं।

4. बचन वेष तें जो बनइ

बचन वेष तें जो बनइ, सो बिगरइ परिनाम।
तुलसी मन तें जो बनइ, बनी बनाई राम॥

अर्थ: जो काम सिर्फ़ मीठी बातों और दिखावटी वेश से बनता है, वह अंत में बिगड़ जाता है। पर जो काम सच्चे मन से बनता है, उसे भगवान बना बनाया रखते हैं।

सीख: दिखावे से बनी बात टिकती नहीं, सच्चे मन से किया काम ही टिकता है।

5. सूधे मन सूधे बचन

सूधे मन सूधे बचन, सूधी सब करतूति।
तुलसी सूधी सकल विधि, रघुवर प्रेम प्रसूति॥

अर्थ: सीधा (सरल) मन, सीधी बात और सीधे काम, यही सब तरह से सीधा रास्ता है, और इसी से भगवान राम का प्रेम पैदा होता है।

सीख: सरलता सबसे बड़ा गुण है; मन, वचन और कर्म एक जैसे रखिए।

6. तुलसी जस भवितव्यता

‘तुलसी’ जस भवितव्यता, तैसी मिलै सहाय।
आपु न आवै ताहि पै, ताहि तहाँ लै जाय॥

अर्थ: जैसी होनी होती है, वैसी ही मदद मिल जाती है। होनी ख़ुद व्यक्ति के पास नहीं आती, बल्कि व्यक्ति को ही वहाँ तक ले जाती है।

सीख: हालात कई बार हमें ख़ुद रास्ता दिखाते हैं; घबराइए नहीं, अपना कर्म करते रहिए।

7. तुलसी विलंब न कीजै

‘तुलसी’ विलंब न कीजै, भजि लीजै रघुबीर।
तन तरकस तें जात है, स्वांस सार सो तीर॥

अर्थ: देर मत करो, भगवान का भजन कर लो। शरीर एक तरकश है और हर साँस उसमें से निकलता हुआ तीर; साँसें एक एक करके ख़र्च हो रही हैं।

सीख: समय सबसे क़ीमती है; अच्छा काम कल पर मत टालिए।

8. तुलसी सुखी जो राम सों

तुलसी सुखी जो राम सों, दुखी सो निज करतूति।
करम बचन मन ठीक जेहि, तेहि न सकै कलि धूति॥

अर्थ: जो भगवान राम से जुड़ा है, वह सुखी है, और जो दुखी है, वह अपनी ही करनी से दुखी है। जिसके कर्म, वचन और मन ठीक हैं, उसे कलियुग भी धोखा नहीं दे सकता।

सीख: ज़्यादातर दुख अपने कर्मों से आते हैं; कर्म, बोली और सोच सुधारिए।

दोहावली से: रिश्ते, मित्र और लोगों की पहचान

9. आवत हिय हरषै नहीं

आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥

अर्थ: जिस घर में आपके आने पर लोगों का मन ख़ुश न हो और उनकी आँखों में प्रेम न दिखे, वहाँ कभी मत जाइए, चाहे वहाँ सोने की बारिश ही क्यों न हो रही हो।

सीख: जहाँ इज़्ज़त और अपनापन न हो, वहाँ का फ़ायदा भी छोटा है।

10. हरे चरहिं तापहिं बरे

हरे चरहिं तापहिं बरे, फरें पसारहिं हाथ।
तुलसी स्वारथ मीत सब, परमारथ रघुनाथ॥

अर्थ: पेड़ हरा हो तो पशु उसे चरते हैं, सूख जाए तो लोग जलाकर तापते हैं, और फल लगें तो सब हाथ फैलाते हैं। संसार में सब स्वार्थ के मित्र हैं; बिना स्वार्थ के साथी केवल भगवान राम हैं।

सीख: दुनिया अक्सर फ़ायदे के लिए जुड़ती है; यह जानकर किसी से कड़वे मत होइए, पर उम्मीदें सोच समझकर रखिए।

11. दुर्जन दर्पण सम सदा

दुर्जन दर्पण सम सदा, करि देखौ हिय गौर।
संमुख की गति और है, विमुख भए पर और॥

अर्थ: दुष्ट व्यक्ति दर्पण जैसा होता है, ध्यान से देखो तो समझ आएगा। सामने रहो तो उसका व्यवहार कुछ और होता है, और पीठ फेरते ही कुछ और।

सीख: जो सामने कुछ और, पीछे कुछ और हो, उससे सावधान रहिए।

12. नीच चंग सम जानिए

नीच चंग-सम जानिए, सुनि लखि ‘तुलसीदास’।
हील देत महि गिरि परत, खैंचत चढ़त अकास॥

अर्थ: नीच व्यक्ति को पतंग (चंग) जैसा समझो। ढील दो तो ज़मीन पर गिर पड़ता है, और खींचकर रखो (कड़ाई करो) तो आसमान पर चढ़ता है।

सीख: कुछ लोग ढील पाकर बिगड़ जाते हैं; उनके साथ प्यार के साथ अनुशासन भी ज़रूरी है।

नीच चंग सम जानिए: नीले आसमान में उड़ती दो पतंगें
पतंग खींचने पर चढ़ती है, ढील देने पर गिरती है

13. तुलसी कबहुँ न त्यागिए

‘तुलसी’ कबहुँ न त्यागिए, अपने कुल की रीति।
लायक ही सों कीजिए, ब्याह, बैर अरु प्रीति॥

अर्थ: अपने परिवार की अच्छी परंपरा कभी मत छोड़िए। और शादी, दुश्मनी और दोस्ती, ये तीनों हमेशा बराबरी वाले और योग्य व्यक्ति से ही कीजिए।

सीख: रिश्ता चाहे कोई भी हो, सामने वाले को परखकर ही जोड़िए।

14. सिष्य सखा सेवक सचिव

सिष्य सखा सेवक सचिव, सुतिय सिखाबनु साँच।
सुनि करिए पुनि परिहरिय, पर मनरंजन पाँच॥

अर्थ: शिष्य, मित्र, सेवक, मंत्री और अच्छी पत्नी, इन पाँचों की सच्ची सलाह सुनकर उस पर अमल करना चाहिए। लेकिन जो बात सिर्फ़ दूसरों का मन रखने के लिए कही जाए, उसे छोड़ देना चाहिए।

सीख: अपने लोगों की सच्ची सलाह सुनिए, चापलूसी नहीं।

15. हित सों हित, रति राम सों

हित सों हित, रति राम सों, रिपु सों बैर बिहाउ।
उदासीन सब सों सरल, तुलसी सहज सुभाउ॥

अर्थ: भला चाहने वालों से भलाई, भगवान से प्रेम, दुश्मन से भी बैर छोड़ देना, और बाक़ी सबसे सरल व्यवहार, यही अच्छे इंसान का सहज स्वभाव है।

सीख: बैर का बोझ उतारिए; सबसे सरल रहना मन को हल्का रखता है।

16. तुलसी संत सुअंब तरु

‘तुलसी’ संत सुअंब तरु, फूलि फलहिं पर हेत।
इतते ये पाहन हनत, उतते वे फल देत॥

अर्थ: संत अच्छे आम के पेड़ जैसे होते हैं, जो दूसरों के लिए फूलते और फलते हैं। लोग इधर से उन्हें पत्थर मारते हैं, और वे उधर से फल देते हैं।

सीख: बुरे के बदले भी भलाई करना, यही बड़प्पन है।

17. वेष विसद बोलनि मधुर

वेष विसद बोलनि मधुर, मन कटु करम मलीन।
तुलसी राम न पाइऐ, भएँ बिषय-जल मीन॥

अर्थ: सुंदर वेश और मीठी बोली हो, पर मन कड़वा और काम मैले हों, तो ऐसे व्यक्ति को भगवान नहीं मिलते। वह विषय भोग के पानी में मछली की तरह फँसा रहता है।

सीख: बाहर की सजावट नहीं, भीतर की सफ़ाई असली है।

18. स्वामी होनो सहज है

स्वामी होनो सहज है, दुर्लभ होनो दास।
गाडर लाए ऊन को, लागी चरन कपास॥

अर्थ: मालिक बनना आसान है, पर सच्चा सेवक बनना कठिन है। जैसे कोई ऊन के लिए भेड़ लाया, पर भेड़ कपास के खेत चरने लगी (फ़ायदे की जगह नुक़सान)।

सीख: विनम्र होकर सेवा करना सबसे कठिन और सबसे बड़ा गुण है।

19. सूर समर करनी करहीं

सूर समर करनी करहीं, कहि न जनावहिं आप।
विद्यमान रिपु पाइ रन, कायर करहिं प्रलाप॥

अर्थ: वीर लोग युद्ध में अपना काम करके दिखाते हैं, अपने मुँह से अपनी बड़ाई नहीं करते। कायर लोग दुश्मन को सामने पाकर बस बड़ी बड़ी बातें करते हैं।

सीख: काम करके दिखाइए, बातें बनाने से कोई वीर नहीं बनता।

दोहावली से: भक्ति, राम नाम और मन

20. राम नाम मनि दीप धरु

राम-नाम-मनि-दीप धरु, जीह देहरी द्वार।
‘तुलसी’ भीतर बाहिरौ, जौ चाहसि उजियार॥

अर्थ: अगर भीतर और बाहर, दोनों तरफ़ उजाला चाहते हो, तो राम नाम रूपी मणि का दीपक जीभ रूपी दहलीज़ पर रख दो। जैसे दहलीज़ पर रखा दीया घर के अंदर और बाहर, दोनों तरफ़ रोशनी करता है।

सीख: अच्छे शब्द और अच्छे विचार मन और व्यवहार, दोनों को रोशन करते हैं।

राम नाम मनि दीप धरु: रात में जलते मिट्टी के दीये
दहलीज़ का दीया अंदर और बाहर, दोनों तरफ़ उजाला करता है

21. नाम राम को अंक है

नाम राम को अंक है, सब साधन हैं सून।
अंक गएँ कछु हाथ नहिं, अंक रहें दस गून॥

अर्थ: राम का नाम अंक (जैसे 1) है और बाक़ी सब साधन शून्य (0) हैं। अंक हटा दो तो शून्यों की कोई क़ीमत नहीं, और अंक रहे तो हर शून्य से क़ीमत दस गुना बढ़ जाती है।

सीख: जीवन में जो सबसे ज़रूरी है (आपका “एक”), वह रहे, तभी बाक़ी सब मेहनत का मूल्य है।

22. तुलसी ममता राम सों

तुलसी ममता राम सों, समता सब संसार।
राग न रोष न दोष दुख, दास भए भव पार॥

अर्थ: जिनकी ममता (अपनापन) राम से है और संसार में सबके प्रति समता का भाव है, जिनमें न राग है, न ग़ुस्सा, न दोष, न दुख, ऐसे भक्त संसार सागर से पार हो जाते हैं।

सीख: सबको बराबर समझने वाला मन ही शांत रहता है।

23. बिनु सतसंग न हरिकथा

बिनु सतसंग न हरिकथा, तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु रामपद, होइ न दृढ़ अनुराग॥

अर्थ: अच्छी संगत के बिना भगवान की कथा नहीं मिलती, कथा के बिना मोह नहीं भागता, और मोह गए बिना भगवान के चरणों में पक्का प्रेम नहीं होता।

सीख: अच्छी संगत अच्छे विचारों की पहली सीढ़ी है।

24. मोर मोर सब कहँ कहसि

मोर-मोर सब कहँ कहसि, तू को कहु निज नाम।
कै चुप साधहि सुनि समुझि, कै तुलसी जपु राम॥

अर्थ: तू हर चीज़ को “मेरा मेरा” कहता है, पर पहले यह तो बता कि तू ख़ुद कौन है? या तो यह समझकर चुप हो जा, या फिर राम का नाम जप।

सीख: “मेरा” का मोह जितना कम, मन उतना हल्का।

25. राम दूरि माया बढ़ति

राम दूरि माया बढ़ति, घटति जानि मन माँह।
भूरि होति रवि दूरि लखि, सिर पर पगतर छाँह॥

अर्थ: जब भगवान मन से दूर होते हैं, तो माया (मोह) बढ़ती है, और जब पास होते हैं, तो घटती है। जैसे सूरज दूर (सुबह शाम) हो तो परछाईं लंबी होती है, और सिर पर (दोपहर) हो तो पैरों तले छोटी सी रह जाती है।

सीख: अच्छे विचार पास हों तो बुरी आदतों की छाया छोटी हो जाती है।

26. ऊँची जाति पपीहरा

ऊँची जाति पपीहरा, पियत न नीचौ नीर।
कै याचै घनश्याम सों, कै दु:ख सहै सरीर॥

अर्थ: पपीहा (चातक) ऊँचे स्वभाव का पक्षी है, नीचे का पानी नहीं पीता। या तो वह बादल से पानी माँगता है, या प्यास का दुख सह लेता है।

सीख: स्वाभिमान ऊँचा रखिए; माँगना हो तो बस सही जगह से।

27. असन बसन सुत नारि सुख

असन बसन सुत नारि सुख, पापिहुँ के घर होइ।
संत-समागम रामधन, ‘तुलसी’ दुर्लभ दोइ॥

अर्थ: भोजन, कपड़े, संतान और पत्नी का सुख तो पापी के घर में भी होता है। पर अच्छे लोगों की संगत और भगवान रूपी धन, ये दोनों दुर्लभ हैं।

सीख: सुविधाएँ सबको मिल जाती हैं; अच्छी संगत किस्मत वालों को मिलती है।

28. घर दीन्हे घर जात है

घर दीन्हे घर जात है, घर छोड़े घर जाय।
‘तुलसी’ घर बन बीच रहू, राम प्रेम-पुर छाय॥

अर्थ: घर में ही पूरा मन लगा दो तो असली घर (परलोक) छूट जाता है, और घर छोड़ दो तो यह घर छूटता है। इसलिए घर और वन के बीच, राम प्रेम का नगर बसाकर रहो।

सीख: गृहस्थी और आध्यात्म, दोनों का संतुलन ही सही रास्ता है।

29. सत्य बचन मानस बिमल

सत्य बचन मानस बिमल, कपट रहित करतूति।
तुलसी रघुबर सेवकहि, सकै न कलिजुग धूति॥

अर्थ: जिसकी वाणी सच्ची, मन निर्मल और काम कपट रहित है, ऐसे राम भक्त को कलियुग भी धोखा नहीं दे सकता।

सीख: सच्चाई और साफ़ मन सबसे मज़बूत ढाल हैं।

30. बारि मथें घृत होइ बरु

बारि मथें घृत होइ बरु, सिकता ते बरु तेल।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ, यह सिद्धांत अपेल॥

अर्थ: पानी को मथने से घी निकल आए, रेत से तेल निकल आए, यह असंभव भी हो जाए, पर भगवान के भजन के बिना संसार सागर पार नहीं हो सकता। यह अटल सिद्धांत है।

सीख: कुछ बातें शॉर्टकट से नहीं होतीं; सच्ची साधना का कोई विकल्प नहीं।

रामचरितमानस के 13 सबसे प्रसिद्ध दोहे और चौपाइयाँ

ये पंक्तियाँ गीता प्रेस की श्री रामचरितमानस से मिलाकर दी गई हैं। हर पंक्ति के साथ कांड का नाम है, और दोहों के साथ दोहा संख्या भी।

31. मुखिआ मुखु सो चाहिऐ (अयोध्याकांड, दोहा 315)

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक॥

अर्थ: श्रीराम भरत से कहते हैं कि मुखिया मुँह के समान होना चाहिए, जो खाने पीने के लिए अकेला है, पर समझदारी से शरीर के सभी अंगों का पालन पोषण करता है।

सीख: अच्छा नेता वह है जो ख़ुद लेकर पूरे परिवार या टीम तक बराबर पहुँचाए।

32. सचिव बैद गुर तीनि जौं (सुंदरकांड, दोहा 37)

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास॥

अर्थ: मंत्री, वैद्य और गुरु, ये तीनों अगर डर से या लाभ की आशा से (सच की जगह) मीठी बात बोलें, तो राज्य, धर्म और शरीर, तीनों जल्दी नष्ट हो जाते हैं।

सीख: सलाहकार, डॉक्टर और शिक्षक से हमेशा सच सुनने की आदत डालिए, चाहे वह कड़वा हो।

33. काम क्रोध मद लोभ सब (सुंदरकांड, दोहा 38)

काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत॥

अर्थ: विभीषण रावण से कहते हैं: हे नाथ, काम, क्रोध, घमंड और लोभ, ये सब नरक के रास्ते हैं। इन सबको छोड़कर श्रीराम का भजन कीजिए, जिन्हें संत भजते हैं।

सीख: ग़ुस्सा, लालच और घमंड, ये तीनों अच्छे भले जीवन को बर्बाद कर देते हैं।

34. बिनय न मानत जलधि जड़ (सुंदरकांड, दोहा 57)

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥

अर्थ: तीन दिन बीत गए, पर जड़ समुद्र विनती नहीं मानता। तब श्रीराम क्रोध के साथ बोले कि भय के बिना प्रीति नहीं होती।

सीख: विनम्रता पहला रास्ता है, पर जो बिल्कुल न समझे उसके सामने दृढ़ता भी दिखानी पड़ती है।

35. तुलसी देखि सुबेषु (बालकांड, सोरठा 161 ख)

तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥

अर्थ: सुंदर वेश देखकर केवल मूर्ख ही नहीं, चतुर लोग भी धोखा खा जाते हैं। सुंदर मोर को देखो, उसकी बोली अमृत जैसी है, पर भोजन साँप है।

सीख: किसी को सिर्फ़ उसके रूप और बोली से मत परखिए।

36. करम प्रधान बिस्व करि राखा (अयोध्याकांड, चौपाई)

करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥

अर्थ: ईश्वर ने इस संसार में कर्म को ही प्रधान रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा ही फल चखता है।

सीख: भाग्य से पहले कर्म है; जो बोएँगे, वही काटेंगे।

37. धीरज धर्म मित्र अरु नारी (अरण्यकांड, चौपाई)

धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥

अर्थ: धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी, इन चारों की परीक्षा मुसीबत के समय ही होती है। (यह बात अनसूया जी सीता जी को समझाते हुए कहती हैं।)

सीख: संकट ही बताता है कि कौन सा साथ और कौन सा गुण सच्चा है।

38. जहाँ सुमति तहँ संपति नाना (सुंदरकांड, चौपाई)

जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥

अर्थ: विभीषण रावण से कहते हैं: जहाँ अच्छी बुद्धि (और आपसी मेल) होती है, वहाँ तरह तरह की संपत्ति होती है, और जहाँ बुरी बुद्धि (और फूट) होती है, वहाँ अंत में विपत्ति आती है।

सीख: घर हो या दफ़्तर, समझदारी और मेल ही तरक़्क़ी की जड़ है।

39. पर हित सरिस धर्म नहिं भाई (उत्तरकांड, चौपाई)

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥

अर्थ: दूसरों की भलाई के समान कोई धर्म नहीं है, और दूसरों को दुख देने के समान कोई नीचता नहीं है।

सीख: हर धर्म का सार यही है: किसी का भला करो, किसी को दुख मत दो।

40. रघुकुल रीति सदा चलि आई (अयोध्याकांड, चौपाई)

रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥

अर्थ: राजा दशरथ कैकेयी से कहते हैं कि रघुकुल में सदा से यह रीति चली आई है कि प्राण भले ही चले जाएँ, पर दिया हुआ वचन नहीं जाता।

सीख: वादा सोच समझकर कीजिए, और कर दिया तो निभाइए।

41. होइहि सोइ जो राम रचि राखा (बालकांड, चौपाई)

होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥

अर्थ: शिवजी मन में कहते हैं कि जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा; तर्क करके बात को कौन बढ़ाए।

सीख: जो अपने हाथ में नहीं, उस पर बहस और चिंता छोड़कर अपना कर्तव्य कीजिए।

42. हरि अनंत हरि कथा अनंता (बालकांड, चौपाई)

हरि अनंत हरिकथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥

अर्थ: भगवान अनंत हैं और उनकी कथा भी अनंत है। सब संत उसे अनेक तरह से कहते और सुनते हैं।

सीख: सच को समझने के कई रास्ते हैं; दूसरों के नज़रिए का भी सम्मान कीजिए।

43. उमा दारु जोषित की नाईं (किष्किंधाकांड, चौपाई)

उमा दारु जोषित की नाईं।
सबहि नचावत रामु गोसाईं॥

अर्थ: शिवजी पार्वती जी से कहते हैं: हे उमा, स्वामी श्रीराम सबको कठपुतली की तरह नचाते हैं।

सीख: घमंड किस बात का; जीवन की डोर किसी बड़ी शक्ति के हाथ में है।

तुलसीदास के नाम से प्रसिद्ध, पर स्रोत पक्का नहीं

ये चार दोहे बहुत लोकप्रिय हैं और इंटरनेट व किताबों में तुलसीदास के नाम से मिलते हैं। हमने इन्हें गीता प्रेस की रामचरितमानस में और हिंदवी के तुलसीदास दोहा संग्रह में खोजा, पर ये वहाँ नहीं मिले, और अलग अलग जगह इनके शब्द भी अलग मिलते हैं। सीख अच्छी है, इसलिए अर्थ दे रहे हैं, पर परीक्षा में या कहीं हवाला देते समय ध्यान रखें।

तुलसी मीठे बचन ते: “तुलसी मीठे बचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर। बसीकरन इक मंत्र है, परिहरु बचन कठोर॥” अर्थ: मीठे वचन से चारों तरफ़ सुख फैलता है; यह सबको वश में करने का मंत्र है, इसलिए कठोर वचन छोड़ दो।

दया धर्म का मूल है: “दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान। तुलसी दया न छाँड़िए, जब लग घट में प्रान॥” अर्थ: दया धर्म की जड़ है और घमंड पाप की; जब तक शरीर में प्राण हैं, दया मत छोड़ो।

तुलसी इस संसार में: “तुलसी इस संसार में, भाँति भाँति के लोग। सबसे हिल मिल चालिए, नदी नाव संजोग॥” अर्थ: संसार में तरह तरह के लोग हैं; सबसे मिलजुलकर चलो, क्योंकि यह मिलना नदी में नाव के यात्रियों जैसा थोड़े समय का है।

तुलसी नर का क्या बड़ा: “तुलसी नर का क्या बड़ा, समय बड़ा बलवान। भीलां लूटी गोपियाँ, वही अर्जुन वही बान॥” अर्थ: इंसान बड़ा नहीं, समय बलवान है; वही अर्जुन और वही बाण थे, फिर भी (समय बदलने पर) भीलों ने गोपियों को लूट लिया।

स्कूल की किताबों में तुलसीदास

तुलसीदास की रचनाएँ कई कक्षाओं में पढ़ाई जाती हैं। जैसे NCERT कक्षा 10 की किताब क्षितिज में “राम लक्ष्मण परशुराम संवाद” (रामचरितमानस, बालकांड का अंश) और कक्षा 12 की किताब आरोह में “कवितावली” और “लक्ष्मण मूर्छा और राम का विलाप”। किताबें बदलती रहती हैं, इसलिए अपनी किताब से मिला लें। परीक्षा में व्याख्या लिखने का तरीका (संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, विशेष) हमारे रहीम के दोहे वाले लेख में उदाहरण के साथ दिया गया है।

गोस्वामी तुलसीदास का जीवन परिचय (छोटा)

तुलसीदास का बचपन का नाम रामबोला था और उनके माता पिता हुलसी और आत्माराम दुबे थे। उनके जन्म के वर्ष और स्थान पर विद्वानों में मतभेद है; राजापुर और सोरों (उत्तर प्रदेश) दोनों का नाम आता है। परंपरा के अनुसार बचपन में ही माता पिता से बिछड़ गए और संत नरहरिदास ने उन्हें शिक्षा दी। उनकी पत्नी रत्नावली से जुड़ी प्रसिद्ध कथा है कि पत्नी के एक ताने ने उन्हें रामभक्ति की ओर मोड़ दिया।

उन्होंने अपना ज़्यादातर जीवन वाराणसी और अयोध्या में बिताया। अवधी में लिखा रामचरितमानस उत्तर भारत के घर घर में पढ़ा जाता है। इसके अलावा विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली और हनुमान बाहुक उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं, और हनुमान चालीसा भी परंपरा से उन्हीं की रचना मानी जाती है। वाराणसी का तुलसी घाट उन्हीं के नाम पर है। 1623 ई. में वाराणसी में उनका निधन हुआ। ज़्यादा जानकारी हिंदी विकिपीडिया पर तुलसीदास पर है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

तुलसीदास का सबसे प्रसिद्ध दोहा कौन सा है?

“तुलसी साथी विपति के, विद्या, विनय, विवेक” और “आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह” बहुत प्रसिद्ध हैं। रामचरितमानस से “मुखिआ मुखु सो चाहिऐ” और चौपाई “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई” भी ख़ूब उद्धृत होते हैं।

तुलसीदास के दोहे किस भाषा में हैं?

रामचरितमानस अवधी में है, जबकि विनय पत्रिका और कवितावली ब्रज भाषा में हैं। दोहावली में भी ब्रज और अवधी का मेल है।

दोहा और चौपाई में क्या अंतर है?

दोहा दो पंक्तियों का छंद है (13 और 11 मात्राएँ), जबकि चौपाई में चार चरण होते हैं (हर चरण में 16 मात्राएँ)। रामचरितमानस में ज़्यादातर चौपाइयाँ हैं और बीच बीच में दोहे।

तुलसी साथी विपति के दोहे का अर्थ क्या है?

मुसीबत के सच्चे साथी विद्या, विनम्रता, विवेक, साहस, अच्छे कर्म, सच्चाई का व्रत और भगवान पर भरोसा हैं।

क्या “दया धर्म का मूल है” तुलसीदास का दोहा है?

यह तुलसीदास के नाम से बहुत प्रसिद्ध है, पर हमें यह गीता प्रेस की रामचरितमानस में या हिंदवी के तुलसी संग्रह में नहीं मिला। इसलिए इसका पक्का स्रोत बताना मुश्किल है।

तुलसीदास की प्रमुख रचनाएँ कौन सी हैं?

रामचरितमानस, विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, हनुमान बाहुक, जानकी मंगल और पार्वती मंगल। हनुमान चालीसा भी परंपरा से उन्हीं की मानी जाती है।

तुलसीदास का निधन कब और कहाँ हुआ?

तुलसीदास का निधन 1623 ई. में वाराणसी में हुआ। वाराणसी का तुलसी घाट उन्हीं के नाम पर है।

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स्रोत: दोहावली के दोहों का पाठ हिंदवी (रेख़्ता फ़ाउंडेशन) से; रामचरितमानस की पंक्तियाँ और संख्या गीता प्रेस की श्री रामचरितमानस से मिलाई गई हैं; जीवन परिचय हिंदी विकिपीडिया के आधार पर। फ़ोटो: Pexels (Arto Suraj, Tushar Kadam, Vũ Bụi)।

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