बिहारी के दोहे अर्थ सहित: कक्षा 10 के 8 दोहे (भावार्थ, अलंकार, प्रश्न उत्तर) और नीति भक्ति के 16 प्रसिद्ध दोहे

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Bihari ke dohe: पुरानी दीवार पर बना राधा कृष्ण का रंगीन चित्र
बिहारी के ज़्यादातर दोहे राधा कृष्ण के प्रेम, रूप और लीला पर हैं

Bihari ke dohe हिंदी के सबसे “कसे हुए” दोहे माने जाते हैं। दो पंक्तियों में बिहारी इतना कह देते हैं कि पूरी कहानी, पूरा दृश्य और कई बार दो तीन अर्थ एक साथ खुल जाते हैं। इसीलिए उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने गागर में सागर भर दिया, और यह कहावत भी चल पड़ी:

सतसैया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।
देखन में छोटे लगैं, घाव करैं गंभीर॥

यानी सतसई के दोहे नावक (छोटा, तेज़ बाण) के तीर जैसे हैं: देखने में छोटे, पर असर गहरा।

इस पेज पर कक्षा 10 की हिंदी पुस्तक स्पर्श (भाग 2) के आठों दोहे मूल पाठ, कठिन शब्द, भावार्थ और अलंकार के साथ हैं, फिर परीक्षा वाले प्रश्न उत्तर, और अंत में नीति और भक्ति के 16 प्रसिद्ध दोहे सरल अर्थ सहित।

मुख्य बातें

  • कवि: बिहारी (बिहारीलाल), रीतिकाल के रीतिसिद्ध कवि; एक ही ग्रंथ लिखा: बिहारी सतसई।
  • कक्षा 10 के 8 दोहे: सोहत ओढ़ैं पीतु पटु, कहलाने एकत बसत, बतरस लालच लाल की, कहत नटत रीझत खिझत, बैठि रही अति सघन बन, कागद पर लिखत न बनत, प्रगट भए द्विजराज कुल, जपमाला छापैं तिलक।
  • भाषा: ब्रज भाषा; छंद: दोहा; मुख्य रस: श्रृंगार, साथ में भक्ति और नीति।
  • ख़ास पहचान: कम शब्दों में ज़्यादा अर्थ, श्लेष और यमक जैसे अलंकारों की चमक।
  • सबसे प्रसिद्ध नीति दोहे: कनक कनक तैं सौगुनी, बड़े न हूजै गुननु बिनु, नर की अरु नल नीर की।

विषय सूची

बिहारी का परिचय

बातजानकारी
जन्मलगभग 1595 ई. (संवत 1652), ग्वालियर के पास
बचपनबुंदेलखंड (ओरछा) में बीता; परंपरा के अनुसार यहीं केशवदास से काव्य की शिक्षा मिली
युवावस्थाससुराल मथुरा में रहे
आश्रयदाताआमेर (जयपुर) के मिर्ज़ा राजा जयसिंह
रचनाबिहारी सतसई: 700 से अधिक दोहे (जगन्नाथदास रत्नाकर के संस्करण में 713)
कालरीतिकाल; रीतिसिद्ध कवि (शास्त्र जानते थे पर लक्षण ग्रंथ नहीं लिखा)
देहांतलगभग 1663 से 1664 ई.
भाषामँजी हुई ब्रज भाषा, बुंदेली के कुछ शब्द

बिहारी के बारे में एक मशहूर किस्सा है। राजा जयसिंह अपनी नई रानी के मोह में राजकाज भूल गए थे। कोई उन्हें टोकने की हिम्मत नहीं कर रहा था। तब बिहारी ने एक दोहा लिखकर भिजवाया: “नहिं परागु नहिं मधुर मधु…” (अर्थ नीचे दिया है)। दोहा पढ़कर राजा की आँखें खुल गईं और वे फिर राजकाज में लग गए। कहते हैं कि इसके बाद राजा ने बिहारी को हर दोहे पर एक सोने की मोहर (अशर्फ़ी) देने का वचन दिया। यह कथा परंपरा से चली आती है, पर इससे पता चलता है कि बिहारी के दोहे कितने असरदार माने गए।

पुराने शीश महल में राधा कृष्ण का भित्ति चित्र
बिहारी का समय राजदरबारों और भित्ति चित्रों का समय था; उनके दोहे भी ऐसे ही बारीक चित्र हैं
Bihari ke dohe class 10: आठों दोहों का सार एक नज़र में
इन्फ़ोग्राफ़िक: बिहारी के 8 दोहे: एक नज़र में (Storyshala)

कक्षा 10 के 8 दोहे अर्थ सहित

दोहा 1: सोहत ओढ़ैं पीतु पटु

सोहत ओढ़ैं पीतु पटु स्याम, सलौनैं गात।
मनौ नीलमनि सैल पर आतपु परयौ प्रभात॥

कठिन शब्द: सोहत = शोभा देता है; ओढ़ैं = ओढ़े हुए; पीतु पटु = पीला वस्त्र; स्याम = साँवले; सलौनैं = सुंदर, सलोने; गात = शरीर; मनौ = मानो; नीलमनि = नीलम रत्न; सैल = पर्वत; आतपु = धूप; प्रभात = सुबह।

भावार्थ: साँवले सलोने शरीर वाले कृष्ण पीला वस्त्र ओढ़े हुए बहुत सुंदर लग रहे हैं। ऐसा लगता है मानो नीलम रत्न के पर्वत पर सुबह की सुनहरी धूप पड़ रही हो। साँवला शरीर नीलम का पर्वत है और पीला वस्त्र सुबह की धूप।

अलंकार: “मनौ नीलमनि सैल पर…” में उत्प्रेक्षा अलंकार (मनौ शब्द से कल्पना); “पीतु पटु”, “सलौनैं गात” में अनुप्रास।

दोहा 2: कहलाने एकत बसत

कहलाने एकत बसत अहि मयूर, मृग बाघ।
जगतु तपोबन सौ कियौ दीरघ दाघ निदाघ॥

कठिन शब्द: कहलाने = गर्मी से बेहाल होकर; एकत = एक साथ; अहि = साँप; मयूर = मोर; मृग = हिरन; तपोबन = तपस्वियों का वन, जहाँ कोई किसी से बैर नहीं रखता; दीरघ = बड़ा, लंबा; दाघ = गर्मी, जलन; निदाघ = ग्रीष्म ऋतु।

भावार्थ: जेठ की भयंकर गर्मी से बेहाल होकर साँप और मोर, हिरन और बाघ, जो एक दूसरे के जानी दुश्मन हैं, एक ही जगह साथ साथ बैठे हैं। गर्मी की इस लंबी तपन ने पूरे संसार को तपोवन जैसा बना दिया है, जहाँ कोई किसी से बैर नहीं करता।

अलंकार: “तपोबन सौ” में उपमा; “दीरघ दाघ निदाघ” में अनुप्रास।

दोहा 3: बतरस लालच लाल की

बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ।
सौंह करैं भौंहनु हँसै, दैन कहैं नटि जाइ॥

कठिन शब्द: बतरस = बातों का आनंद; लाल = कृष्ण; धरी लुकाइ = छिपाकर रख दी; सौंह = सौगंध, कसम; भौंहनु = भौंहों से; नटि जाइ = मना कर देती हैं।

भावार्थ: कृष्ण से बातें करने के आनंद के लालच में गोपियों ने उनकी मुरली छिपा दी। कृष्ण पूछते हैं तो गोपियाँ कसम खाती हैं कि हमने नहीं ली, पर भौंहों से हँस देती हैं, जिससे पता चल जाता है कि मुरली उन्हीं के पास है। जब कृष्ण कहते हैं कि दे दो, तो वे साफ़ मना कर देती हैं। इस तरह बातचीत लंबी चलती रहती है, और गोपियाँ यही चाहती थीं।

अलंकार: “लालच लाल की” में अनुप्रास; पूरे दोहे में चंचल हाव भाव का चित्रात्मक वर्णन।

दोहा 4: कहत नटत रीझत खिझत

कहत, नटत, रीझत, खिझत, मिलत, खिलत, लजियात।
भरे भौन मैं करत हैं नैननु हीं सब बात॥

कठिन शब्द: कहत = कहता है; नटत = मना करती है; रीझत = रीझ जाता है, खुश होता है; खिझत = खीझती है; मिलत = आँखें मिलती हैं; खिलत = खिल उठते हैं; लजियात = लजा जाते हैं; भौन = भवन, घर; नैननु = आँखों से।

भावार्थ: लोगों से भरे घर में नायक और नायिका आँखों ही आँखों में सारी बातें कर लेते हैं। नायक आँखों के इशारे से कुछ कहता है, नायिका मना कर देती है; नायक उसकी इस अदा पर रीझ जाता है, तो नायिका बनावटी गुस्सा (खीझ) दिखाती है। फिर दोनों की आँखें मिलती हैं, दोनों खिल उठते हैं और फिर लजा जाते हैं। एक शब्द बोले बिना पूरी बातचीत हो जाती है।

अलंकार: सात क्रियाओं की लगातार झड़ी में अनुप्रास; यह दोहा बिहारी की “गागर में सागर” कला का सबसे अच्छा उदाहरण माना जाता है।

दोहा 5: बैठि रही अति सघन बन

बैठि रही अति सघन बन, पैठि सदन तन माँह।
देखि दुपहरी जेठ की छाँहौं चाहति छाँह॥

कठिन शब्द: सघन = घना; बन = वन; पैठि = घुसकर; सदन = घर; तन माँह = शरीर के भीतर; जेठ = ज्येष्ठ महीना, सबसे गर्म; छाँहौं = छाया भी; चाहति = चाहती है।

भावार्थ: जेठ महीने की दोपहर इतनी तेज़ है कि छाया भी छाया ढूँढ रही है। वह या तो घने जंगलों में जाकर बैठ गई है, या घरों के भीतर घुस गई है। भरी दोपहर में सूरज सिर पर होता है, इसलिए छाया पैरों के नीचे सिमट जाती है; बिहारी ने इसी को बड़ी सुंदर कल्पना से कहा है।

अलंकार: “छाँहौं चाहति छाँह” में अनुप्रास; छाया को इंसान की तरह छाया ढूँढते दिखाना मानवीकरण है।

दोहा 6: कागद पर लिखत न बनत

कागद पर लिखत न बनत, कहत सँदेसु लजात।
कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात॥

कठिन शब्द: कागद = कागज़; लिखत न बनत = लिखा नहीं जाता; सँदेसु = संदेश; लजात = लाज आती है; कहिहै = कह देगा; हियौ = हृदय।

भावार्थ: विरह में डूबी नायिका अपने प्रियतम को संदेश भेजना चाहती है। कागज़ पर लिखने बैठती है तो भावों के उमड़ने से लिखा नहीं जाता, और किसी के हाथ ज़बानी संदेश भेजने में लाज आती है। इसलिए वह कहती है कि तुम्हारा अपना दिल ही तुम्हें मेरे दिल की बात बता देगा, क्योंकि सच्चे प्रेम में दोनों के दिल एक जैसे होते हैं।

अलंकार: “कहत सँदेसु” में अनुप्रास; “हियौ, हिय” में शब्द की सुंदर आवृत्ति।

दोहा 7: प्रगट भए द्विजराज कुल

प्रगट भए द्विजराज कुल, सुबस बसे ब्रज आइ।
मेरे हरौ कलेस सब, केसव केसवराइ॥

कठिन शब्द: प्रगट भए = जन्म लिया; द्विजराज = चंद्रमा (और ब्राह्मण भी); कुल = वंश; सुबस = अपनी इच्छा से; कलेस = क्लेश, दुःख; केसव = कृष्ण; केसवराइ = बिहारी के पिता का नाम भी केशवराय था।

भावार्थ: जिन्होंने चंद्रवंश में जन्म लिया और अपनी इच्छा से ब्रज में आकर बसे, वे केशव (श्रीकृष्ण) मेरे सारे दुःख दूर करें। बिहारी ने यहाँ “केसव केसवराइ” कहकर कृष्ण के साथ अपने पिता को भी याद कर लिया। दूसरा अर्थ यह भी निकलता है कि ब्राह्मण कुल में जन्मे और ब्रज में आकर बसे मेरे पिता केशवराय, आप मेरे दुःख दूर करें।

अलंकार: “द्विजराज” के दो अर्थ (चंद्रमा, ब्राह्मण) होने से श्लेष अलंकार; “केसव केसवराइ” में यमक और अनुप्रास।

दोहा 8: जपमाला छापैं तिलक

जपमाला, छापैं, तिलक सरै न एकौ कामु।
मन काँचै नाचै बृथा, साँचै राँचै रामु॥

कठिन शब्द: जपमाला = जप करने की माला; छापैं = शरीर पर चंदन से बनाए धार्मिक छापे; सरै न = पूरा नहीं होता; एकौ = एक भी; काँचै = कच्चा, अस्थिर; बृथा = व्यर्थ; साँचै = सच्चे मन से; राँचै = प्रसन्न होते हैं, रीझते हैं।

भावार्थ: माला फेरने, शरीर पर छापे लगाने और तिलक लगाने से एक भी काम नहीं बनता, ये सब दिखावा हैं। जिसका मन कच्चा है, वह व्यर्थ ही नाचता रहता है। राम तो केवल सच्चे मन से की गई भक्ति पर रीझते हैं।

अलंकार: “काँचै नाचै”, “साँचै राँचै” में अनुप्रास और तुक का सुंदर मेल। इस दोहे में बिहारी कबीर की तरह बाहरी आडंबर का विरोध करते हैं।

घने हरे पत्तों के बीच कमल की कली
जेठ की दुपहरी के दोहे में बिहारी कहते हैं कि छाया भी घने वन और ठंडी जगह ढूँढती है

महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न: “छाया भी कब छाया ढूँढने लगती है?” स्पष्ट कीजिए। उत्तर: जेठ महीने की भरी दोपहर में, जब गर्मी सबसे तेज़ होती है। उस समय सूरज ठीक सिर के ऊपर होता है, इसलिए छाया बहुत छोटी होकर पैरों के नीचे सिमट जाती है। बिहारी कल्पना करते हैं कि छाया भी गर्मी से घबराकर घने जंगलों और घरों के भीतर जाकर छिप गई है।

प्रश्न: बिहारी की नायिका यह क्यों कहती है “कहिहै सबु तेरौ हियौ, मेरे हिय की बात”? उत्तर: नायिका प्रियतम को संदेश भेजना चाहती है, पर कागज़ पर भावों के उमड़ने से लिखा नहीं जाता और ज़बानी संदेश भेजने में लाज आती है। उसे विश्वास है कि सच्चा प्रेम है तो प्रियतम का अपना हृदय ही उसके मन की बात समझ लेगा।

प्रश्न: सच्चे मन में राम बसते हैं, दोहे के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। उत्तर: बिहारी कहते हैं कि माला जपने, छापे और तिलक लगाने जैसे बाहरी दिखावे से भक्ति पूरी नहीं होती। कच्चे मन वाला व्यक्ति व्यर्थ नाचता है। भगवान राम केवल सच्चे और स्थिर मन की भक्ति से प्रसन्न होते हैं।

प्रश्न: गोपियाँ श्रीकृष्ण की बाँसुरी क्यों छिपा लेती हैं? उत्तर: गोपियाँ कृष्ण से ज़्यादा से ज़्यादा बातें करना चाहती हैं। मुरली छिपाने से कृष्ण बार बार उसे माँगेंगे, और इसी बहाने बातचीत चलती रहेगी। इसीलिए वे कसम खाती हैं, भौंहों से हँसती हैं और देने से मना कर देती हैं।

प्रश्न: बिहारी कवि ने सभी की उपस्थिति में भी कैसे बात की जा सकती है, इसका वर्णन किस प्रकार किया है? उत्तर: भरे घर में नायक और नायिका आँखों के इशारों से बात करते हैं। नायक कुछ कहता है, नायिका मना करती है, नायक रीझता है, नायिका खीझती है, फिर दोनों की आँखें मिलती हैं, वे खिल उठते हैं और लजा जाते हैं। इस तरह बिना बोले सारी बात हो जाती है।

प्रश्न: “जगतु तपोबन सौ कियौ” का भाव स्पष्ट कीजिए। उत्तर: तपोवन में तपस्वियों के प्रभाव से सब जीव बैर भूलकर साथ रहते हैं। जेठ की गर्मी ने भी यही कर दिया: साँप और मोर, हिरन और बाघ जैसे दुश्मन गर्मी से बेहाल होकर एक ही छाँव में साथ बैठे हैं, और किसी को एक दूसरे पर हमला करने की सुध नहीं।

प्रश्न: “सोहत ओढ़ैं पीतु पटु” दोहे का काव्य सौंदर्य लिखिए। उत्तर: इसमें साँवले कृष्ण के शरीर पर पीले वस्त्र की शोभा का वर्णन है। कवि ने कल्पना की है कि मानो नीलम के पर्वत पर सुबह की धूप पड़ी हो, इसलिए उत्प्रेक्षा अलंकार है। रंगों का यह मेल (नीला और सुनहरा) दोहे को चित्र जैसा बना देता है। भाषा ब्रज है और छंद दोहा।

प्रश्न: “प्रगट भए द्विजराज कुल” दोहे में कौन सा अलंकार है और क्यों? उत्तर: “द्विजराज” शब्द के दो अर्थ हैं: चंद्रमा और ब्राह्मण, इसलिए श्लेष अलंकार है। “केसव केसवराइ” में एक ही शब्द दो अलग अर्थों (कृष्ण और बिहारी के पिता) में आया है, इसलिए यमक भी है।

ये दोहे स्पर्श (भाग 2) में बरसों से पढ़ाए जा रहे हैं; परीक्षा से पहले अपनी चालू किताब और बोर्ड का पाठ्यक्रम एक बार ज़रूर मिला लें।

बिहारी के 16 प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित (नीति और भक्ति)

बिहारी सतसई में सबसे ज़्यादा दोहे श्रृंगार रस के हैं, पर उसके नीति और भक्ति वाले दोहे आज भी कहावतों की तरह बोले जाते हैं। नीचे वे दोहे हैं जो स्कूल, भाषण और रोज़ की बातचीत में सबसे ज़्यादा काम आते हैं।

1. मेरी भव बाधा हरौ (सतसई का मंगलाचरण)

मेरी भव बाधा हरौ, राधा नागरि सोइ।
जा तन की झाँई परैं, स्यामु हरित दुति होइ॥

भावार्थ: हे चतुर राधा, मेरे संसार के दुःख दूर करो। तुम वही राधा हो जिनके शरीर की झलक पड़ते ही साँवले कृष्ण भी हरे (प्रसन्न) हो जाते हैं। इस दोहे के कई अर्थ बताए जाते हैं: एक अर्थ में राधा के गोरे रंग की परछाईं पड़ने से श्याम का रंग हरा दिखता है (पीला और नीला मिलकर हरा), दूसरे में कृष्ण का मन खिल उठता है, और तीसरे में साँवला (पापी) मन भी पवित्र हो जाता है। यह बिहारी सतसई का पहला दोहा माना जाता है।

2. या अनुरागी चित्त की

या अनुरागी चित्त की, गति समुझै नहिं कोइ।
ज्यौं ज्यौं बूड़ै स्याम रँग, त्यौं त्यौं उज्जलु होइ॥

भावार्थ: प्रेम में डूबे इस मन की चाल कोई नहीं समझ सकता। काले रंग में डूबने से कोई चीज़ और काली होती है, पर यह मन जितना श्याम (कृष्ण) के रंग में डूबता है, उतना ही उजला होता जाता है। यहाँ “स्याम” के दो अर्थ (काला रंग और कृष्ण) होने से श्लेष है, और काले में डूबकर उजला होने में विरोधाभास अलंकार।

3. कनक कनक तैं सौगुनी

कनक कनक तैं सौगुनी, मादकता अधिकाइ।
उहिं खाऐं बौराइ जगु, इहिं पाऐं हीं बौराइ॥

भावार्थ: सोने (कनक) में धतूरे (कनक) से सौ गुना ज़्यादा नशा है। धतूरा खाने पर आदमी पागल होता है, पर सोना तो पाने भर से आदमी बौरा जाता है। यह यमक अलंकार का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, क्योंकि “कनक” दो बार दो अलग अर्थों में आया है।

सीख: धन का नशा किसी भी नशे से ख़तरनाक है; पैसा आते ही विनम्रता न छोड़ें।

हरी पत्तियों के बीच खिला धतूरे का सफ़ेद फूल
धतूरे को भी ‘कनक’ कहते हैं; बिहारी ने इसी से सोने और धतूरे की तुलना की

4. बड़े न हूजै गुननु बिनु

बड़े न हूजै गुननु बिनु, बिरद बड़ाई पाइ।
कहत धतूरे सौं कनक, गहनौ गढ्यौ न जाइ॥

भावार्थ: बिना गुणों के केवल बड़ा नाम या उपाधि पा लेने से कोई बड़ा नहीं बनता। धतूरे को भी “कनक” कहते हैं, पर उससे गहना नहीं गढ़ा जा सकता। गहना तो असली सोने से ही बनता है।

सीख: पद और नाम से नहीं, गुण और काम से इज़्ज़त मिलती है।

5. नर की अरु नल नीर की

नर की अरु नल नीर की, गति एकै करि जोइ।
जेतो नीचो ह्वै चलै, तेतो ऊँचो होइ॥

भावार्थ: मनुष्य और नल (फ़व्वारे) के पानी की चाल एक जैसी है। नल का पानी जितना नीचे से दबकर चलता है, उतना ही ऊँचा उछलता है। वैसे ही जो मनुष्य जितना विनम्र होकर (झुककर) चलता है, वह उतना ही ऊँचा उठता है।

सीख: विनम्रता ही ऊँचाई की सीढ़ी है।

6. नहिं परागु नहिं मधुर मधु

नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं बिकासु इहिं काल।
अली कली ही सौं बंध्यौ, आगैं कौन हवाल॥

भावार्थ: अभी न इस कली में पराग आया है, न मीठा रस, न यह खिली है। हे भौंरे, तुम अभी से इस कली में बँधकर सब भूल गए हो, तो जब यह फूल बनेगी तब तुम्हारा क्या हाल होगा। यही दोहा बिहारी ने राजा जयसिंह को भेजा था, जो नई रानी के मोह में राजकाज भूल गए थे। इसमें भौंरे और कली के बहाने राजा को बात कही गई है, इसलिए यह अन्योक्ति अलंकार है।

7. तंत्री नाद कबित्त रस

तंत्री नाद, कबित्त रस, सरस राग, रति रंग।
अनबूड़े बूड़े, तरे जे बूड़े सब अंग॥

भावार्थ: वीणा के स्वर, कविता के रस, मधुर राग और प्रेम के रंग में जो पूरी तरह नहीं डूबे, वे डूब गए (उनका जीवन व्यर्थ गया), और जो सिर से पैर तक डूब गए, वे तर गए (पार हो गए)। यहाँ “डूबना” और “तरना” का उल्टा प्रयोग विरोधाभास है।

सीख: संगीत, कविता और प्रेम आधे मन से नहीं, पूरे डूबकर किए जाते हैं।

8. जगतु जनायौ जिहिं सकलु

जगतु जनायौ जिहिं सकलु, सो हरि जान्यौ नाँहि।
ज्यौं आँखिनु सबु देखियै, आँखि न देखी जाँहि॥

भावार्थ: जिस ईश्वर ने पूरा संसार हमें दिखाया और समझाया, उसी को हमने नहीं जाना। ठीक वैसे ही जैसे आँखों से हम सब कुछ देखते हैं, पर आँख ख़ुद अपने को नहीं देख पाती।

9. मोहन मूरति स्याम की

मोहन मूरति स्याम की, अति अद्भुत गति जोइ।
बसतु सु चित अंतर तऊ, प्रतिबिंबितु जग होइ॥

भावार्थ: श्याम की मनमोहक मूर्ति की चाल बड़ी अद्भुत है। वह रहती तो मन के भीतर है, फिर भी उसका प्रतिबिंब पूरे संसार में दिखता है। आम तौर पर चीज़ बाहर होती है और उसका प्रतिबिंब भीतर; यहाँ उल्टा है, इसलिए यह विरोधाभास का सुंदर उदाहरण है।

10. कोऊ कोटिक संग्रहौ

कोऊ कोटिक संग्रहौ, कोऊ लाख हजार।
मो संपति जदुपति सदा, बिपति बिदारनहार॥

भावार्थ: कोई करोड़ों जमा करे, कोई लाखों हज़ारों। मेरी संपत्ति तो यदुपति कृष्ण हैं, जो हमेशा विपत्ति को काट देने वाले हैं।

11. दीरघ साँस न लेहि दुख

दीरघ साँस न लेहि दुख, सुख साईंहिं न भूलि।
दई दई क्यों करतु है, दई दई सु कबूलि॥

भावार्थ: दुःख में लंबी लंबी आहें मत भर, और सुख में मालिक (ईश्वर) को मत भूल। “हे दई, हे दई” (हे भगवान) क्यों पुकारता है? जो दई (भगवान) ने दिया है, उसे स्वीकार कर ले। यहाँ “दई” के दो अर्थ (भगवान और दिया हुआ) होने से यमक अलंकार है।

सीख: दुःख में धीरज और सुख में कृतज्ञता, दोनों साथ रखें।

12. अति अगाधु अति औथरौ

अति अगाधु अति औथरौ, नदी कूप सरु बाइ।
सो ताकौ सागरु जहाँ, जाकी प्यास बुझाइ॥

भावार्थ: कोई जलाशय बहुत गहरा हो या बहुत उथला, नदी हो, कुआँ, तालाब या बावड़ी; जिसकी प्यास जहाँ बुझ जाए, उसके लिए वही समुद्र है।

सीख: बड़ा वह नहीं जो सबसे बड़ा दिखे, बड़ा वह है जो समय पर काम आए।

13. को छूट्यौ इहिं जाल परि

को छूट्यौ इहिं जाल परि, कत कुरंग अकुलात।
ज्यौं ज्यौं सुरझि भज्यौ चहत, त्यौं त्यौं उरझत जात॥

भावार्थ: हे हिरन, इस जाल में फँसकर कौन छूट पाया है, तू क्यों बेचैन होता है? तू जितना सुलझकर भागना चाहता है, उतना ही उलझता जाता है। हिरन के बहाने कवि मनुष्य से कह रहे हैं कि संसार के मोह के जाल में छटपटाने से और फँसते हैं; भगवान की शरण ही रास्ता है।

14. कब कौ टेरतु दीन रट

कब कौ टेरतु दीन रट, होत न स्याम सहाइ।
तुमहूँ लागी जगत गुरु, जग नाइक, जग बाइ॥

भावार्थ: हे श्याम, मैं कब से दीन होकर पुकार रहा हूँ, पर आप मेरी सहायता नहीं करते। लगता है, हे जगत के गुरु और जगत के स्वामी, आपको भी इस संसार की हवा लग गई है (आप भी दुनिया वालों की तरह बेपरवाह हो गए हैं)। यह भक्त का प्यार भरा उलाहना है।

15. जम करि मुँह तरहरि परयौ

जम करि मुँह तरहरि परयौ, इहिं धरहरि चित लाउ।
विषय तृषा परिहरि अजौं, नरहरि के गुन गाउ॥

भावार्थ: तू यमराज रूपी हाथी के मुँह के नीचे पड़ा है, यह बात पक्के तौर पर मन में बैठा ले। अब भी विषयों की प्यास छोड़ और नरहरि (भगवान) के गुण गा।

16. तजि तीरथ हरि राधिका

तजि तीरथ, हरि राधिका तन दुति करि अनुरागु।
जिहिं ब्रज केलि निकुंज मग, पग पग होत प्रयागु॥

भावार्थ: तीर्थों में भटकना छोड़कर हरि और राधा के रूप की कांति से प्रेम कर। ब्रज की उन कुंज गलियों में, जहाँ वे लीला करते हैं, हर कदम पर प्रयाग है। राधा का गोरा रंग गंगा, कृष्ण का साँवला रंग यमुना, और उस शोभा की लाली सरस्वती मानी गई है; इसलिए जहाँ दोनों साथ हैं, वहीं त्रिवेणी (प्रयाग) है।

बिहारी की काव्य विशेषताएँ

  • गागर में सागर: दो पंक्तियों में पूरा दृश्य, पूरा भाव; “कहत नटत रीझत खिझत” इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
  • अलंकारों की चमक: यमक (कनक कनक), श्लेष (द्विजराज), उत्प्रेक्षा (नीलमनि सैल), विरोधाभास (ज्यौं ज्यौं बूड़ै स्याम रँग), अन्योक्ति (नहिं परागु)।
  • चित्रात्मकता: रंग, हाव भाव और मौसम का ऐसा वर्णन कि पढ़ते ही चित्र बन जाए।
  • तीन रंग: श्रृंगार (प्रेम), भक्ति (राधा कृष्ण) और नीति (जीवन की सीख), तीनों एक ही ग्रंथ में।
  • ब्रज भाषा का मँजा रूप: छोटे, कसे हुए शब्द, जिनमें एक भी फ़ालतू नहीं।
  • प्रकृति वर्णन: जेठ की गर्मी, सुबह की धूप, सावन; मौसम भी भाव के साथ बोलता है।

बिहारी, रहीम और कबीर के दोहे: अंतर

बातबिहारीरहीमकबीर
कालरीतिकालभक्तिकालभक्तिकाल
मुख्य विषयश्रृंगार, भक्ति, नीतिनीति और व्यवहारज्ञान, भक्ति, समाज सुधार
भाषामँजी हुई ब्रजब्रज और अवधीसधुक्कड़ी
ख़ास गुणअलंकार और कम शब्दों में ज़्यादा अर्थसीधी सीख, जीवन के उदाहरणनिडर, सीधी चोट
प्रसिद्ध दोहाकनक कनक तैं सौगुनीरहिमन धागा प्रेम काबुरा जो देखन मैं चला

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बिहारी की प्रमुख रचना कौन सी है?

बिहारी ने एक ही ग्रंथ लिखा: बिहारी सतसई। इसमें 700 से अधिक दोहे हैं; जगन्नाथदास रत्नाकर के प्रसिद्ध संस्करण में 713 दोहे हैं। इसी एक ग्रंथ ने उन्हें हिंदी के सबसे बड़े कवियों में जगह दिलाई।

कक्षा 10 में बिहारी के कितने दोहे हैं?

स्पर्श (भाग 2) के पाठ “दोहे” में बिहारी के 8 दोहे हैं: सोहत ओढ़ैं पीतु पटु, कहलाने एकत बसत, बतरस लालच लाल की, कहत नटत रीझत खिझत, बैठि रही अति सघन बन, कागद पर लिखत न बनत, प्रगट भए द्विजराज कुल, और जपमाला छापैं तिलक।

बिहारी किस काल के कवि हैं?

बिहारी रीतिकाल के कवि हैं। उन्हें रीतिसिद्ध कवि कहा जाता है, क्योंकि वे काव्यशास्त्र के पूरे जानकार थे, पर उन्होंने लक्षण ग्रंथ (नियमों की किताब) नहीं लिखा, केवल उन नियमों पर खरे उतरने वाले दोहे लिखे।

बिहारी के आश्रयदाता कौन थे?

आमेर (जयपुर) के मिर्ज़ा राजा जयसिंह। परंपरा कहती है कि “नहिं परागु नहिं मधुर मधु” दोहा पढ़कर ही राजा का ध्यान नई रानी के मोह से हटकर फिर राजकाज पर गया।

“कनक कनक तैं सौगुनी” में कौन सा अलंकार है?

यमक अलंकार। “कनक” शब्द दो बार आया है और दोनों बार अर्थ अलग है: एक बार सोना, एक बार धतूरा।

बिहारी को “गागर में सागर” भरने वाला कवि क्यों कहते हैं?

क्योंकि वे दोहे जैसे छोटे छंद (दो पंक्तियाँ) में बहुत बड़ा भाव, पूरा दृश्य और कई बार दो तीन अर्थ एक साथ भर देते हैं। जैसे गागर (छोटी मटकी) में सागर भर देना।

“सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर” किसने कहा?

यह दोहा बिहारी का नहीं, बिहारी की प्रशंसा में कहा गया एक पुराना दोहा है, जो कहावत बन गया। इसका अर्थ है कि सतसई के दोहे देखने में छोटे हैं, पर तीर की तरह गहरा असर करते हैं।

बिहारी के दोहों की भाषा कौन सी है?

ब्रज भाषा। बिहारी की ब्रज भाषा बहुत मँजी हुई और कसी हुई है, जिसमें कहीं कहीं बुंदेली के शब्द भी मिलते हैं।

बिहारी के गुरु कौन थे?

परंपरा के अनुसार बचपन में ओरछा में उन्हें प्रसिद्ध कवि केशवदास से काव्य की शिक्षा मिली, और कुछ विद्वान स्वामी नरहरिदास को उनका गुरु बताते हैं। इस बारे में पक्के प्रमाण कम हैं।

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