
Vidur Niti Saar Sampoorn in Hindi: महाभारत को पाँचवाँ वेद कहा जाता है, और उसमें समाई श्रीमद्भगवद्गीता और विदुर नीति उसके दो आधार स्तंभ हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अधर्म के विरुद्ध अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं, तो विदुर नीति में महात्मा विदुर युद्ध टालने के लिए धृतराष्ट्र को अधर्म का साथ छोड़ने का उपदेश देते हैं। श्रीकृष्ण अपने उद्देश्य में सफल होते हैं, पर विदुर के उपदेश धृतराष्ट्र का मन नहीं बदल पाते, और परिणाम महाभारत के युद्ध के रूप में सामने आता है। फिर भी विदुर की नीति को विफल नहीं कहा जा सकता: उनका हर उपदेश अनुभव से निकला है और समय की कसौटी पर खरा उतरा है।
इस लेख में विदुर नीति के 140 से ज़्यादा अनमोल वचन एक ही जगह, विषय के अनुसार दिए गए हैं: ज्ञानी और मूर्ख के लक्षण, कर्म और सफलता, धन और दान, मित्रता, वाणी और क्रोध, धर्म और राजनीति।
विषय सूची
महात्मा विदुर कौन थे?
विदुर महाभारत के सबसे बुद्धिमान और धर्मनिष्ठ पात्रों में से एक थे। वे महर्षि वेदव्यास और रानी अंबिका की एक दासी के पुत्र थे, यानी धृतराष्ट्र और पांडु के भाई। मान्यता है कि वे धर्मराज (यमराज) के अवतार थे। विदुर हस्तिनापुर के महामंत्री थे और हमेशा धर्म और न्याय की बात कहते थे, चाहे वह राजा को अच्छी लगे या नहीं। उन्होंने द्रौपदी के अपमान का भी खुलकर विरोध किया था।
विदुर नीति क्या है और कब कही गई?
विदुर नीति महाभारत के उद्योग पर्व (प्रजागर पर्व, अध्याय 33 से 40) में है। जब संजय पांडवों के पास से संदेश लेकर लौटे, तो युद्ध की आशंका से धृतराष्ट्र को रात भर नींद नहीं आई। बेचैन धृतराष्ट्र ने विदुर को बुलाया, और विदुर ने पूरी रात उन्हें धर्म, नीति, राजकाज और जीवन के बारे में जो उपदेश दिए, वही विदुर नीति कहलाते हैं।
विदुर नीति की 10 सबसे काम की बातें
- उन्नति चाहने वाले को छह दोष छोड़ देने चाहिए: ज़्यादा नींद, ऊँघना, डर, क्रोध, आलस्य और काम टालने की आदत।
- सोना आग में तपकर, सज्जन सदाचार से, और मित्र व शत्रु संकट के समय पहचाने जाते हैं।
- धर्म का सार यही है: जो बात आपको अपने लिए बुरी लगे, वह दूसरों के साथ मत कीजिए।
- क्रोध को प्रेम से, दुष्ट को अच्छे व्यवहार से, कंजूस को दान से और झूठ को सच से जीतिए।
- काम, क्रोध और लोभ आत्मा के नाश के तीन द्वार हैं।
- शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है और इंद्रियाँ घोड़े हैं: जो इन्हें वश में रखता है, वही सुख से यात्रा करता है।
- उत्तम व्यक्ति काम उत्साह से शुरू करता है और पूरा करके छोड़ता है।
- जैसी संगति, वैसा रंग: कपड़े पर जो रंग चढ़ाओ, वही चढ़ता है।
- अन्याय से कमाया धन ज़्यादा दिन नहीं टिकता, न्याय से कमाया धन पीढ़ियों तक चलता है।
- हर दिन ऐसा काम करो कि रात चैन से कटे, और जवानी में ऐसा कि बुढ़ापा सुख से बीते।
एक ज़रूरी बात: विदुर नीति लगभग पाँच हज़ार साल पुराने महाभारत का हिस्सा है। इसके कुछ वचन, जैसे स्त्रियों या वर्णों के बारे में, उस समय के समाज की सोच दिखाते हैं, उन्हें उसी संदर्भ में पढ़िए। पर ज़्यादातर बातें, जैसे मेहनत, संगति, क्रोध, धन और धर्म पर विदुर के उपदेश, आज भी उतनी ही काम की हैं।
ज्ञानी (पंडित) के लक्षण
यह ज़रूरी नहीं कि मूर्ख व्यक्ति दरिद्र हो और बुद्धिमान धनवान। अर्थात् बुद्धि का अमीरी या गरीबी से कोई सम्बंध नहीं है। जो ज्ञानी पुरुष लोक-परलोक की बारीकियों को समझते हैं; वे ही इस मर्म को समझ पाते हैं।
विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव ये चेष्टा करते हैं कि वे यथाशक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।
जो अपनी योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।
जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्डंता इत्यादि दुर्गुणों की ओर आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।
दूसरे लोग जिसके कार्य, व्यवहार, गोपनीयता, सलाह और विचार को कार्य पूरा हो जाने के बाद ही जान पाते हैं, वही व्यक्ति ज्ञानी कहलाता है।
ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं। किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते हैं, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते।
जो व्यक्ति किसी भी कार्य-व्यवहार को निश्चयपूर्वक आरंभ करता है, उसे बीच में नहीं रोकता, समय को बरबाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है।
जो व्यक्ति न तो सम्मान पाकर अहंकार करता है और न अपमान से पीडि़त होता है। जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभरहित और शांत रहता है, वही ज्ञानी है।
जो व्यक्ति बोलने की कला में निपुण हो, जिसकी वाणी लोगों को आकर्षित करे, जो किसी भी ग्रंथ की मूल बातों को शीघ्र ग्रहण करके बता सकता हो, जो तर्क-वितर्क में निपुण हो, वही ज्ञानी है।
जो लोग ज़रूरत के मुताबिक काम करते हैं, लोभ में पड़कर अधिक के पीछे नहीं भागते, वे मेरी दृष्टि में ज्ञानी हैं, क्योंकि अधिक के पीछे भागने से संघर्ष पैदा होते हैं।
पंडित वही कहलाता है, जिसे वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो, उद्योग करने की क्षमता हो और धर्म में स्थित रहकर दुःख सहने की अपार शक्ति हो तथा जो पुरुषार्थ से मुंह न चुराने की प्रकृति वाला हो।
जो अच्छे कर्मों को सेवन करता है, बुराइयों से दूर रहता है, श्रद्धा भाव और आस्तिक होकर क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्यण्डता और अपने को पूज्य समझना, आदि भावों से पुरुषार्थ को भ्रष्ट नहीं होने देता, वही पंडित कहलाता है।
बहुत अधिक धन, विद्या, ऐश्वर्य आदि को पाकर भी जो इठलाता नहीं वह तो पंडित होता है। परन्तु स्वयं समर्थ होते हुए भी जो असमर्थ लोगों का ध्यान न रखते हुए, उन्हें बांटे बिना ही उत्तम भोजन करता है और उत्तम वस्त्र पहनता है, वह सबसे बड़ा क्रूर होता है।
एक बुद्धि ही तो होती है, जिससे व्यक्ति करने योग्य और न करने योग्य कामों का निश्चय करता है तथा साम, दान, दण्ड, भेद चार नीतियों से अपने शत्रु, मित्र अथवा उदासीन को वश में करता है।
जो न स्वयं किसी से जीता गया हो, जिसने किसी को जीतने की इच्छा भी न की हो, न किसी से उसका बैर हो और न कभी दूसरे को चोट पहुंचाने का प्रयास किया हो, निन्दा और प्रशंसा में जो समान भाव से आचरण करता हो, ऐसा व्यक्ति हर्ष और शोक से परे हो जाता है।
मूर्ख और अधम व्यक्ति के लक्षण
जो व्यक्ति अपने हितैषियों को त्याग देता है तथा अपने शत्रुओं को गले लगाता है और जो अपने से शक्तिशाली लोगों से शत्रुता रखता है, उसे महामूर्ख कहते हैं।
अच्छाई में बुराई देखनेवाला, उपहास उड़ाने वाला, कड़वा बोलने वाला, अत्याचारी, अन्यायी तथा कुटिल पुरुष पाप कर्मों में लिप्त रहता है और शीघ्र ही मुसीबतों से घिर जाता है।
जिस व्यक्ति को अपने आप पर भरोसा नहीं होता, वह दूसरों का भी भरोसा नहीं करता, इसलिए कोई भी उसका मित्र नहीं होता। ऐसा व्यक्ति अधम पुरुष कहलाता है।
बुरे लोगों की रुचि दूसरों के गुणों से ज़्यादा उनके दुर्गुणों के बारे में जानने में होती है।
जो व्यक्ति किसी कारण किसी काम को किए धर्म और अर्थ के विरुद्ध हो जाता है, न पाने योग्य वस्तु की कामना रखता है, उसे मूढ़ बुद्धि कहा जाता है।
उपदेश न देने योग्य व्यक्ति को जो उपदेश देता है, शून्य की उपासना करता है और अस्त्र का सहारा लेता है, उसे मूढ़ चित्त वाला व्यक्ति कहते हैं।
जो व्यक्ति किसी की सुनता नहीं, उससे कही हुई बात उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार समुद्र में गिरी हुई वस्तु।

कर्म, परिश्रम और सफलता
किसी भी कार्य को प्रारंभ करने से पहले यह आत्ममंथन करना चाहिए कि हम उसके लिये या वह हमारे लिये उपयुक्त है कि नहीं। अपनी शक्ति से अधिक का कार्य और कोई वस्तु पाने की कामना करना स्वयं के लिये ही कष्टदायी होता है।
न केवल अपनी शक्ति का, बल्कि अपने स्वभाव का भी अवलोकन करना चाहिए। अनेक लोग क्रोध करने पर स्वतः ही काँपने लगते हैं तो अनेक लोग निराश होने पर मानसिक संताप का शिकार होते हैं। अतः इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे जिस मानसिक भाव का बोझ हमारी यह देह नहीं उठा पाती उसे अपने मन में ही न आने दें। कहने का तात्पर्य यह है कि जब हम कोई काम या कामना करते हैं तो उस समय हमें अपनी आर्थिक, मानसिक और सामाजिक स्थिति का भी अवलोकन करना चाहिए।
कभी-कभी गुस्से या प्रसन्नता के कारण हमारा रक्त प्रवाह तीव्र हो जाता है और हम अपने मूल स्वभाव के विपरीत कोई कार्य करने के लिए तैयार हो जाते हैं और जिसका हमें बाद में दुख भी होता है। इसलिए विशेष अवसरों पर आत्ममुग्ध होने की बजाय आत्मचिंतन करते हुए कार्य करना चाहिए।
संसार में उन्नति के अभिलाषी व्यक्तियों को नींद, ऊँघ, भय, क्रोध, आलस्य तथा देर से काम करने की आदत, इन छह दुर्गुणों को सदा के लिए त्याग देना चाहिए।
प्रत्येक कार्य बहुत सोच-विचार करके और उद्देश्य निश्चित करके करना चाहिए। जल्दबाजी में कोई भी कार्य आरंभ नहीं करना चाहिए।
मनुष्य को चाहिए कि पहले कार्य का उद्देश्य तय करे, उसके परिणाम का आकलन करे, उससे अपनी उन्नति का विचार करे फिर उसे आरंभ करे।
काम को करने से पहले विचार करें कि उसे करने से क्या लाभ होगा तथा न करने से क्या हानि होगी? कार्य के परिणाम के बारे में विचार करके कार्य करें या न करें। लेकिन बिना विचारे कोई कार्य न करें।
हर दिन ऐसा कार्य करें कि हर रात सुख से कटे। बचपन में ऐसे कार्य करें कि वृद्धावस्था सुख से कटे और जीवन भर ऐसे कार्य करें कि मरने के बाद भी सुख मिले।
जो काम करके अंत काल में अकेले बैठकर पछताना पड़े, उसे शुरू ही नहीं होने देना चाहिए।
जो व्यक्ति बात के मर्म को समझकर उसी के अनुसार कार्य करता है, संसार में उसकी कीर्ति अक्षुण्ण रहती है।
वह ज्ञान बेकार है जिससे कर्तव्य का बोध न हो; और वह कर्तव्य भी बेकार है जिसकी कोई सार्थकता न हो।
अपने काम में लगे रहनेवाला व्यक्ति सदा सुखी रहता है। धन-संपत्ति से उसका घर भरा-पूरा रहता है। ऐसा व्यक्ति यश-मान-सम्मान पाता है।
विदुर कहते हैं, जो पुरुष यथाशक्ति अपने कार्य में लगा रहता है, जो कर्म का फल ईश्वर के ऊपर छोड़ देता है, जिसके कार्य की संतजन भी प्रशंसा करते हैं, उस पुरुष की कीर्ति-पताका चारों कोनों में फहराती है।
कार्य सिद्धि की दृष्टि से मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं, उत्तम, मध्यम, और अधम। जो कार्य को श्रम के डर से पूरा ही नहीं करते या प्रारम्भ ही नहीं करते, वे आलसी अधम कहलाते हैं। जो उत्साह में कार्य तो प्रारम्भ कर देते हैं, लेकिन श्रम के भय से अथवा फल की आशंका से कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं अथवा शिथिलतापूर्वक करते रहते हैं, वे मध्यम श्रेणी के और जो पुरुष उत्साहपूर्वक कार्य प्रारम्भ करते हैं और पूरी शक्ति से उसे सम्पन्न करते हैं, वे उत्तम पुरुष कहलाते हैं।
वास्तव में व्यक्ति के लिए यही करणीय है कि वह बांट कर खाए, काम अधिक करे, सोए कम, मांगने पर अमित्र को भी दान देने में न हिचके, ऐसा व्यक्ति अनर्थ से सदा दूर ही रहता है। जो व्यक्ति अपने कर्म गुप्त रखता है चाहे हितकारी हो या अहितकारी, वह अपनी चतुरता के कारण सफल होता है।
व्यक्ति वही धुरंधर होता है जो समय आने पर या आपत्ति पड़ने पर दुःखी नहीं होता, बल्कि साहस से उद्योग करता हुआ सावधानीपूर्वक अपना समय गुजारता है। समय पर दुःख सहने से तो व्यक्ति के शत्रु भी पराजित हो जाते हैं।
जो व्यक्ति कष्ट नहीं सह पाता, वह कमजोर होता है, उसे दूसरे पर आश्रित रहना पड़ता है और अपमानित भी होना पड़ता है।
अच्छे उपाय का उपयोग करके सावधानी से किया गया कोई कर्म यदि सफल न हो तो बुद्धिमान पुरुष को उसके लिए मन में ग्लानि नहीं करनी चाहिए। हां, यह अवश्य है कि किसी प्रयोजन से किए गए कर्म में पहले से प्रयोजन को समझ लेना चाहिए। तब पूरी तरह सोच विचार कर काम करना चाहिए। जल्दबाजी से लिए गए निर्णय से सदैव असफलता का संदेह बना रहता है। इसलिए किसी काम को करने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए।
यदि पेड़ से कच्चा फल तोड़ लिया जाए तो न केवल तोड़ने वाला रस प्राप्त नहीं करता बल्कि वृक्ष का बीज भी नष्ट हो जाता है समय पर पके हुए फल को ग्रहण करने से रस भी मिलता है साथ ही बीज भी।
जो वृद्धि भविष्य में नाश का कारण बने, उसे अधिक महत्व नहीं देना चाहिए और जिससे आगे चलकर अभ्युदय हो, ऐसे क्षय का भी आदर करना चाहिए।
बड़े बड़े कुशल विद्वानों के द्वारा दिया गया ज्ञान का उपदेश भी व्यर्थ हो जाता है यदि उससे ज्ञान की प्राप्ति न हो या ज्ञान होने पर भी उन ज्ञान का उपयोग समय पर न किया जाए।
जो पुरुष आगे आने वाले दुखों को समय रहते रोक सकता है, वर्तमान काल में अपने सभी कर्त्तव्यों का दृढ़ता से पालन करता है तथा भविष्य में उसे जो कार्य करने हैं, उनके लिए पहले से ही सचेत रहता है, ऐसा पुरुष कभी भी अर्थ से खाली नहीं होता। शुद्ध मन, वचन, कर्म से किए गए कार्य सदा ही कल्याणकारी होते हैं।
परिश्रम, संयम, धैर्य, सावधानी, स्मृति और सोच विचार कर कार्य शुरू करना, ये ही उन्नति के साधन होते हैं।
जो व्यक्ति बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्था में अपने से बड़े तथा श्रेष्ठ पुरुष में कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में प्रश्न करता है, वह कभी भी मोहमाया में नहीं पड़ता।
धन, लोभ और दान
अल्पमात्र में धन होते हुए भी कीमती वस्तु को पाने की कामना और शक्तिहीन होते हुए भी क्रोध करना मनुष्य की देह के लिये कष्टदायक और काँटों के समान है।
जो व्यक्ति अमीर होने पर भी दानशील न हो और गरीब होने पर जिसमें कष्ट सहने की शक्ति न हो, इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों को गले में पत्थर बाँधकर पानी में डुबो देना चाहिए। अर्थात् इनका जीवन व्यर्थ है।
निर्धन लोग सदैव स्वादिष्ट भोजन करते हैं, क्योंकि उनकी भूख हर तरह के भोजन को स्वादिष्ट बना देती है। वहीं धनवान लोग भूख के अभाव में स्वादिष्ट व्यंजनों का भी मजा लेने से वंचित रह जाते हैं।
अन्याय का तत्क्षण विरोध करना चाहिए तथा बल का दमन दृढ़तापूर्वक करना चाहिए। अन्याय से अर्जित धन ज़्यादा समय तक नहीं ठहरता, जबकि न्याय द्वारा अर्जित धन कई पीढि़यों तक चलता है।
जो हजारों कमाता है वह जीता है और जो सैकड़ों कमाता है वह भी जीता है। इसलिए अधिक की इच्छा न करें। यह न सोचें के अधिक नहीं होगा तो जीवन ही नहीं चलेगा।
अपना सुख तो सुख होता ही है उसमें प्रसन्न क्या होना! प्रश्न तो दूसरे के दुःख में हाथ बटाने का होता है। जो व्यक्ति दुखियों का सहायता करता है, दान देता है लेकिन बाद में कोई पश्चाताप नहीं करता, वह सज्जनों में सबसे बड़ा सदाचारी होता है। उसकी सब जगह प्रशंसा ही होती है।
मछली बढ़िया खाने के पदार्थ से ढकी हुई, लोहे के काँटे को, लोभ में पड़कर निगलना चाहती है, वह उसके परिणाम को भूल जाती है। फलस्वरूप शिकंजे में फंस जाती है। इसी प्रकार अपनी उन्नति चाहने वाला पुरुष यदि ग्रहण करने योग्य वस्तु से अधिक की अपेक्षा करता है या ग्रहण करता है तो वह उसके परिणाम से बच नहीं पाता।
तीन लोग धन की अधिकारी नहीं माने जाते। स्त्री, पुत्र और दास। ये जो कुछ कमाते है, उसी के माने जाते हैं, जिसके ये अधीन होते हैं।
दरिद्र के पेट में लक्कड़ भी पच जाता है, जबकि धनियों को प्रायः भोजन करने की शक्ति ही नहीं होती। इसी प्रकार एक दूसरा पक्ष भी है, अधम पुरुषों के सामने जीविका का भय होता है, मध्यम श्रेणी के पुरुष मृत्यु से डरते हैं, जबकि उत्तम पुरुषों को अपमान का ही महान भय होता है।
जो व्यक्ति अन्याय के द्वारा नष्ट हुए धन को, अपनी बुद्धि से सोच विचार कर, सही नीति का निर्धारण करते हुए दोबारा वापिस लाने की क्षमता रखता है, वह वीर पुरुष कहलाता है।
बहुत अधिक श्रेष्ठ, अधिक दान देने वाला, अधिक वीर, व्रत नियमों का अधिक पालन करने वाला, तथा अपने ऊपर अधिक घमंड करने वाले पुरुष के पास लक्ष्मी नहीं रहती।
सज्जन पुरुष, अधर्म से आई हुई सम्पत्ति को उसी प्रकार त्याग देता है, जिस प्रकार सांप अपनी केंचुली को उतार कर फेंक देता है और फिर सुख का अनुभव करता है।
एक लक्ष्मीवान गृहस्थ के घर में, कुल का बूढ़ा, संकट में पड़ा हुआ उच्चकुल का मनुष्य, धनहीन मित्र और निःसंतान बहन को सदा परिवारजन के समान पूरा आदर मिलना चाहिए।
जिस सुख का सेवन करने से अर्थ और धर्म की हानि नहीं होती है उसका तो पूर्ण रूप से सेवन करना ही उचित है। जो व्यक्ति सदा ही दुःखी रहते हैं, आलसी, ईश्वर में विश्वास न रखने वाले, अपनी इन्द्रियों को वश में न रखने वाले तथा किसी भी कार्य में उत्साह न दिखाने वाले हैं, इन लोगों के यहां कभी भी लक्ष्मी निवास नहीं करती।

संगति, मित्रता और भरोसा
आग में तपाकर सोने की, सदाचार से सज्जन की, व्यवहार से संत पुरुष की, संकट काल में योद्धा की, आर्थिक संकट में धीर की तथा घोर संकटकाल में मित्र और शत्रु की पहचान होती है।
पाँच लोग छाया की तरह सदा आपके पीछे लगे रहते हैं। ये पाँच लोग हैं: मित्र, शत्रु, उदासीन, शरण देने वाले और शरणार्थी।
दुर्जनों की संगति के कारण निरपराध भी उन्हीं के समान दंड पाते हैं; जैसे सूखी लकडि़यों के साथ गीली भी जल जाती हैं। इसलिए दुर्जनों के साथ मैत्री नहीं करनी चाहिए।
कपड़े को जिस रंग में रँगा जाए, उस पर वैसा ही रंग चढ़ जाता है, इसी प्रकार सज्जन के साथ रहने पर सज्जनता, चोर के साथ रहने पर चोरी तथा तपस्वी के साथ रहने पर तपश्चर्या का रंग चढ़ जाता है।
अकेला वृक्ष चाहे कितना ही बड़ा और मजबूत हो, आँधी उसे जड़ से उखाड़कर धराशायी कर सकती है। वहीं जो वृक्ष समूह में होते हैं; वे मिलजुलकर बड़ी-बड़ी आँधियों को झेल जाते हैं।
जो व्यक्ति भरोसे के लायक नहीं है, उस पर तो भरोसा न ही करें, लेकिन जो बहुत भरोसेमंद है, उस पर भी अंधे होकर भरोसा न करें, क्योंकि जब ऐसे लोग भरोसा तोड़ते हैं तो बड़ा अनर्थ होता है।
ईमानदार, दानी, अपनी बात पर दृढ़ रहने वाले, कर्तव्यपरायण और मृदुभाषी लोग शत्रुओं को भी अपना बना लेते हैं।
दो व्यक्तियों की मित्रता तभी स्थायी रह सकती है जब उनके मन से मन, गूढ़ बातों से गूढ़ बातें तथा बुद्धि से बुद्धि मिल जाती है।
जो पुरुष दान से मित्र को जीत लेता है, युद्ध से शत्रु को जीत लेता है तथा पालन-पोषण से स्त्री को जीत लेता है, उसका जीवन सफल है।
वास्तव में मनुष्य जैसी संगति करता है, जिन लोगों के साथ रहता है, जैसे लोगों की सेवा करता है और जैसा वह होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है। जिन विषयों से मन को सताया जाता है, उनसे मुक्ति मिलती है। यदि मनुष्य सभी ओर से निवृत्त हो जाए तो उसे दुख का अनुभव ही न हो।
मनुष्य को चाहिए कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसके बिना पूछे भी उसके कल्याण के लिए, चाहे बात अच्छी लगने वाली हो या बुरी लगने वाली, कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करना चाहिए।
निरर्थक बोलने वाले, पागल अथवा बकवास करने वाले बच्चे से भी उसी भांति तत्व की बात ग्रहण करनी चाहिए, जैसे पत्थर से सोना निकाला जाता है। जैसे पक्षी एक एक दाना चुगता है, उसी प्रकार पुरुष को चाहिए कि वह भावपूर्ण वचनों सदवचनों का श्रवण करे।
चोर असावधान पुरुष से, वैद्य रोगी से, मतवाली स्त्रियां कामियों से, पुरोहित यजमानों से, राजा झगड़ने वालो से और विद्वान पुरुष मूर्खों से अपनी जीविका चलाते हैं।
शिक्षा समाप्त हो जाने पर शिष्य आचार्य का, विवाह हो जाने पर पुत्र माता का, कामवासना की शान्ति हो जाने पर मनुष्य स्त्री का और काम निकल जाने पर व्यक्ति सहायता करने वाले का, नदी की धारा पार करने के बाद नाव का, रोग मुक्त होने के बाद वैद्य का अक्सर लोग तिरस्कार कर देते हैं।
जो अधिक गुणों से सम्पन्न और नम्र स्वभाव वाले हैं, वे प्राणियों पर अत्याचार होते देखकर चुप नहीं रह सकते। परन्तु जो लोग सदा दूसरों की निन्दा करने में ही लगे रहते हैं, दूसरों को दुःख देने और आपस में फूट डलवाने में गौरव का अनुभव करते है, ऐसे लोगों के तो दर्शन भी नहीं करने चाहिए न ऐसे लोगों से धन लेना चाहिए और न ही उन्हें धन देना चाहिए।
अपने जाति भाइयों के साथ विरोध तो कभी करना ही नहीं चाहिए क्योंकि जाति भाई यदि सदाचारी होते हैं तो नाव को किनारे लगा देते हैं और यदि दुराचारी हो तो डुबो भी देते हैं।
बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह स्वयं देखकर, दूसरों से सुनकर तथा अपनी बुद्धि विचार करके ही विद्वान से मित्रता करें। विनय भाव से अपयश का नाश होता है, पराक्रम से अनर्थ का, क्षमा से क्रोध का, और सदाचार से कुलक्षण का अन्त हो जाता है।
जो व्यक्ति विद्वानों की सेवा करता हो वैद्य, धार्मिक, सुन्दर मित्र रखने वाला तथा मीठा बोलने वाला हो, ऐसे व्यक्ति की तो सदैव ही रक्षा करनी चाहिए। मर्यादा का उल्लंघन करने वाला, कोमल स्वभाव वाला तथा लज्जाशील पुरुष सैकड़ों कुलीनों से बड़ा माना जाता है।
विद्वान पुरुष को अभिमानी, क्रोध, मूर्ख, साहसिक और धर्महीन पुरुष के साथ मित्रता नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि मित्र तो वही है, जो कृतज्ञ, धार्मिक, सत्य बोलने वाला, उदार, बहुत अधिक प्रेम करने वाला, मर्यादा में रहने वाला और सदा ही मित्रता को निभाने वाला हो।
स्त्री, धूर्त, आलसी, डरपोक, क्रोधी, घमंडी, चोर, नास्तिक आदि का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।
वाणी, क्रोध, क्षमा और अहंकार
मूर्ख लोग ज्ञानियों को बुरा-भला कहकर उन्हें दुख पहुँचाते हैं। इस पर भी ज्ञानीजन उन्हें माफ कर देते हैं। माफ करने वाला तो पाप से मुक्त हो जाता है और निंदक को पाप लगता है।
शब्द रूपी बाण सीधा दिल पर जाकर लगता है, जिससे पीडि़त व्यक्ति दिन-रात घुलता रहता है। इसलिए ज्ञानियों को चाहिए कि वे कटु वचन बोलने से बचें।
जो प्रिय लगता है उसके बुरे काम भी अच्छे लगते हैं; लेकिन जो अप्रिय है, वह चाहे बुद्धिमान, सज्जन या विद्वान हो, बुरा ही लगता है।
सज्जनता से अपकीर्ति दूर की जा सकती है, बल से संकट टाले जा सकते हैं, क्षमा से क्रोध को शांत किया जा सकता है तथा शिष्ट व्यवहार से बुरी आदतों को बदला जा सकता है।
क्रोध को प्रेम से, दुष्ट को सद्व्यवहार से, कंजूस को दान से तथा झूठ को सच से जीतना चाहिए।
ज्यादा चलने से मनुष्य बूढ़ा होता है, ज़्यादा पानी गिरने से पहाड़ों की आयु घटती है, रति-कर्म न करने से स्त्रियों का बुढ़ापा जल्दी आता है और कड़वी बोली से मन बुढ़ा जाता है।
अच्छाई में बुराई देखना मृत्यु जैसा कष्टकारी अवगुण है। बढ़-चढ़कर बोलना धन-हानि का कारक है। जल्दबाजी, बात पर ध्यान न देना तथा आत्मप्रशंसा, ये तीन अवगुण ज्ञान के शत्रु हैं।
जो व्यक्ति कभी अपने पराक्रम की डींग नहीं हांकता, संतुलित रहकर कभी उद्दंडता नहीं करता, समन्वय की बात करता है, क्रोधित होने पर भी न तो व्याकुल होता है, न कटुवचन बोलता है, बल्कि धीरज से काम लेता है, वह व्यक्ति सभी का प्रिय होता है।
जो दूसरों के धन, रूप, पराक्रम, कुलीनता, सुख, सौभाग्य और सम्मान के प्रति ईर्ष्यालु होता है, वह मानो असाध्य रोग से पीड़ित होता है और इसका निदान किसी के पास नहीं होता।
बैर की आग जब एक बार शान्त हो जाती है उसे शान्त ही रहने देना चाहिए। जो व्यक्ति इस अग्नि को पनपने नहीं देता, गर्व नहीं करता उसमें किसी प्रकार की हीनता की भावना नहीं विकसित होती, वह किसी प्रकार से विपत्ति का रोना भी नहीं रोता और इसका लाभ उठाकर अनुचित कार्य भी नहीं करता। ऐसा आदमी ही श्रेष्ठजन कहा जाता है। उसी का लोग सम्मान भी करते है।
इस संसार में क्षमा ही वशीकरण रूप है। भला सोचिए, क्षमा से क्या सिद्ध नहीं हो पाता। जिसके हाथ में शान्ति रूपी तलवार है, दुष्ट लोग उसका क्या कर लेंगे। और जहां तिनके नहीं होते वहां गिरी आग अपने आप बुझ जाती है।
जो व्यक्ति क्षमाशील नहीं होता, वह अपने साथ साथ दूसरे को भी दोष का भागी बना लेता है, स्वयं भी कष्ट पाता है और उसके साथ रहने वाला हर व्यक्ति कष्ट पाता है।
मद तीन प्रकार के होते हैं, उच्च कुल का मद, धन और शक्ति का मद तथा विद्या का मद। घमण्डी पुरुषों के लिए तो ये मद है, जबकि सज्जनों के लिए ये धर्म के साधन है।
पुरुष को चाहिए कि वह मन की सारी गांठें खोलकर, प्रिय और अप्रिय को अपनी आत्मा के समान समझे, दूसरों से अभद्र गाली सुनकर भी प्रत्युत्तर में उनसे भद्रता का ही व्यवहार करे, क्योंकि क्षमा कर देने वाले का रोका हुआ क्रोध सम्मुख गाली देने वाले को जला डालता है और उसके पुण्य भी ले लेता है।
अभिमान सबसे भयानक नाश का कारण होता है। कहा गया है, बुढ़ापा रूप का, आभा धैर्य का, काम लज्जा का, क्रोध लक्ष्मी का नाश करता है। इसी प्रकार अभिमान व्यक्ति का सर्वस्व नाश कर देता है।
समर्थ व्यक्ति को तो सदा दूसरों को क्षमा करना चाहिए क्योंकि क्षमा से बड़ा दूसरा हितकारी और सम्पन्नता प्रदान करने वाला और कोई दूसरा उपाय नहीं है। जो शक्तिहीन है, उसे तो क्षमा करना ही चाहिए परन्तु जो शक्तिशाली है, उसे भी अपने धर्म का पालन करते हुए क्षमा को ही महत्व देना चाहिए।

धर्म, सदाचार और आत्मसंयम
गृहस्थ होकर अकर्मण्यता और संन्यासी होते हुए विषयासक्ति का प्रदर्शन करना ठीक नहीं है।
धर्म की रक्षा सत्य से होती है, विद्या की रक्षा अभ्यास से, सौंदर्य की रक्षा स्वच्छता से तथा कुल की रक्षा सदाचार से होती है।
ऊँचे या नीचे कुल से मनुष्य की पहचान नहीं हो सकती। मनुष्य की पहचान उसके सदाचार से होती है, भले ही वह नीचे कुल में ही क्यों न पैदा हुआ हो।
यह मानव शरीर रथ है, आत्मा (बुद्धि) इसका सारथी है, इंद्रियाँ इसके घोड़े हैं। जो व्यक्ति सावधानी, चतुराई और बुद्धिमानी से इनको वश में रखता है, वह श्रेष्ठ रथवान की भाँति संसार में सुखपूर्वक यात्रा करता है।
यज्ञ, अध्ययन, दान, तप, सत्य, क्षमा, दया और लोभ विमुखता, धर्म के ये आठ मार्ग बताए गए हैं। इन पर चलने वाला धर्मात्मा कहलाता है।
पच जाने पर भोजन की, यौवन बेदाग निकल जाने पर स्त्री की, युद्ध जीत लेनेवाले योद्धा की तथा तत्त्वज्ञान प्राप्त कर लेने पर तपस्वी की प्रशंसा होती है।
जो कार्य अपने एवं सबके लिए लाभकारी और सुखद हो केवल वही करना चाहिए। इससे मनुष्य को चारों पुरुषार्थों: धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।
मन, वचन और कर्म से हम लगातार जिस वस्तु के बारे में सोचते हैं, वही हमें अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। अतः हमें सदा शुभ चीजों का चिंतन करना चाहिए।
व्यक्ति को यह छूट है कि वह न्यायपूर्वक और धर्म के मार्ग पर चलकर इच्छानुसार सुखों का भरपूर उपभोग करे, लेकिन उनमें इतना आसक्त न हो जाए कि अधर्म का मार्ग पकड़ ले।
जिस पुरुष का अपने मन पर नियंत्रण होता है, वह मुसीबत में, युद्ध के समय, दुर्गम वन में, कठिन परिस्थिति में, न तो धैर्य खोता है, न भयभीत होता है।
अगर धर्म के सार को जानना है तो वह यही है कि जो काम आपको स्वयं के लिए अच्छा न लगे, उसे दूसरे के लिए न करें।
विद्या के बिना मनुष्य, संतान के बिना रति-कर्म, भूखी प्रजा तथा राजा रहित राज्य दुख उठाते हैं।
हमारे शरीर में स्थित आत्मा को एक नदी समझिए। यह नदी ईश्वर के शरीर से निकली है। धैर्य इसके किनारे हैं, करुणा इसकी लहरें हैं, पुण्य इसके तीर्थ हैं, जो मनुष्य सदा पुण्य कर्मों में लिप्त रहता है, वह इस नदी में स्नान करके पवित्र होता है। लोभरहित आत्मा को सदा पवित्र कहा गया है।
काम-क्रोध जैसे मगरमच्छों और पाँच इंद्रियों के जल से पूरित संसार रूपी यह नदी ‘जन्म और मरण’ के अनेक पड़ावों से भरी है। इस नदी को धैर्य की नाव से ही पार किया जा सकता है।
जो व्यक्ति अपने बुजुर्गों का आदर करता है तथा उनसे परामर्श करता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। वह कभी मोह-माया में नहीं फँसता।
यदि मनुष्य पहले इन्द्रियों सहित मन को अपना शत्रु मानकर जीत लेता है, तो फिर वह अपने मित्रों और शत्रुओं को भी जीतने की इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है। ऐसे पुरुष की लक्ष्मी भी सेवा करती है।
जो अपराध करता है, उसी की निन्दा होती है और सदैव उत्तम व्यवहार करने वाले की प्रशंसा होती है।
दो प्रकार के पुरुष सूर्यमंडल को भेद कर उच्च गति पाते हैं। एक वे जो योग्य युक्त संन्यासी होते हैं। दूसरे वे जो युद्ध में वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होते हैं।
दूसरे के धन का हरण करने वाला, दूसरे की स्त्री से संसर्ग करने वाला और हितकारी मित्र का त्याग करने वाला, ये तीनों ही नाश के पात्र होते हैं।
काम, क्रोध और लोभ, आत्मा का नाश करने वाले तीन द्वार हैं। अतः इन तीनों को त्याग करना चाहिए।
पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु की सेवा बड़े यत्न से करनी चाहिए। जो व्यक्ति देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि की शुद्ध हृदय से पूजा करता है और उन्हें संतुष्ट करता है, वह शुद्ध यश प्राप्त करता है।
सत्य व्यक्ति का सबसे बड़ा आधार है। दूसरों को आदर देना मानवीयता का सबसे बड़ा लक्षण है। सत्कर्म करने में व्यक्ति को खुला तथा दुष्कर्म करने में संकोची व्यक्ति श्रेष्ठ कहलाता है।
अच्छे वस्त्र वाला किसी भी सभा में अपना प्रभाव जमा लेता है, जिसके पास गौ है, वह मीठे स्वाद की आकांक्षा को जीत लेता है, सवारी से चलने वाला मार्ग को जीत लेता है, पर शीलवान पुरुष सब पर विजय पा लेता है।
धैर्य धारण, मन का निग्रह और सत्य धर्म का पालन ही मनुष्य का पहला कर्तव्य है।
बुद्धि से मनुष्य अपने भय को दूर करता है, तप से महान पद प्राप्त करता है, गुरु सेवा से ज्ञान और योग से शांति को प्राप्त करता है।
यह संसार भी विविध रंग वाला और क्रिया व्यापार वाला है। इसमें कोई मनुष्य दान से प्रिय होता है, कोई प्रिय वचन बोलने से, कोई मंत्र और औषध बल से प्रिय होता हैं, किन्तु जो वास्तव में प्रिय है, वह तो सर्वप्रिय होता है।
जो पुरुष अपने परिवार के लोगों का सत्कार करता है, बड़े बूढ़ों की सेवा करता है, उसका सदा ही कल्याण होता है।
जो विद्वान पुरुष पापकर्मों को नहीं करता, वह सदा ही आगे बढ़ता है, परन्तु जो व्यक्ति पहले किए गए पापों के विषय में विचार न करके पुनः उन्हीं को करता है, वह बहुत भरे हुए कीचड़ के नरक में गिराया जाता है।
मंगलमय पदार्थों का स्पर्श, मन की इच्छाओं को रोकना, शास्त्र का अभ्यास, परिश्रम, सरलता और सत्पुरुषों का दर्शन करना, उनका सत्कार करना, ये सभी कार्य कल्याणकारी होते हैं।
जिन व्यक्ति की किसी में आसक्ति नहीं होती और श्रेष्ठ लोगों से आदर पाकर, अपनी शक्ति के अनुसार ही वह अर्थ साधन करता रहता है, ऐसे पुरुष को यश प्राप्त होता है। साधु संत लोग उस पर प्रसन्न रहते हैं और उसके लिए मंगल कामना करते हैं।
भय, कामना और लोभ से कभी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए क्योंकि धर्म नित्य है तथा सुख दुःख अनित्य है। जीव नित्य है पर इसका कारण अनित्य है, आपको अनित्य को छोड़कर नित्य को अपनाना चाहिए।
जिस प्रकार बिना फल-फूल वाले वृक्ष को पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार मरे हुए व्यक्ति को उसके जाति भाई, परिवारजन, आदि चिता में रखकर आ जाते हैं। मरे हुए व्यक्ति के साथ तो केवल उसके भले-बुरे कर्म ही जाते हैं, जो उसने इस जीवन में किए होते हैं। इसीलिए मनुष्य को सदा धर्म के कार्यों में ही प्रवृत्त रहना चाहिए।
काम और भूख को अपने वश में रखे। नेत्रों के द्वारा हाथ पैरों की रक्षा, मन से नेत्र और कानों की, तथा सत्कर्मों से मन और वाणी की रक्षा करें।
बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रिय निग्रह, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, दान की प्रवृत्ति और कृतज्ञता भाव, ये आठ गुण किसी भी पुरुष को ख्याति दिलाने में सक्षम है।
विनाश के आठ अन्य लक्षण और भी हैं: ब्राह्मणों से द्वेष करना, उनके विरोध का पात्र बनना, ब्राह्मणों का धन हड़पना, उनकी हत्या, ब्राह्मण निन्दा और प्रशंसा सुनने की प्रवृत्ति, यज्ञ आदि कार्यों में उनका स्मरण न करना या अवहेलना करना तथा कुछ मांगने पर उनमें दोष निकालना से मूलतः त्याज्य कर्म है। बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि सदैव इनसे बचे और ब्राह्मणों का सम्मान करते हुए उनका आदर करे। ब्राह्मणों की अवहेलना स्वयं एक बड़ा पापकर्म है।
राजा, नीति और शासन
जिस व्यक्ति को बुद्धिबल से मारा जाता है, उसके उपचार में योग्य चिकित्सक, औषधियाँ, जड़ी-बूटियाँ, यज्ञ, हवन, वेद मंत्र आदि सारे उपाय व्यर्थ हो जाते हैं।
विष केवल उसके पीने वाले एक व्यक्ति की जान लेता है, शत्रु भी एक अभीष्ट व्यक्ति की जान लेता है, लेकिन राजा की एक ग़लत नीति राज्य और जनता के साथ-साथ राजा का भी सर्वनाश कर डालती है।
अल्प बुद्धि वाले, देरी से कार्य करने वाले, जल्दबाजी करने वाले और चाटुकार लोगों के साथ गुप्त विचार-विमर्श नहीं करना चाहिए। राजा को ऐसे लोगों को पहचानकर उनका परित्याग कर देना चाहिए।
जो व्यक्ति अपने अनुकूल तथा दूसरों के विरुद्ध कार्यों को इस प्रकार करता है कि लोगों को उनकी भनक तक नहीं लगती। अपनी नीतियों को सार्वजनिक नहीं करता, इससे उसके सभी कार्य सफल होते हैं।
जो राजा बेकार में न तो खुश होता है, न किसी पर क्रुद्ध होता है, जो कार्य को कई बार जाँचता-परखता है और स्वयं पर भरोसा रखता है, उसका खजाना हमेशा धन से भरा रहता है।
जो गाय बड़ी कठिनाई से दूध देती है, वह बहुत क्लेश उठाती है और जो आसानी से दूध देती है, वह सुखी रहती है, लोग उसे कष्ट नहीं देते। इसी प्रकार जो धातु बिना गर्म किए मुड़ जाती है, उसे आग में नहीं तपाया जाता है और जो लकड़ी स्वयं मुड़ जाती है, उसे कोई झुकाने का प्रयत्न नहीं करता। कहने का तात्पर्य यही है कि बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि वह शक्तिशाली के सामने झुक जाए, क्योंकि जो बलवान के सामने झुकता है वह मानो इन्द्र देवता को प्रणाम करता है।
जिस प्रकार समुद्र की सैर करने वाला मनुष्य, फटी नाव को छोड़ देता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष के लिए यह आवश्यक है कि वह उपदेश न देने वाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करने वाले होता अथवा रक्षा करने में असमर्थ राजा, कटु वचन बोलने वाली स्त्री, गांव में रहने वाले ग्वाले और वन में रहने वाले नाई को त्याग देना चाहिए। इसके विपरीत सत्य, दान, कर्मण्यता, दूसरों में दोष देखने की प्रवृत्ति का अभाव, क्षमा और धैर्य का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।
बुद्धिमान व्यक्ति को मंत्रभेद के इन छः द्वारों का जानना चाहिए और धन की रक्षा करने के लिए इन्हें सदा बंद रखना चाहिए। ये छः द्वार हैं: नशे का सेवन, निद्रा, आवश्यक बातों की जानकारी न रखना, अपने नेत्र, मुख आदि का विकार, दुष्ट मंस्त्रियों पर विश्वास और मूर्ख दूत पर भी भरोसा रखना। जो इन द्वारों के बारे में जानते हुए भी इन्हें बंद रखता है, वह अर्थ, धर्म और काम, क्रोध सेवन करते हुए भी शत्रुओं को वश में कर लेता है।
सुख और दुःख
सुख चाहने वाले से विद्या दूर रहती है और विद्या चाहने वाले से सुख। इसलिए जिसे सुख चाहिए, वह विद्या को छोड़ दे और जिसे विद्या चाहिए, वह सुख को।
सुखी मनुष्य वही है, जो रोग रहित रहे, उस पर किसी का कोई ऋण न हो, उसे परदेस में न रहना पड़े, मेलजोल अच्छे लोगों के साथ हो। धर्मपूर्वक अपनी वृत्ति से जीविका चलाता हो और निडर रहता हो। यही मनुष्य के सुख के आधार हैं।
जो व्यक्ति दूसरों से घृणा करता है, जिसे अपनी स्थिति पर कभी संतोष नहीं रहता, जो हमेशा क्रोध करता है और जो शंकित रहता है या दूसरों के भाग्य पर अपना जीवन निर्वाह करता है। ये छः व्यक्ति सदा दुःखी रहते हैं।
मित्रों से सद परामर्श, धर्मानुसार धन अर्जित करना, पुत्र के प्रति प्रेम, मैथुन में प्रवृत्ति, समय पर प्रिय वचन बोलना, अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति अपने वर्ग के लोगों में उन्नति और जन समाज में सम्मान, ये वे आठ लौकिक सुख है, जिन्हें पाकर प्रत्येक व्यक्ति हर्ष का अनुभव करता है।
विदुर नीति से जुड़े सवाल (FAQ)
विदुर नीति महाभारत के किस पर्व में है?
विदुर नीति महाभारत के उद्योग पर्व में है, जिसके प्रजागर पर्व में अध्याय 33 से 40 तक विदुर के उपदेश हैं।
विदुर नीति किसको सुनाई गई थी?
विदुर नीति महात्मा विदुर ने हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र को सुनाई थी, उस रात जब युद्ध की चिंता में धृतराष्ट्र को नींद नहीं आ रही थी।
विदुर के अनुसार कौन से छह दोष छोड़ देने चाहिए?
विदुर के अनुसार उन्नति चाहने वाले को ज़्यादा नींद, ऊँघना, भय, क्रोध, आलस्य और काम को टालने की आदत, ये छह दोष छोड़ देने चाहिए।
विदुर के अनुसार ज्ञानी (पंडित) कौन है?
विदुर के अनुसार ज्ञानी वह है जो अपनी योग्यता जानता है, दुख सहने की शक्ति रखता है, धर्म के रास्ते से नहीं हटता, सम्मान पाकर घमंड और अपमान से दुख नहीं करता, और जिसके इरादे लोग काम पूरा होने के बाद ही जान पाते हैं।
विदुर नीति की किताब कहाँ मिलेगी?
गीता प्रेस, गोरखपुर की “विदुरनीति” मूल संस्कृत श्लोकों और हिंदी अर्थ के साथ बहुत कम दाम में मिलती है। आप इसे किसी धार्मिक पुस्तक भंडार से या Amazon पर विदुर नीति की किताब देख सकते हैं।
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तो यह थी महात्मा विदुर की संपूर्ण विदुर नीति। आपको विदुर का कौन सा वचन सबसे ज़्यादा काम का लगा, कमेंट करके ज़रूर बताइए।
अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया
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