भीष्म नीति (Bhishma Neeti) महाभारत के उन उपदेशों को कहते हैं, जो पितामह भीष्म ने बाणों की शय्या पर लेटे हुए युधिष्ठिर को दिए थे। महाभारत के युद्ध के बाद जब युधिष्ठिर राज्य पाकर भी दुखी और अशांत थे, तब श्रीकृष्ण उन्हें भीष्म के पास ले गए। भीष्म ने राजधर्म, सत्य, त्याग, संयम, सुख दुख और जीवन जीने की कला पर जो कहा, वह आज भी हर समझदार व्यक्ति के लिए उतना ही काम का है।
इस लेख में भीष्म पितामह की 40 बातें विषय के हिसाब से, आसान अर्थ के साथ दी गई हैं, साथ में भीष्म का परिचय, ये उपदेश महाभारत में कहाँ आते हैं, और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल।
छोटा जवाब: भीष्म नीति का सार है: सत्य सबसे बड़ा धर्म है, कामनाओं का त्याग उन्हें पूरा करने से श्रेष्ठ है, अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है, समय सबसे बलवान है, सत्ता सुख के लिए नहीं सेवा के लिए है, और मीठी वाणी, संयम (दम) और अच्छा आचरण ही लंबी आयु और सुख का रास्ता है।

भीष्म नीति: एक नज़र में
| बात | जानकारी |
|---|---|
| किसने कहा | पितामह भीष्म (देवव्रत), गंगा और राजा शांतनु के पुत्र |
| किसे कहा | धर्मराज युधिष्ठिर को, श्रीकृष्ण की उपस्थिति में |
| कब और कहाँ | महाभारत युद्ध के बाद, कुरुक्षेत्र में, बाणों की शय्या पर |
| महाभारत में कहाँ | मुख्य रूप से शांति पर्व और अनुशासन पर्व |
| मुख्य विषय | राजधर्म, आपद्धर्म (संकट में धर्म), मोक्षधर्म, सत्य, त्याग, संयम |
| सबसे प्रसिद्ध देन | विष्णु सहस्रनाम भी भीष्म ने अनुशासन पर्व में युधिष्ठिर को सुनाया |
भीष्म पितामह कौन थे
भीष्म का बचपन का नाम देवव्रत था। वे राजा शांतनु और गंगा के पुत्र थे। अपने पिता के सुख के लिए उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने और राजगद्दी न लेने की कठोर प्रतिज्ञा की। इसी “भीषण प्रतिज्ञा” के कारण वे भीष्म कहलाए, और पिता ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया।
महाभारत के युद्ध में अर्जुन के बाणों से घायल होकर वे बाणों की शय्या पर गिरे, पर उन्होंने प्राण तब तक नहीं त्यागे, जब तक सूर्य उत्तरायण नहीं हुआ। इसी बीच उन्होंने युधिष्ठिर को धर्म और नीति का उपदेश दिया। माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने देह त्यागी, जिसे भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को भीष्म के पास क्यों ले गए
जब पितामह भीष्म बाणों की शय्या पर लेटे थे, तब श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा: “तुम्हारे मन में अशांति है। तुम पितामह भीष्म के पास जाओ और अपनी कठिनाई कहो। धर्म जानने वालों में भीष्म सबसे श्रेष्ठ हैं। जब वे नहीं रहेंगे, तो संसार ऐसा अँधेरा हो जाएगा, जैसे चंद्रमा के न रहने पर रात। वे जीवन और मृत्यु के बीच हैं। जाओ, जो पूछना है, पूछ लो।”
युधिष्ठिर, श्रीकृष्ण और पांडवों के साथ कुरुक्षेत्र पहुँचे। मृत्यु शय्या पर पड़े भीष्म ने उस समय जो उपदेश दिए, उनमें से 40 मुख्य बातें नीचे विषय के हिसाब से दी गई हैं।
Bhishma Neeti in Hindi: भीष्म पितामह की 40 बातें
सत्य और धर्म पर
- सत्य धर्म सब धर्मों से उत्तम है। सत्य ही सनातन धर्म है। तप और योग सत्य से ही उत्पन्न होते हैं, और बाक़ी सब धर्म सत्य के अंदर ही आते हैं।
- सत्य के 13 लक्षण हैं: सत्य बोलना, सब प्राणियों को एक जैसा समझना, इंद्रियों को वश में रखना, ईर्ष्या द्वेष से बचना, क्षमा, शील, लज्जा, दूसरों को कष्ट न देना, बुरे कामों से दूर रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस और विद्या। सत्य का फल हज़ारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर बताया गया है।
- सत्य ब्रह्म है, सत्य तप है। सत्य से मनुष्य ऊपर उठता है। झूठ अँधेरे की तरह है, और अँधेरे में रहने वाला नीचे गिरता है।
- जिसे सत्य पर विश्वास है और जो अपने संकल्प पर दृढ़ है, उसका हमेशा कल्याण होता है।
- मृत्यु और अमरता, दोनों मनुष्य के अपने हाथ में हैं। मोह का फल मृत्यु है और सत्य का फल अमरता।
- बड़े से बड़ा शूरवीर भी अगर अधर्म और अन्याय का साथ दे, तो अंत में उसे धर्म के आगे झुकना ही पड़ता है।
- सत्य और धर्म के रास्ते पर चलने वाली छोटी चींटी भी हाथी से ज़्यादा शक्तिशाली हो जाती है।
कामना, मोह और त्याग पर
- कामनाओं को त्याग देना, उन्हें पूरा करने से श्रेष्ठ है। आज तक किस मनुष्य ने अपनी सब कामनाएँ पूरी की हैं? इन कामनाओं से बाहर निकलो, चीज़ों का मोह छोड़ो, और मन को शांत करो।
- कामनाओं से मुक्त होने का सुख इतना बड़ा है कि इस लोक में कामनाएँ पूरी होने से मिलने वाला सुख, और परलोक का सुख भी, उसके सोलहवें हिस्से के बराबर नहीं।
- मोह और तृष्णा बहुत कठोर और विनाशकारी होते हैं।
- जो अपने आप को वश में करना चाहता है, उसे लोभ और मोह से मुक्त होना चाहिए।
- जब मनुष्य अपनी वासनाओं को अपने अंदर खींच लेता है, जैसे कछुआ अपने सब अंग भीतर खींच लेता है, तब आत्मा की ज्योति दिखाई देती है। (यही उपमा गीता में श्रीकृष्ण भी देते हैं।)
- त्याग के बिना कुछ प्राप्त नहीं होता। त्याग के बिना न परम आदर्श की सिद्धि होती है, न भय से मुक्ति। त्याग से ही हर प्रकार का सुख मिलता है।
- अपनी इच्छा से सादगी का जीवन अपनाना सुख का कारण है। इससे मनुष्य क्लेशों से बचता है और किसी को अपना शत्रु नहीं बनाता। यह रास्ता कठिन है, पर भले लोगों के लिए आसान है।
अहंकार, वाणी और व्यवहार पर
- अहंकार मनुष्य और समाज का सबसे बड़ा शत्रु है, जो सब कष्टों का कारण और अंत में विनाश का द्वार बनता है।
- ऐसे वचन बोलो जो दूसरों को प्यारे लगें। दूसरों को बुरा भला कहना, निंदा करना, कठोर बोलना, अपमान करना, अहंकार और दंभ, ये सब त्यागने योग्य अवगुण हैं।
- श्रेष्ठ और सज्जन व्यक्ति की पहचान यह है कि वह दूसरों को धनवान देखकर जलता नहीं, विद्वानों का सत्कार करता है, और धर्म की बात हर जगह से सीखने को तैयार रहता है।
- अपने आत्मबल, सामर्थ्य, विवेक, शालीनता और तेज से ही मनुष्य की पहचान होती है।
- गुरु के प्रति आदर और प्रेम मनुष्य को विजयी बनाता है।
संयम (दम) पर
- दम (संयम) के समान कोई धर्म नहीं। दम में ये सब आते हैं: क्षमा, धैर्य, वैर का त्याग, समता, सत्य, सरलता, इंद्रिय संयम, कर्म में तत्पर रहना, कोमल स्वभाव, लज्जा, बलवान चरित्र, प्रसन्न रहना, संतोष, मीठे वचन, किसी को दुख न देना और ईर्ष्या न करना।
सुख, दुख और मन पर
- वह व्यक्ति सुखी है, जो मन को संतुलन में रखता है, बेकार चिंता नहीं करता, सत्य बोलता है और सांसारिक चीज़ों के मोह में नहीं फँसता।
- जो व्यक्ति बेवजह ख़ुद को कोसता रहता है, वह अपना रूप, धन, जीवन और धर्म तक नष्ट कर लेता है। जो शोक से बचा रहता है, उसे सुख और सेहत दोनों मिलते हैं।
- सुख दो तरह के लोगों को मिलता है: जो सबसे भोले हैं, और जिन्होंने बुद्धि के प्रकाश में सच्चाई को देख लिया है। जो बीच में लटके हैं, वे दुखी रहते हैं।
- कठिन परिस्थितियाँ आना जीवन चक्र का नियम है। बिना घबराए उनका सामना करना ही सफलता का द्वार है।
- परिवर्तन संसार का अटल नियम है। इसे सबको स्वीकारना पड़ता है, कोई इसे रोक नहीं सकता।
समय और जीवन पर
- समय सबसे बलवान है। एक क्षण में सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
- विधि के विधान के आगे कोई नहीं टिकता। बड़े से बड़े पुरुषार्थी को भी समय के साथ इतिहास बन जाना पड़ता है।
- संसार को बुढ़ापे ने हर ओर से घेरा है। मृत्यु रोज़ प्रहार कर रही है। दिन जाते हैं, रातें बीतती हैं। जागो, अभी उठो, समय बर्बाद मत करो, अपने कल्याण के लिए कुछ कर लो, क्योंकि काम पूरे होने से पहले ही मृत्यु ले जाती है।
- जो व्यक्ति अपने भविष्य पर ध्यान रखता है, समय के अनुसार तुरंत सोचकर काम करता है, वह सुख पाता है। आलस्य मनुष्य का नाश कर देता है।
- जीवन से कभी निराश मत हो। पुण्य वही कमाता है जो जीवित है, इसलिए जीवन का त्याग करने का विचार कभी मन में नहीं लाना चाहिए।
- अच्छे आचरण से लंबी आयु मिलती है, उसी से संपत्ति और इस लोक व परलोक में अच्छी कीर्ति मिलती है।
व्यवहार की छोटी पर काम की बातें
- भोजन अकेले न खाएँ। अपनों के साथ खाएँ।
- धन कमाने की योजना बनाएँ तो किसी भरोसेमंद को साथ लें।
- यात्रा अकेले न करें।
- जहाँ सब सोए हों, वहाँ अकेले न जागते रहें।
राजधर्म (नेतृत्व) पर
- सत्ता सुख भोगने के लिए नहीं, बल्कि कड़ी मेहनत करके समाज का कल्याण करने के लिए होती है।
- शासक को अपने पुत्र और प्रजा में भेदभाव नहीं करना चाहिए। इसी से शासन मज़बूत और प्रजा समृद्ध होती है।
- मनुष्य को अपनी मातृभूमि सर्वोपरि रखनी चाहिए और हर परिस्थिति में उसकी रक्षा करनी चाहिए।
ईश्वर और ज्ञान पर
- अगर परमेश्वर से कुछ माँगना है, तो सिर्फ़ उनकी निश्छल भक्ति माँगो। भक्ति आ गई तो बाक़ी सब अपने आप मिल जाएगा।
- जैसे आकाश में पक्षियों के और जल में जलचरों के पदचिह्न नहीं दिखते, वैसे ही ज्ञानियों की गति भी आम लोगों की समझ में नहीं आती।
भीष्म नीति की 5 सबसे बड़ी सीख आज के जीवन के लिए
| भीष्म की बात | आज के जीवन में अर्थ |
|---|---|
| कामनाओं का त्याग श्रेष्ठ है | हर नई चीज़ की चाहत में दौड़ने की जगह संतोष सीखें |
| अहंकार सबसे बड़ा शत्रु | पद और पैसा आने पर विनम्र रहें |
| मीठे वचन बोलो | कड़वा बोलकर रिश्ते और करियर दोनों बिगड़ते हैं |
| आलस्य नाश करता है | काम को टालना सबसे महँगी आदत है |
| सत्ता सेवा के लिए है | नेतृत्व का मतलब टीम का भला करना है |
अगर मन बहुत निराश हो: भीष्म ने स्पष्ट कहा कि जीवन से कभी निराश नहीं होना चाहिए। अगर किसी को जीवन ख़त्म करने जैसे विचार आ रहे हों, तो तुरंत किसी अपने से बात करें, और भारत सरकार की मुफ़्त 24 घंटे वाली हेल्पलाइन Tele MANAS (14416) पर फ़ोन करें।
महाभारत और नीति ग्रंथ
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भीष्म नीति क्या है?
भीष्म नीति उन उपदेशों को कहते हैं, जो महाभारत युद्ध के बाद बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को दिए। ये उपदेश राजधर्म, सत्य, त्याग, संयम और जीवन जीने की कला पर हैं।
भीष्म नीति महाभारत में कहाँ है?
भीष्म के उपदेश मुख्य रूप से महाभारत के शांति पर्व और अनुशासन पर्व में आते हैं। शांति पर्व में राजधर्म, आपद्धर्म और मोक्षधर्म के उपदेश हैं।
भीष्म पितामह ने किसे उपदेश दिया था?
धर्मराज युधिष्ठिर को, जो युद्ध के बाद बहुत दुखी थे। श्रीकृष्ण स्वयं युधिष्ठिर को भीष्म के पास ले गए थे।
भीष्म नीति की सबसे बड़ी सीख क्या है?
सत्य सबसे बड़ा धर्म है, कामनाओं का त्याग उन्हें पूरा करने से श्रेष्ठ है, अहंकार सबसे बड़ा शत्रु है, और मीठी वाणी व संयम ही सुख का रास्ता है।
भीष्म पितामह कितने दिन बाणों की शय्या पर रहे?
महाभारत के अनुसार भीष्म लगभग 58 रातें बाणों की शय्या पर रहे, और सूर्य के उत्तरायण होने पर माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने देह त्यागी।
क्या विष्णु सहस्रनाम भीष्म ने सुनाया था?
हाँ। महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को भगवान विष्णु के हज़ार नाम, यानी विष्णु सहस्रनाम सुनाया था।
दम क्या है?
भीष्म के अनुसार दम यानी संयम सबसे बड़ा धर्म है, जिसमें क्षमा, धैर्य, सत्य, सरलता, इंद्रिय संयम, मीठी वाणी, संतोष और किसी को दुख न देना जैसे गुण आते हैं।
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