Top 100 Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit: कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे

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Top 100 Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit: इस लेख में आप संत कबीर दास जी के 100 से ज़्यादा प्रसिद्ध दोहे सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ेंगे। साथ में कबीर का छोटा सा परिचय, उनके सबसे मशहूर दोहे और परीक्षा के लिए “किसी एक दोहे का अर्थ 100 शब्दों में” का उदाहरण भी दिया गया है।

संत कबीर दास जी ने अपने दोहों के माध्यम से समाज में फैली बुराइयों, आडंबर और भेदभाव पर प्रहार किया और लोगों को सच्चे जीवन का रास्ता दिखाया। उनके एक एक शब्द का अर्थ बहुत गहरा है, और छह सौ साल बाद भी ये दोहे उतने ही काम के हैं।

विषय सूची

संत कबीर दास: एक छोटा सा परिचय

कबीर दास पंद्रहवीं सदी के महान संत और कवि थे। माना जाता है कि उनका जन्म काशी (वाराणसी) में हुआ और उनका पालन पोषण नीरू और नीमा नाम के एक जुलाहा (बुनकर) दंपति ने किया। कबीर ने खुद भी जीवन भर कपड़ा बुनने का काम किया। उनके गुरु संत रामानंद माने जाते हैं।

सुबह की धुंध में वाराणसी का घाट और गंगा में नाव
काशी (वाराणसी), जहाँ कबीर का जीवन बीता

कबीर ने कोई किताब खुद नहीं लिखी, उनके शिष्यों ने उनकी वाणी को इकट्ठा किया। उनकी रचनाएँ मुख्य रूप से बीजक में मिलती हैं, जिसके तीन भाग हैं: साखी (दोहे), सबद (पद) और रमैनी। उनके कई पद सिख धर्म के गुरु ग्रंथ साहिब में भी शामिल हैं। कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी या “पंचमेल खिचड़ी” कहा जाता है, क्योंकि इसमें अवधी, ब्रज, भोजपुरी, राजस्थानी और पंजाबी जैसी कई बोलियों के शब्द मिलते हैं। जीवन के अंत में वे मगहर चले गए और वहीं उन्होंने शरीर छोड़ा।

कबीर के सबसे प्रसिद्ध दोहे

ये वे दोहे हैं जो लगभग हर भारतीय ने कभी न कभी सुने हैं। पहले इन्हें पढ़िए, फिर नीचे 100 दोहों की पूरी सूची है।

बुरा जो देखन मैं चला

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

हिंदी अर्थ: मैं दुनिया में बुरे इंसान को खोजने निकला, पर कोई बुरा नहीं मिला। जब मैंने अपने ही दिल में झाँका, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है। यानी दूसरों में कमियाँ ढूँढने से पहले अपने भीतर देखिए।

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥

हिंदी अर्थ: मोटी मोटी किताबें पढ़ते पढ़ते दुनिया चली गई, पर कोई सच्चा ज्ञानी नहीं बना। जिसने प्रेम के ढाई अक्षर पढ़ लिए, यानी प्रेम को सच में समझ लिया, वही असली विद्वान है।

माटी कहे कुम्हार से

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय।
इक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूँगी तोय॥

हिंदी अर्थ: मिट्टी कुम्हार से कहती है, आज तू मुझे पैरों से रौंद रहा है, पर एक दिन ऐसा आएगा जब मैं तुझे रौंदूँगी, यानी मृत्यु के बाद तू भी मिट्टी में मिल जाएगा। इसलिए किसी चीज़ का घमंड मत करो।

कुम्हार के बनाए मिट्टी के घड़े
माटी कहे कुम्हार से: एक दिन सब मिट्टी में मिलना है

गुरु गोविंद दोऊ खड़े

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूँ पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥

हिंदी अर्थ: गुरु और भगवान दोनों सामने खड़े हैं, पहले किसके पैर छुऊँ? मैं अपने गुरु पर बलिहारी जाता हूँ, क्योंकि उन्हीं ने मुझे भगवान तक पहुँचने का रास्ता बताया।

ऐसी बानी बोलिए

ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करे, आपहु सीतल होय॥

हिंदी अर्थ: अहंकार छोड़कर ऐसी मीठी वाणी बोलिए जो सुनने वाले के मन को शांति दे, और बोलने वाले को भी सुकून मिले।

धीरे धीरे रे मना

धीरे धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय।
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥

हिंदी अर्थ: हे मन, धीरज रख, हर काम अपने समय पर होता है। माली चाहे पेड़ को सौ घड़े पानी से सींच दे, फल तो मौसम आने पर ही लगेगा।

बड़ा हुआ तो क्या हुआ

बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥

हिंदी अर्थ: सिर्फ़ बड़ा होने से कोई महान नहीं बनता, जैसे खजूर का पेड़: बहुत ऊँचा है, पर न राहगीर को छाया देता है, और उसके फल भी इतनी ऊँचाई पर हैं कि आसानी से तोड़े नहीं जा सकते। बड़प्पन वही है जो दूसरों के काम आए।

कबीर के किसी एक दोहे का अर्थ 100 शब्दों में

स्कूल की परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है: “कबीर के किसी एक दोहे का अर्थ 100 शब्दों में लिखिए।” एक नमूना उत्तर:

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय।
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥

इस दोहे में संत कबीर दास जी आत्मनिरीक्षण का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जब मैं संसार में बुरे व्यक्ति को खोजने निकला, तो मुझे कोई बुरा नहीं मिला। लेकिन जब मैंने अपने मन के भीतर झाँककर देखा, तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है। इसका अर्थ है कि मनुष्य को दूसरों के दोष गिनने के बजाय अपने अवगुणों को पहचानना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी कमियों को देख लेता है, वही उन्हें सुधार सकता है। यह दोहा हमें विनम्रता, आत्मसुधार और दूसरों के प्रति सहनशीलता की सीख देता है।

100 प्रसिद्ध दोहे, हिंदी अर्थ सहित

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे (Popular Dohe of Kabir Das)

Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit
Kabir ke Dohe Hindi Arth Sahit

दोहा 01

अंत कतरनी जीभ रस, नैनों उपला नेह ।
ताकी संगति रामजी, सपनेहू मद देह ॥

हिंदी अर्थ: वह व्यक्ति जिसके दिल में बुरी भावना होती है, आँखों में स्नेह और होंठों पर मिठास, हे भगवन्, सपने में भी मुझे ऐसी संगत में जाने मत देना।

यदि आपको किसी व्यक्ति की मंशा और कार्यों में दोहरापन नजर आता है तो यह जान लीजिए कि वह व्यक्ति ऐसा नहीं, जिसकी संगत में आपको रहना चाहिए।

दोहा 02

हिये कतरनी जीभ रस, मुख बोलन का रंग ।
आगे भले पीछे बुरा, ताको तजिए संग ॥

हिंदी अर्थ: वह जो मीठी बोली बोलता है और जिसमें वाक्पटुता होती है, यदि वह आपके सामने कुछ और पीछे कुछ और बोलता है तो उससे भी बचिए।

ऐसे लोग अपने विचार, अपना पक्ष और स्थान बदल सकते हैं।

दोहा 03

आगे दरपन ऊजला, पीछै विषम विवकार ।
आगे पीछे आरसी, क्यो न पड़े मुखछार ॥

हिंदी अर्थ: दर्पण का एक उजला और एक काला पक्ष होता है, जो दो-दो चेहरे रखते हैं, उन्हें आलोचना सहनी पड़ती है। चमकनेवाली हर चीज सोना नहीं होती।

हर कोई जो सही बात कहता है, जरूरी नहीं कि उसकी मंशा भी सही हो। इस बात को लेकर सतर्क रहें कि आप किससे बात करते हैं और क्या बात करते हैं।

दोहा 04

कछु कहि नीच न छेडि़ए, भलो न वाको संग ।
पत्थर डारे कीच में, उछलि बिगाड़े अंग ॥

हिंदी अर्थ: बुरे लोगों का संग खतरनाक होता है, यदि आप कीचड़ में पत्थर फेंकेंगे, तो गंदगी आपके ऊपर ही आएगी।

दोहा 05

कबीर सो धन संचिए, जो आगे को होय ।
सीस चढ़ाए गाठरी, जात न देखा कोय ॥

हिंदी अर्थ: कबीर कहते हैं, ऐसे तरीके अपनाइए और सम्मान इस प्रकार हासिल कीजिए, जो टिकाऊ हो, जो मौजूदा समय और हालात से आगे भी बरकरार रहे।

सच्चे रास्ते पर चलकर सम्मान हासिल करो; क्योंकि विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा के बिना सफलता न केवल खोखली, बल्कि लँगड़ी भी होती है।

दोहा 06

खट्टा-मीठा चरपरा, जिभ्या सब रस लेय ।
चारों कुतिया मिलि गई, पहरा किसका देय ॥

कबीर कहते हैं, हम जो कुछ खाते हैं, उसके लिए जीभ को संरक्षक का कार्य करना चाहिए, ताकि हमारी सेहत का खयाल रखा जा सके। यह दुःखद है कि जीभ स्वाद का गुलाम बन जाता है और सिर्फ स्वाद को संतुष्ट करने लगता है, जिससे शरीर का स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है।

कुत्ते से अपेक्षा की जाती है कि वह हमारे घर की रखवाली करेगा। यदि कुत्ता चोरों से मिल जाए तो समझिए तबाही निश्चित है।

दोहा 07

कबीर तहाँ न जाइए, जहाँ न चोखा चीत ।
परपूटा औगुण घना, मुहड़े ऊपर मीत ॥

हिंदी अर्थ: कबीर, वहाँ मत जाइए जहाँ नीयत साफ न हो, पीठ पीछे आपकी आलोचना करते हैं, लेकिन सामने दोस्त बने रहते हैं।

कबीर हमें सुझाव देते हैं कि हमें साफ नीयतवाले लोगों की संगत में रहना चाहिए, ऐसे लोग जो दूसरों का बुरा नहीं चाहते, अपने विचार अकसर नहीं बदलते और सिर्फ अपनी स्थिति को बनाए रखने की प्रेरणा से काम करते हैं, जबकि साफ नीयत न रखनेवाले हमारी सोच को संकीर्ण बना देते हैं।

वे ऐसे होते हैं, जो मुँह पर हमारी तारीफ करते हैं , लेकिन पीठ पीछे कुछ और ही कहते हैं। हमें जल्दी ही यह पता चल जाता है और अविश्वास की एक परत दिखने लगती है, जिसके कारण बातचीत में बनावटीपन आ जाता है।

दोहा 08

कबीर तहाँ न जाइए, जहाँ कपट को हेत ।
नौ मन बीज जू बोय के, खाली रहेगा खेत ॥

हिंदी अर्थ: कबीर, वहाँ मत जाइए, जहाँ धोखा देने की नीयत हो। बोरी बीज से भरी क्यों न हो, खराब मिट्टी में फसल नहीं उगेगी। अच्छी फसल के लिए अच्छी मिट्टी चाहिए। ऐसी जमीन, जिसमें सही गुण न हों, उस पर अगर एक बोरी बीज भी डाल दिए जाएँ तो भी फसल नहीं उग सकती है।

आप जिस संगत में रहते हैं, वह बिल्कुल ऐसी ही होती है। हम चाहे कुशाग्र, बुद्धिमान, सक्षम और काबिल क्यों न हों, गलत संगत में ज्यादा समय बिताने से हमारा उत्साह समाप्त हो सकता है, क्षमता कुंद पड़ सकती है और अधिक तथा बेहतर करने की प्रेरणा समाप्त हो सकती है।

दोहा 09

पंडित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय ।
वह अक्षर इनमें नहीं, हसि दे भावै रोय ॥

हिंदी अर्थ: आप जितनी पुस्तकें पढ़ते हैं, उन सभी में ज्ञान है, किंतु यह ज्ञान नहीं कि उदास चेहरे पर मुसकान कैसे लाई जाए। कबीर ऐसे इनसान से कहते हैं कि उसे न सिर्फ किताबों, शब्दजाल और सिद्धांतों पर भरोसा करना चाहिए, बल्कि उसमें अन्य मनुष्यों के साथ जुड़ने की क्षमता भी होनी चाहिए।

सच यही है कि चाहे कितने ही सिद्धांत क्यों न दिए गए हों, किसी में भी रोते इनसान को हँसा देने की क्षमता नहीं है।

दोहा 10

हेत प्रीति से जो मिले, तासों मिलिए धाय ।
अंतर राखी जो मिलै, तासो मिले बलाय ॥

हिंदी अर्थ: जो सच्चे स्नेह से मिले, उससे खूब प्रेम से मिलिए, किंतु उससे बचिए, जिसके दिल में बुरी भावना है।

दोहा 11

सोऊँ तो सुपनै मिलूँ, जागूँ तो मन मांहि ।
लोचन राता सुधि हरी, बिछुरत कबहूँ नांहि ॥

हिंदी अर्थ: सपनों में जब मैं सोता हूँ, विचारों में जब जागता हूँ, तुम्हारी खोज में आँखें लाल हो जाती हैं, मेरी प्रार्थना है कि आप कभी दूर न रहें।

दोहा 12

एक साधै सब सधे, सब साधै सब जाय ।
माली सीचै मूल को, फूलै फलै अघाय ॥

हिंदी अर्थ: एक पर ध्यान लगाएँगे तो सबकुछ मिल सकता है। सब पर ध्यान लगाइए और सबकुछ खो जाएगा। वह जो जड़ों को सींचता है, उसे फल और फूल का आनंद मिलता है।

वे मानते हैं कि जब हमारा लक्ष्य एक होता है, तब हम उन सभी को एक ही समय में हासिल कर पाते हैं, लेकिन हमारा प्रयास जब सबको एक साथ हासिल करने का होता है, तो सबके विफल होने की आशंका रहती है। हम जब जड़ों की, सिर्फ जड़ों की देखभाल करते हैं, तब पूरा पौधा फल-फूल जाता है।

दोहा 13

दोष पराया देखकर, चले हसंत हसंत ।
अपना याद न आवई, जाका आदि न अंत ॥

हिंदी अर्थ: तुम दूसरों की कमियों पर हँसते हो और अपनी याद नहीं रखते, जिनकी कोई सीमा नहीं है। दूसरों की गलतियाँ निकालना और उन पर टिप्पणी करना न केवल आसान होता है , बल्कि उनके समाधान सुझा देना भी सरल होता है।

अपने अंदर की कमी का पता लगाना और देखना न केवल कठिन होता है, बल्कि उनमें सुधार भी कठिन होता है। हमारे अंदर जो अनुचित है, उसकी कोई सीमा नहीं होती। दूसरों की कमी का मजा उठाने की बजाय यहीं से शुरुआत क्यों न करें।

दोहा 14

हीरा पाया पारखी, घन मह दिन्हा आन ।
चोट सही फुटा नहीं, तब पाई पहचान ॥

हिंदी अर्थ: हीरे की पहचान तब होती है, जब उस पर हथौड़े से चोट की जाती है। चोट करने पर जब वह नहीं टूटता, तभी पता चलता है कि वह हीरा है।

दोहा 15

सूरा के मैदान में, कायर फंदा आय ।
ना भाजै न लडि़ सकै, मन-ही-मन पछिताय ॥

हिंदी अर्थ: बहादुरी के मैदान में कायर व्यक्ति फँसकर रह जाता है। वह न तो भाग पाता है, न ही लड़ पाता है, और इस तरह से वह मन-ही-मन में पछताता रहता है।

दोहा 16

साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधु नाहि ॥

हिंदी अर्थ: बुद्धिमान व्यक्ति धन का नहीं, प्रसिद्धि का भूखा होता है। जो सिर्फ धन की चाह रखते हैं, वे बुद्धिमान नहीं होते।

दोहा 17

आषा तजि माया तजे, मोह तजै अरु मान ।
हरष शोक निंदा तजै कहै कबीर सन्त जान ॥

हिंदी अर्थ: न कोई आकांक्षा, न मोह, न ही घमंड। न कोई जश्न, न निंदा, बुद्धिमान की दशा ऐसी ही होती है।

दोहा 18

चर्चा करुं तब चौहटे, ज्ञान करो तब दाए ।
ध्यान धरो तब एकिला, और न दुजा कोय ॥

हिंदी अर्थ: चर्चा चार लोगों से होती है, ज्ञान के लिए दो लोग चाहिए, लेकिन सोचने और फैसला लेने का काम स्वयं करना पड़ता है।

दोहा 19

कबीर तेई पीर है, जे जानै पर पीर ।
जे पर पीर न जानही, ते काफिर बे पीर ॥

हिंदी अर्थ: बुद्धिमान वह है, जो दूसरों की पीड़ा को समझता है, जो नहीं समझता, बुद्धिमान नहीं है।

दोहा 20

जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ ।
मैं बपुरा बूड़न डरा, रहा किनारे बैठ ॥

हिंदी अर्थ: आपको धन चाहिए, जो गहरे पानी में ही मिल सकता है, मैं तो डर से किनारे पर ही बैठा रहा। हमें मोती गहराई में मिलते हैं और सीप तट पर मिलता है। ज्ञान तभी मिलता है, जब हम उसकी गहराई में डूब जाते हैं। काम पहचान का स्रोत तभी बनता है, जब हम अपने आपको गहराई में डुबा लेते हैं।

दोहा 21

जो मन लागे एक सों, तो निरुवार जाय ।
तूरा दो मुख बाजता, घना तमाचा खाय ॥

हिंदी अर्थ: एक पर ध्यान केंद्रित करने से निर्णय सुनिश्चत हो जाते हैं, दो मुँहा ढोल तो बस पिटता रह जाता है।

दोहा 22

निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय ।
बिन पानी साबुन बिना, निरमल करै सुभाय ॥

हिंदी अर्थ: आलोचक की संगत में रहिए, जो पानी या साबुन के बिना भी आपको स्वच्छ कर देता है।

दोहा 23

कबीर निंदक मर गया, अब क्या कहिए जाए ।
ऐसा कोई न मिले, बीड़ा ले उठाए ॥

हिंदी अर्थ: आलोचक की मृत्य हो गई, अब क्या कहा जाए? ऐसा कोई नहीं बचा, जो मुझमें सुधार की जिम्मेदारी उठा सके।

दोहा 24

कबीर चिंता क्या करे, चिंता सों क्या होय ।
चिंता तो हरि ही करे, चिंता करो न कोय ॥

हिंदी अर्थ: चिंता मत करो, क्योंकि चिंता करने से वैसे भी क्या हो जाता है? तुम अपनी चिंता मत करो, यह काम संसार को करने दो।

दोहा 25

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक ।
जो पै भीतर लखि परे, भीतर बाहिर एक ॥

हिंदी अर्थ: आप जो बाहर है, उसकी बात करते हैं, जो अंदर रहता है, उसपर विचार नहीं करते। यदि आप अपने अंदर से जुड़ जाएँ तो एकता अंदर और बाहर की स्थापित हो जाएगी।

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