
Chhath puja vrat katha और विधि जानने से पहले एक बात: छठ सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। चार दिन का यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित है, जिसमें व्रती 36 घंटे तक बिना पानी के रहते हैं और नदी या तालाब के घाट पर डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हैं।
इस पेज पर छठी मैया की पूरी कथा, चारों दिन की पूजा विधि क्रम से, सामग्री की सूची और ठेकुआ बनाने का तरीका एक जगह है। घाट पर कथा पढ़ने के लिए इस पेज को अभी बुकमार्क कर लीजिए।
विषय सूची
छठ पूजा 2026: चारों दिन की तारीख
| दिन | अनुष्ठान | तारीख |
|---|---|---|
| पहला | नहाय खाय | शुक्रवार, 13 नवंबर 2026 |
| दूसरा | खरना | शनिवार, 14 नवंबर 2026 |
| तीसरा | संध्या अर्घ्य (डूबते सूर्य को) | रविवार, 15 नवंबर 2026 |
| चौथा | उषा अर्घ्य (उगते सूर्य को) और पारण | सोमवार, 16 नवंबर 2026 |
अर्घ्य का समय आपके शहर के सूर्यास्त और सूर्योदय से तय होता है, इसलिए सही समय स्थानीय पंचांग से देख लें और घाट पर कम से कम आधा घंटा पहले पहुँचें।
छठ व्रत कथा: राजा प्रियव्रत और षष्ठी माता

बहुत समय पहले प्रियव्रत नाम के एक राजा थे, जो स्वायंभुव मनु के पुत्र माने जाते हैं। उनकी रानी का नाम मालिनी था। राज्य में सब कुछ था, पर राजा और रानी के कोई संतान नहीं थी, और यही दुख उन्हें भीतर ही भीतर खाता रहता था।
एक दिन महर्षि कश्यप ने राजा को पुत्रकामेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ पूरी विधि से हुआ, और उसके प्रसाद से रानी गर्भवती हुईं। पूरा राज्य ख़ुशी से भर गया।
पर जब बालक का जन्म हुआ, तो वह जीवित नहीं था। राजा प्रियव्रत यह दुख सह नहीं पाए। वे शिशु को लेकर श्मशान गए और शोक में डूबकर स्वयं भी प्राण त्याग देने को तैयार हो गए।
तभी आकाश से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं। उन्होंने कहा: “राजन, मैं षष्ठी देवी हूँ। मैं संसार के सभी बच्चों की रक्षा करती हूँ और निःसंतान दंपतियों को संतान का सुख देती हूँ।” इतना कहकर देवी ने मृत शिशु को स्पर्श किया, और वह बालक जीवित होकर रोने लगा।
राजा देवी के चरणों में गिर पड़े। देवी ने कहा कि जो कोई सच्चे मन से उनकी पूजा करेगा, उसकी संतान सुखी और दीर्घायु होगी। उस दिन से राजा प्रियव्रत ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को षष्ठी देवी की पूजा शुरू की, और तभी से यह व्रत चला आ रहा है। षष्ठी देवी को ही लोक भाषा में छठी मैया कहा जाता है।
यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण से जुड़ी मानी जाती है। अलग-अलग जगहों पर इसके छोटे विवरण थोड़े अलग सुनाए जाते हैं, पर मूल कथा यही है।
छठ से जुड़ी और कथाएँ
- सूर्यपुत्र कर्ण: महाभारत के कर्ण सूर्य देव के पुत्र थे। मान्यता है कि वे रोज़ घंटों पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे, और पानी में खड़े होकर अर्घ्य देने की परंपरा उन्हीं से जुड़ी मानी जाती है।
- द्रौपदी का व्रत: एक कथा के अनुसार जब पांडव अपना राज्य हार गए, तब द्रौपदी ने यह व्रत रखा, और उसके बाद पांडवों को उनका राज्य वापस मिला।
- श्रीराम और सीता: एक मान्यता यह भी है कि वनवास से लौटने के बाद श्रीराम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को सूर्य की उपासना की थी।
डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य क्यों?
छठ अकेला ऐसा बड़ा पर्व है जिसमें डूबते सूर्य की भी पूजा होती है। मान्यता है कि संध्या अर्घ्य सूर्य की पत्नी प्रत्यूषा (सूर्य की अंतिम किरण) को और उषा अर्घ्य उषा (सूर्य की पहली किरण) को समर्पित होता है। इसकी एक सीधी सीख भी है: जो ढल रहा है, उसका सम्मान भी उतना ही ज़रूरी है जितना उसका जो उग रहा है।
छठ पूजा विधि: चारों दिन क्रम से

पहला दिन: नहाय खाय (13 नवंबर)
- सुबह जल्दी उठकर नदी, तालाब या घर पर स्नान करें और घर की अच्छी तरह सफ़ाई करें।
- व्रती दिन में एक बार सात्विक भोजन करते हैं, जो बिना लहसुन और प्याज़ के बनता है। ज़्यादातर घरों में लौकी (कद्दू) की सब्ज़ी, चने की दाल और चावल बनता है, इसलिए इसे “कद्दू भात” भी कहते हैं।
- भोजन अक्सर मिट्टी के चूल्हे पर या नए बर्तनों में बनता है। नमक के इस्तेमाल को लेकर घरों की परंपरा अलग है, अपने घर की रीति मानें।
दूसरा दिन: खरना (14 नवंबर)
- व्रती पूरे दिन बिना पानी के उपवास रखते हैं।
- शाम को गुड़ की खीर (रसियाव), घी लगी रोटी और केले का प्रसाद बनता है। इसमें चीनी नहीं डाली जाती।
- पूजा के बाद व्रती यही प्रसाद ग्रहण करते हैं, और फिर परिवार में बाँटा जाता है।
- इसी प्रसाद के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है, जो चौथे दिन उषा अर्घ्य के बाद खुलता है।
तीसरा दिन: संध्या अर्घ्य (15 नवंबर)
- दिन में ठेकुआ और बाकी प्रसाद तैयार किया जाता है।
- बाँस के सूप और दउरा (टोकरी) में ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल और बाकी सामग्री सजाई जाती है।
- शाम को पूरा परिवार छठ के गीत गाते हुए घाट पर जाता है।
- व्रती पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को दूध और जल से अर्घ्य देते हैं, और सूप को सूर्य की ओर उठाकर प्रणाम करते हैं।
- कई परिवारों में इस रात घर या घाट पर “कोसी भरी” जाती है: गन्ने के डंठलों के बीच दीये जलाकर पूजा की जाती है।
चौथा दिन: उषा अर्घ्य और पारण (16 नवंबर)

- सूर्योदय से पहले व्रती फिर उसी घाट पर पहुँचते हैं और पानी में खड़े होकर सूर्य के उगने का इंतज़ार करते हैं।
- उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, और छठी मैया से परिवार की सुख-शांति की कामना की जाती है।
- घाट पर प्रसाद बाँटा जाता है, और बड़ों का आशीर्वाद लिया जाता है।
- घर लौटकर व्रती प्रसाद और जल ग्रहण करके व्रत खोलते हैं। इसे पारण कहते हैं।
पूजा का तरीका हर क्षेत्र और परिवार में थोड़ा अलग होता है। जहाँ फ़र्क हो, वहाँ अपने घर के बड़ों की रीति को ही मानें।
छठ पूजा सामग्री सूची

- बाँस का सूप और दउरा (टोकरी)
- पीतल या ताँबे का लोटा, अर्घ्य के लिए
- मिट्टी के दीये, घी और बाती
- ठेकुआ (बनाने का तरीका नीचे है)
- गन्ना, केले का घौद, नारियल (पानी वाला)
- मौसमी फल: सिंघाड़ा, बड़ा नींबू (डाभ), शरीफ़ा, सेब, संतरा
- अदरक और हल्दी के हरे पौधे, मूली, सुथनी, शकरकंद
- चावल के लड्डू, अक्षत और सिंदूर
- दूध, अर्घ्य के लिए
- व्रती के लिए नए कपड़े: साड़ी या धोती
सारा सामान अलग-अलग न ख़रीदना हो तो छठ पूजा सामग्री की तैयार किट भी मिलती है।
ठेकुआ कैसे बनाएँ
ठेकुआ छठ का सबसे ज़रूरी प्रसाद है। लगभग 25 से 30 ठेकुआ के लिए:
- गुड़ घोलें: लगभग 250 ग्राम गुड़ को आधा कप गुनगुने पानी में घोल लें और छान लें।
- आटा तैयार करें: 500 ग्राम गेहूँ के आटे में 4 बड़े चम्मच घी, 2 बड़े चम्मच कद्दूकस किया सूखा नारियल, आधा चम्मच पिसी इलायची और थोड़ी सौंफ मिलाएँ।
- गूँथें: गुड़ के पानी से सख़्त आटा गूँथें। आटा नरम होगा तो ठेकुआ फैल जाएगा।
- आकार दें: छोटी लोई लेकर ठेकुआ के साँचे पर दबाएँ, या हथेली से चपटा करके कांटे से डिज़ाइन बनाएँ।
- तलें: घी या तेल को मध्यम आँच पर गरम करें और ठेकुआ को धीमी से मध्यम आँच पर दोनों तरफ़ सुनहरा भूरा होने तक तलें। तेज़ आँच पर बाहर से जल जाएँगे और अंदर से कच्चे रहेंगे।
- ठंडा करें: ठंडे होकर ठेकुआ कुरकुरे हो जाते हैं और कई दिन तक ख़राब नहीं होते।
प्रसाद बनाते समय पूरी सफ़ाई रखी जाती है, और कई घरों में व्रती स्वयं ही ठेकुआ बनाते हैं।
व्रत और घाट पर सावधानी
- सेहत पहले: 36 घंटे का निर्जला व्रत शरीर के लिए कठिन है। बुज़ुर्ग, गर्भवती महिलाएँ, या जिन्हें डायबिटीज़, बीपी या कोई और बीमारी है, वे डॉक्टर से पूछकर ही यह व्रत रखें।
- गहरे पानी से दूर: अर्घ्य के लिए कमर तक पानी काफ़ी है। अनजान घाट पर गहरे पानी में न जाएँ।
- बच्चों का ध्यान: घाट पर भारी भीड़ होती है। बच्चों का हाथ पकड़े रखें, और उनकी जेब में घर का फ़ोन नंबर लिखकर रखें।
- पटाखे और दीये: भीड़ में पटाखे न चलाएँ, और दीयों को कपड़ों से दूर रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ पूजा 2026 कब है?
छठ पूजा 13 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को नहाय खाय से शुरू होगी। मुख्य संध्या अर्घ्य 15 नवंबर (रविवार) को और उषा अर्घ्य 16 नवंबर (सोमवार) को है।
छठी मैया कौन हैं?
छठी मैया षष्ठी देवी हैं, जिन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। लोक मान्यता में उन्हें सूर्य देव की बहन भी कहा जाता है। छठ में सूर्य देव और छठी मैया, दोनों की पूजा होती है।
छठ का 36 घंटे का निर्जला व्रत कब शुरू होता है?
खरना (दूसरे दिन) की शाम प्रसाद ग्रहण करने के बाद 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है, जो चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद पारण से खुलता है।
क्या पुरुष भी छठ का व्रत रख सकते हैं?
हाँ। छठ का व्रत महिलाएँ और पुरुष दोनों रखते हैं, और कई घरों में पुरुष व्रती भी पानी में खड़े होकर अर्घ्य देते हैं।
ठेकुआ में चीनी डाल सकते हैं क्या?
परंपरा में ठेकुआ गुड़ से ही बनता है। खरना की खीर में भी चीनी नहीं, गुड़ डाला जाता है।
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