
धनतेरस (Dhanteras) दिवाली के पाँच दिन के उत्सव का पहला दिन है। यह कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है, इसलिए इसे धनत्रयोदशी भी कहते हैं। इस दिन आयुर्वेद के देवता भगवान धन्वंतरि, धन की देवी माता लक्ष्मी और धन के रक्षक कुबेर जी की पूजा होती है, और शाम को यमराज के लिए दीपदान किया जाता है, ताकि घर में किसी की अकाल मृत्यु न हो।
इस पेज पर Dhanteras puja vidhi यानी धनतेरस पूजा विधि के साथ धनतेरस 2026 की तारीख़ और शुभ मुहूर्त, धनतेरस की तीनों कथाएँ, घर पर पूजा का पूरा क्रम, यम दीपदान की विधि और मंत्र, धनतेरस पर क्या ख़रीदें और क्या नहीं, पूजा सामग्री और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, सब एक जगह दिए गए हैं।
विषय सूची
धनतेरस 2026 कब है? शुभ मुहूर्त
धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है। इसी शाम धनतेरस की पूजा और यम दीपदान दोनों होंगे।
| बात | जानकारी |
|---|---|
| धनतेरस की तारीख़ | शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 |
| धनतेरस पूजा का मुहूर्त | शाम 6:02 से 7:57 बजे तक (1 घंटा 56 मिनट) |
| प्रदोष काल | शाम 5:33 से 8:09 बजे तक |
| वृषभ काल (स्थिर लग्न) | शाम 6:02 से 7:57 बजे तक |
| त्रयोदशी तिथि शुरू | 6 नवंबर 2026, सुबह 10:30 बजे |
| त्रयोदशी तिथि समाप्त | 7 नवंबर 2026, सुबह 10:47 बजे |
| यम दीपदान | 6 नवंबर की शाम, प्रदोष काल में |
| किसकी पूजा | भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी, गणेश जी, कुबेर जी, और यमराज के लिए दीपदान |
ऊपर के समय Drik Panchang के अनुसार नई दिल्ली के हैं। दूसरे शहरों में सूर्यास्त के हिसाब से समय कुछ मिनट आगे पीछे होगा, इसलिए अपने शहर का मुहूर्त एक बार ज़रूर देख लें।
पूजा शाम को ही क्यों? धनतेरस की पूजा प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद के लगभग ढाई घंटे) में करना सबसे अच्छा माना जाता है। इसमें भी वृषभ लग्न का समय ख़ास है, क्योंकि यह “स्थिर लग्न” है, और मान्यता है कि स्थिर लग्न में पूजा करने से लक्ष्मी घर में स्थिर रहती हैं। 2026 में पूरा वृषभ काल प्रदोष काल के अंदर पड़ रहा है, इसलिए शाम 6:02 से 7:57 बजे का समय सबसे शुभ है।
ख़रीदारी कब करें? त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर को सुबह 10:30 बजे शुरू होकर 7 नवंबर सुबह 10:47 बजे तक है। धनतेरस की ख़रीदारी के लिए त्रयोदशी का यह समय शुभ माना जाता है, और ज़्यादातर लोग 6 नवंबर को दिन में या शाम को पूजा से पहले ख़रीदारी कर लेते हैं।
धनतेरस क्यों मनाते हैं?
- भगवान धन्वंतरि का प्रकट होना: मान्यता है कि समुद्र मंथन के समय इसी दिन भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसलिए यह दिन धन्वंतरि जयंती भी है, और इस दिन अच्छे स्वास्थ्य के लिए उनकी पूजा होती है।
- यमराज के लिए दीपदान: राजा हिम के बेटे की कथा से जुड़ी परंपरा है कि इस शाम घर के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीपक जलाने से परिवार में अकाल मृत्यु का डर नहीं रहता।
- लक्ष्मी और कुबेर की पूजा: दिवाली से दो दिन पहले घर में लक्ष्मी जी के स्वागत की तैयारी शुरू होती है। नए बर्तन, सोना, चाँदी ख़रीदकर उनकी पूजा की जाती है, ताकि घर में साल भर धन धान्य बना रहे।
“धनतेरस” नाम का अर्थ: धन + तेरस। “तेरस” यानी त्रयोदशी, महीने के पक्ष का तेरहवाँ दिन। कई विद्वान मानते हैं कि नाम में “धन” भगवान धन्वंतरि से आया है, यानी असली धन अच्छा स्वास्थ्य है। समय के साथ यह दिन धन संपत्ति की ख़रीदारी से भी जुड़ गया।
2016 से 2024 तक भारत सरकार धन्वंतरि जयंती यानी धनतेरस के दिन ही राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाती थी। 2025 से आयुर्वेद दिवस हर साल 23 सितंबर को मनाया जाता है, पर धन्वंतरि जयंती की पूजा धनतेरस पर ही होती है।
धनतेरस की कथा 1: राजा हिम के बेटे और यमराज की कथा

यही कथा यम दीपदान की कथा भी कहलाती है।
प्राचीन समय में हिम नाम के एक राजा थे। बहुत समय बाद उनके घर एक बेटे का जन्म हुआ। राजा ने ज्योतिषियों को बुलाकर बेटे की कुंडली दिखाई। ज्योतिषियों ने चिंता से बताया: “महाराज, जिस दिन इस राजकुमार का विवाह होगा, उसके चौथे दिन साँप के काटने से इसकी मृत्यु हो जाएगी।”
राजा और रानी बहुत दुखी हुए। समय बीता और राजकुमार सोलह साल का हो गया। उसका विवाह एक बहुत समझदार राजकुमारी से हुआ। राजकुमारी को जब यह भविष्यवाणी पता चली, तो उसने तय किया कि वह अपने पति को किसी भी हाल में बचाएगी।
विवाह के चौथे दिन की रात राजकुमारी ने अपने पति को सोने नहीं दिया। उसने पूरे महल में और कमरे के चारों ओर ढेर सारे दीपक जला दिए। कमरे के दरवाज़े पर उसने अपने सोने चाँदी के सारे गहने और सिक्के ढेर बनाकर रख दिए। फिर वह पूरी रात पति को कहानियाँ और गीत सुनाती रही, ताकि उन्हें नींद न आए।
आधी रात को यमराज साँप का रूप लेकर राजकुमार के प्राण लेने आए। पर दीपकों की तेज़ रोशनी और सोने चाँदी की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे कमरे के अंदर नहीं जा सके और दरवाज़े पर रखे गहनों के ढेर पर बैठ गए। वहाँ बैठे बैठे वे राजकुमारी की कहानियाँ और गीत सुनते रहे।
ऐसे ही सुबह हो गई, और मृत्यु का समय निकल गया। यमराज चुपचाप लौट गए। राजकुमारी की समझदारी और भक्ति से उसके पति के प्राण बच गए।
उसी दिन से कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की रात यमराज के लिए दीपक जलाने की परंपरा शुरू हुई, जिसे यम दीपदान कहते हैं। इसी कथा के कारण धनतेरस पर घर में रोशनी करने और सोना चाँदी ख़रीदने की परंपरा भी मानी जाती है।
एक और कथा: यमदूतों का प्रश्न
एक दूसरी कथा के अनुसार, एक बार यमराज ने अपने दूतों से पूछा: “क्या कभी किसी के प्राण लेते समय तुम्हें दया आई?” दूतों ने बताया कि एक बार एक राजकुमार के प्राण उसके विवाह के चौथे दिन ही लेने पड़े, और उसकी नई नवेली पत्नी का रोना देखकर उनका मन भी काँप गया था।
दूतों ने पूछा: “महाराज, क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से बच सके?” यमराज ने कहा: “जो मनुष्य कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की शाम मेरे नाम से दक्षिण दिशा में दीपक जलाएगा, उसे और उसके परिवार को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहेगा।”
धनतेरस की कथा 2: समुद्र मंथन और भगवान धन्वंतरि
एक बार देवताओं और असुरों ने मिलकर अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथानी बनाया गया और वासुकि नाग को रस्सी। मंथन से एक के बाद एक चौदह रत्न निकले, जिनमें कामधेनु गाय, ऐरावत हाथी, कल्पवृक्ष और माता लक्ष्मी भी थीं।
सबसे अंत में भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत से भरा कलश लेकर प्रकट हुए। वे भगवान विष्णु के अंश माने जाते हैं, और उन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का वैद्य कहा जाता है। मान्यता है कि वे कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए थे, इसलिए यह दिन धन्वंतरि जयंती के रूप में मनाया जाता है।
धन्वंतरि जी प्रकट होते समय हाथ में कलश लिए हुए थे, इसलिए धनतेरस पर बर्तन, ख़ासकर पीतल के बर्तन ख़रीदने की परंपरा है। पीतल को भगवान धन्वंतरि की प्रिय धातु माना जाता है।
धनतेरस की कथा 3: लक्ष्मी जी और किसान की कथा
एक बार भगवान विष्णु पृथ्वी पर घूमने आए, और माता लक्ष्मी भी साथ आने की ज़िद करने लगीं। विष्णु जी ने कहा: “चलो, पर मेरी एक बात माननी होगी। मैं दक्षिण दिशा की ओर जा रहा हूँ, तुम यहीं रुकना और उधर मत देखना।”
विष्णु जी के जाते ही लक्ष्मी जी का मन नहीं माना और वे भी दक्षिण की ओर चल पड़ीं। रास्ते में सरसों का पीला खेत था। लक्ष्मी जी ने सरसों के फूलों से श्रृंगार किया। आगे गन्ने का खेत था, वहाँ उन्होंने गन्ना तोड़कर चूसा।
विष्णु जी लौटे तो यह देखकर नाराज़ हुए: “तुमने मेरी बात नहीं मानी, और किसान के खेत से बिना पूछे फूल और गन्ना लिया। इसकी सज़ा यह है कि तुम बारह साल तक इसी किसान की सेवा करोगी।” यह कहकर विष्णु जी चले गए।
लक्ष्मी जी उस ग़रीब किसान के घर रहने लगीं। उनके आने से किसान का घर धन धान्य से भर गया। बारह साल बाद विष्णु जी उन्हें लेने आए, तो किसान ने लक्ष्मी जी को भेजने से मना कर दिया।
तब लक्ष्मी जी ने किसान से कहा: “मुझे जाना ही होगा। पर अगर तुम हर साल कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को घर साफ़ करके, रात को घी का दीपक जलाकर, ताँबे के कलश में सिक्के भरकर मेरी पूजा करोगे, तो मैं पूरे साल तुम्हारे घर में अदृश्य रूप से रहूँगी।”
किसान ने वैसा ही किया, और उसका घर हमेशा धन धान्य से भरा रहा। तभी से धनतेरस पर लक्ष्मी जी की पूजा की परंपरा मानी जाती है।
Dhanteras Puja Vidhi: धनतेरस पर घर पर पूजा का पूरा क्रम
- दिन में तैयारी: पूरे घर की सफ़ाई करें, ख़ासकर मुख्य द्वार और पूजा की जगह। दरवाज़े पर रंगोली बनाएँ और तोरण लगाएँ।
- ख़रीदारी: त्रयोदशी शुरू होने (सुबह 10:30) के बाद नए बर्तन, सिक्के, झाड़ू या जो भी ख़रीदना हो, ख़रीद लें। नया बर्तन ख़ाली घर न लाएँ, उसमें थोड़ा पानी, अनाज या मिठाई डालकर लाएँ।
- स्नान: शाम को सूर्यास्त से पहले स्नान करके साफ़ या नए कपड़े पहनें।
- चौकी: घर की उत्तर या उत्तर पूर्व दिशा में चौकी रखें, उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएँ। उस पर भगवान धन्वंतरि, लक्ष्मी गणेश और कुबेर जी की मूर्ति या चित्र रखें।
- कलश: जल से भरा कलश रखें, उसमें आम के पत्ते लगाएँ और ऊपर नारियल रखें।
- नई ख़रीदी चीज़ें: जो बर्तन, सिक्के या गहने ख़रीदे हैं, उन्हें भी धोकर चौकी पर रख दें। इनकी भी पूजा होगी।
- संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपना नाम और पूजा का उद्देश्य बोलें, फिर जल छोड़ दें।
- गणेश पूजा: सबसे पहले गणेश जी को तिलक, अक्षत, फूल, दूर्वा और लड्डू अर्पित करें। मंत्र: ॐ गं गणपतये नमः।
- धन्वंतरि पूजा: भगवान धन्वंतरि को पीले फूल, चंदन, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें, और परिवार के अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करें। मंत्र: ॐ धन्वंतरये नमः।
- लक्ष्मी और कुबेर पूजा: लक्ष्मी जी और कुबेर जी को रोली, अक्षत, लाल फूल, कमल गट्टा, खील बताशे, मिठाई और सिक्के अर्पित करें। नए बर्तन और गहनों पर रोली और अक्षत लगाएँ।
- साबुत धनिया: लक्ष्मी जी को थोड़ा साबुत धनिया और गुड़ अर्पित करें। अगले दिन इनमें से कुछ दाने गमले में बो दें और बाक़ी तिजोरी या पैसे रखने की जगह पर रख दें।
- दीपक: पूजा के बाद घर में दीपक जलाएँ। कई परिवारों में धनतेरस पर 13 दीपक जलाने की परंपरा है: पूजा स्थान, मुख्य द्वार, रसोई, तुलसी, पानी रखने की जगह और आँगन में।
- आरती: “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती और धन्वंतरि जी की आरती करें, फिर प्रसाद बाँटें।
- यम दीपदान: आख़िर में घर के बाहर यमराज के लिए दीपक जलाएँ। इसकी विधि नीचे अलग से दी गई है।
पूजा का तरीका हर क्षेत्र और परिवार में थोड़ा अलग होता है। जहाँ फ़र्क हो, वहाँ अपने घर के बड़ों की रीति को ही मानें।
यम दीपदान की विधि (धनतेरस की शाम)

यम दीपदान धनतेरस की सबसे ख़ास परंपरा है। यह दीपक परिवार की लंबी उम्र और अकाल मृत्यु से रक्षा के लिए यमराज के नाम से जलाया जाता है।
- दीपक: आटे का बना चौमुखा दीपक (चार बत्तियों वाला) सबसे अच्छा माना जाता है। आटे का दीपक न बना सकें तो मिट्टी का पुराना दीपक भी ले सकते हैं।
- तेल और बत्ती: दीपक में सरसों का तेल डालें और चार बत्तियाँ लगाएँ।
- समय: सूर्यास्त के बाद, प्रदोष काल में (2026 में 6 नवंबर, शाम 5:33 से 8:09 बजे के बीच)। ज़्यादातर परिवार घर की पूजा के बाद यह दीपक जलाते हैं।
- जगह और दिशा: घर के मुख्य द्वार के बाहर, थोड़े से अनाज (गेहूँ या चावल) की ढेरी पर दीपक रखें, और उसका मुँह दक्षिण दिशा की ओर हो। दक्षिण यमराज की दिशा मानी जाती है।
- मंत्र: दीपक जलाकर हाथ जोड़ें और यह मंत्र बोलें:
मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
अर्थ: पाश और दंड लिए हुए, काल और देवी श्यामा के साथ रहने वाले सूर्यपुत्र यमराज, त्रयोदशी के इस दीपदान से मुझ पर प्रसन्न हों।
- प्रार्थना: यमराज से परिवार के सभी लोगों की लंबी उम्र और रक्षा की प्रार्थना करें। कई घरों में मान्यता है कि दीपक रखकर पीछे मुड़कर नहीं देखते, सीधे घर के अंदर आ जाते हैं।
कुछ परिवारों में यम दीपदान छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) की शाम को भी किया जाता है। अपने घर की परंपरा के अनुसार करें।
धनतेरस पर क्या ख़रीदें

| क्या ख़रीदें | क्यों (मान्यता) |
|---|---|
| सोना या चाँदी (सिक्के, गहने) | लक्ष्मी जी का प्रतीक, घर में बरकत |
| पीतल के बर्तन, कलश | भगवान धन्वंतरि हाथ में कलश लेकर प्रकट हुए, पीतल उनकी प्रिय धातु |
| नई झाड़ू | झाड़ू को लक्ष्मी का रूप माना जाता है, यह दरिद्रता को घर से बाहर करती है |
| साबुत धनिया | “धन” से जुड़ा नाम, समृद्धि का प्रतीक, पूजा के बाद बोया जाता है |
| लक्ष्मी गणेश की नई मूर्ति | दिवाली की लक्ष्मी पूजा के लिए |
| मिट्टी के दीये | दिवाली के पाँचों दिन घर रोशन करने के लिए |
| गोमती चक्र, कौड़ी | लक्ष्मी पूजा में रखे जाते हैं, बाद में तिजोरी में |
| बही खाता, नया पेन | व्यापारी परिवार नए हिसाब की शुरुआत के लिए |
आज के समय में लोग धनतेरस पर गाड़ी, मोबाइल, घर का सामान और इलेक्ट्रॉनिक चीज़ें भी ख़रीदते हैं। बजट कम हो तो सिर्फ़ एक नई झाड़ू या साबुत धनिया ख़रीदना भी शुभ माना जाता है। ज़रूरी यह है कि ख़रीदारी अपनी क्षमता में हो, उधार लेकर नहीं।
सोना ख़रीदते समय: गहने पर BIS हॉलमार्क और 6 अंकों का HUID नंबर ज़रूर देखें, और पक्का बिल लें। सिक्का ख़रीदें तो उस पर शुद्धता (जैसे 24 कैरेट, 999) लिखी हो।
धनतेरस पर क्या न ख़रीदें (मान्यता)
- लोहे का सामान: लोहे को शनि से जोड़ा जाता है, इसलिए इस दिन लोहे की चीज़ें नहीं ख़रीदी जातीं।
- नुकीली चीज़ें: चाकू, कैंची, सुई जैसी धारदार चीज़ें।
- काँच का सामान और काले रंग की चीज़ें।
- ख़ाली बर्तन: नया बर्तन घर में ख़ाली न लाएँ, उसमें कुछ भरकर लाएँ।
- उधार: धनतेरस के दिन किसी को पैसे उधार देने और उधार लेने से भी लोग बचते हैं।
ये लोक मान्यताएँ हैं। ज़रूरत का सामान ख़रीदना ग़लत नहीं है, पर पूजा के लिए ऊपर बताई गई चीज़ें ही रखें।
धनतेरस के मंत्र
- भगवान धन्वंतरि: ॐ धन्वंतरये नमः
- माता लक्ष्मी: ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
- कुबेर जी: ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा
- गणेश जी: ॐ गं गणपतये नमः
- यम दीपदान: मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥
पूजा के अंत में “ॐ जय लक्ष्मी माता” आरती और धन्वंतरि जी की आरती की जाती है।
धनतेरस पूजा सामग्री सूची
पूजा से एक दिन पहले यह सूची देखकर सामान इकट्ठा कर लें:
- भगवान धन्वंतरि की मूर्ति या चित्र
- लक्ष्मी गणेश की मूर्ति और कुबेर जी की मूर्ति या कुबेर यंत्र
- पूजा की चौकी और लाल या पीला कपड़ा
- कलश, आम के पत्ते और नारियल
- रोली, अक्षत (साबुत चावल), हल्दी, चंदन और कलावा
- लाल और पीले फूल, फूलों की माला, कमल गट्टा
- खील बताशे, मिठाई, गुड़ और फल
- साबुत धनिया और चाँदी या नए सिक्के
- मिट्टी के दीये, घी, सरसों का तेल और रुई की बाती
- यम दीपदान के लिए आटा (चौमुखा दीपक बनाने के लिए) और थोड़ा अनाज
- धूप, अगरबत्ती और कपूर
धनतेरस से भाई दूज: दिवाली के पाँच दिन (2026)
| दिन | त्योहार | तारीख़ |
|---|---|---|
| पहला | धनतेरस | शुक्रवार, 6 नवंबर |
| दूसरा | छोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी) | 7 या 8 नवंबर (पंचांगों में मतभेद) |
| तीसरा | दिवाली, लक्ष्मी पूजा | रविवार, 8 नवंबर |
| चौथा | गोवर्धन पूजा (अन्नकूट) | मंगलवार, 10 नवंबर |
| पाँचवाँ | भाई दूज | बुधवार, 11 नवंबर |
2026 में दिवाली (8 नवंबर) और गोवर्धन पूजा (10 नवंबर) के बीच एक दिन का अंतर है, क्योंकि 9 नवंबर को दोपहर तक अमावस्या तिथि है। दिवाली की रात लक्ष्मी पूजा का पूरा क्रम यहाँ पढ़िए: दिवाली लक्ष्मी पूजा विधि 2026।
धनतेरस पर सावधानी
- दीयों को पर्दों, कपड़ों और काग़ज़ की सजावट से दूर रखें, और यम दीपदान का दीपक ऐसी जगह रखें जहाँ हवा से बुझे नहीं और किसी का पैर न लगे।
- बाज़ार में भीड़ बहुत होती है, इसलिए गहने और नकदी संभालकर रखें। ऑनलाइन ख़रीदारी में “धनतेरस ऑफ़र” वाले अनजान लिंक पर क्लिक न करें।
- सोना चाँदी हॉलमार्क देखकर और बिल के साथ ही ख़रीदें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
धनतेरस 2026 कब है?
धनतेरस शुक्रवार, 6 नवंबर 2026 को है। त्रयोदशी तिथि 6 नवंबर सुबह 10:30 बजे शुरू होकर 7 नवंबर सुबह 10:47 बजे ख़त्म होगी।
धनतेरस पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?
6 नवंबर 2026 को शाम 6:02 से 7:57 बजे तक (नई दिल्ली)। यह समय प्रदोष काल और स्थिर वृषभ लग्न, दोनों में आता है, इसलिए सबसे शुभ माना गया है।
धनतेरस पर किसकी पूजा होती है?
भगवान धन्वंतरि (स्वास्थ्य के लिए), माता लक्ष्मी और गणेश जी (धन और बुद्धि के लिए), कुबेर जी (धन की रक्षा के लिए), और शाम को यमराज के नाम से दीपदान (लंबी उम्र के लिए)।
धनतेरस की कथा क्या है?
सबसे प्रचलित कथा राजा हिम के बेटे की है, जिसकी पत्नी ने दीपक जलाकर और सोने चाँदी का ढेर लगाकर साँप बनकर आए यमराज से पति की रक्षा की। दूसरी कथा समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने की है, और तीसरी लक्ष्मी जी और किसान की लोक कथा है।
यम दीपदान कैसे करें?
धनतेरस की शाम आटे का चौमुखा दीपक सरसों के तेल से जलाकर घर के मुख्य द्वार के बाहर, अनाज की ढेरी पर, दक्षिण दिशा की ओर मुँह करके रखें, और यमराज से परिवार की लंबी उम्र की प्रार्थना करें।
धनतेरस पर क्या ख़रीदना शुभ है?
सोना, चाँदी, पीतल के बर्तन, नई झाड़ू, साबुत धनिया, लक्ष्मी गणेश की मूर्ति, मिट्टी के दीये और गोमती चक्र। बजट कम हो तो सिर्फ़ झाड़ू या साबुत धनिया ख़रीदना भी शुभ माना जाता है।
धनतेरस पर क्या नहीं ख़रीदना चाहिए?
मान्यता है कि इस दिन लोहे का सामान, चाकू कैंची जैसी नुकीली चीज़ें, काँच का सामान और काले रंग की चीज़ें नहीं ख़रीदनी चाहिए। नया बर्तन ख़ाली घर न लाएँ।
धनतेरस पर झाड़ू क्यों ख़रीदते हैं?
झाड़ू को माता लक्ष्मी का रूप माना जाता है, क्योंकि यह घर से गंदगी और दरिद्रता बाहर करती है। इसलिए धनतेरस पर नई झाड़ू ख़रीदकर उस पर कलावा बाँधा जाता है।
धनतेरस पर धनिया क्यों ख़रीदते हैं?
साबुत धनिया समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा में इसे लक्ष्मी जी को अर्पित करके अगले दिन कुछ दाने गमले में बोए जाते हैं और बाक़ी पैसे रखने की जगह पर रखे जाते हैं।
क्या धनतेरस पर व्रत रखा जाता है?
धनतेरस पर व्रत रखना ज़रूरी नहीं है। कुछ लोग दिन भर व्रत रखकर शाम की पूजा के बाद भोजन करते हैं, पर ज़्यादातर परिवारों में पूजा, ख़रीदारी और यम दीपदान ही मुख्य परंपरा है।
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