दुर्गा पूजा विधि 2026: नवरात्रि कलश स्थापना मुहूर्त (पटना, रांची, कोलकाता), पूजा विधि, सप्तशती पाठ, कथा और विसर्जन

Durga puja vidhi: लाल चुनरी में लिपटे नारियल वाला कलश, जौ के अंकुर और जलती अखंड ज्योति
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना: आम के पत्ते और नारियल वाला कलश, मिट्टी में बोए जौ और अखंड ज्योति (प्रतीकात्मक चित्र)

Durga puja vidhi यानी नवरात्रि में माँ दुर्गा की पूजा का पूरा क्रम, पहले दिन कलश स्थापना से लेकर बेल नेवता, पट खुलने, संधि पूजा, नवमी के हवन, खोइंछा और विसर्जन तक। शारदीय नवरात्रि 2026 रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू होगी। बिहार और झारखंड में विसर्जन और दशहरा 20 अक्टूबर को, और बंगाल में विजयादशमी और सिंदूर खेला 21 अक्टूबर को है। इस साल एक तिथि दो दिन है, इसलिए नवरात्रि नौ की जगह दस दिन की है।

यह लेख ख़ास तौर पर बिहार, झारखंड और बंगाल के लिए लिखा गया है, इसलिए सारे समय पटना, रांची और कोलकाता के सूर्योदय के हिसाब से दिए गए हैं। पूर्वी भारत में सूर्योदय जल्दी होता है, इसलिए यहाँ कुछ तिथियाँ दिल्ली से एक दिन अलग पड़ती हैं।

इस पेज पर शहरों के हिसाब से कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त, कलश स्थापना की विधि मंत्र सहित, रोज़ की दुर्गा पूजा का क्रम, नौ दिन की नौ देवियाँ, हर दिन का रंग और भोग, नवरात्रि की कथा, दुर्गा सप्तशती पाठ का तरीका (3, 5, 7 और 9 दिन का क्रम), व्रत के नियम, क्या खाएँ, पूजा सामग्री, बिहार, झारखंड और बंगाल में षष्ठी से दशमी तक की दुर्गा पूजा, खोइंछा भराई, कन्या पूजन, हवन, पारण और विसर्जन, सब एक जगह दिया गया है।

पूजा का क्रम और कलश स्थापना के मंत्र पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की कर्मकाण्ड भास्कर से, और दुर्गा सप्तशती पाठ की विधि गीता प्रेस की श्रीदुर्गासप्तशती की पाठविधि से लिए गए हैं। नौ दिन रोज़ पूजा के समय फ़ोन पर पढ़ने के लिए इस पेज को अभी बुकमार्क कर लीजिए।

विषय सूची

शारदीय नवरात्रि 2026 कब से है? घटस्थापना मुहूर्त

बातजानकारी
नवरात्रि शुरूरविवार, 11 अक्टूबर 2026
कलश स्थापना (पटना)11 अक्टूबर, सुबह 5:46 से 9:39 बजे तक, अभिजीत मुहूर्त 11:13 से 11:59
प्रतिपदा तिथि10 अक्टूबर रात 9:19 बजे से 11 अक्टूबर रात 9:30 बजे तक
महालयाशनिवार, 10 अक्टूबर (पितृ पक्ष की अमावस्या)
बेल नेवता (बिल्व निमंत्रण)शुक्रवार, 16 अक्टूबर, शाम
कल्पारंभ, बोधन, अधिवासशनिवार, 17 अक्टूबर
सप्तमी, पट खुलना, नवपत्रिकारविवार, 18 अक्टूबर
महाअष्टमी, संधि पूजासोमवार, 19 अक्टूबर, संधि पूजा सुबह 10:27 से 11:15
महानवमी, हवन, कन्या पूजनमंगलवार, 20 अक्टूबर की सुबह (नवमी दोपहर 12:50 तक)
विसर्जन और दशहरा (बिहार, झारखंड)मंगलवार, 20 अक्टूबर, दशमी दोपहर 12:50 से
विजयादशमी, सिंदूर खेला (बंगाल)बुधवार, 21 अक्टूबर
माँ का आगमनहाथी (गज) पर

शहरों के हिसाब से कलश स्थापना मुहूर्त (11 अक्टूबर 2026)

शहरसुबह का मुहूर्तअभिजीत मुहूर्त
पटना5:46 से 9:3911:13 से 11:59
गया5:46 से 9:4011:13 से 12:00
रांची5:44 से 9:3811:12 से 11:59
जमशेदपुर5:40 से 9:3511:08 से 11:55
धनबाद5:40 से 9:3411:07 से 11:54
कोलकाता5:31 से 9:2611:00 से 11:47
वाराणसी5:54 से 9:4811:21 से 12:08
नई दिल्ली6:19 से 10:1211:44 से 12:31

ये समय Drik Panchang के अनुसार हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय के हिसाब से समय कुछ मिनट आगे पीछे होगा।

घटस्थापना किस समय करें? घटस्थापना दिन के पहले एक तिहाई हिस्से में, प्रतिपदा तिथि में करना सबसे अच्छा माना जाता है, और रात में या अमावस्या पर घटस्थापना नहीं की जाती। 2026 में 11 अक्टूबर को लगभग पूरे दिन चित्रा नक्षत्र (रात 10:32 तक) और वैधृति योग (रात 9:05 तक) है, जिन्हें शास्त्रों में घटस्थापना के लिए टालने योग्य बताया गया है। क्योंकि ये पूरे दिन रहेंगे, इसलिए कई आचार्य अभिजीत मुहूर्त (पटना में सुबह 11:13 से 11:59, कोलकाता में 11:00 से 11:47) को सबसे शुभ मानते हैं। जो सुबह पूजा करना चाहें, वे ऊपर की तालिका के सुबह वाले मुहूर्त में कर सकते हैं।

नवरात्रि 10 दिन की क्यों? बिहार, झारखंड और बंगाल में इस साल षष्ठी तिथि 16 और 17 अक्टूबर, दोनों दिन सूर्योदय के समय है (दिल्ली और पश्चिमी भारत में यही बढ़ोतरी सप्तमी की है, 17 और 18 अक्टूबर को)। तिथि बढ़ने से नवरात्रि एक दिन लंबी हो गई है। लोक मान्यता में नवरात्रि में तिथि बढ़ना शुभ माना जाता है। इसी तरह लोक मान्यता में माँ का हाथी पर आगमन अच्छी वर्षा और समृद्धि का संकेत माना जाता है।

नवरात्रि 2026: हर दिन की देवी, रंग और भोग

दिनतारीख़तिथिदेवीरंगभोग
पहलारविवार, 11 अक्टूबरप्रतिपदा, घटस्थापनामाँ शैलपुत्रीनारंगीगाय का घी
दूसरासोमवार, 12 अक्टूबरद्वितीयामाँ ब्रह्मचारिणीसफ़ेदशक्कर, मिश्री
तीसरामंगलवार, 13 अक्टूबरतृतीयामाँ चंद्रघंटालालदूध, खीर
चौथाबुधवार, 14 अक्टूबरचतुर्थीमाँ कूष्मांडागहरा नीलामालपुआ
पाँचवाँगुरुवार, 15 अक्टूबरपंचमीमाँ स्कंदमातापीलाकेला
छठाशुक्रवार, 16 अक्टूबरषष्ठी, बेल नेवतामाँ कात्यायनीहराशहद
सातवाँशनिवार, 17 अक्टूबरषष्ठी (दूसरा दिन), बोधनमाँ कात्यायनी की पूजा जारी, सरस्वती पूजास्लेटीशहद
आठवाँरविवार, 18 अक्टूबरसप्तमी, पट खुलनामाँ कालरात्रिबैंगनीगुड़
नौवाँसोमवार, 19 अक्टूबरअष्टमी, संधि पूजामाँ महागौरीमोरपंखी हरानारियल
दसवाँमंगलवार, 20 अक्टूबरनवमी, फिर दशमीमाँ सिद्धिदात्री, हवन, पारण, विसर्जनकोई तय नहींतिल, हलवा, पूरी, चना

यह तालिका पटना के नवरात्रि कैलेंडर के अनुसार है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से और पश्चिम भारत में 17 अक्टूबर को ही सप्तमी (माँ कालरात्रि) है, और 18 अक्टूबर को सप्तमी का दूसरा दिन।

दिन के रंग की परंपरा ख़ास तौर पर महाराष्ट्र में और भोग की सूची लोक परंपरा में प्रचलित है। जो रंग या भोग न हो पाए, उसकी चिंता न करें। माँ को श्रद्धा से जो भी अर्पित करें, वही स्वीकार है।

नवदुर्गा: नौ देवियों का परिचय और मंत्र

  1. माँ शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की बेटी, पार्वती का पहला रूप। वाहन बैल, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ में कमल। मंत्र: ॐ देवी शैलपुत्र्यै नमः।
  2. माँ ब्रह्मचारिणी: तप करने वाली देवी। हाथ में जप की माला और कमंडल। संयम और धैर्य देती हैं। मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः।
  3. माँ चंद्रघंटा: माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र, वाहन सिंह। साहस और शांति, दोनों देती हैं। मंत्र: ॐ देवी चन्द्रघण्टायै नमः।
  4. माँ कूष्मांडा: मान्यता है कि अपनी मुस्कान से इन्होंने ब्रह्मांड की रचना की। आठ भुजाएँ, वाहन सिंह। मंत्र: ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः।
  5. माँ स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता, गोद में बाल स्कंद। संतान सुख की देवी मानी जाती हैं। मंत्र: ॐ देवी स्कन्दमातायै नमः।
  6. माँ कात्यायनी: ऋषि कात्यायन के घर जन्मीं, इन्होंने ही महिषासुर का वध किया। अच्छे जीवनसाथी के लिए इनकी पूजा होती है। मंत्र: ॐ देवी कात्यायन्यै नमः।
  7. माँ कालरात्रि: सबसे उग्र रूप, जो अंधकार और भय का नाश करती हैं। रूप भयानक, पर फल शुभ देती हैं, इसलिए “शुभंकरी” भी कहलाती हैं। मंत्र: ॐ देवी कालरात्र्यै नमः।
  8. माँ महागौरी: गौर वर्ण, सफ़ेद वस्त्र, वाहन बैल। शांति और पवित्रता की देवी। मंत्र: ॐ देवी महागौर्यै नमः।
  9. माँ सिद्धिदात्री: सभी सिद्धियाँ देने वाली देवी, कमल पर विराजमान। मंत्र: ॐ देवी सिद्धिदात्र्यै नमः।

नवरात्रि क्यों मनाते हैं?

  • महिषासुर पर विजय: दुर्गा सप्तशती के अनुसार माँ दुर्गा ने महिषासुर, शुंभ निशुंभ और दूसरे असुरों का वध करके देवताओं को फिर से स्वर्ग दिलाया। नवरात्रि उसी शक्ति की उपासना का पर्व है।
  • श्रीराम का अकाल बोधन: मान्यता है कि रावण से युद्ध से पहले श्रीराम ने आश्विन में माँ दुर्गा की पूजा की थी। बंगाल में इसीलिए शारदीय दुर्गा पूजा को “अकाल बोधन” कहा जाता है, और दसवें दिन रावण पर विजय का दशहरा मनाया जाता है।
  • ऋतु बदलने का समय: कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार साल में दो नवरात्रि आती हैं, चैत्र और आश्विन में, और दोनों के बीच छह महीने का अंतर है। ये ऋतुओं के संधिकाल हैं, और संधिकाल को उपासना के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है, जैसे दिन में सुबह और शाम की संध्या।
  • दुर्गा यानी संगठित शक्ति: कर्मकाण्ड भास्कर बताती है कि ब्रह्मा जी ने सभी देवताओं की थोड़ी थोड़ी शक्ति इकट्ठी करके दुर्गा, यानी संघशक्ति, का निर्माण किया। दुर्गा की आठ भुजाएँ आठ तरह के बल का प्रतीक हैं: शरीर बल, विद्या बल, चातुर्य बल, धन बल, शस्त्र बल, शौर्य बल, मनोबल और धर्म बल।

नवरात्रि की कथा (छोटी कथा)

जिनके पास समय कम है, उनके लिए नवरात्रि की कथा का छोटा रूप: महिषासुर नाम के असुर ने तप करके वरदान पाया और देवताओं को हराकर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया। तब ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवताओं के तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं, जिन्हें सबने अपने अपने अस्त्र दिए। देवी ने सिंह पर सवार होकर महिषासुर की सेना और फिर महिषासुर का वध किया, और देवताओं को फिर से स्वर्ग मिला। बाद में देवी ने शुंभ और निशुंभ जैसे असुरों का भी नाश किया, और वचन दिया कि जब भी असुरों से संसार को कष्ट होगा, वे फिर अवतार लेंगी।

Navratri ki Katha: दुर्गा सप्तशती के तीन चरित्र (पूरी कथा)

यह कथा मार्कण्डेय पुराण के देवी माहात्म्य में आती है, जिसे दुर्गा सप्तशती कहते हैं। इसमें 13 अध्याय और 700 श्लोक हैं, और इसे तीन चरित्रों में बाँटा गया है।

कथा की शुरुआत: राजा सुरथ और समाधि वैश्य

राजा सुरथ का राज्य शत्रुओं ने छीन लिया था, और उनके अपने मंत्रियों ने भी धोखा दिया। दुखी होकर वे वन में मेधा ऋषि के आश्रम पहुँचे। वहीं उन्हें समाधि नाम का एक वैश्य मिला, जिसे उसके अपने परिवार ने धन के लालच में घर से निकाल दिया था।

दोनों ने ऋषि से पूछा: “हमें सब जानते हुए भी उन्हीं लोगों का मोह क्यों नहीं छूटता, जिन्होंने हमें दुख दिया?” मेधा ऋषि ने बताया कि यह भगवती महामाया की माया है, और फिर उन्हें देवी के तीन चरित्र सुनाए।

प्रथम चरित्र: मधु और कैटभ का वध (अध्याय 1)

प्रलय के समय भगवान विष्णु योगनिद्रा में थे। उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो असुर पैदा हुए, जो विष्णु जी की नाभि के कमल पर बैठे ब्रह्मा जी को मारने दौड़े। ब्रह्मा जी ने योगनिद्रा देवी की स्तुति की, जिससे देवी ने विष्णु जी को जगाया। विष्णु जी ने पाँच हज़ार साल तक उनसे युद्ध किया। अंत में देवी की माया से मोहित होकर असुरों ने ख़ुद कहा कि “हमसे वर माँगो”, और विष्णु जी ने उनका वध किया। इस चरित्र की देवी महाकाली हैं।

मध्यम चरित्र: महिषासुर मर्दिनी (अध्याय 2 से 4)

महिषासुर असुरों का राजा बना और सौ साल के युद्ध के बाद उसने इंद्र को हराकर स्वर्ग ले लिया। देवता ब्रह्मा जी को आगे करके भगवान शिव और विष्णु के पास गए। उनकी बात सुनकर शिव और विष्णु के मुख से बड़ा तेज निकला, और फिर सभी देवताओं के शरीर से तेज निकलकर एक जगह इकट्ठा हुआ। उस तेज से एक दिव्य देवी प्रकट हुईं।

शिव जी ने उन्हें त्रिशूल दिया, विष्णु जी ने चक्र, वरुण ने शंख, अग्नि ने शक्ति, वायु ने धनुष बाण, इंद्र ने वज्र और घंटा, यमराज ने दंड, हिमालय ने सवारी के लिए सिंह, और दूसरे देवताओं ने भी अपने अस्त्र और आभूषण दिए। देवी ने अट्टहास किया तो तीनों लोक काँप उठे।

देवी ने महिषासुर के सेनापतियों चिक्षुर, चामर, उदग्र, बाष्कल और बिडाल जैसे असुरों का एक एक करके वध किया। आख़िर में महिषासुर ख़ुद भैंसे के रूप में लड़ने आया और बार बार रूप बदलने लगा: कभी सिंह, कभी हाथी, कभी मनुष्य। देवी ने उसे पैर से दबाकर त्रिशूल से मारा और तलवार से उसका सिर काट दिया। देवताओं ने देवी की स्तुति की। इस चरित्र की देवी महालक्ष्मी हैं, और इसी रूप को महिषासुर मर्दिनी कहते हैं।

उत्तम चरित्र: शुंभ और निशुंभ का वध (अध्याय 5 से 13)

कुछ समय बाद शुंभ और निशुंभ नाम के दो असुर भाइयों ने फिर स्वर्ग छीन लिया। देवताओं ने हिमालय पर जाकर देवी की स्तुति की, तब पार्वती जी के शरीर से अंबिका देवी प्रकट हुईं। शुंभ के सेवकों चंड और मुंड ने अंबिका की सुंदरता की बात शुंभ को बताई, तो शुंभ ने विवाह का प्रस्ताव लेकर दूत भेजा। देवी ने कहा कि मैंने प्रण किया है, जो मुझे युद्ध में जीतेगा, उसी से विवाह करूँगी।

  • धूम्रलोचन का वध (अध्याय 6): शुंभ ने धूम्रलोचन को देवी को बालों से पकड़कर लाने भेजा। देवी ने सिर्फ़ “हुं” की आवाज़ से उसे भस्म कर दिया।
  • चंड और मुंड का वध (अध्याय 7): देवी के क्रोध से उनके माथे से काली प्रकट हुईं, जिन्होंने चंड और मुंड का वध किया। तभी से उनका नाम चामुंडा पड़ा।
  • रक्तबीज का वध (अध्याय 8): रक्तबीज के ख़ून की हर बूँद से एक नया असुर पैदा होता था। तब देवी के साथ सभी देवताओं की शक्तियाँ (मातृकाएँ) आईं, और काली ने रक्तबीज का ख़ून धरती पर गिरने से पहले ही पी लिया। इस तरह रक्तबीज मारा गया।
  • निशुंभ और शुंभ का वध (अध्याय 9 और 10): देवी ने पहले निशुंभ का और फिर शुंभ का वध किया। शुंभ ने ताना मारा कि तुम दूसरों के बल पर लड़ती हो, तो देवी ने सभी शक्तियों को अपने में समा लिया और कहा: “इस संसार में मैं अकेली ही हूँ, दूसरा कौन है?” फिर अकेले युद्ध करके शुंभ को मार डाला।

देवी का वरदान (अध्याय 11 से 13)

असुरों के नाश के बाद देवताओं ने देवी की स्तुति की। देवी ने वरदान दिया कि जब जब असुरों से संसार को कष्ट होगा, वे अवतार लेकर उनका नाश करेंगी:

इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति। तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम्॥

यह कथा सुनकर राजा सुरथ और समाधि वैश्य ने नदी किनारे तीन साल तक देवी की उपासना की। प्रसन्न होकर देवी ने राजा सुरथ को उनका राज्य लौटाया और अगले जन्म में मनु बनने का वर दिया, और समाधि वैश्य को मोह से मुक्त करके ज्ञान दिया। इस चरित्र की देवी महासरस्वती हैं।

कथा की सीख: अकेली शक्ति कमज़ोर पड़ सकती है, पर सबकी शक्ति एक हो जाए तो कोई बुराई टिक नहीं सकती। और जिस मोह से दुख मिलता है, उससे छूटने का रास्ता भी भक्ति और ज्ञान से निकलता है।

नवरात्रि से पहले की तैयारी

  • सफ़ाई: पूरे घर की, ख़ासकर पूजा की जगह की सफ़ाई करें। पूजा उत्तर पूर्व (ईशान) कोने में हो तो सबसे अच्छा।
  • जौ भिगोना: कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार जौ बोने से पहले उन्हें चौबीस घंटे पानी में भिगो दें, तो अंकुर जल्दी निकलते हैं। यानी 10 अक्टूबर को जौ भिगो दें।
  • मिट्टी: जौ बोने के लिए साफ़ मिट्टी (बगीचे या खेत की) और एक चौड़ा मिट्टी का पात्र।
  • अखंड ज्योति का फ़ैसला: अखंड ज्योति जलानी है तो पहले ही तय कर लें कि नौ दिन तक घर में कोई न कोई रहेगा। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार अखंड दीपक ज़रूरी नहीं है, जिनकी स्थिति हो वे रखें, नहीं तो सुबह से शाम की आरती तक दीपक जलाना भी पर्याप्त है।
  • संकल्प तय करें: नौ दिन का व्रत, सप्तशती पाठ, या रोज़ मंत्र जप, जो भी करना है, पहले दिन उसी का संकल्प लें। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार नौ दिन में रोज़ 27 माला जप करने से 24,000 मंत्र का अनुष्ठान होता है, और इतना न हो सके तो रोज़ 12 माला करके 108 माला का अनुष्ठान भी किया जा सकता है।

घटस्थापना और कलश स्थापना विधि (मंत्र सहित)

पहले दिन, 11 अक्टूबर को, शुभ मुहूर्त में यह पूजा करें। हर मंत्र के साथ उसका काम हिंदी में लिखा है। मंत्र न बोल पाएँ तो उसी काम को भाव से करते हुए “ॐ नमः” कहकर आगे बढ़ें।

1. पवित्रीकरण, आचमन और संकल्प

  1. स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें और पूर्व या उत्तर की ओर मुँह करके आसन पर बैठें।
  2. बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर छिड़कें और बोलें: ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥
  3. तीन बार थोड़ा जल पीकर आचमन करें (ॐ केशवाय नमः, ॐ नारायणाय नमः, ॐ माधवाय नमः) और हाथ धो लें।
  4. संकल्प: दाहिने हाथ में जल, अक्षत, फूल और एक सिक्का लेकर बोलें: “मैं (अपना नाम), (गोत्र) गोत्र, आज आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को अपने परिवार की सुख शांति और माँ दुर्गा की कृपा के लिए नवरात्रि व्रत और पूजा का संकल्प लेता हूँ (लेती हूँ)।” फिर जल ज़मीन पर छोड़ दें।

2. जौ बोना (खेत्री)

  1. मिट्टी के चौड़े पात्र में साफ़ मिट्टी की एक परत बिछाएँ।
  2. भीगे हुए जौ उस पर फैला दें, ऊपर से थोड़ी मिट्टी और डालें, और हल्का पानी छिड़कें।
  3. यही पात्र कलश के नीचे या पास रखा जाता है। नौ दिन रोज़ थोड़ा पानी छिड़कते रहें। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार जौ बोने से साधना स्थल में पवित्रता और सुंदरता आती है।

3. कलश स्थापना के पाँच उपचार

कर्मकाण्ड भास्कर में कलश स्थापना पाँच उपचारों में बताई गई है। कलश को सभी देव शक्तियों और तीर्थों का प्रतीक माना जाता है।

  1. घटस्थापन (कलश रखना): मिट्टी, ताँबे या पीतल के कलश को जौ वाले पात्र के बीच में या चौकी पर रखें। मंत्र: ॐ आजिघ्र कलशं मह्या त्वा विशन्त्विन्दवः। पुनरूर्जा निवर्तस्व सा नः सहस्रं धुक्ष्वोरुधारा पयस्वती पुनर्मा विशताद्रयिः॥
  2. जलपूरण (जल भरना): कलश में शुद्ध जल भरें, उसमें थोड़ा गंगाजल मिलाएँ। मंत्र: ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य स्कम्भसर्जनी स्थो वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद॥
  3. मंगल द्रव्य डालना: कलश में दूर्वा, कुश, सुपारी, फूल, एक सिक्का और हल्दी की गाँठ डालें, और मुँह पर आम या अशोक के पाँच पत्ते लगाएँ। मंत्र: ॐ त्वां गन्धर्वा अखनँस्त्वाम् इन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः। त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत॥
  4. सूत्रवेष्टन (कलावा लपेटना): कलश के गले में कलावा लपेटें और रोली से स्वास्तिक बनाएँ। मंत्र: ॐ सुजातो ज्योतिषा सह शर्म वरूथमासदत्स्वः। वासो अग्ने विश्वरूपं सं व्ययस्व विभावसो॥
  5. नारियल रखना: लाल चुनरी में लिपटा और कलावा बँधा पानी वाला नारियल, पत्तों के ऊपर कलश के मुँह पर रखें, नारियल का मुँह अपनी ओर रहे। मंत्र: ॐ याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः। बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः॥

इसके बाद दोनों हाथों से कलश को छूकर प्रार्थना करें:

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥

अर्थ: कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और बीच में मातृगण (देवी शक्तियाँ) निवास करते हैं।

4. गणेश और गौरी पूजन

कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार कलश पूजन के साथ गणेश और गौरी पूजन की परंपरा है। गणेश जी को तिलक, अक्षत, फूल, दूर्वा और मोदक अर्पित करें, फिर माँ गौरी का ध्यान इस मंत्र से करें:

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

5. माँ दुर्गा की स्थापना और अखंड ज्योति

  1. कलश के पास चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ दुर्गा की मूर्ति या चित्र रखें।
  2. माँ को लाल चुनरी ओढ़ाएँ और श्रृंगार का सामान (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, आलता) अर्पित करें।
  3. अखंड ज्योति रखनी हो तो घी का बड़ा दीपक कलश के दाहिनी ओर (आग्नेय दिशा) रखें और उसे काँच की चिमनी से ढक दें, ताकि हवा से न बुझे।
  4. फिर पहले दिन की देवी, माँ शैलपुत्री की पूजा करें और आरती करें।

Durga Puja Vidhi: नवरात्रि में रोज़ की पूजा विधि (नौ दिन)

कर्मकाण्ड भास्कर में नवरात्रि साधना का क्रम यह बताया गया है: षट्कर्म (पवित्रीकरण, आचमन आदि), तिलक और कलावा, कलश और दीप पूजन, सर्वदेव आवाहन, षोडशोपचार या पंचोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, संकल्प, अभिषेक और पुष्पांजलि। घर पर रोज़ के लिए इसका आसान रूप:

  1. सुबह स्नान करके पूजा स्थान पर बैठें, कलश और जौ पर थोड़ा जल छिड़कें।
  2. दीपक और धूप जलाएँ।
  3. पंचोपचार पूजन: माँ को गंध (रोली, चंदन), पुष्प (लाल फूल, गुड़हल), धूप, दीप और नैवेद्य (उस दिन का भोग) अर्पित करें।
  4. उस दिन की देवी का मंत्र: ऊपर दी गई सूची से उस दिन की देवी का मंत्र 11 या 108 बार बोलें।
  5. पाठ या जप: दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या नवार्ण मंत्र ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे का जप।
  6. आरती: “जय अम्बे गौरी” आरती करें।
  7. क्षमा प्रार्थना: पूजा के अंत में भूल चूक के लिए क्षमा माँगें: अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया। दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥
  8. शाम को फिर दीपक जलाकर आरती करें। कर्मकाण्ड भास्कर शाम को भजन, कीर्तन और सामूहिक आरती का सुझाव देती है।

दुर्गा सप्तशती पाठ कैसे करें

गीता प्रेस की श्रीदुर्गासप्तशती में पाठ की विधि इस तरह दी गई है:

  1. स्नान करके शुद्ध आसन पर पूर्व की ओर मुँह करके बैठें। माथे पर चंदन या रोली लगाएँ।
  2. पुस्तक को अपने सामने लकड़ी के आसन (स्टैंड) पर रखें, ज़मीन पर नहीं।
  3. चार मंत्रों से आचमन करें: ॐ ऐं आत्मतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। ॐ क्लीं शिवतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सर्वतत्त्वं शोधयामि नमः स्वाहा॥
  4. प्राणायाम करके गणेश जी और गुरुजनों को प्रणाम करें, फिर हाथ में जल, लाल फूल और अक्षत लेकर पाठ का संकल्प लें।
  5. पुस्तक की पूजा इस मंत्र से करें: नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥
  6. पहले कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करें, फिर 13 अध्याय, और अंत में क्षमा प्रार्थना।

एक दिन में पूरा पाठ न हो सके तो: गीता प्रेस की पाठविधि में बताया गया है कि रोज़ नियम से पाठ करने वालों के लिए सात दिन का क्रम है, जिसमें एक, दो, एक, चार, दो, एक और दो अध्याय पढ़े जाते हैं:

दिनकौन से अध्यायकथा
पहलाअध्याय 1मधु कैटभ वध
दूसराअध्याय 2 और 3महिषासुर की सेना और महिषासुर का वध
तीसराअध्याय 4देवताओं द्वारा देवी की स्तुति
चौथाअध्याय 5 से 8शुंभ का दूत, धूम्रलोचन, चंड मुंड और रक्तबीज वध
पाँचवाँअध्याय 9 और 10निशुंभ और शुंभ वध
छठाअध्याय 11देवी स्तुति और वरदान
सातवाँअध्याय 12 और 13पाठ का माहात्म्य, सुरथ और वैश्य को वरदान

तीन दिन का क्रम (तीनों चरित्रों के हिसाब से): सप्तशती अपने आप तीन चरित्रों में बँटी है, इसलिए तीन दिन में पाठ करने का यह सबसे स्वाभाविक तरीका है:

दिनकौन से अध्यायचरित्र और देवी
पहलाअध्याय 1प्रथम चरित्र, महाकाली (मधु कैटभ वध)
दूसराअध्याय 2, 3 और 4मध्यम चरित्र, महालक्ष्मी (महिषासुर वध और देवताओं की स्तुति)
तीसराअध्याय 5 से 13उत्तम चरित्र, महासरस्वती (शुंभ निशुंभ वध, देवी का वरदान)

तीसरे दिन पाठ लंबा है (9 अध्याय), इसलिए उस दिन सुबह जल्दी शुरू करें। गीता प्रेस की पाठविधि में यह भी बताया गया है कि जिसे एक दिन में पूरा पाठ करने का समय न मिले, वह दो दिन में भी कर सकता है: एक दिन केवल मध्यम चरित्र (अध्याय 2 से 4) और दूसरे दिन बाक़ी दोनों चरित्र।

पाँच दिन का क्रम: यह क्रम सुविधा के लिए है, ताकि कोई चरित्र बीच में न टूटे और रोज़ का पाठ लगभग बराबर रहे:

दिनकौन से अध्यायकथा
पहलाअध्याय 1मधु कैटभ वध
दूसराअध्याय 2, 3 और 4महिषासुर वध और देवताओं की स्तुति (पूरा मध्यम चरित्र)
तीसराअध्याय 5 से 8शुंभ का दूत, धूम्रलोचन, चंड मुंड और रक्तबीज वध
चौथाअध्याय 9, 10 और 11निशुंभ और शुंभ वध, देवी का वरदान
पाँचवाँअध्याय 12 और 13पाठ का माहात्म्य, सुरथ और वैश्य को वरदान

बिहार और बंगाल में बहुत से परिवार षष्ठी से दशमी तक, यानी पाँच दिन की दुर्गा पूजा के साथ यही पाँच दिन वाला क्रम अपनाते हैं।

नौ दिन का क्रम (पूरे नवरात्र में): जो पूरे नवरात्र रोज़ थोड़ा थोड़ा पढ़ना चाहें:

दिनअध्यायदिनअध्याय
पहला1छठा7 और 8
दूसरा2सातवाँ9 और 10
तीसरा3आठवाँ11
चौथा4नौवाँ12 और 13
पाँचवाँ5 और 6

किसी भी क्रम में रोज़ पाठ से पहले कवच, अर्गला और कीलक, और पाठ के बाद क्षमा प्रार्थना करें। आख़िरी दिन पाठ के बाद हवन कर सकें तो और अच्छा।

समय बहुत कम हो, तो सप्तश्लोकी दुर्गा या सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ, या नवार्ण मंत्र की एक माला भी की जा सकती है। सप्तशती का पाठ स्पष्ट उच्चारण से, न बहुत तेज़ और न बहुत धीमे करना चाहिए।

गीता प्रेस की श्रीदुर्गासप्तशती पूजा की दुकानों और Amazon पर मिल जाती है।

नवरात्रि व्रत के नियम

कर्मकाण्ड भास्कर नवरात्रि साधना में “सर्वसुलभ तप तितिक्षा” अपनाने को कहती है, यानी ऐसे नियम जो हर कोई निभा सके:

  • भोजन: अस्वाद व्रत (कम नमक मसाले वाला सादा भोजन), एक समय अन्नाहार, या शाक और फल जैसा आसान उपवास। अपनी क्षमता के अनुसार चुनें।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • चमड़े के जूते, बेल्ट जैसी चीज़ों का इस्तेमाल न करें।
  • चारपाई या पलंग की जगह ज़मीन पर बिस्तर लगाकर सोएँ।
  • अपना काम ख़ुद करें, दूसरों से सेवा कम से कम लें।

इनके साथ लोक परंपरा में ये नियम भी माने जाते हैं:

  • घर में प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और शराब नहीं आते।
  • नौ दिन बाल और नाख़ून नहीं काटे जाते, और दाढ़ी नहीं बनाई जाती (कई परिवारों में)।
  • अखंड ज्योति जल रही हो तो घर ख़ाली न छोड़ें।
  • किसी का अपमान, झूठ और क्रोध से बचें। कन्याओं और स्त्रियों का सम्मान सबसे बड़ी पूजा है।

नवरात्रि व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं

Navratri vrat food: कुट्टू की पूरी, आलू की सब्ज़ी, साबूदाना खिचड़ी, मखाना, फल और दूध
नवरात्रि के व्रत का खाना: कुट्टू, साबूदाना, आलू, मखाना, फल और दूध (प्रतीकात्मक चित्र)

क्या खा सकते हैं:

  • कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा, राजगिरा और सामक (समा) के चावल
  • साबूदाना, मखाना, मूँगफली और सूखे मेवे
  • आलू, शकरकंद, अरबी, कद्दू और लौकी
  • सभी फल, दूध, दही, पनीर और छाछ
  • सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा और हरी मिर्च

क्या नहीं खाना चाहिए:

  • गेहूँ, चावल, दालें और दूसरे अनाज
  • साधारण नमक (सिर्फ़ सेंधा नमक)
  • प्याज़, लहसुन, मांस, अंडा और शराब
  • बाज़ार के पैकेट वाले “व्रत” नमकीन, जब तक उनकी सामग्री देख न लें

नवरात्रि पूजा सामग्री सूची

सारा सामान अलग अलग न ख़रीदना हो तो नवरात्रि पूजा सामग्री की तैयार किट भी मिलती है।

अष्टमी और नवमी: कन्या पूजन विधि

Kanya pujan: आसन पर पंक्ति में बैठी छोटी कन्याएँ, सामने हलवा पूरी चने की थालियाँ
अष्टमी या नवमी पर नौ कन्याओं को माँ दुर्गा का रूप मानकर भोजन कराया जाता है (प्रतीकात्मक चित्र)

2026 में कन्या पूजन कब करें?

  • अष्टमी का कन्या पूजन: सोमवार, 19 अक्टूबर की सुबह, अष्टमी तिथि रहते (सुबह 10:51 से पहले)।
  • नवमी का कन्या पूजन: बिहार और झारखंड में ज़्यादातर परिवार नवमी को कन्या पूजन करते हैं। नवमी तिथि 19 अक्टूबर सुबह 10:51 से 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 तक है, इसलिए 20 अक्टूबर की सुबह, हवन के बाद और दोपहर 12:50 से पहले कन्या पूजन करें।

कन्या पूजन की विधि:

  1. कन्याएँ: 2 से 10 साल की नौ कन्याओं को एक दिन पहले आदर से निमंत्रण दें। साथ में एक बालक को भी बुलाया जाता है, जिसे बटुक भैरव या “लंगूर” का रूप माना जाता है।
  2. स्वागत: कन्याओं के आने पर उनके पैर धोएँ, पोंछें, और उन्हें आसन पर बिठाएँ।
  3. पूजा: माथे पर रोली का तिलक और अक्षत लगाएँ, हाथ में कलावा बाँधें, और सिर पर चुनरी ओढ़ाएँ। कई घरों में पैरों में आलता भी लगाया जाता है।
  4. भोजन: हलवा, पूरी और काले चने का भोजन कराएँ।
  5. दक्षिणा: भोजन के बाद अपनी क्षमता के अनुसार दक्षिणा और उपहार (चूड़ी, किताब, कॉपी, खिलौना) दें।
  6. आशीर्वाद: कन्याओं के पैर छूकर आशीर्वाद लें और प्रेम से विदा करें।

उम्र के हिसाब से कन्या के नाम (मान्यता): 2 साल कुमारी, 3 साल त्रिमूर्ति, 4 साल कल्याणी, 5 साल रोहिणी, 6 साल कालिका, 7 साल चंडिका, 8 साल शांभवी, 9 साल दुर्गा और 10 साल सुभद्रा।

नौ कन्याएँ न मिलें तो जितनी मिलें, उतनी को ही पूरे सम्मान से भोजन कराएँ। एक कन्या का पूजन भी पूरा माना जाता है।

हवन, पारण और जौ का विसर्जन

हवन: कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार नौवें दिन पूर्णाहुति (हवन) करनी चाहिए। आहुतियों की संख्या का कोई बंधन नहीं है। पूर्णाहुति में सुपारी या गोले (सूखे नारियल) का इस्तेमाल होता है। घर पर नवार्ण मंत्र या “ॐ दुं दुर्गायै नमः स्वाहा” से 108 आहुतियाँ दी जा सकती हैं।

पारण (व्रत खोलना): 2026 में नवरात्रि का पारण मंगलवार, 20 अक्टूबर को है। कर्मकाण्ड भास्कर बताती है कि पारण दलिया या खिचड़ी जैसे हल्के, सात्विक भोजन से करना अच्छा है। हफ़्ते भर के व्रत के बाद एकदम भारी, तला हुआ खाना न खाएँ।

दान: पूर्णाहुति के साथ दान की परंपरा है। कर्मकाण्ड भास्कर ज्ञानदान को सबसे श्रेष्ठ बताती है, यानी अच्छी किताबें बाँटना। अपनी क्षमता से अन्न, कपड़े या किताबों का दान करें।

जौ और कलश: उगे हुए जौ (जवारे) का कुछ हिस्सा प्रसाद के रूप में घर में रखा जाता है, बाक़ी को बहते पानी या किसी पेड़ के नीचे विसर्जित करें। कलश का जल पूरे घर में छिड़कें, और नारियल को प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें।

बिहार, झारखंड और बंगाल में दुर्गा पूजा 2026: षष्ठी से दशमी

Durga puja: रोशनी से सजे पंडाल के सामने ढाक बजाते ढाकी और उत्सव में शामिल भीड़
बंगाल की दुर्गा पूजा: पंडाल, ढाक की थाप और पाँच दिन का उत्सव (प्रतीकात्मक चित्र)

बिहार, झारखंड, बंगाल, असम और ओडिशा में दुर्गा पूजा का सबसे बड़ा उत्सव षष्ठी से दशमी तक, पाँच दिन चलता है। Drik Panchang के पटना और कोलकाता के दुर्गा पूजा कैलेंडर के अनुसार 2026 में:

तारीख़तिथिबिहार और झारखंडबंगाल
शनिवार, 10 अक्टूबरअमावस्यामहालया, पितरों को तर्पणमहालया, भोर में “महिषासुरमर्दिनी” सुनने की परंपरा
शुक्रवार, 16 अक्टूबरषष्ठीबेल नेवता (बेल के पेड़ को निमंत्रण), दोपहर 2:51 से शाम 5:11 (कोलकाता)बिल्व निमंत्रण
शनिवार, 17 अक्टूबरषष्ठीबेल तोड़ी, प्राण प्रतिष्ठा की तैयारीकल्पारंभ, अकाल बोधन, आमंत्रण और अधिवास
रविवार, 18 अक्टूबरसप्तमीपट खुलना, नवपत्रिका प्रवेश, रात में निशा पूजानवपत्रिका (कोलाबोउ) स्नान, भोर लगभग 5:11 से 5:34 (कोलकाता), महासप्तमी
सोमवार, 19 अक्टूबरअष्टमीमहाअष्टमी, खोइंछा भराई, संधि पूजामहाअष्टमी, पुष्पांजलि, कुमारी पूजा, संधि पूजा (सुबह 10:27 से 11:15)
मंगलवार, 20 अक्टूबरनवमी, फिर दशमीहवन, कन्या पूजन, पारण, दोपहर बाद विसर्जन और दशहरामहानवमी, नवमी होम, भोग
बुधवार, 21 अक्टूबरदशमीमेले और विसर्जन जुलूस (कई जगह)विजयादशमी, देवी बरन, सिंदूर खेला, विसर्जन

बिहार और झारखंड की ख़ास परंपराएँ

  • बेल नेवता: षष्ठी की शाम बेल के पेड़ के नीचे जाकर माँ को निमंत्रण दिया जाता है, और अगले दिन बेल की टहनी तोड़कर पंडाल में लाई जाती है।
  • पट खुलना: सप्तमी की सुबह नवपत्रिका प्रवेश और प्राण प्रतिष्ठा के बाद पंडालों के पट खुलते हैं, और उसी दिन से दर्शन के लिए भीड़ उमड़ती है। 2026 में बिहार और झारखंड में पट 18 अक्टूबर को खुलेंगे।
  • निशा पूजा: जिस रात अष्टमी तिथि हो, उस रात महानिशा पूजा होती है। 2026 में यह 18 अक्टूबर (सप्तमी) की रात है, क्योंकि अष्टमी 18 अक्टूबर सुबह 8:27 से शुरू हो रही है।
  • खोइंछा भराई: अष्टमी या नवमी को विवाहित महिलाएँ माँ दुर्गा का खोइंछा भरती हैं, जैसे विदा होती बेटी का भरा जाता है। इसमें चावल (या धान), हल्दी की गाँठ, दूब, सुपारी, सिंदूर, फूल, सिक्का और मिठाई होती है, और साथ में लाल चुनरी या साड़ी चढ़ाई जाती है।
  • नवमी का हवन और कन्या पूजन: नवमी की सुबह घरों और पंडालों में हवन होता है, फिर कन्या पूजन और पारण।
  • दशहरा और नीलकंठ: विजयादशमी पर नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। बड़े बुज़ुर्ग नवरात्र में उगे जौ (जयंती) को आशीर्वाद के रूप में छोटों के कान या पगड़ी में लगाते हैं। पटना के गांधी मैदान का रावण दहन बहुत प्रसिद्ध है।
  • झारखंड: रांची, जमशेदपुर और धनबाद के बड़े थीम वाले पंडाल देखने दूर दूर से लोग आते हैं, और संथाल समाज में इन दिनों दासाय नाच की परंपरा है।

बंगाल की ख़ास परंपराएँ

  • महालया: पितृ पक्ष की आख़िरी अमावस्या को भोर में “महिषासुरमर्दिनी” का पाठ सुनने की परंपरा है। इसी दिन से देवी पक्ष शुरू माना जाता है।
  • कल्पारंभ और बोधन: षष्ठी को बेल के पेड़ के नीचे देवी का आवाहन होता है। श्रीराम ने रावण से युद्ध से पहले असमय (अकाल) में देवी को जगाया था, इसलिए इसे “अकाल बोधन” कहते हैं।
  • नवपत्रिका (कोलाबोउ): सप्तमी की भोर केले के पौधे के साथ नौ पौधों को बाँधकर, नदी या तालाब में स्नान कराकर, लाल किनारी वाली साड़ी पहनाकर गणेश जी के पास रखा जाता है।
  • अष्टमी की पुष्पांजलि: अष्टमी की सुबह लोग व्रत रखकर पंडाल में पुष्पांजलि देते हैं, उसके बाद ही कुछ खाते हैं।
  • संधि पूजा: अष्टमी के आख़िरी 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट, कुल 48 मिनट की यह पूजा सबसे ख़ास मानी जाती है, जिसमें 108 दीपक और 108 कमल चढ़ाए जाते हैं। मान्यता है कि इसी समय माँ चामुंडा ने चंड और मुंड का वध किया था। 2026 में संधि पूजा 19 अक्टूबर सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक है।
  • कुमारी पूजा: अष्टमी को एक छोटी कन्या की देवी के रूप में पूजा होती है। बेलूर मठ की कुमारी पूजा बहुत प्रसिद्ध है।
  • धुनुची नाच और भोग: आरती में नारियल के रेशे और धूप वाली धुनुची लेकर नाच होता है, और भोग में खिचुड़ी, लाबड़ा, बेगुनी और पायेस बँटता है।
  • सिंदूर खेला और बिजोया: दशमी को विवाहित महिलाएँ माँ को सिंदूर और मिठाई चढ़ाकर एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं, फिर विसर्जन होता है। विसर्जन के बाद बड़ों को प्रणाम, गले मिलना (कोलाकुली) और “शुभो बिजोया” की शुभकामनाएँ दी जाती हैं।

दशहरा 2026: विजयादशमी

Sindoor khela: लाल किनारी वाली सफ़ेद साड़ियों में एक दूसरे को सिंदूर लगाती महिलाएँ
विजयादशमी पर सिंदूर खेला: माँ की विदाई से पहले महिलाएँ एक दूसरे को सिंदूर लगाती हैं (प्रतीकात्मक चित्र)

दशहरा मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है। दशमी तिथि 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 से 21 अक्टूबर दोपहर 2:11 बजे तक है। बंगाल में विजयादशमी, सिंदूर खेला और दुर्गा विसर्जन 21 अक्टूबर को है।

शहरविजय मुहूर्त, 20 अक्टूबर
पटनादोपहर 1:29 से 2:14
गयादोपहर 1:29 से 2:15
रांचीदोपहर 1:29 से 2:15
जमशेदपुरदोपहर 1:25 से 2:11
धनबाददोपहर 1:24 से 2:10
वाराणसीदोपहर 1:37 से 2:23
नई दिल्लीदोपहर 1:59 से 2:45

बिहार और झारखंड में दुर्गा विसर्जन 20 अक्टूबर को दशमी तिथि लगने (दोपहर 12:50) के बाद किया जाता है। कोलकाता में बंगाल की विजयादशमी का अपराह्न समय 21 अक्टूबर दोपहर 12:30 से 2:49 बजे तक है।

  • शमी पूजा: दशहरे के दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है। मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के समय अपने अस्त्र शमी के पेड़ पर छिपाए थे।
  • अपराजिता पूजा: विजय की देवी अपराजिता की पूजा अपराह्न में होती है।
  • शस्त्र और औज़ार पूजा: इस दिन शस्त्र, औज़ार, वाहन और किताबों की पूजा की परंपरा है।
  • रावण दहन: श्रीराम की रावण पर विजय की याद में शाम को रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतले जलाए जाते हैं।

कर्मकाण्ड भास्कर दशहरे को शौर्य और स्वास्थ्य का पर्व बताती है, जिस दिन हम अपनी शक्ति, ख़ास तौर पर स्वास्थ्य और सामर्थ्य का लेखा जोखा करते हैं, और अपने अंदर की बुरी आदतों को जीतने का संकल्प लेते हैं।

देश में नवरात्रि के अलग अलग रंग

राज्य या क्षेत्रपरंपरा
उत्तर भारतघटस्थापना, जौ बोना, नौ दिन व्रत, कन्या पूजन, रामलीला और रावण दहन
गुजरातनौ रातों तक गरबा और डांडिया, माँ अंबा की आरती
बिहारकलश स्थापना, बेल नेवता, सप्तमी को पट खुलना, निशा पूजा, खोइंछा भराई, नवमी हवन, नीलकंठ दर्शन
झारखंडबड़े थीम वाले पंडाल, कलश स्थापना, संथाल समाज में दासाय नाच
पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशामहालया, षष्ठी से दशमी तक दुर्गा पूजा, पंडाल, ढाक, धुनुची नाच, सिंदूर खेला
महाराष्ट्रघटस्थापना, हर दिन का रंग, सीमोल्लंघन और सोना पत्ती (आपटा के पत्ते) बाँटना
कर्नाटकमैसूर दसरा, जंबो सवारी
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेशगोलू (बोम्मई कोलू) में गुड़ियों की सजावट, सरस्वती पूजा, आयुध पूजा
हिमाचल प्रदेशकुल्लू दशहरा, जो विजयादशमी से शुरू होकर सात दिन चलता है

नवरात्रि में सावधानी

  • अखंड ज्योति को पर्दों और कपड़ों से दूर रखें, चिमनी से ढकें, और घर ख़ाली न छोड़ें।
  • डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, गर्भावस्था या किसी बीमारी में नौ दिन का कड़ा व्रत न रखें। फल, दूध और एक समय भोजन के साथ व्रत रखें, और ज़रूरत हो तो डॉक्टर से सलाह लें।
  • गरबा और पंडालों की भीड़ में पानी पीते रहें, और बच्चों का हाथ पकड़े रहें।
  • दुर्गा प्रतिमा और पूजा सामग्री का विसर्जन नदी को गंदा किए बिना, तय कुंड या घर पर बाल्टी में करें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शारदीय नवरात्रि 2026 कब से कब तक है?

शारदीय नवरात्रि रविवार, 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होकर मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को पारण और दशहरे के साथ पूरी होगी। इस साल एक तिथि दो दिन है (पूर्वी भारत में षष्ठी, दिल्ली में सप्तमी), इसलिए नवरात्रि 10 दिन की है।

बिहार और झारखंड में दुर्गा पूजा 2026 का पट कब खुलेगा?

सप्तमी, रविवार 18 अक्टूबर 2026 को। इससे पहले 16 अक्टूबर की शाम बेल नेवता और 17 अक्टूबर को बोधन होगा। विसर्जन 20 अक्टूबर को दशमी लगने के बाद होगा।

पटना और रांची में कलश स्थापना का मुहूर्त क्या है?

11 अक्टूबर 2026 को पटना में सुबह 5:46 से 9:39 बजे तक और अभिजीत मुहूर्त 11:13 से 11:59 बजे तक। रांची में सुबह 5:44 से 9:38 बजे तक और अभिजीत 11:12 से 11:59 बजे तक।

बंगाल में दुर्गा पूजा 2026 कब है?

बंगाल में महालया 10 अक्टूबर को, बोधन 17 अक्टूबर को, महासप्तमी 18 को, महाअष्टमी और संधि पूजा 19 को, महानवमी 20 को और विजयादशमी व सिंदूर खेला 21 अक्टूबर 2026 को है।

खोइंछा कैसे भरें?

अष्टमी या नवमी को लाल चुनरी या साड़ी के साथ माँ के आँचल में चावल (या धान), हल्दी की गाँठ, दूब, सुपारी, सिंदूर, फूल, सिक्का और मिठाई रखी जाती है, जैसे विदा होती बेटी का खोइंछा भरा जाता है।

घटस्थापना 2026 का शुभ मुहूर्त क्या है?

11 अक्टूबर 2026 को कोलकाता में सुबह 5:31 से 9:26, पटना में 5:46 से 9:39 और नई दिल्ली में 6:19 से 10:12 बजे तक। अभिजीत मुहूर्त पटना में 11:13 से 11:59 और कोलकाता में 11:00 से 11:47 बजे तक है। इस दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग लगभग पूरे दिन है, इसलिए कई आचार्य अभिजीत मुहूर्त को सबसे शुभ मानते हैं।

कलश स्थापना कैसे करें?

जौ बोए पात्र के बीच कलश रखें, उसमें जल और गंगाजल भरें, दूर्वा, सुपारी, फूल और सिक्का डालें, मुँह पर आम के पाँच पत्ते लगाएँ, गले में कलावा लपेटें और ऊपर लाल चुनरी में लिपटा नारियल रखें। ऊपर हर चरण का मंत्र दिया गया है।

नवरात्रि में रोज़ दुर्गा पूजा कैसे करें?

सुबह स्नान के बाद दीपक जलाकर माँ को रोली, फूल, धूप, दीप और उस दिन का भोग अर्पित करें, उस दिन की देवी का मंत्र और नवार्ण मंत्र जपें, सप्तशती या चालीसा का पाठ करें, आरती करें और अंत में क्षमा प्रार्थना करें। शाम को फिर आरती करें।

नवरात्रि के नौ दिनों में किन देवियों की पूजा होती है?

शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इन्हें नवदुर्गा कहते हैं।

2026 में दुर्गा अष्टमी और नवमी कब है?

दुर्गा अष्टमी सोमवार, 19 अक्टूबर को है (अष्टमी तिथि सुबह 10:51 तक), और संधि पूजा सुबह 10:27 से 11:15 बजे तक। नवमी तिथि 19 अक्टूबर सुबह 10:51 से 20 अक्टूबर दोपहर 12:50 तक है। बिहार और झारखंड में नवमी का हवन, कन्या पूजन और पारण 20 अक्टूबर की सुबह होगा।

कन्या पूजन में कितनी कन्याएँ बुलानी चाहिए?

2 से 10 साल की नौ कन्याएँ और साथ में एक बालक (बटुक भैरव का रूप)। नौ न मिलें तो जितनी मिलें, उनका पूरे सम्मान से पूजन करें।

दुर्गा सप्तशती का पाठ एक दिन में न हो सके तो क्या करें?

तीन दिन में तीनों चरित्रों के हिसाब से (अध्याय 1, फिर 2 से 4, फिर 5 से 13), पाँच दिन में (1, फिर 2 से 4, फिर 5 से 8, फिर 9 से 11, फिर 12 और 13), या गीता प्रेस की पाठविधि वाले सात दिन के क्रम में (1, फिर 2 और 3, फिर 4, फिर 5 से 8, फिर 9 और 10, फिर 11, फिर 12 और 13)।

नवरात्रि में अखंड ज्योति जलाना ज़रूरी है?

नहीं। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार अखंड दीपक ज़रूरी नहीं है। जिनकी स्थिति हो, वे रखें, नहीं तो सुबह से शाम की आरती तक दीपक जलाना भी पर्याप्त है।

नवरात्रि व्रत में क्या खाना चाहिए?

कुट्टू, सिंघाड़ा, राजगिरा, सामक के चावल, साबूदाना, आलू, शकरकंद, फल, दूध, दही, मखाना और सेंधा नमक। अनाज, दालें, साधारण नमक, प्याज़ और लहसुन नहीं खाए जाते।

दशहरा 2026 कब है?

दशहरा (विजयादशमी) मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है। विजय मुहूर्त पटना में दोपहर 1:29 से 2:14, रांची में 1:29 से 2:15 और दिल्ली में 1:59 से 2:45 बजे तक है। बंगाल में विजयादशमी और सिंदूर खेला 21 अक्टूबर को है।

नवरात्रि के बाद जौ का क्या करें?

जवारे का कुछ हिस्सा प्रसाद के रूप में घर में या तिजोरी में रखें और बाक़ी को बहते पानी में या किसी पेड़ के नीचे विसर्जित करें।

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नवरात्रि और दुर्गा पूजा के दिनों में रोज़ Durga puja vidhi पढ़ने के लिए इस पेज को सेव कर लीजिए और परिवार के साथ शेयर कीजिए। आप नवरात्रि में कौन सा पाठ या व्रत करते हैं, कमेंट में ज़रूर बताइए।

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