
Ahoi Ashtami vrat katha के बिना अहोई अष्टमी की पूजा पूरी नहीं मानी जाती। इस दिन माताएँ अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख के लिए सुबह से व्रत रखती हैं, शाम को अहोई माता की पूजा करके कथा सुनती हैं, और तारे निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं। यह व्रत करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से आठ दिन पहले आता है।
इस पेज पर अहोई अष्टमी की दोनों प्रचलित कथाएँ पूरी लिखी हैं: साहूकारनी और स्याहु की कथा, और छोटी बहू, सुरही गाय और स्याहु माता की कथा। साथ में पूजा की विधि क्रम से, सामग्री की पूरी सूची और व्रत खोलने का तरीका भी है। पूजा के समय कथा पढ़ने के लिए इस पेज को अभी बुकमार्क कर लीजिए।
विषय सूची
अहोई अष्टमी 2026: एक नज़र में
| बात | जानकारी |
|---|---|
| तारीख | रविवार, 1 नवंबर 2026 |
| तिथि | कार्तिक मास, कृष्ण पक्ष की अष्टमी (उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार) |
| किसके लिए | संतान की लंबी उम्र, सेहत और सुख के लिए |
| व्रत | सुबह से शाम तक, कई घरों में निर्जला |
| पूजा और कथा | शाम को, प्रदोष काल में |
| व्रत खोलना | तारे निकलने पर अर्घ्य देकर (कुछ परिवारों में चाँद देखकर) |
पूजा का मुहूर्त और तारे निकलने का समय हर शहर में थोड़ा अलग होता है, इसलिए अपने शहर का स्थानीय पंचांग ज़रूर देख लें। जिन क्षेत्रों में अमांत पंचांग चलता है (जैसे गुजरात और महाराष्ट्र), वहाँ यही दिन आश्विन मास की कृष्ण अष्टमी कहलाता है, पर व्रत उसी दिन होता है।
अहोई अष्टमी व्रत कथा 1: साहूकारनी और स्याहु की कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे थे और घर धन धान्य से भरा था। दिवाली आने वाली थी, और घर को लीपने पोतने के लिए साहूकार की पत्नी मिट्टी लेने जंगल की ओर गई।
जंगल में एक जगह उसने कुदाल से मिट्टी खोदनी शुरू की। उसी जगह पर एक स्याहु (साही) अपने बच्चों के साथ माँद में रहती थी। मिट्टी खोदते समय अनजाने में कुदाल स्याहु के एक बच्चे को लग गई और वह बच्चा मर गया। साहूकारनी को बहुत दुख हुआ, उसके मन में पछतावा भर गया, पर वह मिट्टी लेकर चुपचाप घर लौट आई।
कुछ ही समय बाद उसके घर पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा। एक एक करके उसके सातों बेटे साल भर के भीतर चल बसे। साहूकारनी का रो रोकर बुरा हाल हो गया। उसे बार बार वही दिन याद आता, जब उसकी कुदाल से स्याहु का बच्चा मरा था।
एक दिन उसने गाँव की बड़ी बूढ़ी महिलाओं के सामने अपना दुख कहा: “मैंने जानबूझकर कोई पाप नहीं किया, पर मिट्टी खोदते समय अनजाने में मेरे हाथ से स्याहु का बच्चा मर गया था। उसी के बाद से मेरे बेटे एक एक करके चले गए।”
बुज़ुर्ग महिलाओं ने उसे धीरज बँधाया और कहा: “तुमने सच्चे मन से अपना अपराध मान लिया है, इससे तुम्हारा आधा पाप तो कट गया। अब कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन अहोई माता की पूजा करो। दीवार पर अहोई माता के साथ स्याहु और उसके बच्चों का चित्र बनाओ, व्रत रखो और सच्चे मन से क्षमा माँगो। माता की कृपा से तुम्हारा दुख दूर होगा।”
साहूकारनी ने वैसा ही किया। उसने अष्टमी के दिन व्रत रखा, अहोई माता और स्याहु के बच्चों का चित्र बनाकर पूजा की, और हर साल यह व्रत पूरी श्रद्धा से करती रही। अहोई माता की कृपा से उसे फिर से सात पुत्रों का सुख मिला। तभी से माताएँ अपनी संतान की रक्षा और सुख के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती आई हैं।

अहोई अष्टमी व्रत कथा 2: छोटी बहू, सुरही गाय और स्याहु माता की कथा
एक साहूकार के सात बेटे, सात बहुएँ और एक बेटी थी। दिवाली से पहले घर लीपने के लिए सातों बहुएँ अपनी ननद के साथ जंगल में मिट्टी लेने गईं। ननद जिस जगह मिट्टी खोद रही थी, वहीं स्याहु अपने बच्चों के साथ रहती थी। खुरपी चलाते समय स्याहु का एक बच्चा मर गया।
स्याहु दुख और गुस्से से भर गई और बोली: “जैसे तूने मेरे बच्चे को मारा है, मैं तेरी कोख बाँध दूँगी।” ननद डर गई। उसने अपनी सातों भाभियों से विनती की कि उसकी जगह कोई अपनी कोख बँधवा ले। छह बड़ी भाभियों ने साफ़ मना कर दिया। पर सबसे छोटी भाभी को ननद पर दया आ गई, और उसने अपनी कोख बँधवाना स्वीकार कर लिया।
इसके बाद छोटी बहू के जब भी कोई संतान होती, वह सात दिन बाद ही चल बसती। इस तरह उसके सात बच्चे चले गए। दुखी होकर उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित ने कहा: “तुम सुरही गाय की सेवा करो। वह स्याहु माता की सहेली है, वही तुम्हारी कोख खुलवा सकती है।”
छोटी बहू रोज़ सुबह सबके उठने से पहले चुपचाप सुरही गाय की सेवा करने लगी: उसकी जगह साफ़ करती, गोबर उठाती और उसे चारा पानी देती। कुछ दिन बाद गाय ने देखा कि कौन उसकी इतनी सेवा कर रहा है। उसने छोटी बहू को पकड़ लिया और प्रसन्न होकर पूछा: “बता, तुझे क्या चाहिए?” छोटी बहू ने रोते हुए अपना सारा दुख सुना दिया।
सुरही गाय उसे साथ लेकर सात समंदर पार स्याहु माता के पास चल पड़ी। रास्ते में दोनों थककर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगीं। उसी पेड़ पर गरुड़ पंखनी नाम की एक पक्षी के बच्चे घोंसले में थे, और एक साँप उन्हें डसने के लिए ऊपर चढ़ रहा था। छोटी बहू ने तुरंत उस साँप को मार दिया और बच्चों को बचा लिया।
थोड़ी देर में गरुड़ पंखनी लौटी। चारों ओर ख़ून देखकर उसे लगा कि इस स्त्री ने उसके बच्चों को मार डाला है, और वह छोटी बहू पर चोंच मारने लगी। छोटी बहू ने कहा: “मैंने तुम्हारे बच्चों को मारा नहीं, बचाया है। यह ख़ून उस साँप का है जो उन्हें डसने आया था।” सच जानकर गरुड़ पंखनी बहुत प्रसन्न हुई, और उसने दोनों को अपनी पीठ पर बैठाकर स्याहु माता के पास पहुँचा दिया।
स्याहु माता ने सुरही गाय को देखकर कहा: “बहन, बहुत दिनों बाद आई हो।” फिर बोलीं: “मेरे सिर में बहुत जुएँ हो गई हैं, ज़रा निकाल दो।” सुरही गाय के कहने पर छोटी बहू ने बड़े प्रेम से स्याहु माता के सिर की जुएँ निकाल दीं। स्याहु माता प्रसन्न होकर बोलीं: “तेरे सात बेटे और सात बहुएँ हों।”
छोटी बहू ने हाथ जोड़कर कहा: “माता, मेरी तो कोख बँधी हुई है, मेरे बेटे कहाँ से होंगे?” स्याहु माता समझ गईं कि यह वही बहू है जिसने ननद के बदले अपनी कोख बँधवाई थी। वे अपना वचन वापस नहीं ले सकती थीं, इसलिए उन्होंने छोटी बहू की कोख खोल दी और कहा: “घर जाकर अहोई माता की पूजा करना।”
छोटी बहू घर लौटी तो उसने देखा कि उसका घर सात बेटों और सात बहुओं से भरा हुआ है। उसने बड़े उत्साह से अहोई अष्टमी का व्रत और पूजा की। तभी से यह कथा अहोई अष्टमी के दिन सुनी जाती है, और माना जाता है कि जो माँ श्रद्धा से यह व्रत करती है, अहोई माता उसकी संतान की रक्षा करती हैं।
अहोई अष्टमी पूजा विधि (क्रम से)
- सुबह का संकल्प: सुबह स्नान करके संतान की लंबी उम्र और सुख के लिए व्रत का संकल्प लीजिए। ज़्यादातर घरों में यह व्रत निर्जला रखा जाता है, पर सेहत के हिसाब से अपने परिवार की परंपरा मानिए।
- अहोई माता का चित्र: शाम से पहले दीवार पर गेरू या लाल रंग से अहोई माता का चित्र बनाइए। इसमें स्याहु और उसके बच्चे भी बनाए जाते हैं। चित्र न बना सकें तो बाज़ार में मिलने वाला अहोई माता का कैलेंडर लगा लीजिए।
- कलश या करवा: चित्र के सामने चौकी पर जल से भरा कलश रखिए। कई घरों में करवा चौथ वाला करवा ही इसके लिए इस्तेमाल होता है। इस पर रोली से स्वास्तिक बनाइए।
- भोग की तैयारी: पूड़ी, हलवा, मीठे पुए या घर की परंपरा के अनुसार पकवान बनाइए, और कुछ हिस्सा बायने के लिए अलग रखिए।
- पूजा: अहोई माता को रोली, चावल, दूध और भोग चढ़ाइए, दीपक जलाइए।
- स्याऊ (चाँदी की अहोई): कई परिवारों में चाँदी की अहोई (स्याऊ) और मोतियों की माला की पूजा करके उसे पहना जाता है। यह माला आमतौर पर दिवाली तक पहनी जाती है।
- कथा: हाथ में गेहूँ के सात दाने लेकर ऊपर दी गई कथा सुनिए या पढ़िए।
- बायना: कथा के बाद बायना (मिठाई, पकवान और कुछ रुपये) अपनी सास या घर की किसी बड़ी महिला को देकर उनका आशीर्वाद लीजिए।
- अर्घ्य और पारण: शाम को तारे निकलने पर कलश के जल से तारों को अर्घ्य दीजिए और फिर व्रत खोलिए।


अहोई अष्टमी पूजा सामग्री सूची
पूजा से एक दिन पहले यह सामग्री जुटा लीजिए:
- अहोई माता का चित्र या कैलेंडर
- चाँदी की अहोई (स्याऊ) और मोती माला
- पूजा की थाली
- जल से भरा कलश या करवा
- रोली, अक्षत (चावल), कच्चा दूध
- मिट्टी के दीये
- गेहूँ के सात दाने
- भोग: पूड़ी, हलवा या पुए
- बायने के लिए मिठाई और कुछ रुपये

व्रत रखते समय ध्यान रखें
- सेहत पहले: गर्भवती, बीमार या बुज़ुर्ग महिलाएँ निर्जला व्रत की जगह फलाहार या पानी के साथ व्रत रख सकती हैं। आस्था मन से होती है, शरीर को कष्ट देकर नहीं।
- कथा पूरी सुनें: कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है, इसलिए पूरी कथा ध्यान से सुनिए।
- मिट्टी का काम: परंपरा में इस दिन मिट्टी खोदने या ज़मीन की खुदाई से बचने को कहा जाता है, क्योंकि कथा इसी से जुड़ी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहोई अष्टमी 2026 कब है?
अहोई अष्टमी 2026 में रविवार, 1 नवंबर को है। यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को, करवा चौथ के चार दिन बाद मनाई जाती है।
अहोई अष्टमी का व्रत क्यों रखा जाता है?
यह व्रत माताएँ अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन के लिए रखती हैं। जिन दंपतियों को संतान की कामना होती है, वे भी यह व्रत रखते हैं।
अहोई अष्टमी का व्रत तारे देखकर खोलें या चाँद देखकर?
ज़्यादातर घरों में शाम को तारे निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। कुछ परिवारों में चाँद देखकर व्रत खोलने की परंपरा है, पर अष्टमी का चाँद रात में काफ़ी देर से निकलता है। अपने परिवार की परंपरा के अनुसार चलिए।
अहोई माता कौन हैं?
अहोई माता को माता पार्वती का ही एक रूप माना जाता है, जिनकी पूजा संतान की रक्षा करने वाली देवी के रूप में होती है। इसलिए इस दिन स्याहु और उसके बच्चों के साथ अहोई माता का चित्र बनाकर पूजा की जाती है।
करवा चौथ और अहोई अष्टमी में क्या संबंध है?
दोनों व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में चार दिन के अंतर पर आते हैं। करवा चौथ पति की लंबी उम्र के लिए और अहोई अष्टमी संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। कई घरों में करवा चौथ वाले करवे में ही अहोई अष्टमी का जल भरा जाता है।
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आपके घर में अहोई अष्टमी की कौन सी कथा सुनी जाती है, और पूजा की कोई ख़ास परंपरा है तो कमेंट में ज़रूर बताइए। अहोई माता सभी की संतान की रक्षा करें।
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