बृहस्पतिवार व्रत कथा (Brihaspativar Vrat Katha): पूरी कथा, पूजा विधि, नियम और उद्यापन

Brihaspativar vrat katha: गुरुवार पूजा के लिए सजा पीला पूजा स्थान, दीपक, गेंदे की माला और चने की दाल
गुरुवार व्रत की पूजा: पीला कपड़ा, गेंदे के फूल, दीपक और चने की दाल का भोग (प्रतीकात्मक चित्र)

बृहस्पतिवार व्रत कथा (Brihaspativar vrat katha) गुरुवार के व्रत में पढ़ी या सुनी जाने वाली कथा है, जिसे गुरुवार व्रत कथा या बृहस्पति देव की कथा भी कहते हैं। यह व्रत देवताओं के गुरु बृहस्पति देव और भगवान विष्णु को समर्पित है। मान्यता है कि गुरुवार का व्रत करने से घर में सुख समृद्धि आती है, विद्या और बुद्धि बढ़ती है, और जिनके विवाह में देर हो रही हो, उन्हें अच्छा जीवनसाथी मिलता है। इस व्रत में पीले रंग का ख़ास महत्व है।

इस पेज पर बृहस्पतिवार व्रत की पूरी कथा, 2 मिनट में पढ़ने वाली छोटी कथा, पूजा की विधि क्रम से, कितने गुरुवार व्रत करें, क्या खाएँ, बृहस्पति देव के मंत्र, व्रत के नियम और उद्यापन की विधि व सामग्री दी गई है। हर गुरुवार कथा पढ़ने के लिए इस पेज को बुकमार्क कर लीजिए।

विषय सूची

गुरुवार व्रत: एक नज़र में

बातजानकारी
दिनहर गुरुवार (बृहस्पतिवार)
किसकी पूजाबृहस्पति देव और भगवान विष्णु, साथ में केले के पेड़ की
कब से शुरू करेंकिसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से (कई परिवार पौष मास में शुरुआत नहीं करते)
कितने गुरुवार16 गुरुवार, या 1 साल, या 3 साल, संकल्प के अनुसार
रंगपीला: पीले कपड़े, पीले फूल, पीला भोग
भोगचने की दाल, गुड़, केले, बेसन के लड्डू
भोजनदिन में एक बार, पीला भोजन, केला नहीं
मंत्रॐ बृं बृहस्पतये नमः

बृहस्पतिवार व्रत कथा (छोटी कथा)

एक प्रतापी और दानी राजा था, पर उसकी रानी को दान पुण्य पसंद नहीं था। एक गुरुवार बृहस्पति देव साधु बनकर आए। रानी ने कहा कि धन से तंग आ गई हूँ, कोई उपाय बताइए कि यह ख़त्म हो जाए। साधु ने बताया कि गुरुवार को घर लीपना, बाल धोना, कपड़े धोना और मांस मदिरा रखना। रानी ने ऐसा किया और राज्य का सारा धन चला गया।

राजा परदेस में लकड़ी बेचने लगा, रानी भूखी रहने लगी। तब रानी की बहन ने उसे गुरुवार का व्रत करना सिखाया।

रानी ने और जंगल में साधु के कहने पर राजा ने भी श्रद्धा से व्रत किया। बृहस्पति देव की कृपा से उनके दिन फिर गए, और दोनों ने दान पुण्य के साथ हर गुरुवार व्रत करने का प्रण लिया।

Brihaspativar Vrat Katha: बृहस्पतिवार व्रत की पूरी कथा (राजा और रानी की कहानी)

रानी को दान पुण्य पसंद नहीं था

प्राचीन समय में एक बड़ा प्रतापी और दानी राजा था। वह हर गुरुवार को व्रत रखता, बृहस्पति देव की पूजा करता और ग़रीबों और साधुओं को खुले हाथ से दान देता था। पर उसकी रानी को यह सब पसंद नहीं था। वह न व्रत करती थी, न किसी को दान देती थी, और राजा को भी दान करने से रोकती थी।

साधु के रूप में आए बृहस्पति देव

एक बार राजा शिकार खेलने वन में गया हुआ था। उसी समय बृहस्पति देव एक साधु का रूप धरकर महल के द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी ने साधु से कहा: “महाराज, मैं इस दान पुण्य से तंग आ गई हूँ। इतना धन है कि संभाला नहीं जाता, और राजा उसे दान में लुटाते रहते हैं। कोई ऐसा उपाय बताइए कि यह सारा धन ख़त्म हो जाए और मैं आराम से रह सकूँ।”

साधु ने समझाया: “देवी, धन से तो दान पुण्य और भले काम होते हैं, इसे बोझ मत समझो।” पर रानी नहीं मानी। तब साधु ने कहा: “अगर तुम यही चाहती हो, तो गुरुवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने बाल धोना, राजा से हजामत बनवाने को कहना, कपड़े धोना, और भोजन में मांस मदिरा रखना। सात गुरुवार में तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।” इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गए।

Brihaspati dev ki katha: महल के द्वार पर साधु के रूप में बृहस्पति देव और रानी
कथा का एक दृश्य: साधु बनकर आए बृहस्पति देव और रानी (प्रतीकात्मक चित्र)
Guruvar vrat katha: केले का पेड़, जिसमें केले के गुच्छे लगे हैं
गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा होती है, पर इस दिन केला खाया नहीं जाता

रानी की भूल और धन का नाश

रानी ने ठीक वैसा ही किया। तीन गुरुवार भी नहीं बीते थे कि राजा का सारा ख़ज़ाना ख़ाली हो गया और महल में खाने तक के लाले पड़ गए। राजा ने रानी से कहा: “तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश जाकर कुछ काम करता हूँ, ताकि गुज़ारा हो सके।” राजा दूसरे देश चला गया और जंगल से लकड़ियाँ काटकर बेचने लगा।

उधर रानी और उसकी दासी भूखी रहने लगीं। कई दिन भूखे रहने के बाद रानी ने दासी से कहा: “पास के नगर में मेरी बहन रहती है, वह बहुत धनवान है। तुम उसके पास जाकर कुछ अनाज ले आओ।” दासी रानी की बहन के घर पहुँची। उस दिन गुरुवार था, और बहन बृहस्पति देव की कथा सुन रही थी, इसलिए उसने दासी को कोई जवाब नहीं दिया। दासी दुखी होकर लौट आई और रानी को सब बताया। रानी ने कहा: “यह सब मेरे कर्मों का फल है।”

बहन ने बताई गुरुवार व्रत की विधि

कथा पूरी होने के बाद बहन को याद आया कि दासी कुछ कहने आई थी। वह खुद रानी के घर पहुँची और कहा: “बहन, उस समय मैं गुरुवार की कथा सुन रही थी, इसलिए कुछ बोल नहीं पाई। बताओ, दासी क्यों आई थी?” रानी ने रोते हुए सारी बात बता दी। बहन ने कहा: “बहन, बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। तुम भी गुरुवार का व्रत करो।”

बहन ने रानी को व्रत की विधि बताई: गुरुवार को सुबह स्नान करके पीले कपड़े पहनना, केले के पेड़ की जड़ में चने की दाल, गुड़ और हल्दी मिला जल चढ़ाना, दीपक जलाना, बृहस्पति देव की कथा सुनना, और दिन में एक बार पीला भोजन करना। रानी और दासी ने पूरी श्रद्धा से यह व्रत करना शुरू किया।

Guruvar vrat katha: रानी की बहन उसे गुरुवार व्रत की विधि बताते हुए
बहन ने रानी को गुरुवार व्रत की विधि बताई (प्रतीकात्मक चित्र)

बृहस्पति देव की कृपा से फिर लौटे अच्छे दिन

कुछ ही गुरुवार में बृहस्पति देव की कृपा से उनके घर में फिर से अन्न और धन आने लगा। उधर जंगल में लकड़ियाँ काटते राजा को भी एक दिन वही साधु मिले। राजा ने अपना दुख बताया, तो साधु ने उसे भी गुरुवार का व्रत करने को कहा। राजा ने व्रत किया, और उसकी लकड़ियों के अच्छे दाम मिलने लगे। धीरे धीरे उसके दिन फिर गए, और वह अपने राज्य लौट आया।

लौटकर राजा ने देखा कि महल फिर से धन धान्य से भरा है। रानी ने अपनी भूल मानी और कहा कि अब से हम दोनों गुरुवार का व्रत करेंगे और दान पुण्य भी करेंगे। तब से राजा और रानी हर गुरुवार श्रद्धा से व्रत करने लगे, और उनका जीवन सुख से भर गया।

कथा की सीख: धन बोझ नहीं, अवसर है। जो धन का सम्मान करता है, उसे दान और भले काम में लगाता है, उसके घर में बरकत बनी रहती है।

बृहस्पतिवार व्रत कैसे करें: पूजा विधि (क्रम से)

  1. सुबह स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर स्नान कीजिए और पीले कपड़े पहनिए।
  2. संकल्प: भगवान विष्णु और बृहस्पति देव के सामने व्रत का संकल्प लीजिए, और मन में तय कीजिए कि कितने गुरुवार व्रत रखेंगे।
  3. पूजा: भगवान विष्णु के चित्र या मूर्ति पर पीले फूल, पीला चंदन या हल्दी, चने की दाल, गुड़ और केले अर्पित कीजिए। घी का दीपक जलाइए।
  4. केले के पेड़ की पूजा: केले के पेड़ की जड़ में हल्दी, चने की दाल और गुड़ मिला जल चढ़ाइए, दीपक जलाइए और परिक्रमा कीजिए।
  5. कथा: ऊपर दी गई बृहस्पतिवार व्रत कथा (Brihaspativar vrat katha) पढ़िए या सुनिए।
  6. आरती: कथा के बाद बृहस्पति देव की आरती कीजिए। सबसे प्रचलित आरती “जय बृहस्पति देवा” है, जिसके बोल व्रत कथा की किताबों में दिए होते हैं।
  7. भोजन: दिन में एक बार पीला भोजन कीजिए, जैसे चने की दाल, बेसन की रोटी या बेसन के लड्डू। कई परिवारों में इस दिन नमक नहीं खाया जाता।
Brihaspativar vrat vidhi: पूजा की थाली में दीपक जलाती महिला
गुरुवार की पूजा में घी का दीपक जलाया जाता है (प्रतीकात्मक चित्र)

गुरुवार व्रत कितने करने चाहिए?

गुरुवार व्रत की गिनती अपने संकल्प पर निर्भर करती है। सबसे प्रचलित तरीके ये हैं:

  • 16 गुरुवार: सबसे आम संकल्प। 16 व्रत पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है, कई परिवार इसे 17वें गुरुवार को करते हैं।
  • 1 साल या 3 साल: कई लोग साल भर या तीन साल तक हर गुरुवार व्रत रखते हैं, फिर उद्यापन करते हैं।
  • जीवन भर: कुछ लोग बिना गिनती के हर गुरुवार व्रत रखते हैं।

व्रत किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से शुरू किया जा सकता है। किसी गुरुवार व्रत छूट जाए, तो बहुत से परिवार उसे गिनती में नहीं जोड़ते और अगले गुरुवार से गिनती आगे बढ़ाते हैं।

गुरुवार व्रत में क्या खाएँ और क्या नहीं

खा सकते हैंनहीं खाते
चने की दाल, बेसन की रोटी या पूड़ीकेला (इसकी पूजा होती है, इसे दान में देते हैं)
बेसन के लड्डू, पीली मिठाईमांस, मदिरा, प्याज़, लहसुन
केसर या हल्दी वाला दूधकई परिवारों में नमक
पीले फल जैसे पपीता, आम (मौसम के अनुसार)दिन में बार बार भोजन (एक समय भोजन की परंपरा)

गुरुवार व्रत के नियम

  • पीला रंग: पीले कपड़े, पीले फूल और पीला भोग इस व्रत की पहचान हैं।
  • केला न खाएँ: इस दिन केले के पेड़ की पूजा होती है, इसलिए केला खाया नहीं जाता, उसे भोग और दान में दिया जाता है।
  • परंपरा के अनुसार वर्जित काम: कथा में आए कामों से इस दिन बचने की परंपरा है, जैसे बाल धोना, हजामत बनवाना, घर में पोछा या गोबर लीपना और कपड़े धोना।
  • दान: इस दिन चने की दाल, गुड़, पीले कपड़े, हल्दी या केले का दान शुभ माना जाता है।
  • सेहत: अगर आप बीमार हैं, गर्भवती हैं या दवा ले रही हैं, तो कठोर उपवास न करें, फल और हल्का भोजन लेते हुए पूजा करें।
गुरुवार व्रत का भोग: गुड़ के टुकड़े
बृहस्पति देव को चने की दाल और गुड़ का भोग लगाया जाता है

बृहस्पति देव के मंत्र

विष्णु मंत्र: फूलों से सजी भगवान विष्णु (श्री वेंकटेश्वर) की प्रतिमा
गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है

पूजा के समय या दिन भर इनमें से किसी एक मंत्र का जाप किया जाता है। एक माला यानी 108 बार जाप करने की परंपरा है।

  • बृहस्पति का मंत्र: ॐ बृं बृहस्पतये नमः
  • गुरु का बीज मंत्र: ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
  • विष्णु मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

गुरुवार व्रत के लाभ (मान्यता)

  • घर में सुख, समृद्धि और बरकत बनी रहती है, जैसा कथा में राजा रानी के साथ हुआ।
  • पढ़ाई, विद्या और बुद्धि में बढ़ोतरी मानी जाती है, क्योंकि बृहस्पति देव ज्ञान के देवता हैं।
  • विवाह में आ रही देरी या रुकावटें दूर होने की मान्यता है।
  • ज्योतिष में कुंडली का गुरु (बृहस्पति) ग्रह मज़बूत करने के लिए भी यह व्रत रखा जाता है।
  • सबसे बड़ा लाभ अनुशासन और दान की आदत है, जो कथा की असली सीख है।

गुरुवार व्रत का उद्यापन: विधि और सामग्री

जितने गुरुवार का संकल्प लिया था, वे पूरे होने पर आख़िरी गुरुवार को उद्यापन किया जाता है। इस दिन विधि से पूजा और कथा के बाद हवन कराया जाता है, और ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को चने की दाल, गुड़, पीले कपड़े, केले और दक्षिणा दान की जाती है। उद्यापन की सही विधि अपने पंडित जी से पूछ लेना अच्छा रहता है।

उद्यापन की विधि (क्रम से)

  1. सुबह स्नान करके पीले कपड़े पहनें और पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का चित्र रखें।
  2. कलश स्थापना करें और सामान्य गुरुवार की तरह पूजा करें।
  3. बृहस्पतिवार व्रत कथा पढ़ें और आरती करें।
  4. पंडित जी से हवन कराएँ, मंत्रों के साथ आहुति दें।
  5. ब्राह्मण या ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ और पीली चीज़ें दान करें।
  6. सबको प्रसाद बाँटकर व्रत पूरा करें।

उद्यापन सामग्री लिस्ट

  • भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का चित्र, पीला कपड़ा, चौकी
  • कलश, आम के पत्ते, नारियल
  • पीले फूल और माला, हल्दी, पीला चंदन, रोली, अक्षत
  • चने की दाल, गुड़, केले, बेसन के लड्डू
  • घी, दीपक, धूप, कपूर
  • हवन सामग्री, आम की लकड़ी, हवन कुंड
  • दान के लिए पीले कपड़े, धार्मिक पुस्तक, दक्षिणा

पूजा सामग्री और किताब

गुरुवार व्रत पूजा सामग्री: फूल, कलश और फल से सजी पूजा की थाली
हर गुरुवार की पूजा के लिए पीले फूल, कलश, फल और दीपक वाली थाली

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बृहस्पतिवार का व्रत कब से शुरू करें?

किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से यह व्रत शुरू किया जा सकता है। कई परिवारों में पौष मास में नई शुरुआत नहीं की जाती। आप 16 गुरुवार, 1 साल या 3 साल का संकल्प ले सकते हैं।

गुरुवार व्रत कितने करने चाहिए?

सबसे प्रचलित संकल्प 16 गुरुवार का है। कई लोग 1 साल या 3 साल तक भी रखते हैं। संकल्प पूरा होने पर उद्यापन किया जाता है।

गुरुवार के व्रत में क्या खाना चाहिए?

दिन में एक बार पीला भोजन किया जाता है, जैसे चने की दाल, बेसन की रोटी, बेसन के लड्डू या केसर वाला दूध। कई परिवारों में इस दिन नमक नहीं खाते। केला इस दिन नहीं खाया जाता।

गुरुवार के व्रत में केला क्यों नहीं खाते?

इस दिन केले के पेड़ की पूजा होती है, क्योंकि मान्यता है कि उसमें भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का वास है। इसलिए केला भोग और दान में दिया जाता है, खुद नहीं खाया जाता।

क्या कुँवारी लड़कियाँ गुरुवार का व्रत रख सकती हैं?

हाँ। मान्यता है कि गुरुवार का व्रत अच्छे जीवनसाथी और विवाह में आ रही रुकावटें दूर करने के लिए भी रखा जाता है, इसलिए बहुत सी कुँवारी लड़कियाँ यह व्रत रखती हैं।

गुरुवार को बाल क्यों नहीं धोते?

यह परंपरा इसी कथा से जुड़ी है, जिसमें रानी के गुरुवार को बाल धोने और कपड़े धोने से घर की बरकत चली गई थी। इसलिए बहुत से परिवार इस दिन ये काम नहीं करते।

बृहस्पति देव का मंत्र क्या है?

“ॐ बृं बृहस्पतये नमः” और बीज मंत्र “ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः”। एक माला यानी 108 बार जाप की परंपरा है।

गुरुवार व्रत का उद्यापन कैसे करें?

आख़िरी गुरुवार को पूजा, कथा और आरती के बाद हवन कराया जाता है, और ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन कराकर चने की दाल, गुड़, पीले कपड़े और दक्षिणा दान की जाती है।

बृहस्पतिवार व्रत कथा की किताब कहाँ मिलेगी?

ये किताब पूजा सामग्री की दुकानों और Amazon पर मिलती है, ऊपर “पूजा सामग्री और किताब” में लिंक दिया है। यह पूरी कथा इस पेज पर भी है, जिसे आप हर गुरुवार यहीं पढ़ सकते हैं।

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हर गुरुवार Brihaspativar vrat katha पढ़ने के लिए इस पेज को सेव कर लीजिए। आप कितने गुरुवार का व्रत रख रहे हैं, कमेंट में ज़रूर बताइए।

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