संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा: 12 महीनों की कथा, 2026 और 2027 की सभी तारीख़ें, चाँद निकलने का समय और पूजा विधि

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Sankashti Chaturthi vrat katha: फूलों की सजावट के बीच विराजमान भगवान गणेश की मूर्ति
संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा और रात को चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है

Sankashti Chaturthi vrat katha हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को पढ़ी जाती है, जब भक्त दिन भर व्रत रखकर शाम को भगवान गणेश की पूजा करते हैं और रात को चाँद निकलने पर अर्घ्य देकर व्रत खोलते हैं। “संकष्टी” का मतलब है संकट से छुटकारा। मान्यता है कि यह व्रत जीवन की रुकावटें दूर करता है। हर महीने गणेश जी के एक अलग रूप की पूजा होती है और हर महीने की अपनी कथा है। जब संकष्टी मंगलवार को पड़े, तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं, जो सबसे शुभ मानी जाती है।

इस पेज पर अगली संकष्टी चतुर्थी कब है, 2026 और 2027 की सभी तारीख़ें, 16 शहरों में चाँद निकलने का समय, व्रत किस दिन रखें इसका नियम, संकष्टी व्रत की मूल कथा, 12 महीनों की कथाएँ, पूजा विधि, मंत्र, व्रत में क्या खाएँ और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, सब एक जगह है।

विषय सूची

अगली Sankashti Chaturthi: एक नज़र में

बातजानकारी
अगली संकष्टी चतुर्थीशुक्रवार, 27 नवंबर 2026
गणेश जी का रूपगणाधिप
महीनामार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष चतुर्थी
चतुर्थी तिथि27 नवंबर सुबह 9:48 बजे से 28 नवंबर सुबह 6:39 बजे तक
चाँद निकलने का समय (दिल्ली)27 नवंबर रात 8:18 बजे
उसके बादशनिवार, 26 दिसंबर 2026 (अखुरथ), दिल्ली में चाँद रात 8:19 बजे

इससे पहले गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को वक्रतुंड संकष्टी है, और उसी दिन करवा चौथ भी है। कार्तिक की संकष्टी ही करवा चौथ होती है। ऊपर के सभी समय Drik Panchang के अनुसार नई दिल्ली के हैं।

Sankashti Chaturthi 2026 और 2027: सभी तारीख़ें

तारीख़दिनमहीनागणेश जी का रूपचाँद (दिल्ली)ख़ास बात
29 अक्टूबर 2026गुरुवारकार्तिकवक्रतुंडरात 8:17करवा चौथ
27 नवंबर 2026शुक्रवारमार्गशीर्षगणाधिपरात 8:18
26 दिसंबर 2026शनिवारपौषअखुरथरात 8:19पूर्वी भारत में 27 दिसंबर
25 जनवरी 2027सोमवारमाघलंबोदररात 9:16सकट चौथ, तिलकुट चौथ
24 फ़रवरी 2027बुधवारफाल्गुनद्विजप्रियरात 10:03
25 मार्च 2027गुरुवारचैत्रभालचंद्ररात 9:49
24 अप्रैल 2027शनिवारवैशाखविकटरात 10:32
23 मई 2027रविवारज्येष्ठएकदंतरात 10:03
22 जून 2027मंगलवारआषाढ़कृष्णपिंगलरात 9:57अंगारकी चतुर्थी
22 जुलाई 2027गुरुवारश्रावणगजाननरात 9:27
20 अगस्त 2027शुक्रवारभाद्रपदहेरंबरात 8:27बहुला चतुर्थी
19 सितंबर 2027रविवारआश्विनविघ्नराजरात 8:08
18 अक्टूबर 2027सोमवारकार्तिकवक्रतुंडरात 7:35करवा चौथ
17 नवंबर 2027बुधवारमार्गशीर्षगणाधिपरात 8:26
16 दिसंबर 2027गुरुवारपौषअखुरथरात 8:30

महीनों के नाम पूर्णिमांत पंचांग के हैं, जो उत्तर भारत में चलता है। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में यही चतुर्थी एक महीने पहले के नाम से आती है। जैसे 27 नवंबर 2026 वाली संकष्टी उत्तर भारत में मार्गशीर्ष की है, और महाराष्ट्र के पंचांग में कार्तिक की। तारीख़ दोनों में एक ही रहती है। जिस साल अधिक मास होता है, उस साल 13 संकष्टी आती हैं; 2026 में अधिक ज्येष्ठ की संकष्टी 3 जून को “विभुवन संकष्टी” थी।

शहर के अनुसार चाँद निकलने का समय

रात के अँधेरे आसमान में चमकता चंद्रमा
संकष्टी चतुर्थी का व्रत चाँद निकलने के बाद अर्घ्य देकर खोला जाता है
शहर29 अक्टूबर 202627 नवंबर 202626 दिसंबर 2026
दिल्लीरात 8:17रात 8:18रात 8:19
मुंबईरात 9:00रात 8:59रात 8:52
पुणेरात 8:58रात 8:56रात 8:49
नागपुररात 8:29रात 8:28रात 8:23
लखनऊरात 8:06रात 8:07रात 8:06
वाराणसीरात 8:02रात 8:0227 दिसंबर, रात 9:07
पटनाशाम 7:52शाम 7:5227 दिसंबर, रात 8:57
कोलकाताशाम 7:47शाम 7:4627 दिसंबर, रात 8:47
जयपुररात 8:28रात 8:28रात 8:28
भोपालरात 8:31रात 8:30रात 8:27
इंदौररात 8:39रात 8:38रात 8:34
अहमदाबादरात 8:52रात 8:51रात 8:47
बेंगलुरुरात 8:55रात 8:52रात 8:42
हैदराबादरात 8:41रात 8:39रात 8:32
चेन्नईरात 8:44रात 8:40रात 8:30
चंडीगढ़रात 8:12रात 8:14रात 8:17

ये समय क्षितिज पर चाँद उगने के हैं। घर की छत से चाँद दिखने में पेड़, इमारतों या बादलों की वजह से 10 से 20 मिनट और लग सकते हैं।

व्रत किस दिन रखें: चाँद और तिथि का नियम

संकष्टी का व्रत उस दिन रखा जाता है, जिस दिन चाँद निकलते समय चतुर्थी तिथि चल रही हो। इसीलिए कभी कभी व्रत की तारीख़ शहर के हिसाब से बदल जाती है, और कभी तृतीया तिथि वाले दिन भी व्रत पड़ता है।

दिसंबर 2026 इसका अच्छा उदाहरण है। चतुर्थी तिथि 26 दिसंबर रात 8:04 बजे शुरू होगी। दिल्ली में उस दिन चाँद 8:19 बजे निकलेगा, यानी चतुर्थी शुरू होने के बाद, इसलिए दिल्ली, मुंबई, जयपुर जैसे शहरों में व्रत 26 दिसंबर को है। पर पटना, वाराणसी और कोलकाता में 26 दिसंबर को चाँद 8 बजे से पहले निकल जाएगा, जब चतुर्थी शुरू ही नहीं हुई होगी। इसलिए पूर्वी भारत में यह व्रत 27 दिसंबर को रखा जाएगा। अपने शहर का पंचांग देखकर ही व्रत की तारीख़ तय करें।

अंगारकी चतुर्थी 2027: 22 जून, मंगलवार

जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार को पड़ती है, तो उसे अंगारकी या अंगारक चतुर्थी कहते हैं। मंगल ग्रह का एक नाम अंगारक है। मान्यता है कि अंगारकी चतुर्थी का एक व्रत कई संकष्टियों के बराबर फल देता है। महाराष्ट्र में इस दिन सिद्धिविनायक (मुंबई) और अष्टविनायक मंदिरों में बहुत भीड़ होती है। 2027 में अंगारकी चतुर्थी केवल एक बार है: मंगलवार, 22 जून 2027 को, कृष्णपिंगल संकष्टी के दिन। दिल्ली में उस रात चाँद 9:57 बजे निकलेगा।

Sankashti Chaturthi Vrat Katha: संकष्टी व्रत की मूल कथा

यह कथा श्रावण की गजानन संकष्टी की कथा के रूप में आती है, और इसमें संकष्टी व्रत की पूरी शुरुआत और विधि बताई गई है। इसलिए इसे संकष्टी व्रत की मूल कथा माना जाता है।

एक बार ऋषियों ने भगवान कार्तिकेय से पूछा: “जो लोग ग़रीबी, बीमारी, शत्रु, घर से निकाले जाने या किसी भी बड़े संकट से दुखी हैं, उनके लिए कौन सा उपाय है?” कार्तिकेय जी ने कहा कि ऐसा ही प्रश्न पांडवों के वनवास के समय राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा था, और श्रीकृष्ण ने उन्हें यह कथा सुनाई थी।

श्रीकृष्ण बोले: “सतयुग में पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए वन में बहुत कठोर तप किया। बहुत समय बीत गया, पर शिव जी ने दर्शन नहीं दिए। तब पार्वती जी ने गणेश जी का ध्यान किया, और गणेश जी उनके सामने प्रकट हुए।”

पार्वती जी ने पूछा: “मैंने इतना कठिन तप किया, फिर भी मुझे शिव जी नहीं मिले। नारद जी ने संकटों को मिटाने वाले जिस व्रत की बात की थी, उसकी विधि मुझे बताइए।” तब गणेश जी ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत बताया: “श्रावण कृष्ण चतुर्थी को सुबह संकल्प लें कि चाँद निकलने तक कुछ नहीं खाऊँगी। सफ़ेद तिल मिले पानी से स्नान करें। सोने, चाँदी या मिट्टी की, जैसी सामर्थ्य हो, मेरी मूर्ति कलश पर बैठाकर पूजा करें। घी के लड्डू का भोग लगाएँ, कुछ लड्डू ब्राह्मण को दें, चाँद निकलने पर चतुर्थी तिथि और चंद्रमा को अर्घ्य दें, और फिर प्रसाद लेकर व्रत खोलें।”

गणेश जी ने यह भी कहा कि जो जीवन भर यह व्रत न कर सके, वह कम से कम एक साल तक बारह महीनों की संकष्टी करे, और वह भी न हो सके तो साल में एक संकष्टी ज़रूर करे। पार्वती जी ने यही व्रत किया, और इसी व्रत के फल से उनका विवाह भगवान शिव से हुआ।

श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने भी यह व्रत किया, और आगे चलकर उन्हें अपना खोया हुआ राज्य वापस मिला।

कथा की सीख: लंबी कोशिश के बाद भी रास्ता न मिले, तो धैर्य और श्रद्धा के साथ सही विधि अपनाने से काम बनता है।

12 महीनों की संकष्टी कथा (हर महीने की अलग कथा)

परंपरा में हर महीने की संकष्टी की एक अलग कथा है। हर कथा में माता पार्वती गणेश जी से उस महीने का व्रत पूछती हैं, और ज़्यादातर कथाओं में यह बात श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर को सुनाते हैं। नीचे हर महीने की कथा छोटे में है। जिस महीने की संकष्टी हो, उस दिन उसी महीने की कथा पढ़ें।

चैत्र: भालचंद्र संकष्टी (राजा मयूरध्वज की कथा)

राजा मयूरध्वज ने पुत्र होने के बाद राजकाज मंत्री धर्मपाल को सौंप दिया। मंत्री की सबसे छोटी बहू गणेश जी की भक्त थी। उसने संकष्टी का व्रत किया तो सास ने इसे जादू टोना कहकर रोकना चाहा, और बेटे को भी उसके ख़िलाफ़ कर दिया। बहू ने सब सहकर भी व्रत पूरा किया और गणेश जी से प्रार्थना की कि उसके घर वालों की बुद्धि ठीक हो। तब राजकुमार अचानक ग़ायब हो गया और उसके कपड़े मंत्री के महल में मिले। राजा ने मंत्री को मृत्युदंड की धमकी दी। तब छोटी बहू ने बताया कि यह गणेश जी के अपमान का फल है, और सबने मिलकर संकष्टी का व्रत किया। व्रत के बाद राजकुमार सकुशल लौट आया।

वैशाख: विकट संकष्टी (सुशीला और चंचला की कथा)

ब्राह्मण धर्मकेतु की दो पत्नियाँ थीं। सुशीला व्रत उपवास करती थी, चंचला कभी व्रत नहीं करती थी। सुशीला की बेटी हुई और चंचला का बेटा, तो चंचला सुशीला को ताने देने लगी। सुशीला ने पूरी श्रद्धा से गणेश चतुर्थी का व्रत किया। गणेश जी की कृपा से उसकी बेटी के मुँह से मोती और मूँगे झड़ने लगे, और उसे एक विद्वान बेटा भी हुआ। जलन में चंचला ने एक दिन बच्ची को कुएँ में धक्का दे दिया, पर गणेश जी ने उसे बचा लिया। यह देखकर चंचला का मन बदल गया, उसने माफ़ी माँगी और ख़ुद भी व्रत करने लगी। कथा के अनुसार इस दिन कमलगट्टे का हलवा खाया जाता है।

ज्येष्ठ: एकदंत संकष्टी (ब्राह्मण दयादेव की कथा)

राजा पृथु के राज्य में ब्राह्मण दयादेव की बड़ी बहू बचपन से संकष्टी का व्रत करती थी। ससुराल में सास के दबाव में उसने व्रत छोड़ दिया। आगे चलकर उसके बेटे की शादी के दिन ही दूल्हा ग़ायब हो गया। बहू समझ गई कि यह व्रत छोड़ने का फल है। तब नई बहू ने अपने पति के लिए हर महीने संकष्टी का व्रत शुरू किया। एक दिन गणेश जी एक दुबले ब्राह्मण के वेश में उसके घर भिक्षा माँगने आए। उसने आदर से भोजन कराया, तो गणेश जी ने प्रकट होकर वरदान दिया, और उसका पति जंगल से सकुशल लौट आया। कथा के अनुसार इस दिन घी से बने हलवे, लड्डू और पूड़ी का भोग लगता है।

आषाढ़: कृष्णपिंगल संकष्टी (राजा महीजित की कथा)

माहिष्मती नगरी का राजा महीजित धर्मात्मा था, पर उसकी कोई संतान नहीं थी। राजा बूढ़ा होने लगा, तो प्रजा और विद्वान ब्राह्मण उपाय ढूँढने वन में गए। वहाँ उन्हें लोमश ऋषि मिले, जिन्होंने आषाढ़ कृष्ण चतुर्थी को कृष्णपिंगल गणेश की पूजा का व्रत बताया। राजा ने विधि से व्रत किया, ब्राह्मणों को भोजन और वस्त्र दिए, और गणेश जी की कृपा से रानी सुदक्षिणा को सुंदर पुत्र हुआ। 2027 में यही संकष्टी मंगलवार को पड़ रही है, यानी अंगारकी चतुर्थी है।

श्रावण: गजानन संकष्टी (पार्वती जी का व्रत)

यह ऊपर दी गई मूल कथा है: पार्वती जी ने गणेश जी से संकष्टी व्रत की विधि जानी, व्रत किया और उन्हें भगवान शिव पति रूप में मिले। कथा के अनुसार इस महीने व्रत का उद्यापन भी किया जाता है।

भाद्रपद: हेरंब संकष्टी (राजा नल और दमयंती की कथा)

राजा नल पर एक के बाद एक संकट आए: हाथी घोड़े चोरी हो गए, ख़ज़ाना लुट गया, जुए में सब हार गए, और पति पत्नी बिछड़ गए। वन में भटकती दमयंती को शरभंग ऋषि मिले। उन्होंने भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को हेरंब गणेश की पूजा का व्रत बताया और कहा कि तीन महीने में पति से मिलन होगा। दमयंती ने हर महीने व्रत किया, और तीन महीने में उसे पति, पुत्र और राज्य, सब वापस मिल गए। इसी कथा में गणेश जी के बारह नाम भी आते हैं, जिनसे बारह महीनों में उनकी पूजा होती है। इसी दिन बहुला चतुर्थी भी मनाई जाती है।

आश्विन: विघ्नराज संकष्टी (अनिरुद्ध और बाणासुर की कथा)

बाणासुर की बेटी उषा ने सपने में श्रीकृष्ण के पोते अनिरुद्ध को देखा। उसकी सखी चित्रलेखा माया से अनिरुद्ध को द्वारका से उठा लाई। पूरे द्वारका में शोक छा गया। तब लोमश ऋषि ने श्रीकृष्ण को बताया कि अनिरुद्ध बाणासुर के महल में है, और आश्विन कृष्ण चतुर्थी का संकट व्रत करने को कहा। श्रीकृष्ण ने व्रत किया, बाणासुर को युद्ध में हराया और अनिरुद्ध को वापस लाए। कथा के अनुसार इस दिन भोजन नहीं किया जाता, और क्रोध, लोभ और दिखावे से दूर रहा जाता है।

कार्तिक: वक्रतुंड संकष्टी (वृत्रासुर और अगस्त्य मुनि की कथा)

वृत्रासुर और उसके साथी दैत्यों ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था, और दैत्य समुद्र में छिपकर सुरक्षित थे। भगवान विष्णु ने देवताओं को अगस्त्य मुनि के पास भेजा, ताकि वे समुद्र पी जाएँ। अगस्त्य मुनि सोच में पड़ गए कि इतना बड़ा समुद्र कैसे पिएँगे। उन्होंने तीन महीने संकष्टी का व्रत किया, गणेश जी प्रसन्न हुए, और अगस्त्य मुनि ने आसानी से समुद्र पी लिया। कथा के अनुसार इस दिन एक बार भोजन और वह भी मौन रहकर किया जाता है। उत्तर भारत में यही दिन करवा चौथ है।

मार्गशीर्ष: गणाधिप संकष्टी (हनुमान जी और समुद्र की कथा)

यह कथा राजा दशरथ और श्रवण कुमार से शुरू होकर रामायण तक जाती है। सीता जी की खोज में वानर समुद्र किनारे पहुँचे, तो जटायु के भाई संपाति ने बताया कि सीता जी समुद्र पार लंका में हैं, और केवल हनुमान जी ही समुद्र लाँघ सकते हैं। हनुमान जी ने पूछा कि वे इतना बड़ा समुद्र कैसे पार करेंगे। संपाति ने उन्हें संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने को कहा। हनुमान जी ने व्रत किया, और उसके प्रभाव से वे एक छलाँग में समुद्र पार कर गए। 27 नवंबर 2026 की संकष्टी इसी महीने की है।

पौष: अखुरथ संकष्टी (रावण और बालि की कथा)

देवताओं को हराकर अहंकारी हुए रावण ने संध्या कर रहे वानरराज बालि पर पीछे से हमला किया। बालि ने उसे काँख में दबाकर किष्किंधा ले आया और अपने बेटे अंगद को खिलौने की तरह खेलने को दे दिया। अंगद रावण के गले में रस्सी बाँधकर नगर में घुमाता, और लोग हँसते। तब रावण ने अपने दादा पुलस्त्य मुनि को याद किया। मुनि ने उसे संकष्टी का व्रत करने को कहा, और व्रत के प्रभाव से रावण बंधन से छूट गया। कथा के अनुसार इस दिन दिन में सोना नहीं चाहिए और पूरा दिन निराहार रहना चाहिए।

माघ: लंबोदर संकष्टी (विधवा ब्राह्मणी और कुम्हार के आँवे की कथा)

यह वही कथा है जो उत्तर भारत में सकट चौथ पर सुनाई जाती है। राजा हरिश्चंद्र के राज्य में एक विधवा ब्राह्मणी भिक्षा माँगकर अपने छोटे बेटे को पालती थी और हर संकष्टी पर गोबर के गणेश बनाकर पूजा करती थी। एक कुम्हार का आँवा पक नहीं रहा था, और किसी ने उसे बच्चे की बलि का उपाय बताया। उसने ब्राह्मणी के बेटे को आँवे में बैठाकर आग लगा दी। सुबह आँवे में पानी भरा मिला, उसमें दूब और कमल उग आए थे, और बच्चा मज़े से खेल रहा था। राजा ने यह चमत्कार देखा तो पूरी प्रजा को संकष्टी का व्रत करने का आदेश दिया। कथा के अनुसार इस दिन तिल के लड्डू का भोग लगता है।

फाल्गुन: द्विजप्रिय संकष्टी (बूढ़े विष्णुशर्मा और छोटी बहू की कथा)

बूढ़े ब्राह्मण विष्णुशर्मा के सात बेटे अलग अलग रहते थे। संकष्टी के दिन वे पूजा की सामग्री माँगने हर बहू के पास गए, पर छह बहुओं ने उनका अपमान करके लौटा दिया। सबसे ग़रीब छोटी बहू ने भिक्षा माँगकर सामग्री जुटाई, ससुर के साथ पूजा की, ख़ुद भूखी रहकर उन्हें खाना खिलाया और रात भर उनकी सेवा की। सुबह उसका घर रत्नों से भरा था और ससुर भी ठीक हो गए थे। बाक़ी भाई ग़रीब और दुखी हो गए, और जब उन्होंने भी व्रत करना शुरू किया, तब उनके दिन फिरे।

हर महीने का गणेश रूप और व्रत में ख़ास बात

महीनागणेश जी का रूपकथा के अनुसार ख़ास बात
चैत्रभालचंद्रपूरा दिन व्रत, षोडशोपचार पूजा
वैशाखविकटकमलगट्टे का हलवा
ज्येष्ठएकदंतघी का हलवा, लड्डू और पूड़ी का भोग
आषाढ़कृष्णपिंगलब्राह्मण को भोजन और वस्त्र दान
श्रावणगजाननघी के लड्डू; व्रत का उद्यापन
भाद्रपदहेरंबबहुला चतुर्थी भी
आश्विनविघ्नराजदिन में भोजन नहीं
कार्तिकवक्रतुंडएक बार मौन भोजन; करवा चौथ
मार्गशीर्षगणाधिपपूरा दिन उपवास
पौषअखुरथनिराहार, दिन में न सोएँ
माघलंबोदरतिल के लड्डू; सकट चौथ
फाल्गुनद्विजप्रियघी और शक्कर

ये बातें कथाओं में बताई गई परंपरा हैं। आज ज़्यादातर घरों में हर महीने एक जैसी पूजा होती है, और भोग में मोदक या लड्डू चढ़ता है।

संकष्टी चतुर्थी पूजा की सामग्री

संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि

थाली में रखे केसर वाले पीले मोदक
गणेश जी को मोदक प्रिय हैं, संकष्टी पर मोदक या लड्डू का भोग लगता है
  1. सुबह संकल्प: स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। पानी में थोड़े सफ़ेद तिल डालकर नहाने की परंपरा भी है। फिर गणेश जी के आगे हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि चाँद निकलने तक व्रत रखेंगे।
  2. दिन भर व्रत: अपनी परंपरा और सेहत के अनुसार निर्जला, फलाहार या एक बार हल्के खाने वाला व्रत रखें।
  3. शाम की तैयारी: सूर्यास्त के बाद चौकी पर कपड़ा बिछाकर गणेश जी को बैठाएँ। पास में जल भरा कलश रखें।
  4. पूजा: गणेश जी को जल से स्नान कराने का भाव करें, फिर रोली, चंदन, अक्षत, जनेऊ, लाल फूल और माला चढ़ाएँ। 21 दूर्वा “ॐ गं गणपतये नमः” बोलते हुए चढ़ाएँ।
  5. भोग: मोदक या लड्डू और फल का भोग लगाएँ।
  6. कथा: उस महीने की संकष्टी कथा पढ़ें या सुनें। ऊपर मूल कथा और सभी 12 कथाएँ हैं।
  7. मंत्र और आरती: नीचे दिए श्लोक पढ़ें और “जय गणेश जय गणेश देवा” आरती गाएँ।
  8. चंद्रमा को अर्घ्य: चाँद निकलने पर लोटे में जल, थोड़ा दूध, अक्षत और सफ़ेद फूल डालकर चंद्रमा को अर्घ्य दें, और “ॐ सोमाय नमः” बोलें। कथा की परंपरा में चतुर्थी तिथि को भी प्रणाम करके अर्घ्य दिया जाता है।
  9. व्रत खोलें: अर्घ्य के बाद गणेश जी का प्रसाद लेकर व्रत खोलें, फिर भोजन करें।

पूजा का पूरा वैदिक तरीका, यानी आवाहन से विसर्जन तक हर चरण के मंत्र, हमारे लेख गौरी गणेश पूजन विधि में है।

गणेश जी का श्लोक

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थ: हे घुमावदार सूँड़ वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसे तेज वाले देव, मेरे सभी काम हमेशा बिना विघ्न के पूरे करें।

गणेश जी के बारह नाम

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥

अर्थ: सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन, गणेश जी के इन बारह नामों को जो पढ़ता या सुनता है, उसके काम में विघ्न नहीं आता। यह “द्वादश नाम स्तोत्र” के श्लोक हैं, जिन्हें पूजा के अंत में पढ़ा जाता है।

चंद्रमा को अर्घ्य देते समय

छोटा मंत्र: ॐ सोमाय नमः या ॐ चन्द्राय नमः। गजानन संकष्टी की कथा में अर्घ्य की प्रार्थना का भाव यह है: “क्षीरसागर से प्रकट हुए, लक्ष्मी जी के भाई, रात को रोशन करने वाले चंद्रदेव, रोहिणी के साथ मेरा अर्घ्य स्वीकार करें।”

व्रत में क्या खाएँ और क्या न खाएँ

  • बहुत से लोग चाँद निकलने तक निर्जला व्रत रखते हैं। बहुत से घरों में दिन में फल, दूध, साबूदाना, शकरकंद, आलू और मूँगफली लेते हैं, ख़ासकर महाराष्ट्र में साबूदाने की खिचड़ी आम है।
  • अनाज, दाल, प्याज़, लहसुन और नमक वाला सामान्य खाना व्रत खुलने से पहले नहीं लिया जाता। कई घरों में सेंधा नमक चलता है।
  • व्रत अर्घ्य के बाद गणेश जी के प्रसाद से खोलें।
  • गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती; उन्हें दूर्वा प्रिय है।
  • गर्भवती महिलाएँ, बुज़ुर्ग, डायबिटीज़ या ब्लड प्रेशर वाले, और दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत न रखें। पानी, दूध या फल लेते हुए भी व्रत का पूरा भाव रखा जा सकता है।

संकष्टी, विनायक चतुर्थी और गणेश चतुर्थी में फ़र्क

बातसंकष्टी चतुर्थीविनायक चतुर्थीगणेश चतुर्थी
कबहर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (पूर्णिमा के बाद)हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्थी (अमावस्या के बाद)भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी, साल में एक बार
चाँदचाँद को अर्घ्य देकर व्रत खुलता हैख़ास नियम नहींउस रात चाँद देखना मना माना जाता है
पूजा का समयशाम और चंद्रोदयदोपहरदोपहर, गणेश स्थापना

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी पर चाँद न देखने की परंपरा स्यमंतक मणि की कथा से जुड़ी है, जिसमें उस रात चाँद देखने से श्रीकृष्ण पर चोरी का झूठा कलंक लगा था। संकष्टी पर इसका उल्टा है: यहाँ चाँद देखकर अर्घ्य देना व्रत का ज़रूरी हिस्सा है।

संकष्टी व्रत का उद्यापन

गजानन संकष्टी की कथा के अनुसार, जो लोग साल भर बारह संकष्टी करते हैं, वे श्रावण की संकष्टी पर व्रत का उद्यापन करते हैं। उद्यापन में गणेश जी की विशेष पूजा, ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, दक्षिणा और गणेश जी की मूर्ति का दान होता है। कई परिवार माघ की संकष्टी (सकट चौथ) पर उद्यापन करते हैं। अपने घर की परंपरा या पुरोहित की सलाह से दिन तय करें।

व्रत और त्योहारों की विधि पर पूरी किताब चाहिए, तो गीता प्रेस की व्रत परिचय अच्छी है, जिसमें साल भर के व्रतों की विधि और कथाएँ हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अगली संकष्टी चतुर्थी कब है?

अगली संकष्टी चतुर्थी शुक्रवार, 27 नवंबर 2026 को है, गणाधिप संकष्टी। दिल्ली में चाँद रात 8:18 बजे निकलेगा। उससे पहले 29 अक्टूबर 2026 को वक्रतुंड संकष्टी है, जो करवा चौथ भी है।

Sankashti Chaturthi vrat katha कौन सी पढ़ें?

जिस महीने की संकष्टी हो, उसी महीने की कथा पढ़ें, जैसे मार्गशीर्ष में गणाधिप संकष्टी की हनुमान जी वाली कथा। अगर महीने की कथा न मिले, तो पार्वती जी के व्रत वाली मूल कथा पढ़ सकते हैं। सभी 12 कथाएँ इसी पेज पर हैं।

संकष्टी चतुर्थी पर चाँद कितने बजे निकलेगा?

27 नवंबर 2026 को दिल्ली में रात 8:18, मुंबई में 8:59, पुणे में 8:56, लखनऊ में 8:07, पटना में 7:52 और कोलकाता में 7:46 बजे। बाक़ी शहरों का समय ऊपर की तालिका में है।

अंगारकी चतुर्थी 2027 कब है?

मंगलवार, 22 जून 2027 को। यह आषाढ़ की कृष्णपिंगल संकष्टी है। 2027 में यही एक अंगारकी चतुर्थी है।

संकष्टी चतुर्थी साल में कितनी बार आती है?

हर महीने एक बार, यानी साल में 12 बार। जिस साल अधिक मास हो, उस साल 13 बार।

संकष्टी और सकट चौथ में क्या फ़र्क है?

सकट चौथ माघ महीने की संकष्टी चतुर्थी ही है, जिसे सबसे बड़ी संकष्टी माना जाता है। उसमें तिल, तिलकुट और सकट माता की पूजा ख़ास होती है। सकट चौथ 2027 सोमवार, 25 जनवरी को है।

क्या करवा चौथ भी संकष्टी चतुर्थी है?

हाँ। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की संकष्टी (वक्रतुंड संकष्टी) ही करवा चौथ है। उत्तर भारत में इस दिन सुहागिनें पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं।

संकष्टी का व्रत अलग अलग शहरों में अलग दिन क्यों होता है?

क्योंकि व्रत उस दिन होता है, जिस दिन चाँद निकलते समय चतुर्थी तिथि हो। चाँद हर शहर में अलग समय पर निकलता है। जैसे दिसंबर 2026 में दिल्ली में व्रत 26 दिसंबर को है, पर पटना, वाराणसी और कोलकाता में 27 दिसंबर को।

बादल हों और चाँद न दिखे, तो व्रत कैसे खोलें?

पंचांग में दिए चंद्रोदय के समय के बाद पूर्व दिशा में चंद्रमा का ध्यान करके अर्घ्य दें और व्रत खोलें।

क्या संकष्टी व्रत में पानी पी सकते हैं?

बहुत से लोग निर्जला व्रत रखते हैं, पर यह ज़रूरी नियम नहीं है। सेहत ठीक न हो, तो पानी, दूध या फल लेकर व्रत रखें।

संकष्टी व्रत कौन रख सकता है?

कोई भी, स्त्री या पुरुष। कथाओं में राजा, ऋषि, बहुएँ, बूढ़े ब्राह्मण और हनुमान जी तक ने यह व्रत किया है। महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में बहुत से परिवार हर महीने यह व्रत रखते हैं।

स्रोत

  • तारीख़ें, चंद्रोदय और तिथि: Drik Panchang, संकष्टी चतुर्थी 2026 और 2027 की सूची (नई दिल्ली और ऊपर दिए 16 शहर), 26 अक्टूबर 2026 को जाँची गई।
  • 12 महीनों की कथाएँ: Drik Panchang का संकष्टी व्रत कथा संग्रह, जिसके आधार पर कथाएँ यहाँ अपने शब्दों में छोटे रूप में लिखी गई हैं।
  • गणेश द्वादश नाम स्तोत्र: पारंपरिक स्तुति, जो पूजा की किताबों में मिलती है।

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