
Meera ke pad कृष्ण भक्ति के सबसे सच्चे और सबसे निडर गीत हैं। राजघराने की बहू होकर भी मीराबाई ने लोक लाज, कुल की मर्यादा और राणा के ज़हर तक की परवाह नहीं की, और अपने “गिरधर नागर” के लिए गाती रहीं। यही कारण है कि पाँच सौ साल बाद भी “पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो” और “मेरे तो गिरधर गोपाल” घर घर में गाए जाते हैं, और कक्षा 10 की हिंदी पुस्तक स्पर्श (भाग 2) में मीरा के दो पद पढ़ाए जाते हैं।
इस पेज पर कक्षा 10 के दोनों पद मूल पाठ, कठिन शब्दों के अर्थ, प्रसंग, भावार्थ और काव्य सौंदर्य के साथ हैं, फिर परीक्षा वाले प्रश्न उत्तर, और अंत में मीरा के 10 प्रसिद्ध पद सरल अर्थ सहित।
मुख्य बातें
- कक्षा 10 (स्पर्श भाग 2) के 2 पद: “हरि आप हरो जन री भीर” और “स्याम म्हाने चाकर राखो जी”।
- पहले पद का भाव: भगवान भक्तों का दुःख हरते हैं; द्रौपदी, प्रह्लाद और गजराज की तरह मेरी पीड़ा भी हरो।
- दूसरे पद का भाव: मीरा कृष्ण की नौकरानी (चाकर) बनना चाहती हैं; तनख़्वाह में दर्शन, खर्ची में स्मरण, जागीर में भक्ति।
- भाषा: राजस्थानी मिली ब्रज भाषा; भक्ति: सगुण, माधुर्य भाव (कृष्ण को पति और प्रियतम मानना)।
- सबसे प्रसिद्ध भजन: पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो, मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई, पग घुँघरू बाँध मीरा नाची।
विषय सूची
मीराबाई का परिचय
| बात | जानकारी |
|---|---|
| जन्म | लगभग 1498 ई., कुड़की गाँव (मेड़ता के पास, आज का राजस्थान) |
| परिवार | पिता रतन सिंह राठौड़; दादा राव दूदा, मेड़ता के शासक |
| विवाह | मेवाड़ के राणा सांगा के पुत्र भोजराज से |
| जीवन की मुश्किलें | पति, पिता और ससुर की मृत्यु; ससुराल वालों ने साधु संगत का विरोध किया, ज़हर और साँप भेजने की कथाएँ प्रसिद्ध हैं |
| बाद का जीवन | मेवाड़ छोड़कर वृंदावन, फिर द्वारका |
| देहांत | लगभग 1546 से 1547 ई., द्वारका; परंपरा कहती है कि वे रणछोड़ जी की मूर्ति में समा गईं |
| गुरु | परंपरा संत रैदास (रविदास) को उनका गुरु मानती है; इस पर इतिहासकारों में मतभेद है |
| रचनाएँ | मुख्य रूप से फुटकर पद, जिनका संग्रह “मीरा पदावली” कहलाता है |
| भाषा | राजस्थानी, ब्रज, और कुछ पदों में गुजराती का रंग |
बचपन की एक प्रसिद्ध कथा है कि एक बारात देखकर नन्ही मीरा ने माँ से पूछा कि मेरा दूल्हा कौन है, और माँ ने हँसते हुए कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा कर दिया। तब से मीरा ने गिरधर गोपाल को ही अपना पति मान लिया। ये कथाएँ इतिहास से ज़्यादा भक्ति परंपरा का हिस्सा हैं, पर मीरा के पदों में यही भाव हर जगह दिखता है: “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”।

मीरा की भक्ति की खास बात
सूरदास कृष्ण को बालक और सखा के रूप में देखते हैं, तुलसीदास राम को स्वामी के रूप में। मीरा कृष्ण को पति और प्रियतम मानती हैं। इसे माधुर्य भाव की भक्ति कहते हैं। इसीलिए मीरा के पदों में मिलन की खुशी भी है और विरह का गहरा दर्द भी।
मीरा का दूसरा गुण है निडरता। उस समय राजघराने की स्त्री का मंदिर में नाचना, साधुओं के बीच बैठना बहुत बड़ी बात थी। मीरा ने साफ़ कहा: लोग मुझे बावरी कहें या कुल का नाश करने वाली, मुझे फ़र्क नहीं पड़ता। उनके पदों में यह आत्मविश्वास हर पंक्ति में बोलता है।

पद 1: हरि आप हरो जन री भीर
हरि आप हरो जन री भीर। द्रोपदी री लाज राखी, आप बढ़ायो चीर। भगत कारण रूप नरहरि, धर्यो आप सरीर। बूढ़तो गजराज राख्यो, काटी कुण्जर पीर। दासी मीराँ लाल गिरधर, हरो म्हारी भीर॥
कठिन शब्द: हरि = भगवान विष्णु, कृष्ण; जन = भक्त, दास; री = की; भीर = पीड़ा, संकट; लाज = इज़्ज़त; चीर = वस्त्र, साड़ी; भगत कारण = भक्त के लिए; नरहरि = नरसिंह (आधा मनुष्य, आधा सिंह); सरीर = शरीर; बूढ़तो = डूबते हुए; गजराज = हाथियों का राजा; कुण्जर = हाथी; पीर = पीड़ा; म्हारी = मेरी।
प्रसंग: यह पद मीरा की विनती है। वे भगवान को याद दिलाती हैं कि आपने हर युग में अपने भक्तों का संकट दूर किया है, इसलिए मेरा भी करो।
भावार्थ: मीरा कहती हैं कि हे हरि, आप अपने भक्तों की पीड़ा हर लेते हो। जब भरी सभा में द्रौपदी का अपमान हो रहा था, तब आपने उसकी साड़ी को अनंत बढ़ाकर उसकी लाज बचाई। अपने भक्त प्रह्लाद को बचाने के लिए आपने नरसिंह का रूप धारण किया और हिरण्यकशिपु को मारा। जब मगरमच्छ ने गजराज को पानी में खींच लिया और वह डूबने लगा, तब आपने आकर मगर को मारा और हाथी की पीड़ा दूर की। मीरा कहती हैं कि मैं आपकी दासी हूँ, हे गिरधर लाल, जैसे आपने उन सबकी रक्षा की, वैसे ही मेरी पीड़ा भी दूर करो।
काव्य सौंदर्य:
- तीन पौराणिक कथाओं (द्रौपदी चीरहरण, नरसिंह अवतार, गज और ग्राह) को दृष्टांत की तरह रखा गया है।
- “हरि आप हरो” में अनुप्रास और “हरि हरो” में शब्द की सुंदर आवृत्ति।
- “काटी कुण्जर पीर” में अनुप्रास अलंकार।
- राजस्थानी मिश्रित ब्रज भाषा, दास्य भाव और शांत रस, गेय पद।
पद 2: स्याम म्हाने चाकर राखो जी
स्याम म्हाने चाकर राखो जी, गिरधारी लाला म्हाँने चाकर राखोजी। चाकर रहस्यूँ बाग लगास्यूँ नित उठ दरसण पास्यूँ। बिन्दरावन री कुंज गली में, गोविन्द लीला गास्यूँ। चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची। भाव भगती जागीरी पास्यूँ, तीनूं बाताँ सरसी। मोर मुगट पीताम्बर सौहे, गल वैजन्ती माला। बिन्दरावन में धेनु चरावे, मोहन मुरली वाला। ऊँचा ऊँचा महल बणावं बिच बिच राखूँ बारी। साँवरिया रा दरसण पास्यूँ, पहर कुसुम्बी साड़ी। आधी रात प्रभु दरसण, दीज्यो जमनाजी रे तीरां। मीराँ रा प्रभु गिरधर नागर, हिवड़ो घणो अधीराँ॥
कठिन शब्द: म्हाने = मुझे; चाकर = नौकर, सेवक; रहस्यूँ = रहूँगी; लगास्यूँ = लगाऊँगी; नित = रोज़; दरसण = दर्शन; पास्यूँ = पाऊँगी; बिन्दरावन = वृंदावन; कुंज गली = लताओं से घिरी गलियाँ; गास्यूँ = गाऊँगी; सुमरण = स्मरण, याद; खरची = रोज़ का खर्च, जेब ख़र्च; जागीरी = जागीर, ज़मीन जायदाद; सरसी = अच्छी, रस भरी; मुगट = मुकुट; पीताम्बर = पीला वस्त्र; वैजन्ती माला = वैजयंती फूलों की माला; धेनु = गाय; बारी = खिड़की, या बगीचे की क्यारी; कुसुम्बी = कुसुम के फूल जैसे लाल रंग की; तीरां = किनारे; हिवड़ो = हृदय; घणो = बहुत; अधीराँ = अधीर, बेचैन।
प्रसंग: इस पद में मीरा कृष्ण से विनती करती हैं कि मुझे अपनी सेविका बना लो। नौकरी के बहाने वे कृष्ण के पास रहना चाहती हैं।
भावार्थ: मीरा कहती हैं कि हे श्याम, मुझे अपना नौकर रख लो। हे गिरधारी लाल, मुझे चाकर बना लो। मैं तुम्हारी सेविका बनकर बाग़ लगाऊँगी, ताकि रोज़ सुबह उठते ही तुम्हारे दर्शन हो सकें। वृंदावन की कुंज गलियों में घूमकर मैं तुम्हारी लीलाओं के गीत गाऊँगी।
इस नौकरी में मुझे तीन चीज़ें मिलेंगी: वेतन के रूप में तुम्हारे दर्शन, रोज़ के खर्च के रूप में तुम्हारा स्मरण, और जागीर के रूप में भाव भक्ति। ये तीनों ही बातें मेरे लिए बहुत सुखद हैं।
फिर मीरा कृष्ण के रूप का वर्णन करती हैं: सिर पर मोर पंख का मुकुट, शरीर पर पीला वस्त्र और गले में वैजयंती माला शोभा देती है। मुरली बजाने वाले मोहन वृंदावन में गाएँ चराते हैं।
मीरा कहती हैं कि मैं ऊँचे ऊँचे महल बनवाऊँगी और उनके बीच बीच में खिड़कियाँ (या बगीचे में क्यारियाँ) रखूँगी, ताकि कुसुंबी रंग की साड़ी पहनकर साँवरे के दर्शन कर सकूँ। हे प्रभु, आधी रात को यमुना के किनारे मुझे दर्शन देना। मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं, और उनसे मिलने के लिए मीरा का हृदय बहुत बेचैन है।
काव्य सौंदर्य:
- “दर्शन वेतन, स्मरण खर्ची, भक्ति जागीर” में नौकरी का पूरा रूपक है, यानी सांग रूपक अलंकार।
- “मोर मुगट”, “मोहन मुरली” में अनुप्रास अलंकार।
- “ऊँचा ऊँचा”, “बिच बिच” में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार।
- कृष्ण के रूप का चित्रात्मक वर्णन; राजस्थानी भाषा; दास्य और माधुर्य भाव, गेय पद।

महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर
प्रश्न: पहले पद में मीरा ने हरि से अपनी पीड़ा हरने की विनती किस प्रकार की है? उत्तर: मीरा भगवान को उनकी पुरानी कृपाएँ याद दिलाती हैं। उन्होंने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसकी लाज बचाई, प्रह्लाद के लिए नरसिंह रूप धरा और डूबते गजराज को मगर से छुड़ाया। मीरा कहती हैं कि जैसे आपने इन सब भक्तों का संकट हरा, वैसे ही अपनी दासी मीरा का दुःख भी दूर करो।
प्रश्न: दूसरे पद में मीरा श्याम की चाकरी क्यों करना चाहती हैं? उत्तर: चाकरी के बहाने वे हर समय कृष्ण के पास रहना चाहती हैं। सेविका बनकर बाग़ लगाएँगी तो रोज़ दर्शन होंगे, वृंदावन की गलियों में उनकी लीला गा सकेंगी, और वेतन में दर्शन, खर्ची में स्मरण और जागीर में भक्ति मिलेगी।
प्रश्न: “चाकरी में दरसण पास्यूँ, सुमरण पास्यूँ खरची” का भाव स्पष्ट कीजिए। उत्तर: नौकरी करने वाले को वेतन और रोज़ का खर्च मिलता है। मीरा कहती हैं कि कृष्ण की नौकरी में उन्हें वेतन के रूप में कृष्ण के दर्शन मिलेंगे और रोज़ के खर्च के रूप में उनका स्मरण। मीरा के लिए यही सबसे बड़ी कमाई है।
प्रश्न: मीरा ने कृष्ण के रूप सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है? उत्तर: कृष्ण के सिर पर मोर पंख का मुकुट है, शरीर पर पीला पीतांबर है और गले में वैजयंती की माला है। वे वृंदावन में गाएँ चराते हैं और मुरली बजाते हैं। यह वर्णन इतना चित्रात्मक है कि पढ़ते ही आँखों के सामने तस्वीर बन जाती है।
प्रश्न: मीरा कृष्ण को पाने के लिए क्या क्या करने को तैयार हैं? उत्तर: वे सेविका बनने, बाग़ लगाने, वृंदावन की गलियों में लीला गाने, ऊँचे महल बनवाकर खिड़कियों से दर्शन करने और कुसुंबी साड़ी पहनकर आधी रात को यमुना किनारे इंतज़ार करने को तैयार हैं।
प्रश्न: मीरा की भाषा शैली की विशेषताएँ लिखिए। उत्तर: मीरा की भाषा राजस्थानी मिली ब्रज है, जिसमें सरल, घरेलू शब्द हैं: चाकर, खरची, जागीरी, हिवड़ो। उनके पद गाने के लिए बने हैं, इसलिए उनमें लय और संगीत है। भाव सीधे दिल से निकले हैं; कोई बनावट नहीं। अनुप्रास, रूपक और पुनरुक्ति जैसे अलंकार अपने आप आ गए हैं।
प्रश्न: “हिवड़ो घणो अधीराँ” से मीरा की किस मनोदशा का पता चलता है? उत्तर: इसका अर्थ है कि मेरा हृदय बहुत बेचैन है। इससे पता चलता है कि मीरा कृष्ण के दर्शन के लिए कितनी व्याकुल हैं; उनसे एक पल की दूरी भी उन्हें सहन नहीं होती।
प्रश्न: पहले और दूसरे पद में मीरा की भक्ति के कौन से दो रूप दिखते हैं? उत्तर: पहले पद में दास्य भाव है: मीरा दासी बनकर स्वामी से संकट दूर करने की विनती करती हैं। दूसरे पद में दास्य के साथ माधुर्य भाव भी है: वे प्रियतम के दर्शन के लिए अधीर हैं, कुसुंबी साड़ी पहनकर उनसे मिलना चाहती हैं।
ये पद स्पर्श (भाग 2) में बरसों से पढ़ाए जा रहे हैं; परीक्षा से पहले अपनी चालू किताब और बोर्ड का पाठ्यक्रम एक बार ज़रूर मिला लें।
मीरा के 10 प्रसिद्ध पद अर्थ सहित
नीचे वे पद हैं जो भजन संध्या, फ़िल्मों और लोक गायकों के ज़रिए सबसे ज़्यादा गाए जाते हैं। मीरा के पद सदियों तक मुँह से मुँह तक पहुँचे, इसलिए एक ही पद के कई पाठ मिलते हैं; यहाँ सबसे प्रचलित पाठ दिया गया है।
1. पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो
पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो। वस्तु अमोलक दी म्हारे सतगुरु, किरपा कर अपनायो॥ जनम जनम की पूँजी पाई, जग में सभी खोवायो। खरच न खूटै, चोर न लूटै, दिन दिन बढ़त सवायो॥ सत की नाव खेवटिया सतगुरु, भवसागर तर आयो। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, हरख हरख जस गायो॥
भावार्थ: मीरा कहती हैं कि मुझे राम नाम रूपी रत्न का धन मिल गया है। मेरे सतगुरु ने कृपा करके मुझे अपनाया और यह अनमोल चीज़ दी। यह कई जन्मों की कमाई है; इसके आगे दुनिया की बाकी हर चीज़ छूट गई तो भी कोई ग़म नहीं। यह ऐसा धन है जो खर्च करने से घटता नहीं, चोर इसे लूट नहीं सकता, और यह रोज़ सवाया बढ़ता है। सत्य की नाव है और उसे खेने वाले सतगुरु हैं, इसलिए मैं संसार सागर पार कर आई। मीरा प्रसन्न होकर अपने प्रभु गिरधर नागर का यश गाती हैं।
सीख: जो धन बाँटने से बढ़े और चोरी न हो सके, वही असली धन है: नाम, ज्ञान और अच्छे संस्कार।
2. मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई
मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जा के सिर मोर मुकुट, मेरो पति सोई॥ छाँड़ि दयी कुल की कानि, कहा करिहै कोई? संतन ढिग बैठि बैठि, लोक लाज खोयी॥ असुवन जल सींचि सींचि, प्रेम बेलि बोयी। अब त बेलि फैलि गयी, आणंद फल होयी॥ भगत देखि राजी हुयी, जगत देखि रोयी। दासि मीरां लाल गिरधर! तारो अब मोही॥
भावार्थ: मीरा कहती हैं कि मेरे तो केवल गिरधर गोपाल हैं, दूसरा कोई नहीं। जिनके सिर पर मोर मुकुट है, वही मेरे पति हैं। मैंने कुल की मर्यादा छोड़ दी, अब कोई मेरा क्या कर लेगा। संतों के पास बैठ बैठकर मैंने लोक लाज भी छोड़ दी। आँसुओं के जल से सींच सींचकर मैंने प्रेम की बेल बोई; अब वह बेल फैल गई है और उस पर आनंद के फल लगे हैं। भक्तों को देखकर मैं खुश होती हूँ और दुनिया का मोह देखकर रोती हूँ। मीरा कहती हैं, हे गिरधर, अब अपनी दासी को तार दो।
इस पद के कुछ पाठों में दूध मथकर घी निकालने और छाछ छोड़ देने की पंक्ति भी आती है: यानी मीरा ने संसार का सार (भक्ति) ले लिया और बाकी छोड़ दिया। यह पद और अगला पद “पग घुँघरू” कक्षा 11 की पुस्तक आरोह में भी पढ़ाए गए हैं।
3. पग घुँघरू बाँध मीरा नाची
पग घुँघरू बाँधि मीरां नाची। मैं तो मेरे नारायण सूं, आपहि हो गई साची॥ लोग कहै, मीरां भई बावरी; न्यात कहै कुल नासी। विस का प्याला राणा भेज्या, पीवत मीरां हाँसी॥ मीरां के प्रभु गिरधर नागर, सहज मिले अविनासी॥
भावार्थ: पैरों में घुँघरू बाँधकर मीरा नाच उठीं। वे कहती हैं कि मैं अपने नारायण की सच्ची पत्नी बन गई हूँ। लोग कहते हैं कि मीरा पागल हो गई, बिरादरी कहती है कि इसने कुल का नाश कर दिया। राणा ने ज़हर का प्याला भेजा, और मीरा हँसते हँसते उसे पी गईं। मीरा के प्रभु गिरधर नागर हैं, जो अविनाशी हैं और उन्हें सहज ही मिल गए।
4. बसो मेरे नैनन में नंदलाल
बसो मेरे नैनन में नंदलाल। मोहनी मूरत, साँवरी सूरत, नैना बने बिसाल। अधर सुधारस मुरली राजत, उर बैजंती माल॥ छुद्रघंटिका कटितट सोभित, नूपुर सबद रसाल। मीरां प्रभु संतन सुखदाई भगत बछल गोपाल॥
भावार्थ: हे नंदलाल, मेरी आँखों में आकर बस जाओ। तुम्हारी मूर्ति मन मोह लेने वाली है, सूरत साँवली है और आँखें बड़ी बड़ी हैं। होंठों पर अमृत जैसी मधुर मुरली सजी है और छाती पर वैजयंती माला है। कमर में छोटी छोटी घंटियों वाली करधनी शोभा देती है और पैरों के नूपुर मीठी आवाज़ करते हैं। मीरा कहती हैं कि मेरे प्रभु संतों को सुख देने वाले और भक्तों से प्रेम करने वाले गोपाल हैं।
5. हे री मैं तो प्रेम दिवानी
हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरा दरद न जाने कोय। सूली ऊपर सेज हमारी, किस बिध सोना होय। गगन मंडल पर सेज पिया की, किस बिध मिलना होय॥ घायल की गति घायल जानै, कि जिन लागी होय। जौहरी की गति जौहरी जाने, कि जिन लागी होय॥ दरद की मारी बन बन डोलूँ, वैद मिल्यो नहीं कोय। मीरां की प्रभु पीर मिटै जब वैद सांवलया होय॥
भावार्थ: हे सखी, मैं तो प्रेम में दीवानी हो गई हूँ, मेरा दर्द कोई नहीं समझता। मेरी सेज मानो सूली पर है, नींद कैसे आए। प्रियतम की सेज आकाश में है, उनसे मिलना कैसे हो। घायल का हाल वही जानता है जिसे चोट लगी हो; रत्न की परख जौहरी ही जानता है। दर्द की मारी मैं वन वन भटक रही हूँ, पर कोई वैद्य नहीं मिला। मीरा का दर्द तभी मिटेगा जब साँवरे कृष्ण ख़ुद वैद्य बनकर आएँगे।
सीख: “घायल की गति घायल जानै” आज भी मुहावरे की तरह बोला जाता है: जिसने दुःख नहीं झेला, वह दूसरे का दुःख पूरी तरह नहीं समझ सकता।
6. दरस बिन दूखन लागे नैन
दरस बिन दूखन लागे नैन। जब तें तुम बिछुरे पिव प्यारे, कबहुँ न पायो चैन॥ सबद सुनत मेरी छतियाँ काँपै, मीठे लागें बैन। एक टकटकी पंथ निहारूँ, भई छमासी रैन॥ बिरह बिथा कासों कहुँ सजनी, बह गई करवत ऐन। मीरां के प्रभु कबहो मिलोगे, दुःख मेटन सुख दैन॥
भावार्थ: तुम्हारे दर्शन के बिना मेरी आँखें दुखने लगी हैं। हे प्रियतम, जब से तुम बिछड़े हो, मुझे कभी चैन नहीं मिला। तुम्हारा नाम सुनते ही दिल काँप उठता है, तुम्हारी बातें मीठी लगती हैं। मैं टकटकी लगाए रास्ता देखती हूँ; विरह की एक रात छह महीने जितनी लंबी लगती है। हे सखी, यह दर्द किससे कहूँ, मानो दिल पर आरी चल गई हो। मीरा पूछती हैं, हे प्रभु, दुःख मिटाने और सुख देने कब आओगे।
7. श्री गिरधर आगे नाचूँगी
श्री गिरधर आगे नाचूँगी। नाच नाच पिव रसिक रिझाऊँ, प्रेमी जन को जाचूँगी। प्रेम प्रीत के बाँध घूँघरू, सुरत की कछनी काछूँगी॥ लोक लाज कुल की मरजादा, या मैं एक न राखूँगी। पिया के पलंगा जा पौढूँगी, मीरां हरि रंग राचूँगी॥
भावार्थ: मैं गिरधर के सामने नाचूँगी। नाच नाचकर अपने रसिक प्रियतम को रिझाऊँगी और सच्चे प्रेमियों को परखूँगी। प्रेम के घुँघरू बाँधूँगी और प्रभु की याद (सुरत) का वस्त्र पहनूँगी। लोक लाज और कुल की मर्यादा, इनमें से कुछ नहीं रखूँगी। मीरा कहती हैं कि मैं हरि के रंग में पूरी तरह रंग जाऊँगी।
8. मैं गिरधर के घर जाऊँ
मैं गिरधर के घर जाऊँ। गिरधर म्हाँरो साँचो प्रीतम, देखत रूप लुभाऊँ॥ रैण पड़ै तब ही उठ जाऊँ, भोर भये उठ आऊँ। रैण दिना वा के संग खेलूँ, ज्यूँ त्यूँ ताही रिझाऊँ॥ जो पहिरावै सोई पहिरूँ, जो दे सोई खाऊँ। मेरी उण की प्रीत पुराणी, उण बिन पल न रहाऊँ॥ जहाँ बैठावें तितही बैठूँ, बेचै तो बिक जाऊँ। मीरा के प्रभु गिरधर नागर, बार बार बलि जाऊँ॥
भावार्थ: मीरा कहती हैं कि मैं गिरधर के घर जाती हूँ; वही मेरे सच्चे प्रियतम हैं और उनका रूप देखकर मैं मोहित हो जाती हूँ। रात होते ही उनके पास चली जाती हूँ और सुबह लौट आती हूँ। दिन रात उनके साथ रहकर किसी भी तरह उन्हें प्रसन्न करती हूँ। वे जो पहनाएँ वही पहनती हूँ, जो दें वही खाती हूँ। हमारा प्रेम पुराना है, उनके बिना एक पल नहीं रह सकती। वे जहाँ बिठाएँ वहीं बैठूँगी, बेचें तो बिक जाऊँगी। मीरा अपने प्रभु पर बार बार न्योछावर होती हैं।
सीख: यह पद पूर्ण समर्पण का सबसे सुंदर उदाहरण है: अपनी पसंद नापसंद भी प्रभु को सौंप देना।
9. जोगी मत जा मत जा मत जा
जोगी मत जा मत जा मत जा, पाइं परूँ मैं चेरी तेरी हौं। प्रेम भगति कौ पैड़ो ही न्यारो, हम कूँ डौल बता जा। अगर चंदण की चिता बनाऊँ, अपणे हाथ जला जा॥ जल बल भई भस्म की ढेरी, अपणे अंग लगा जा। मीरा कहे प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा॥
भावार्थ: हे जोगी, मत जाओ। मैं तुम्हारी दासी हूँ, तुम्हारे पैर पड़ती हूँ। प्रेम भक्ति का रास्ता सबसे अलग है, मुझे उस पर चलने का ढंग बता जाओ। अगर मैं अगर और चंदन की लकड़ी की चिता बनाऊँ तो उसे अपने हाथ से जलाना, और जब मैं जलकर राख हो जाऊँ तो वह राख अपने अंग पर लगा लेना। मीरा कहती हैं, हे प्रभु, मेरी ज्योति को अपनी ज्योति में मिला लो। यहाँ “जोगी” ख़ुद कृष्ण हैं, और आख़िरी पंक्ति आत्मा के परमात्मा में मिल जाने की चाह है।
10. बरसे बदरिया सावन की
बरसे बदरिया सावन की। सावन की मन भावन की॥ सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की। उमड़ घुमड़ चहुँदिस से आया, दामिन दमकै झर लावन की॥ नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सुहावन की। मीरा के प्रभु गिरधर नागर! आनंद मंगल गावन की॥
भावार्थ: सावन की मन को भाने वाली बदली बरस रही है। सावन में मेरा मन उमंग से भर गया, क्योंकि हरि के आने की आहट सुनाई दी। चारों ओर से बादल उमड़ घुमड़कर आए हैं, बिजली चमक रही है और झड़ी लगी है। नन्हीं नन्हीं बूँदें बरस रही हैं और ठंडी हवा सुहानी लग रही है। मीरा कहती हैं कि यह गिरधर नागर के आनंद मंगल गाने का समय है। विरह के पदों के उलट यह मिलन की खुशी का पद है।

मीरा की काव्य विशेषताएँ
- अनन्य प्रेम: “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई”; उनके लिए कृष्ण के सिवा कुछ नहीं।
- माधुर्य और दास्य भाव: कृष्ण कभी पति हैं, कभी स्वामी; मीरा कभी प्रिया हैं, कभी दासी।
- विरह की तीव्रता: “दरस बिन दूखन लागे नैन”, “घायल की गति घायल जानै” जैसे पद हिंदी के सबसे मार्मिक विरह गीतों में गिने जाते हैं।
- आत्मकथा जैसा स्वर: राणा का ज़हर, लोक निंदा, कुल की मर्यादा; मीरा अपने जीवन की घटनाएँ सीधे पदों में कहती हैं।
- सरल, गेय भाषा: राजस्थानी, ब्रज और गुजराती के घरेलू शब्द; हर पद राग में गाया जा सकता है।
- अलंकार अपने आप: अनुप्रास, रूपक, उपमा और पुनरुक्ति, बिना किसी दिखावे के।
मीरा, सूर और कबीर: एक तुलना
| बात | मीराबाई | सूरदास | कबीर |
|---|---|---|---|
| भक्ति | सगुण, कृष्ण | सगुण, कृष्ण | निर्गुण, राम नाम |
| भाव | माधुर्य और दास्य | वात्सल्य और सख्य | ज्ञान और प्रेम |
| रूप | पद | पद | साखी (दोहा), सबद, रमैनी |
| भाषा | राजस्थानी मिली ब्रज | ब्रज | सधुक्कड़ी |
| सबसे प्रसिद्ध | पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो | मैया मैं नहिं माखन खायौ | बुरा जो देखन मैं चला |
मीरा को और पढ़ने के लिए
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कक्षा 10 में मीरा के कौन से पद हैं?
स्पर्श (भाग 2) में मीरा के दो पद हैं: “हरि आप हरो जन री भीर” और “स्याम म्हाने चाकर राखो जी”। पहले में भक्तों की रक्षा के उदाहरण देकर पीड़ा हरने की विनती है, दूसरे में कृष्ण की सेविका बनने की चाह।
मीराबाई के पद किस भाषा में हैं?
मुख्य रूप से राजस्थानी मिली ब्रज भाषा में। कुछ पदों में गुजराती के शब्द भी मिलते हैं, क्योंकि मीरा ने जीवन के आख़िरी साल द्वारका में बिताए।
मीरा किस प्रकार की भक्ति करती थीं?
मीरा सगुण कृष्ण भक्त थीं। वे कृष्ण को पति और प्रियतम मानती थीं, इसलिए उनकी भक्ति को माधुर्य भाव की भक्ति कहते हैं। कई पदों में दास्य भाव भी है, जैसे “दासी मीराँ लाल गिरधर”।
“पायो जी म्हैं तो राम रतन धन पायो” का अर्थ क्या है?
मीरा कहती हैं कि मुझे राम नाम रूपी अनमोल रत्न मिल गया है। यह ऐसा धन है जो खर्च करने से घटता नहीं, चोर लूट नहीं सकता और रोज़ बढ़ता है। यह धन सतगुरु की कृपा से मिला।
मीराबाई के गुरु कौन थे?
भक्ति परंपरा संत रैदास (रविदास) को मीरा का गुरु मानती है, और उनके कुछ पदों में रैदास का नाम आता है। इतिहासकार इस पर एकमत नहीं हैं, क्योंकि दोनों के समय को लेकर सवाल उठते हैं।
मीरा के पति कौन थे?
मीरा का विवाह मेवाड़ के राणा सांगा के बड़े पुत्र भोजराज से हुआ था। विवाह के कुछ साल बाद भोजराज की मृत्यु हो गई। मीरा स्वयं कृष्ण को ही अपना असली पति मानती थीं।
मीराबाई की मृत्यु कहाँ हुई?
माना जाता है कि मीरा ने अंतिम समय द्वारका में बिताया और लगभग 1546 से 1547 ई. के आसपास वहीं उनका देहांत हुआ। परंपरा कहती है कि वे रणछोड़ जी की मूर्ति में समा गईं।
“घायल की गति घायल जानै” का क्या अर्थ है?
घायल का दर्द वही समझ सकता है जिसे ख़ुद चोट लगी हो। मीरा कहती हैं कि प्रेम का दर्द भी वही समझेगा जिसने प्रेम किया हो; दूसरे लोग केवल ताने दे सकते हैं।
मीरा के पदों को किस नाम से जाना जाता है?
मीरा के पदों का संग्रह “मीरा पदावली” कहलाता है। मीरा ने कोई एक लंबा ग्रंथ नहीं लिखा; उनके फुटकर पद गायकों और भक्तों के ज़रिए सदियों तक चलते रहे और बाद में संकलित हुए।
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