गीता के 18 अध्याय का सार: हर अध्याय का नाम, श्लोक संख्या, मुख्य श्लोक और आज की सीख

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Gita ke 18 adhyay ka saar: रथ पर अर्जुन और सारथी श्रीकृष्ण की मूर्ति
कुरुक्षेत्र में दोनों सेनाओं के बीच खड़े रथ पर ही गीता का उपदेश हुआ

Gita ke 18 adhyay ka saar एक लाइन में कहें तो यह है: डरो मत, अपना कर्तव्य करो, फल की चिंता भगवान पर छोड़ दो। पर गीता यह बात 700 श्लोकों और 18 अध्यायों में धीरे धीरे समझाती है, क्योंकि अर्जुन का सवाल सिर्फ़ युद्ध का नहीं था; वह हर उस इंसान का सवाल है जो किसी मुश्किल फ़ैसले के सामने हाथ पैर छोड़ देता है।

इस पेज पर गीता के हर अध्याय का नाम, श्लोक संख्या, आसान भाषा में सार, एक मुख्य श्लोक अर्थ सहित, और आज के जीवन के लिए एक सीख दी गई है। अंत में पूरी गीता का सार 10 वाक्यों में है, जो भाषण, निबंध या रोज़ के पाठ में काम आएगा।

मुख्य बातें

  • कुल: 18 अध्याय, 700 श्लोक। इनमें 574 श्लोक श्रीकृष्ण के हैं; बाकी अर्जुन, संजय और धृतराष्ट्र (1 श्लोक) के।
  • कहाँ से: महाभारत के भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 42 तक।
  • तीन भाग (षट्क): अध्याय 1 से 6 कर्म, 7 से 12 भक्ति, 13 से 18 ज्ञान पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं।
  • सबसे प्रसिद्ध श्लोक: कर्मण्येवाधिकारस्ते (2.47), यदा यदा हि धर्मस्य (4.7), सर्वधर्मान्परित्यज्य (18.66)।
  • पढ़ने का आसान तरीका: रोज़ एक अध्याय; 18 दिन में पूरी गीता।

विषय सूची

गीता का प्रसंग: अर्जुन ने हथियार क्यों रखे

कुरुक्षेत्र में कौरव और पांडव की सेनाएँ आमने सामने थीं। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से कहा कि रथ को दोनों सेनाओं के बीच ले चलो, मैं देखना चाहता हूँ कि मुझे किससे लड़ना है। सामने दादा भीष्म, गुरु द्रोण, चाचा, भाई और मित्र खड़े थे। अर्जुन का शरीर काँपने लगा, गांडीव हाथ से छूट गया और उन्होंने कहा कि अपनों को मारकर मिलने वाला राज्य मुझे नहीं चाहिए।

यहीं से श्रीकृष्ण का उपदेश शुरू होता है। यह पूरा संवाद संजय, जिन्हें व्यास जी ने दिव्य दृष्टि दी थी, अंधे राजा धृतराष्ट्र को सुनाते हैं। इसीलिए गीता का पहला श्लोक धृतराष्ट्र का प्रश्न है और बाकी लगभग पूरा संवाद संजय के मुँह से है।

पहाड़ों के बीच कृष्ण अर्जुन के रथ की बड़ी मूर्ति
गीता उपदेश की यह झाँकी देश के कई तीर्थों में बनी है

18 अध्याय एक नज़र में

अध्यायनामश्लोकएक लाइन में
1अर्जुनविषादयोग47अपनों को देखकर अर्जुन का मोह और शोक
2सांख्ययोग72आत्मा अमर है; कर्म करो, फल की चिंता छोड़ो
3कर्मयोग43काम छोड़ना हल नहीं, निःस्वार्थ भाव से करो
4ज्ञानकर्मसंन्यासयोग42भगवान के अवतार का कारण और ज्ञान की आग
5कर्मसंन्यासयोग29संसार में रहकर भी कमल के पत्ते जैसे अलिप्त
6आत्मसंयमयोग (ध्यानयोग)47मन को साधना, ध्यान की विधि
7ज्ञानविज्ञानयोग30सब कुछ ईश्वर में धागे में मणियों जैसा पिरोया है
8अक्षरब्रह्मयोग28अंत समय की स्मृति; हर पल भगवान को याद रखो
9राजविद्याराजगुह्ययोग34पत्ता, फूल, फल, जल; प्रेम से दिया सब स्वीकार
10विभूतियोग42हर श्रेष्ठ चीज़ में भगवान की झलक
11विश्वरूपदर्शनयोग55अर्जुन को भगवान का विराट रूप दिखा
12भक्तियोग20सच्चे भक्त के लक्षण
13क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग34शरीर खेत है, आत्मा उसे जानने वाला
14गुणत्रयविभागयोग27सत्त्व, रज, तम: तीन गुण कैसे बाँधते हैं
15पुरुषोत्तमयोग20उल्टा पीपल रूपी संसार और पुरुषोत्तम
16दैवासुरसम्पद्विभागयोग24अच्छे और बुरे स्वभाव; काम, क्रोध, लोभ नरक के द्वार
17श्रद्धात्रयविभागयोग28तीन तरह की श्रद्धा, भोजन, तप और दान
18मोक्षसंन्यासयोग78त्याग का असली अर्थ; पूरी शरणागति
Gita ke 18 adhyay ka saar: गीता के 6 सबसे बड़े सूत्र एक नज़र में
इन्फ़ोग्राफ़िक: गीता के 6 बड़े सूत्र (Storyshala)

गीता के 18 अध्याय का सार (हर अध्याय विस्तार से)

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग (47 श्लोक)

सार: धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि कुरुक्षेत्र में मेरे और पांडु के पुत्रों ने क्या किया। संजय दोनों सेनाओं के बड़े योद्धाओं के नाम बताते हैं, शंख बजते हैं। अर्जुन रथ को बीच में ले जाते हैं और अपने ही परिवार और गुरुओं को सामने देखकर दुःख और मोह से भर जाते हैं। वे कहते हैं कि इस युद्ध से कुल नष्ट होगा, और धनुष छोड़कर रथ में बैठ जाते हैं।

मुख्य श्लोक (1.1):

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥

अर्थ: धृतराष्ट्र पूछते हैं: हे संजय, धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए मेरे पुत्रों और पांडु के पुत्रों ने क्या किया?

आज की सीख: बड़े फ़ैसले के समय घबराहट होना स्वाभाविक है। गीता की शुरुआत ही इस घबराहट को मानने से होती है, उसे छिपाने से नहीं।

अध्याय 2: सांख्ययोग (72 श्लोक)

सार: यह गीता का सबसे ज़रूरी अध्याय है, इसे पूरी गीता का बीज कहते हैं। श्रीकृष्ण पहले अर्जुन को डाँटते हैं कि यह कमज़ोरी तुम्हें शोभा नहीं देती। फिर समझाते हैं कि आत्मा न जन्म लेती है न मरती है; जैसे इंसान पुराने कपड़े छोड़कर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा शरीर बदलती है। फिर क्षत्रिय का धर्म बताते हैं, और फिर कर्मयोग का सूत्र देते हैं: कर्म करो, फल की चिंता मत करो। अध्याय के अंत में स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाले) व्यक्ति के लक्षण हैं: जो सुख दुःख में एक जैसा रहे, जिसकी इंद्रियाँ उसके बस में हों।

मुख्य श्लोक (2.47):

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए फल की इच्छा को कर्म का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी रुचि न हो।

आज की सीख: परीक्षा की तैयारी, नौकरी या कोई भी काम: पूरी मेहनत आपके हाथ में है, नतीजा नहीं। नतीजे के डर से मेहनत छोड़ देना भी ग़लत है।

अध्याय 3: कर्मयोग (43 श्लोक)

सार: अर्जुन पूछते हैं कि अगर ज्ञान बड़ा है तो मुझे इस घोर कर्म (युद्ध) में क्यों लगाते हो। श्रीकृष्ण कहते हैं कि कोई भी इंसान एक पल भी बिना कर्म के नहीं रह सकता; काम छोड़ देना हल नहीं है। काम को यज्ञ की भावना से, यानी दूसरों की भलाई के लिए करो। बड़े लोगों का आचरण दूसरे देखकर अपनाते हैं, इसलिए उन्हें और सावधान रहना चाहिए। अपना धर्म (स्वधर्म) कमियों के साथ भी दूसरे के धर्म से अच्छा है। अंत में बताते हैं कि इंसान को पाप की ओर काम (इच्छा) और क्रोध खींचते हैं।

मुख्य श्लोक (3.21):

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो मानक बनाता है, दुनिया उसी पर चलती है।

आज की सीख: माता पिता, शिक्षक और बड़े भाई बहन जो करते हैं, बच्चे वही सीखते हैं; उपदेश से ज़्यादा आचरण बोलता है।

अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग (42 श्लोक)

सार: श्रीकृष्ण बताते हैं कि यह योग उन्होंने बहुत पहले सूर्य को दिया था, जो परंपरा से चलता रहा और फिर लुप्त हो गया। अर्जुन हैरान होते हैं कि आप तो अभी जन्मे हो। तब कृष्ण अवतार का रहस्य बताते हैं: जब जब धर्म घटता है, मैं आता हूँ। फिर समझाते हैं कि कर्म में अकर्म देखना (काम करते हुए भी कर्तापन का अहंकार न रखना) ही असली ज्ञान है, और ज्ञान की आग सब कर्मों के बंधन को जला देती है। ज्ञान पाने के लिए गुरु के पास विनम्रता, प्रश्न और सेवा से जाओ।

मुख्य श्लोक (4.7):

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थ: हे भारत, जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब तब मैं अपने आप को प्रकट करता हूँ।

आज की सीख: सीखने का सही ढंग है: झुककर पूछना, सवाल करना और सेवा करना (4.34)। अकड़कर कोई नहीं सीखता।

अध्याय 5: कर्मसंन्यासयोग (29 श्लोक)

सार: अर्जुन फिर पूछते हैं: कर्म छोड़ना (संन्यास) अच्छा है या कर्म करना (कर्मयोग)? कृष्ण कहते हैं कि दोनों से कल्याण होता है, पर कर्मयोग आसान और बेहतर है। असली संन्यासी वह है जो न किसी से नफ़रत करता है, न कुछ माँगता है। ज्ञानी व्यक्ति विद्वान ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में एक ही आत्मा देखता है।

मुख्य श्लोक (5.10):

ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

अर्थ: जो व्यक्ति अपने सब कर्म भगवान को अर्पण करके और आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से वैसे ही नहीं लिपटता, जैसे कमल का पत्ता पानी में रहकर भी गीला नहीं होता।

आज की सीख: दुनिया छोड़कर जंगल जाना ज़रूरी नहीं; घर, दफ़्तर और ज़िम्मेदारियों के बीच रहकर भी मन को साफ़ रखा जा सकता है।

पानी की बूँदों वाले कमल के पत्तों के बीच खिला गुलाबी कमल
पद्मपत्रमिवाम्भसा: कमल का पत्ता पानी में रहकर भी उस पर पानी नहीं टिकता

अध्याय 6: आत्मसंयमयोग या ध्यानयोग (47 श्लोक)

सार: इस अध्याय में ध्यान की व्यावहारिक विधि है: साफ़ जगह, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा आसन, सीधा शरीर, नज़र नाक के अगले भाग पर, और मन को भगवान में लगाना। कृष्ण कहते हैं कि योग न बहुत ज़्यादा खाने वाले का होता है, न बिल्कुल न खाने वाले का; संतुलित भोजन, नींद और काम वाले का होता है। अर्जुन कहते हैं कि मन तो हवा जैसा चंचल है, उसे कैसे रोकें। कृष्ण मानते हैं कि यह कठिन है, पर अभ्यास और वैराग्य से हो सकता है। जो योग अधूरा छोड़कर मर जाए, उसका भी नाश नहीं होता; अगले जन्म में वह वहीं से आगे बढ़ता है।

मुख्य श्लोक (6.5):

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अर्थ: अपने आप से अपना उद्धार करो, अपने आप को नीचे मत गिराओ। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।

आज की सीख: मोबाइल, आलस या ग़ुस्सा: मन को बदलने का रास्ता है रोज़ थोड़ा अभ्यास। एक दिन में नहीं, धीरे धीरे।

अध्याय 7: ज्ञानविज्ञानयोग (30 श्लोक)

सार: यहाँ से भक्ति का भाग शुरू होता है। कृष्ण बताते हैं कि उनकी दो प्रकृतियाँ हैं: एक जड़ (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, अहंकार), और दूसरी चेतन (जीव)। पानी में स्वाद, सूरज और चाँद में रोशनी, वेदों में ओंकार, सब में वही हैं। चार तरह के लोग भगवान को भजते हैं: दुखी, जिज्ञासु, कुछ चाहने वाला और ज्ञानी; इनमें ज्ञानी सबसे प्रिय है।

मुख्य श्लोक (7.7):

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥

अर्थ: हे धनंजय, मुझसे बढ़कर कुछ भी नहीं है। यह सारा संसार मुझमें वैसे ही पिरोया हुआ है, जैसे धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं।

आज की सीख: माला में मणियाँ अलग अलग दिखती हैं, पर धागा एक है। लोगों में भेद करने से पहले यह धागा याद रखें।

अध्याय 8: अक्षरब्रह्मयोग (28 श्लोक)

सार: अर्जुन सात प्रश्न पूछते हैं: ब्रह्म क्या है, अध्यात्म क्या है, कर्म क्या है, और मृत्यु के समय भगवान को कैसे जाना जाता है। कृष्ण कहते हैं कि अंत समय में इंसान जिस भाव को याद करता है, उसी को पाता है। पर अंत में वही याद आता है जिसका जीवन भर अभ्यास हो, इसलिए हर समय भगवान को याद करते हुए अपना काम करो।

मुख्य श्लोक (8.7):

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

अर्थ: इसलिए हर समय मुझे याद करो और युद्ध (अपना कर्तव्य) भी करो। मन और बुद्धि मुझे अर्पित करके तुम निःसंदेह मुझे ही पाओगे।

आज की सीख: भगवान को याद करने के लिए काम छोड़ना ज़रूरी नहीं; “याद भी करो और काम भी करो”, यही गीता का संतुलन है।

अध्याय 9: राजविद्याराजगुह्ययोग (34 श्लोक)

सार: कृष्ण इस ज्ञान को सब विद्याओं का राजा और सबसे गुप्त रहस्य कहते हैं। भगवान सबमें हैं, फिर भी किसी से बँधे नहीं। जो अनन्य भाव से भजता है, उसकी ज़रूरतें और रक्षा का भार भगवान ख़ुद उठाते हैं (योगक्षेमं वहाम्यहम्, 9.22)। भगवान को महँगे चढ़ावे नहीं, प्रेम चाहिए। जो भी करो, खाओ, दान दो, सब भगवान को अर्पण करो।

मुख्य श्लोक (9.26):

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

अर्थ: जो कोई प्रेम से मुझे एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा सा जल भी अर्पित करता है, उस शुद्ध मन वाले भक्त का प्रेम से दिया वह उपहार मैं स्वीकार करता हूँ।

आज की सीख: पूजा में चीज़ का दाम नहीं, भाव मायने रखता है। रोज़ की दैनिक पूजा में एक तुलसी पत्ता और जल भी पूरा है।

अध्याय 10: विभूतियोग (42 श्लोक)

सार: अर्जुन पूछते हैं कि आपको किन किन रूपों में याद करूँ। कृष्ण अपनी विभूतियाँ (ख़ास रूप) बताते हैं: देवताओं में इंद्र, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा, पेड़ों में पीपल, अक्षरों में “अ”, महीनों में मार्गशीर्ष, शस्त्रधारियों में राम, पांडवों में अर्जुन। अंत में कहते हैं कि जो भी चीज़ सुंदर, शक्तिशाली या श्रेष्ठ है, उसे मेरे तेज का एक अंश समझो।

मुख्य श्लोक (10.20):

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥

अर्थ: हे गुडाकेश (नींद को जीतने वाले अर्जुन), मैं सब प्राणियों के हृदय में रहने वाली आत्मा हूँ। मैं ही सब प्राणियों का आदि, मध्य और अंत हूँ।

आज की सीख: किसी में कोई ख़ास गुण दिखे, तो जलन की जगह उसमें ईश्वर का अंश देखें और उससे सीखें।

अध्याय 11: विश्वरूपदर्शनयोग (55 श्लोक)

सार: अर्जुन भगवान का असली रूप देखना चाहते हैं। कृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि देते हैं और अर्जुन विराट रूप देखते हैं: हज़ारों सूरजों जैसा तेज, अनगिनत मुख और भुजाएँ, सारा ब्रह्मांड एक शरीर में। अर्जुन देखते हैं कि कौरव सेना के योद्धा उस रूप के मुख में समा रहे हैं। कृष्ण कहते हैं कि मैं काल हूँ, ये सब पहले ही मारे जा चुके हैं; तुम केवल निमित्त (साधन) बनो। डरे हुए अर्जुन के कहने पर कृष्ण फिर अपना सौम्य रूप धारण करते हैं।

मुख्य श्लोक (11.33):

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥

अर्थ: इसलिए तुम उठो, यश प्राप्त करो, शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य भोगो। ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची (दोनों हाथों से बाण चलाने वाले), तुम केवल निमित्त बन जाओ।

आज की सीख: “निमित्त मात्र” का भाव अहंकार और डर, दोनों को कम करता है: सफलता पर घमंड नहीं, असफलता पर टूटना नहीं।

अध्याय 12: भक्तियोग (20 श्लोक)

सार: अर्जुन पूछते हैं कि साकार भगवान को भजने वाले श्रेष्ठ हैं या निराकार ब्रह्म को। कृष्ण कहते हैं कि दोनों मुझे ही पाते हैं, पर साकार की भक्ति देहधारी इंसान के लिए आसान है। फिर एक सीढ़ी बताते हैं: मन मुझमें लगाओ; न हो सके तो अभ्यास करो; वह भी न हो तो मेरे लिए काम करो; वह भी न हो तो कर्मों के फल का त्याग करो। अध्याय के अंत में प्यारे भक्त के लक्षण हैं।

मुख्य श्लोक (12.13):

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥

अर्थ: जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र है और दयालु है, जिसमें “मेरा” का मोह और अहंकार नहीं, जो सुख दुःख में एक जैसा रहता है और क्षमा करने वाला है (वह भक्त मुझे प्रिय है)।

आज की सीख: भक्ति की पहचान माला या तिलक नहीं, स्वभाव है: द्वेष न करना, दया, क्षमा।

अध्याय 13: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (34 श्लोक)

सार: यहाँ से ज्ञान का भाग शुरू होता है। कृष्ण कहते हैं कि यह शरीर क्षेत्र (खेत) है और इसे जानने वाली आत्मा क्षेत्रज्ञ। जैसे किसान खेत नहीं है, वैसे ही हम शरीर नहीं हैं। फिर ज्ञान के बीस लक्षण बताते हैं: विनम्रता, दिखावा न करना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु सेवा, पवित्रता, स्थिरता, मन पर काबू। प्रकृति और पुरुष (आत्मा) का भेद समझने वाला मुक्त हो जाता है।

मुख्य श्लोक (13.2):

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥

अर्थ: हे भारत, सब क्षेत्रों (शरीरों) में क्षेत्रज्ञ (जानने वाला) भी मुझे ही समझो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में असली ज्ञान है।

आज की सीख: “मैं शरीर नहीं, उसे चलाने वाला हूँ”: यह भाव बीमारी, बुढ़ापे और रूप रंग की चिंता में मन को सँभालता है।

अध्याय 14: गुणत्रयविभागयोग (27 श्लोक)

सार: प्रकृति के तीन गुण हैं: सत्त्व (ज्ञान, शांति, सफ़ाई), रज (इच्छा, भागदौड़, लोभ) और तम (आलस, नींद, अज्ञान)। तीनों आत्मा को शरीर से बाँधते हैं; सत्त्व सुख से, रज कर्म के मोह से और तम प्रमाद से। जो इन तीनों से ऊपर उठ जाए, उसे गुणातीत कहते हैं: वह मान अपमान, मित्र शत्रु और सुख दुःख में एक जैसा रहता है।

मुख्य श्लोक (14.5):

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्॥

अर्थ: हे महाबाहो, प्रकृति से पैदा हुए सत्त्व, रज और तम, ये तीन गुण अविनाशी आत्मा को शरीर में बाँध देते हैं।

आज की सीख: दिन भर ख़ुद को देखें: कब मन शांत (सत्त्व) था, कब बेचैन (रज), कब आलसी (तम)। पहचान ही बदलाव की शुरुआत है।

अध्याय 15: पुरुषोत्तमयोग (20 श्लोक)

सार: संसार एक उल्टे पीपल के पेड़ जैसा है, जिसकी जड़ ऊपर (भगवान में) और शाखाएँ नीचे फैली हैं; वेद इसके पत्ते हैं। इस पेड़ को वैराग्य की कुल्हाड़ी से काटना है। जीव भगवान का सनातन अंश है। संसार में दो पुरुष हैं: नाशवान (शरीर) और अविनाशी (आत्मा); इन दोनों से ऊपर जो परमात्मा है, वही पुरुषोत्तम है। यह छोटा सा अध्याय बहुत से घरों में भोजन से पहले पढ़ा जाता है।

मुख्य श्लोक (15.1):

ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्॥

अर्थ: जिस अविनाशी पीपल के पेड़ की जड़ ऊपर और शाखाएँ नीचे हैं, और वेद जिसके पत्ते हैं, उस संसार रूपी पेड़ को जो ठीक से जानता है, वही वेदों को जानने वाला है।

आज की सीख: इसके श्लोक 14 (“अहं वैश्वानरो भूत्वा”) में भगवान कहते हैं कि मैं ही पाचन की अग्नि बनकर भोजन पचाता हूँ; इसीलिए भोजन को प्रसाद मानकर खाने की परंपरा है।

अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग (24 श्लोक)

सार: कृष्ण दो तरह के स्वभाव बताते हैं। दैवी संपदा: निडरता, मन की शुद्धता, दान, संयम, सत्य, अहिंसा, क्रोध न करना, दया, विनम्रता, क्षमा। आसुरी संपदा: दिखावा, घमंड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान। आसुरी स्वभाव वाले सोचते हैं कि आज इतना कमाया, कल और कमाऊँगा, मैं ही सबसे बड़ा हूँ। दैवी संपदा मुक्ति देती है और आसुरी बंधन।

मुख्य श्लोक (16.21):

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥

अर्थ: काम, क्रोध और लोभ, ये तीन नरक के दरवाज़े हैं जो आत्मा का नाश करते हैं। इसलिए इन तीनों को छोड़ देना चाहिए।

आज की सीख: ज़्यादातर पछतावे इन्हीं तीन से आते हैं: बेकाबू इच्छा, ग़ुस्से में बोला शब्द और “थोड़ा और” का लालच।

अध्याय 17: श्रद्धात्रयविभागयोग (28 श्लोक)

सार: अर्जुन पूछते हैं कि जो शास्त्र नहीं जानते पर श्रद्धा से पूजा करते हैं, उनकी श्रद्धा कैसी है। कृष्ण कहते हैं कि श्रद्धा भी तीन तरह की होती है: सात्त्विक, राजसी और तामसी। फिर भोजन, यज्ञ, तप और दान के भी तीन तीन प्रकार बताते हैं; जैसे सात्त्विक भोजन ताज़ा, रसीला, पौष्टिक और मन को प्रसन्न करने वाला होता है, और सात्त्विक दान वह है जो बिना बदले की उम्मीद के, सही समय और सही व्यक्ति को दिया जाए। वाणी का तप है ऐसा बोलना जो सच हो, प्रिय हो, हितकारी हो और किसी को चोट न पहुँचाए। अंत में “ॐ तत् सत्” का अर्थ समझाया गया है।

मुख्य श्लोक (17.3):

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥

अर्थ: हे भारत, हर व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। मनुष्य श्रद्धामय है; जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वैसा ही है।

आज की सीख: आप जिस पर भरोसा करते हैं, वही आप बनते जाते हैं। इसलिए भरोसा सोच समझकर रखें।

अध्याय 18: मोक्षसंन्यासयोग (78 श्लोक)

सार: गीता का सबसे लंबा अध्याय, जिसमें पूरी गीता का निचोड़ है। कृष्ण समझाते हैं कि संन्यास का अर्थ काम छोड़ना नहीं, त्याग का अर्थ फल की आसक्ति छोड़ना है। यज्ञ, दान और तप कभी नहीं छोड़ने चाहिए। ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धैर्य और सुख, सबके तीन तीन प्रकार बताते हैं। हर व्यक्ति अपने स्वभाव के अनुसार काम करके सफल हो सकता है। अंत में सबसे गुप्त बात कहते हैं: सब छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। अर्जुन कहते हैं, “मेरा मोह नष्ट हो गया, मैं आपकी आज्ञा मानूँगा”, और गांडीव उठा लेते हैं। संजय अंतिम श्लोक में कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीं विजय, श्री और नीति है।

मुख्य श्लोक (18.66):

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

अर्थ: सब धर्मों (कर्तव्यों के आश्रय) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।

आज की सीख: पूरी कोशिश के बाद जो बच जाए, उसे भगवान पर छोड़ देना कमज़ोरी नहीं, समझदारी है। शरणागति का अर्थ है: मेहनत पूरी, चिंता शून्य।

पूरी गीता का सार 10 वाक्यों में

  1. शरीर नश्वर है, आत्मा अमर है; मौत के डर से अपना कर्तव्य मत छोड़ो।
  2. कर्म करने पर तुम्हारा अधिकार है, फल पर नहीं।
  3. काम छोड़ना हल नहीं; काम को निःस्वार्थ भाव से, सबकी भलाई के लिए करो।
  4. सुख दुःख, लाभ हानि, जीत हार में मन को एक जैसा रखो; यही योग है।
  5. मन को अभ्यास और वैराग्य से साधो; मन ही तुम्हारा मित्र है, मन ही शत्रु।
  6. भगवान सब जगह और सबमें हैं, जैसे माला की मणियों में एक धागा।
  7. भगवान को महँगा चढ़ावा नहीं, सच्चा प्रेम चाहिए।
  8. काम, क्रोध और लोभ नरक के तीन दरवाज़े हैं; इनसे बचो।
  9. अपना स्वभाव और अपना धर्म पहचानो, दूसरे की नकल मत करो।
  10. पूरी कोशिश करो, फिर भगवान की शरण में चिंता छोड़ दो।
पूजा की थाली के पास बैठकर पोथी का पाठ करते व्यक्ति
रोज़ एक अध्याय पढ़ें तो 18 दिन में पूरी गीता हो जाती है

गीता पढ़ने का आसान तरीका

  • रोज़ एक अध्याय: 18 दिन में पूरी गीता। बड़े अध्याय (2 और 18) दो दिन में बाँट लें।
  • पहले अर्थ, फिर श्लोक: शुरुआत हिंदी अर्थ से करें; जो श्लोक दिल को छू जाए, उसे संस्कृत में याद करें।
  • बच्चों के लिए: हर हफ़्ते एक श्लोक। शुरुआत के लिए हमारे विद्यार्थियों के लिए गीता श्लोक अच्छे हैं।
  • खास दिन: मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को गीता जयंती मनाई जाती है; उस दिन पूरी गीता का पाठ करने की परंपरा है।
  • भोजन से पहले: बहुत से घरों में अध्याय 15 (पुरुषोत्तमयोग) भोजन से पहले पढ़ा जाता है, क्योंकि यह छोटा है और इसमें भोजन पचाने वाली अग्नि का उल्लेख है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गीता में कितने अध्याय और कितने श्लोक हैं?

श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इनमें 574 श्लोक श्रीकृष्ण के और 1 धृतराष्ट्र का है। अर्जुन के 84 और संजय के 41 श्लोक माने जाते हैं; कुछ गिनतियों में यह 85 और 40 है, क्योंकि एक श्लोक किसके मुँह से है, इस पर मत अलग हैं।

गीता का सबसे बड़ा और सबसे छोटा अध्याय कौन सा है?

सबसे बड़ा अध्याय 18वाँ (मोक्षसंन्यासयोग) है, जिसमें 78 श्लोक हैं। सबसे छोटे अध्याय 12वाँ (भक्तियोग) और 15वाँ (पुरुषोत्तमयोग) हैं, दोनों में 20 श्लोक हैं।

गीता महाभारत के किस पर्व में है?

गीता महाभारत के भीष्म पर्व में है, उसके अध्याय 25 से 42 तक। यह संवाद युद्ध शुरू होने से ठीक पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में हुआ।

गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन सा है?

अध्याय 2 का श्लोक 47, “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”, सबसे प्रसिद्ध है। इसका अर्थ है कि तुम्हारा अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं। इसके बाद 4.7 (यदा यदा हि धर्मस्य) और 18.66 (सर्वधर्मान्परित्यज्य) सबसे ज़्यादा उद्धृत होते हैं।

गीता का सार एक लाइन में क्या है?

अपना कर्तव्य पूरी लगन से करो, फल की चिंता मत करो, और सब कुछ भगवान को अर्पण करके निश्चिंत रहो।

गीता के तीन भाग कौन से हैं?

परंपरा में 18 अध्यायों को छह छह के तीन षट्क में बाँटा जाता है: अध्याय 1 से 6 कर्मयोग, 7 से 12 भक्तियोग और 13 से 18 ज्ञानयोग पर ज़्यादा ज़ोर देते हैं। वैसे तीनों धाराएँ पूरी गीता में साथ साथ चलती हैं।

गीता किसने लिखी?

गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया और इसे महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में लिखा। संजय ने व्यास जी से मिली दिव्य दृष्टि से यह संवाद धृतराष्ट्र को सुनाया।

गीता जयंती कब मनाई जाती है?

मार्गशीर्ष (अगहन) महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को, जिसे मोक्षदा एकादशी भी कहते हैं। माना जाता है कि इसी दिन श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था।

गीता का पाठ कैसे शुरू करें?

रोज़ एक अध्याय का हिंदी अर्थ पढ़ें, 18 दिन में पूरी गीता हो जाएगी। शुरुआत के लिए गीता प्रेस की छोटी गीता अच्छी है, जिसमें श्लोक और सरल अर्थ दोनों हैं।

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