दोगले लोगों की पहचान कैसे करें? उनकी बोली से नहीं, उनके काम से और उस बात से जो वो आपकी ग़ैरहाज़िरी में करते हैं। महाभारत के उद्योग पर्व में विदुर धृतराष्ट्र को यही समझाते हैं कि आदमी की परख उसकी बोली से नहीं होती। उनकी सीख से छह पहचान निकलती हैं, जो दफ़्तर में भी काम आती हैं और घर रिश्तेदारी में भी।
दफ़्तर में एक आदमी होता है जो आपसे सबसे मीठा बोलता है। और जिस दिन पता चलता है कि आपके बारे में सबसे ज़्यादा उसी ने कहा है, तो चोट बात की नहीं लगती, उस मिठास की लगती है। मुस्कुराहट कोई सबूत नहीं होती।
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दोगले लोगों की पहचान कैसे करें: छोटा जवाब, 6 पहचान
- कहता कुछ, करता कुछ और। मीटिंग में आपके साथ, फ़ाइल आगे बढ़ने के वक़्त कहीं नहीं। एक बार मजबूरी, तीन बार आदत।
- तारीफ़ सिर्फ़ आपके सामने। किसी तीसरे से पूछिए कि आपके काम की चर्चा हुई या नहीं। जो चुप्पी मिलेगी, वही जवाब है।
- समय हमेशा अपनी ज़रूरत से। उसे कुछ चाहिए तो उसी दिन, आपको चाहिए तो हफ़्ता निकल जाता है।
- माफ़ी कभी नहीं, बस बात बदल देता है। ग़लती हुई और बातचीत सीधे आगे के प्लान पर।
- दूसरों के सामने आपका ज़िक्र नहीं करता। सालों साथ, और उसके बाक़ी लोगों को आपका नाम तक नहीं पता।
- कभी असहमत नहीं होता। विदुर के अनुसार सच्चा हितैषी अप्रिय बात भी कह देता है।
मुस्कुराहट कोई सबूत नहीं होती
सच बताऊँ तो मैंने भी यह देर से पहचाना। सामने वाला मुस्कुरा रहा था, और मुझे लगा कि रिश्ता ठीक चल रहा है। पर मुस्कुराहट कोई सबूत नहीं होती, और यह जितनी जल्दी समझ आ जाए, उतना अच्छा।
ये छह पहचान कोई भारी बात नहीं हैं। रोज़ दिखने वाली चीज़ें हैं, बस हम उन्हें पढ़ना भूल गए हैं। छठी पहचान सबसे उलटी है, क्योंकि जिसे हम आम तौर पर अच्छा गुण समझते हैं, विदुर उसी को ख़तरे का निशान बताते हैं।
एक बात पहले साफ़ कर दें: ये किसी पर आरोप लगाने की सूची नहीं है। ये सिर्फ़ जाँच है, ताकि आप अपना भरोसा नापकर दे सकें।

पहली पहचान: कहता कुछ, करता कुछ और
ये सबसे साफ़ और सबसे आसान पहचान है, फिर भी हम इसी को सबसे ज़्यादा नज़रअंदाज़ करते हैं। विदुर बार-बार वचन और कर्म के फ़र्क़ पर लौटते हैं। उनके यहाँ आदमी की पहचान इस बात से होती है कि जो कहा गया था, वो हुआ या नहीं।
दफ़्तर में यह ऐसे दिखता है: मीटिंग में वो आपके साथ खड़ा नज़र आता है, और फ़ाइल आगे बढ़ने के वक़्त कहीं नहीं होता। घर में ऐसे कि हर फ़ोन पर कहता है, “कोई ज़रूरत हो तो बता देना”, और ज़रूरत बताने पर जवाब देर से आता है।
यहाँ एक बात समझने वाली है। एक बार ऐसा होना कुछ नहीं, लोगों की अपनी मजबूरियाँ होती हैं। पर तीन बार हो जाए तो वो मजबूरी नहीं रहती, स्वभाव बन जाता है।
सीख: बातें मत गिनिए, ये गिनिए कि कितनी बातें काम में बदलीं। तीन बार का हिसाब रखिए, तस्वीर अपने आप साफ़ हो जाएगी।
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दूसरी पहचान: तारीफ़ सिर्फ़ आपके सामने
ये आदमी आपकी तारीफ़ करता है, पर हमेशा तभी जब आप सुन रहे हों। विदुर का इशारा साफ़ है कि जो सामने बहुत मीठा है, उसकी असली परख वहाँ होती है जहाँ आप मौजूद ही नहीं।
इसे जाँचने का तरीक़ा बहुत आसान है। किसी तीसरे से पूछ लीजिए कि आपके काम की चर्चा कहीं हुई थी या नहीं। जवाब में जो चुप्पी मिलेगी, वही असली जवाब है। जिसने आपके सामने दस बार तारीफ़ की, हो सकता है उसने कहीं और एक बार भी आपका नाम न लिया हो।
दफ़्तर में यही सबसे ज़्यादा नुक़सान करता है, क्योंकि तरक़्क़ी उस कमरे में तय होती है जहाँ आप बैठे नहीं होते।
सीख: तारीफ़ को सबूत मत मानिए। सबूत वो है जो आपकी ग़ैरहाज़िरी में कहा गया हो।
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तीसरी पहचान: समय हमेशा अपनी ज़रूरत से
ग़ौर कीजिए कि यह आदमी मिलता कब है। जब उसे कुछ चाहिए, तो उसी दिन आ जाता है। और जब आपको कुछ चाहिए, तो हफ़्ता निकल जाता है। विदुर स्वार्थ से बँधे संबंध को अलग गिनते हैं, क्योंकि उनके यहाँ रिश्ता वही है जिसमें लेना और देना दोनों तरफ़ चलता हो।
रिश्तेदारी में यह शादी ब्याह के मौसम में सबसे साफ़ दिखता है। फ़ोन तभी आते हैं जब कोई काम अटका हो, और काम निकलते ही वो नंबर फिर शांत हो जाता है।
पर यहाँ एक बात कहनी ज़रूरी है: हर व्यस्त आदमी मतलबी नहीं होता। फ़र्क़ यह है कि व्यस्त आदमी बाद में लौटकर पूछ लेता है, और मतलबी आदमी काम निकलते ही ग़ायब हो जाता है।
सीख: यह मत देखिए कि उसने कितनी बार मना किया। यह देखिए कि उसने आपकी ज़रूरत पर लौटकर पूछा या नहीं।
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चौथी पहचान: माफ़ी कभी नहीं, बस बात बदल देता है
कुछ लोग ग़लती मान ही नहीं पाते। वो नाराज़ नहीं होते, लड़ते भी नहीं, बस विषय बदल देते हैं। विदुर अहंकार को उन दोषों में गिनते हैं जो आदमी को धीरे धीरे अकेला कर देते हैं, और यह उसी की सबसे नरम शक्ल है।
दफ़्तर में यह ऐसे आता है: ग़लती हुई, नुक़सान हुआ, और बातचीत सीधे आगे के प्लान पर चली गई। जो हुआ, उस पर एक शब्द नहीं, क्योंकि उस एक शब्द से मानना पड़ता कि ग़लती हुई थी।
सीख: जो आदमी छोटी ग़लती पर एक बार भी माफ़ी नहीं माँग सका, वो बड़ी ग़लती पर ज़िम्मेदारी भी नहीं लेगा। यह छोटा सा टेस्ट बहुत आगे तक काम आता है।
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पाँचवीं पहचान: दूसरों के सामने आपका ज़िक्र नहीं करता
यह सबसे चुपचाप चलने वाली पहचान है, क्योंकि इसमें बुरा कुछ होता ही नहीं। बस कुछ होता ही नहीं। आप उसके साथ सालों काम करते हैं, और उसके बाक़ी लोगों को आपका नाम तक ठीक से पता नहीं होता। तो सोचिए, उसने आपका ज़िक्र किया ही कब होगा?
विदुर के यहाँ संबंध का एक अर्थ यह भी है कि आदमी अपने लोगों को अपने दायरे में जगह देता है। जो आपको अपने दायरे से बाहर रखता है, वो आपको साथी नहीं, ज़रूरत मानकर चल रहा है। परखने का तरीक़ा सीधा है: किसी भीड़ वाली जगह पर देखिए कि वो आपको बाक़ी लोगों से मिलवाता है या नहीं।
सीख: जो आपको अपने लोगों से नहीं मिलवाता, उसने मन में आपकी जगह पहले ही तय कर रखी है।
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छठी पहचान: जो आपसे कभी असहमत नहीं होता
यह उलटा लगेगा, क्योंकि हम तो ऐसे आदमी को अच्छा मानते हैं जो कभी बहस नहीं करता। पर विदुर की पूरी नीति इसी एक बात पर खड़ी है कि सच्चा हितैषी, यानी जो सच में आपका भला चाहता है, वो अप्रिय बात भी कह देता है।
विदुर ख़ुद यही कर रहे थे। उन्होंने धृतराष्ट्र को वही सुनाया जो उसे सुनना नहीं था, और शायद इसीलिए वो सलाह आज तक बची हुई है।
अब ज़रा सोचिए। आपके आस पास जो आदमी हर बात पर हाँ कहता है, उसने आज तक आपको एक बार भी नहीं रोका। वो आपको अच्छा महसूस करा रहा है, पर बचा नहीं रहा। और जो आदमी आपको टोकता है, थोड़ा चुभता भी है, हो सकता है वही अकेला हो जिसे आपके नुक़सान की सच में परवाह है।
सीख: यह मत देखिए कि कौन आपसे सहमत है। यह देखिए कि पिछली बार आपको किसने रोका था, और आपने उसकी सुनी या नहीं।
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पहचान का काम दूरी बनाना नहीं, सही दूरी तय करना है
तो ये थीं छह पहचान: कही बात काम में नहीं बदलती, तारीफ़ सिर्फ़ सामने, समय अपनी ज़रूरत से, माफ़ी कभी नहीं, दूसरों के सामने ज़िक्र नहीं, और हर बात पर हाँ।
इन छह को किसी को सज़ा देने के लिए मत इस्तेमाल कीजिए। इन्हें सिर्फ़ यह तय करने के लिए रखिए कि किसे कितना पास आने देना है। पहचान का काम दूरी बनाना नहीं है, सही दूरी तय करना है।
इन छह में से कौन सी पहचान आपको अभी किसी एक चेहरे पर साफ़ दिख रही है? चाहें तो नीचे कमेंट में सिर्फ़ नंबर लिख दीजिए।
विदुर नीति की किताब
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दोगले लोगों की पहचान कैसे करें?
छह चीज़ें देखिए: कहना और करना अलग, तारीफ़ सिर्फ़ सामने, समय अपनी ज़रूरत से, माफ़ी कभी नहीं, दूसरों के सामने आपका ज़िक्र नहीं, और कभी असहमत नहीं।
दोगले लोग कैसे होते हैं?
सामने सबसे मीठे, पीछे कुछ और। उनकी पहचान बोली से नहीं, उनके काम से और आपकी ग़ैरमौजूदगी में उनके व्यवहार से होती है।
मतलबी लोगों की पहचान क्या है?
उनका समय हमेशा उनकी ज़रूरत से तय होता है। उन्हें कुछ चाहिए तो उसी दिन आ जाते हैं, आपको चाहिए तो हफ़्ता निकल जाता है।
ऑफ़िस में दो मुँहे लोग कैसे पहचानें?
मीटिंग में साथ, फ़ाइल आगे बढ़ने पर ग़ायब। एक बार मजबूरी हो सकती है, तीन बार आदत है।
क्या तारीफ़ करने वाला भी दोगला हो सकता है?
हो सकता है, अगर तारीफ़ सिर्फ़ आपके सामने होती है। किसी तीसरे से पूछ लीजिए कि आपकी ग़ैरहाज़िरी में आपकी चर्चा हुई या नहीं।
जो कभी माफ़ी नहीं माँगता, वो कैसा इंसान है?
वो लड़ता नहीं, बस विषय बदल देता है। विदुर अहंकार को उन दोषों में गिनते हैं जो इंसान को धीरे धीरे अकेला कर देते हैं।
जो कभी असहमत न हो, वो ख़तरा क्यों है?
क्योंकि सच्चा हितैषी अप्रिय बात भी कह देता है। हर बात पर हाँ कहने वाला आपकी नहीं, अपनी सुविधा की परवाह कर रहा है।
क्या ये छह पहचान विदुर नीति में सीधे लिखी हैं?
भाव विदुर नीति का है (उद्योग पर्व, अध्याय 33 से 35)। पहचानों के नाम और आज की मिसालें उसी भाव की व्याख्या हैं, सीधे श्लोक नहीं।
ऐसे लोगों के साथ क्या करें?
पहले पहचानिए, फिर भरोसे और नज़दीकी का हिसाब उसी हिसाब से रखिए। इसका मतलब सब पर शक करना नहीं है।
विदुर नीति किस ग्रंथ में है?
महाभारत के उद्योग पर्व में, प्रजागर पर्व वाले हिस्से में, जहाँ विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हैं।
स्रोत
- महाभारत, उद्योग पर्व, प्रजागर पर्व (विदुर नीति, अध्याय 33 से 35), गीता प्रेस। छह पहचानों के नाम और आज की मिसालें विदुर के भाव पर व्याख्या हैं, सीधे श्लोक नहीं।
आगे पढ़िए
- धोखा देने वाले के साथ क्या करें? विदुर नीति के 5 सूत्र
- विदुर नीति के सप्त दोष: 7 आदतें जो इंसान को बर्बाद करती हैं
- विदुर नीति के 143 वचन, विषय के हिसाब से, अर्थ सहित
यह लेख SanatanSci के वीडियो पर आधारित है। ऐसे और वीडियो के लिए YouTube पर SanatanSci देखिए।
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