पितृ पक्ष और तर्पण विधि: रोज़ तर्पण कैसे करें, पूरी शास्त्रीय विधि, मंत्र, श्राद्ध के नियम और 2027 की तिथियाँ

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Pitru Paksha tarpan vidhi: महालया पर नदी में खड़े होकर पितरों का तर्पण करते लोग
पितृ पक्ष की अमावस्या पर नदी में तर्पण (कोलकाता)

Pitru Paksha tarpan vidhi सीखने का सबसे अच्छा समय पितृ पक्ष है, पर शास्त्र तर्पण को केवल पंद्रह दिन का काम नहीं मानते। गीता प्रेस की “नित्यकर्म पूजाप्रकाश” साफ़ लिखती है कि गृहस्थ को प्रतिदिन तर्पण करना चाहिए, और जो रोज़ तर्पण करता है उसका नित्य श्राद्ध भी इसी से पूरा हो जाता है। तर्पण का मतलब है श्रद्धा से जल देकर देवताओं, ऋषियों और अपने पितरों को तृप्त करना। इसमें न ज़्यादा ख़र्च है, न ज़्यादा समय।

इस लेख का एक ही उद्देश्य है: हर घर का कोई एक सदस्य रोज़ पाँच मिनट में अपने पितरों को जल दे सके, और पितृ पक्ष में पूरी विधि से श्राद्ध कर सके। सारी विधि दो किताबों से ली गई है: गीता प्रेस गोरखपुर की नित्यकर्म पूजाप्रकाश और शान्तिकुञ्ज की कर्मकाण्ड भास्कर। शास्त्रीय प्रमाण गरुड़ पुराण (सारोद्धार, गीता प्रेस), मनुस्मृति, यजुर्वेद, ऋग्वेद, भगवद्गीता और महाभारत से हैं। जहाँ कोई बात लोक परंपरा है, वहाँ यह साफ़ लिखा है।

मुख्य बातें

  • पितृ पक्ष 2027: बुधवार 15 सितंबर (पूर्णिमा श्राद्ध) से बुधवार 29 सितंबर (सर्वपितृ अमावस्या) तक।
  • रोज़ तर्पण: नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार रोज़ तर्पण से नित्य श्राद्ध की पूर्ति हो जाती है। नीचे 5 मिनट की छोटी विधि है।
  • घर में रोज़ सादा जल: घर में तिल वाला तर्पण केवल पितृ श्राद्ध, अमावस्या, संक्रांति और ग्रहण के दिन करें, बाक़ी दिन बिना तिल के।
  • दिशा: देवताओं के लिए पूर्व की ओर, पितरों के लिए दक्षिण की ओर मुँह।
  • जनेऊ न हो तो: गमछे या उत्तरीय से तर्पण करें, यह नित्यकर्म पूजाप्रकाश में लिखा है।
  • तिथि याद न हो: सर्वपितृ अमावस्या (29 सितंबर 2027) को श्राद्ध करें।

विषय सूची

पितृ पक्ष 2027: एक नज़र में

बातजानकारी
शुरुआतबुधवार, 15 सितंबर 2027 (भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध)
पहला श्राद्ध (प्रतिपदा)गुरुवार, 16 सितंबर 2027
मातृ नवमीशुक्रवार, 24 सितंबर 2027
सर्वपितृ अमावस्या (महालय)बुधवार, 29 सितंबर 2027
अमावस्या तिथि29 सितंबर सुबह 10:54 बजे से 30 सितंबर सुबह 8:05 बजे तक
अमावस्या श्राद्ध का कुतुप मुहूर्त (दिल्ली)29 सितंबर, सुबह 11:47 से दोपहर 12:35 तक
रौहिण मुहूर्तदोपहर 12:35 से 1:23 तक
अपराह्न कालदोपहर 1:23 से 3:46 तक

समय Drik Panchang के अनुसार नई दिल्ली के हैं। अपने शहर का समय थोड़ा अलग हो सकता है।

पितृ पक्ष 2027 की सभी श्राद्ध तिथियाँ

तारीख़दिनश्राद्धकिसका श्राद्ध (प्रचलित परंपरा)
15 सितंबरबुधवारपूर्णिमा श्राद्धजिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई
16 सितंबरगुरुवारप्रतिपदा श्राद्धप्रतिपदा को दिवंगत; कई परिवारों में नाना नानी का श्राद्ध भी
17 सितंबरशुक्रवारद्वितीया श्राद्धद्वितीया को दिवंगत
18 सितंबरशनिवारतृतीया श्राद्धतृतीया को दिवंगत
19 सितंबररविवारचतुर्थी श्राद्धचतुर्थी को दिवंगत
20 सितंबरसोमवारपंचमी श्राद्ध और महा भरणीपंचमी को दिवंगत; भरणी नक्षत्र का श्राद्ध, जिसे गया श्राद्ध जैसा पुण्य देने वाला माना जाता है
21 सितंबरमंगलवारषष्ठी श्राद्धषष्ठी को दिवंगत
22 सितंबरबुधवारसप्तमी श्राद्धसप्तमी को दिवंगत
23 सितंबरगुरुवारअष्टमी श्राद्धअष्टमी को दिवंगत
24 सितंबरशुक्रवारनवमी श्राद्ध (मातृ नवमी)नवमी को दिवंगत; माता और सुहागिन दिवंगत स्त्रियों का श्राद्ध
25 सितंबरशनिवारदशमी श्राद्धदशमी को दिवंगत
26 सितंबररविवारएकादशी श्राद्धएकादशी को दिवंगत
27 सितंबरसोमवारद्वादशी श्राद्ध और मघा श्राद्धद्वादशी को दिवंगत; संन्यासियों का श्राद्ध; मघा नक्षत्र का श्राद्ध
28 सितंबरमंगलवारत्रयोदशी और चतुर्दशी श्राद्धत्रयोदशी को दिवंगत; चतुर्दशी पर दुर्घटना, शस्त्र या अकाल मृत्यु वालों का श्राद्ध
29 सितंबरबुधवारसर्वपितृ अमावस्याअमावस्या को दिवंगत, और जिनकी तिथि याद नहीं; सभी पितरों का श्राद्ध

2027 में त्रयोदशी और चतुर्दशी का श्राद्ध एक ही दिन, 28 सितंबर को पड़ रहा है, क्योंकि उस दिन दोनों तिथियाँ आ रही हैं। महा भरणी, मातृ नवमी, मघा और चतुर्दशी के नियम हर परिवार और क्षेत्र में एक जैसे नहीं हैं, इसलिए अपने कुल की रीति मानें।

पितृ पक्ष क्या है?

पितृ यानी पितर, हमारे दिवंगत माता पिता, दादा दादी, नाना नानी और उनसे पहले के पूर्वज। पक्ष यानी चंद्र महीने का पंद्रह दिन का आधा हिस्सा। आश्विन महीने का कृष्ण पक्ष पितरों के लिए रखा गया है, इसलिए इसे पितृ पक्ष कहते हैं। इसे श्राद्ध पक्ष (क्योंकि इसमें श्राद्ध होते हैं) और महालय पक्ष भी कहा जाता है।

श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। धर्मग्रंथों की परिभाषा है: “श्रद्धया इदं दीयते इति श्राद्धम्”, यानी पितरों के लिए श्रद्धा से जो दिया जाए, वही श्राद्ध है।

पितृ पक्ष कब से कब तक: भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक, लगभग 16 दिन। उत्तर भारत के पूर्णिमांत पंचांग में यह आश्विन का कृष्ण पक्ष है, और महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण भारत के अमांत पंचांग में भाद्रपद का कृष्ण पक्ष। महीने का नाम अलग है, पर तारीख़ें दोनों में एक ही हैं। अंग्रेज़ी कैलेंडर में यह हर साल सितंबर या अक्टूबर में आता है और तारीख़ बदलती रहती है, क्योंकि हिंदू तिथियाँ चंद्रमा की चाल से चलती हैं।

पितृ पक्ष केवल कर्मकांड नहीं है। यह अपनी जड़ों को याद करने का समय है: उन लोगों को, जिनकी मेहनत, संस्कार और त्याग से आज हमारा परिवार खड़ा है।

शास्त्रों में पितरों का स्मरण: प्रमाण और कथाएँ

1. वेद: ऋग्वेद के दसवें मंडल का पंद्रहवाँ सूक्त पूरा पितरों को समर्पित है। उसका पहला मंत्र यजुर्वेद (19.49) में भी है, और तर्पण में आज भी पढ़ा जाता है:

उदीरतामवर उत्परास उन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं य ईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥

अर्थ: नीचे, ऊपर और बीच के लोकों में रहने वाले सौम्य पितर ऊपर उठें। जो पितर सत्य को जानने वाले हैं और शत्रुता से रहित होकर प्राण के लोक में गए हैं, वे हमारे आवाहन पर हमारी रक्षा करें।

2. मनुस्मृति (3.68 से 70): गृहस्थ के लिए रोज़ के पाँच महायज्ञ बताए गए हैं, और उनमें तर्पण को सीधे पितृयज्ञ कहा गया है:

अध्यापनं ब्रह्मयज्ञः पितृयज्ञस्तु तर्पणम्।
होमो दैवो बलिर्भौतो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्॥

अर्थ: पढ़ना पढ़ाना ब्रह्मयज्ञ है, तर्पण पितृयज्ञ है, हवन देवयज्ञ है, बलि (पशु पक्षियों को अन्न) भूतयज्ञ है और अतिथि का सत्कार मनुष्ययज्ञ है।

3. भगवद्गीता (1.42): अर्जुन युद्ध से पहले चिंता करते हैं कि कुल नष्ट हुआ तो “पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः”, यानी पिंड और जल की क्रिया बंद होने से पितरों का पतन होता है। इससे पता चलता है कि महाभारत काल में पिंड और जल देने की परंपरा जीवन का हिस्सा थी।

4. गरुड़ पुराण (सारोद्धार, गीता प्रेस):

  • अध्याय 7, श्लोक 9: “पुन्नाम्नो नरकाद्यस्मात्पितरं त्रायते सुतः”, यानी जो “पुत्” नाम के नरक से पितरों की रक्षा करे, वही पुत्र है।
  • अध्याय 7, श्लोक 15: “प्रेतोऽपि परदत्तेन गतः स्वर्गम्”, यानी दूसरे के दिए हुए श्राद्ध से भी प्रेत को सद्गति मिली। (राजा बभ्रुवाहन की कथा)
  • अध्याय 13, श्लोक 113 से 115: गया में श्राद्ध करने वाले का जन्म सफल बताया गया है, और पितरों की यह गाथा दी गई है कि वे चाहते हैं उनके कुल में ऐसा कोई हो जो गया जाकर आदर से पिंड दे।
  • अध्याय 13, श्लोक 120: “तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पितृभक्तो भवेन्नरः”, यानी मनुष्य को पूरे प्रयत्न से पितृभक्त होना चाहिए, पितृभक्ति से इस लोक और परलोक दोनों में सुख है।

5. श्राद्ध की शुरुआत (महाभारत, अनुशासन पर्व): भीष्म युधिष्ठिर को बताते हैं (अनुशासन पर्व, अध्याय 91) कि अत्रि वंश में दत्तात्रेय के पुत्र महर्षि निमि ने अपने पुत्र श्रीमान् की मृत्यु के बाद सबसे पहले श्राद्ध किया। उन्हें डर था कि यह नया कर्म है, तब महर्षि अत्रि ने आकर बताया कि यह पितृयज्ञ ब्रह्मा जी का ही बताया हुआ है।

6. श्रीराम का पिंडदान (वाल्मीकि रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग 103, प्रचलित पाठ): वनवास में पिता दशरथ के देहांत का समाचार मिलने पर श्रीराम ने मंदाकिनी के तट पर इंगुदी के गूदे और बेर से पिंड बनाकर उन्हें जल और पिंड दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जो स्वयं खाता है, वही उसके पितरों का भी अन्न होता है।

7. सीता जी और फल्गु नदी (गया की स्थानीय परंपरा): गया में यह कथा प्रचलित है कि श्रीराम के लौटने में देर हुई तो सीता जी ने बालू के पिंड से दशरथ जी का पिंडदान किया, और गवाही से मुकरने पर फल्गु नदी को शाप दिया कि वह धरती के नीचे बहेगी। यह कथा गया की लोक परंपरा में है, वाल्मीकि रामायण में नहीं।

8. दानवीर कर्ण की कथा (लोक कथा): कहा जाता है कि स्वर्ग में कर्ण को भोजन की जगह सोना मिला, क्योंकि उन्होंने जीवन में अन्न और जल का दान नहीं किया था। तब उन्हें पंद्रह दिन धरती पर लौटकर पितरों को अन्न जल देने का अवसर मिला, और यही पितृ पक्ष बना। यह कथा बहुत प्रचलित है, पर महाभारत के मूल ग्रंथ में यह प्रसंग नहीं मिलता; इसे बाद की लोक कथा समझें।

पितृ पक्ष क्यों मनाया जाता है?

  • कृतज्ञता: जिनसे जीवन, नाम, संपत्ति और संस्कार मिले, उन्हें याद करना और धन्यवाद देना।
  • पितृ ऋण: शास्त्र मनुष्य पर तीन ऋण बताते हैं: देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। तर्पण में तीनों के लिए जल दिया जाता है।
  • परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति: मान्यता है कि श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर तृप्त होकर परिवार को आशीर्वाद देते हैं।
  • श्रद्धा ही मुख्य है: कर्मकाण्ड भास्कर कहता है कि सूक्ष्म शरीर को भोजन की भूख नहीं होती, “श्रद्धा ही इनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है”। और यह विधि “इतनी सरल एवं इतने कम ख़र्च की है कि निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी उसे आसानी से कर सकता है”।
  • करुणा और सेवा: गाय, कुत्ते, कौए, चींटी और ज़रूरतमंद को भोजन देना पितृ पक्ष का हिस्सा है। यह याद दिलाता है कि हमारा परिवार केवल हम तक सीमित नहीं।

ये धार्मिक मान्यताएँ हैं, जिन्हें विज्ञान की तरह सिद्ध नहीं किया जा सकता। पर पूर्वजों को याद करना, उनकी अच्छी आदतें आगे बढ़ाना और ज़रूरतमंद की मदद करना, इनका लाभ हर कोई अपने जीवन में देख सकता है।

श्राद्ध की तिथि कैसे चुनें?

  1. मृत्यु की तिथि देखें, तारीख़ नहीं: श्राद्ध उस हिंदू तिथि पर होता है जिस दिन व्यक्ति का देहांत हुआ था। जैसे किसी का देहांत किसी भी महीने की कृष्ण या शुक्ल पक्ष की पंचमी को हुआ, तो पितृ पक्ष की पंचमी को उनका श्राद्ध होगा।
  2. तारीख़ याद है, तिथि नहीं: उस दिन का पुराना पंचांग देखें, या Drik Panchang का “हिंदू श्राद्ध तिथि कैलकुलेटर” इस्तेमाल करें, जिसमें अंग्रेज़ी तारीख़ डालने पर तिथि निकल आती है।
  3. तिथि बिल्कुल याद नहीं: सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध करें। इसीलिए इसे सभी पितरों की अमावस्या कहते हैं।
  4. माता के लिए: बहुत से परिवार मातृ नवमी को माता और दिवंगत सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध करते हैं।
  5. दुर्घटना या अकाल मृत्यु: चतुर्दशी को श्राद्ध की परंपरा है।
  6. संन्यासी: द्वादशी को।
  7. तिथि छूट गई: सर्वपितृ अमावस्या को कर लें।

शक हो तो अपने कुल पुरोहित से या स्थानीय पंचांग से पक्का करें।

श्राद्ध, तर्पण, तिलांजलि और पिंडदान में अंतर

शब्दमतलबक्या दिया जाता हैकब
पितृ पक्षपितरों के स्मरण का समयभाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या
श्राद्धपितरों के लिए श्रद्धा से किया पूरा कर्मतर्पण, पिंड, भोजन, दान, सब मिलाकरमृत्यु तिथि पर, पितृ पक्ष में, बरसी पर
तर्पणजल देकर देवता, ऋषि और पितरों को तृप्त करनाजल, पितरों को तिल मिला जलरोज़, और श्राद्ध के अंग के रूप में
तिलांजलितिल मिले जल की अंजलिकाले तिल वाला जलपितृ तर्पण में
पिंडदानआटे या चावल के पिंड अर्पित करनाजौ या गेहूँ के आटे के पिंड, तिल, शहद, घी, दूधश्राद्ध में, तीर्थ पर
बरसी (वार्षिक श्राद्ध)मृत्यु की वर्षगाँठ पर श्राद्धएकोदिष्ट श्राद्धहर साल मृत्यु तिथि पर

यानी तर्पण श्राद्ध का एक हिस्सा है, पर रोज़ अलग से भी किया जाता है। पिंडदान भी श्राद्ध का हिस्सा है। तीनों आपस में जुड़े हैं, पर एक ही चीज़ के नाम नहीं।

तर्पण क्या है और रोज़ क्यों करें?

तर्पण शब्द “तृप्” धातु से बना है, जिसका अर्थ है तृप्त करना, संतुष्ट करना। तर्पण में अंजलि (दोनों हाथ जोड़कर बनी कटोरी) से जल देते हुए हर नाम के साथ “तृप्यताम्” (तृप्त हों) बोला जाता है।

नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 87) तर्पण का फल इस श्लोक से बताती है:

एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रीन् त्रीन् दद्याज्जलाञ्जलीन्।
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति॥

अर्थ: हर पितर को तिल मिले जल की तीन तीन अंजलि दे। इससे जन्म से अब तक किए पाप उसी समय नष्ट हो जाते हैं।

और तर्पण न करने के बारे में वहीं लिखा है: “अतर्पिताः शरीराद्रुधिरं पिबन्ति”, यानी बिना तर्पण के देवता और पितर शरीर का रक्त पीते हैं। किताब का निष्कर्ष है: “गृहस्थ मानव को प्रतिदिन तर्पण अवश्य करना चाहिये।” गृह्यसूत्र का वचन है “नित्यमेव स्नात्वाऽद्भिर्देवानृषींश्च तर्पयन्ति”, यानी रोज़ स्नान के बाद जल से देवताओं और ऋषियों का तर्पण करते हैं।

सबसे काम की बात पृष्ठ 157 पर है: जो लोग रोज़ का नित्य श्राद्ध नहीं कर सकते, उनका नित्य श्राद्ध रोज़ तर्पण करने से पूरा हो जाता है (“अपि वाऽऽपस्तत् पितृयज्ञः संतिष्ठेत्”)। यानी रोज़ के पाँच मिनट का तर्पण ही गृहस्थ का रोज़ का पितृयज्ञ है।

रोज़ तर्पण कैसे करें: 5 मिनट की छोटी विधि (शास्त्र के अनुसार)

घर के बरामदे में आसन पर बैठकर अंजलि से तांबे की थाली में जल देते व्यक्ति
घर में रोज़ का तर्पण (प्रतीकात्मक चित्र)

यह विधि नित्यकर्म पूजाप्रकाश की पूरी विधि का छोटा रूप है। इसमें हर हिस्से का क्रम वही है जो किताब में है (देव, ऋषि, फिर पितर), और हर मंत्र किताब का ही है। फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि नामों की लंबी सूची की जगह मुख्य नाम और सामूहिक आवाहन रखा गया है। जिस दिन समय हो, उस दिन नीचे दी पूरी विधि करें।

पहले से तैयार रखें: तांबे का लोटा भरकर जल, एक चौड़ी थाली या परात (जिसमें तर्पण का जल गिरेगा), कुश की पवित्री, थोड़े अक्षत (चावल), और एक गमछा।

रोज़ तर्पण कैसे करें: 5 मिनट की छोटी तर्पण विधि के 6 कदम
इन्फ़ोग्राफ़िक: रोज़ का तर्पण: 5 मिनट की विधि (Storyshala)

कदम 1: स्नान और पवित्री। स्नान करके साफ़ कपड़े पहनें। आसन पर बैठें। दाहिने हाथ की अनामिका (रिंग फ़िंगर) में दो कुश की और बाएँ हाथ की अनामिका में तीन कुश की पवित्री (अँगूठी) पहनें। किताब कहती है कि बिना कुश के केवल हाथ से पितृ तर्पण नहीं करना चाहिए।

कदम 2: पूर्व की ओर मुँह, संकल्प। जनेऊ हो तो सामान्य स्थिति में, यानी बाएँ कंधे पर (इसे सव्य कहते हैं)। हाथ में जल लेकर बोलें:

अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।

अर्थ: आज मैं वेद, स्मृति और पुराणों में बताए फल के लिए देवता, ऋषि, मनुष्य और पितरों का तर्पण करूँगा। संस्कृत कठिन लगे, तो अपने शब्दों में यही बात मन से कहें। जल थाली में छोड़ दें।

कदम 3: देव तर्पण। लोटे के जल में थोड़े चावल डालें। दाहिना घुटना ज़मीन पर रखकर बैठें। अंजलि में जल लेकर उँगलियों के आगे के भाग से (इसे देवतीर्थ कहते हैं) थाली में गिराएँ, हर नाम पर एक अंजलि:

ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्।

कदम 4: ऋषि तर्पण। उसी तरह, देवतीर्थ से एक अंजलि:

ॐ मरीच्यादि दशऋषयः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।

कदम 5: पितृ तर्पण। अब दक्षिण की ओर मुँह करें। जनेऊ को दाहिने कंधे पर, बाएँ हाथ के नीचे कर लें (इसे अपसव्य कहते हैं)। जनेऊ न हो तो गमछा दाहिने कंधे पर रखें। बायाँ घुटना ज़मीन पर रखें। कुश को बीच से मोड़कर अँगूठे और तर्जनी (पहली उँगली) के बीच पकड़ें। पितृ पक्ष, अमावस्या या संक्रांति का दिन हो, तो जल में काले तिल डालें।

पहले हाथ जोड़कर पितरों का आवाहन करें:

ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्।

अर्थ: मेरे पितर आएँ और यह जलांजलि ग्रहण करें। (नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार, वेद मंत्रों का शुद्ध उच्चारण संभव न हो, तो यही वाक्य बोलकर आवाहन करें।)

फिर हर दिवंगत पितर के लिए अंजलि में जल लेकर अँगूठे और तर्जनी के बीच से (इसे पितृतीर्थ कहते हैं) तीन बार जल गिराएँ, और हर बार यह वाक्य बोलें:

पिता के लिए: (गोत्र का नाम) गोत्रः अस्मत्पिता (पिता का नाम) शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः।
माता के लिए: (गोत्र का नाम) गोत्रा अस्मन्माता (माता का नाम) देवी वसुरूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः।

अर्थ: मेरे पिता (या माता), जो इस गोत्र के थे, यह तिल मिला जल ग्रहण कर तृप्त हों, उन्हें स्वधा और नमस्कार। जिस दिन जल में तिल न हो, उस दिन “तिलोदकं” की जगह “जलं” बोलें। दादा के लिए “अस्मत्पितामहः … रुद्ररूपः” और परदादा के लिए “अस्मत्प्रपितामहः … आदित्यरूपः” बोला जाता है। ब्राह्मण के नाम के साथ “शर्मा”, क्षत्रिय के साथ “वर्मा” और वैश्य के साथ “गुप्त” बोलने की परंपरा है; यह न पता हो तो केवल नाम बोलें।

कदम 6: सभी पितरों के लिए, फिर समर्पण। जिन पितरों के नाम याद नहीं, उन सबके लिए पितृतीर्थ से तीन अंजलि यह श्लोक पढ़कर दें:

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥

अर्थ: ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक, देवता, ऋषि, पितर और मनुष्य, और माता और नाना की ओर के सभी पितर तृप्त हों।

अंत में जनेऊ फिर बाएँ कंधे पर कर लें (सव्य), पूर्व की ओर मुँह करें और हाथ जोड़कर तर्पण भगवान को अर्पित करें:

अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाख्येन कर्मणा भगवान् पितृस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयतां न मम।

अर्थ: अपनी शक्ति के अनुसार किए इस तर्पण से पितृरूप भगवान वासुदेव प्रसन्न हों; यह मेरा नहीं, उन्हीं का है।

तर्पण का जल कहाँ डालें: थाली या परात में इकट्ठा हुआ जल नाली में न बहाएँ। उसे किसी पेड़, पौधे या पीपल की जड़ में डाल दें। नदी पर तर्पण कर रहे हों, तो अंजलि सीधे नदी के जल में डालें।

तर्पण के लिए क्या चाहिए: सामग्री की सूची

सफ़ेद कटोरी में रखे काले तिल
पितृ तर्पण में काले तिल मिला जल दिया जाता है

रोज़ के छोटे तर्पण के लिए:

पात्र का नियम: नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 88) के अनुसार सोना, चाँदी, तांबा और काँसा के पात्र पितरों के तर्पण में अच्छे माने गए हैं, और मिट्टी और लोहे के पात्र वर्जित हैं। कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि जिसमें जल गिराया जाए, वह ऊँचे किनारे की थाली, परात, पीतल या स्टील का बड़ा बर्तन भी चल सकता है।

कुश किस काम आता है: किताब के अनुसार कुश के आगे के भाग से देवताओं का, बीच से मनुष्यों का, और मोड़कर जड़ और आगे के भाग से पितरों का तर्पण किया जाता है।

श्राद्ध के दिन अतिरिक्त सामग्री (कर्मकाण्ड भास्कर): पिंड के लिए लगभग एक पाव गुँथा हुआ जौ का आटा (न मिले तो गेहूँ के आटे में जौ और तिल मिलाकर), पत्तल या केले के पत्ते, थोड़ा दूध, दही और शहद; पंचबलि के लिए भोजन, उड़द की दाल के बड़े और दही; फूल, चंदन, दीपक, धूप।

तिल कब डालें और कब नहीं

यह बात बहुत लोग नहीं जानते। नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 88) के अनुसार:

  • तिल नहीं: सप्तमी, रविवार, शुक्रवार, जन्मदिन, नंदा तिथियाँ (प्रतिपदा, षष्ठी, एकादशी), कृत्तिका, मघा और भरणी नक्षत्र के दिन तिल मिले जल से तर्पण न करें। और घर में सामान्य दिनों में तिल वाला तर्पण न करें।
  • तिल ज़रूर: ग्रहण, पितृ श्राद्ध, व्यतीपात योग, अमावस्या और संक्रांति के दिन, ऊपर का निषेध होने पर भी तिल से तर्पण करें।

यानी रोज़ घर में सादे जल से तर्पण करें, और पितृ पक्ष, श्राद्ध के दिन और अमावस्या को तिल डालें। पितृ पक्ष के श्राद्ध पितृ श्राद्ध ही हैं, इसलिए उन दिनों तिल का प्रयोग ठीक है।

तर्पण के प्रकार: 6 तर्पण, उनकी दिशा और नियम

दोनों किताबें तर्पण को छह भागों में बाँटती हैं। हर भाग की दिशा, जनेऊ की स्थिति, हाथ का हिस्सा (तीर्थ) और अंजलि की गिनती अलग है:

तर्पणकिसके लिएमुँहजनेऊजल मेंतीर्थ (हाथ का हिस्सा)अंजलि
देव तर्पणब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और सभी देव शक्तियाँपूर्वसव्य (बाएँ कंधे पर)चावलदेवतीर्थ: उँगलियों का अगला भाग1-1
ऋषि तर्पणमरीचि, अत्रि, अंगिरा आदि दस ऋषिपूर्वसव्यचावलदेवतीर्थ1-1
दिव्य मनुष्य तर्पणसनक, सनंदन, सनातन, कपिल आदिउत्तरनिवीत (माला की तरह गले में)जौप्राजापत्य तीर्थ: छोटी उँगली की जड़2-2
दिव्य पितृ तर्पणकव्यवाडनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निष्वात्त, सोमप, बर्हिषद पितरदक्षिणअपसव्य (दाहिने कंधे पर)काले तिलपितृतीर्थ: अँगूठे और तर्जनी के बीच3-3
यम तर्पणयम के 14 नामदक्षिणअपसव्यकाले तिलपितृतीर्थ3-3
मनुष्य पितृ तर्पणअपने दिवंगत परिजनदक्षिणअपसव्यकाले तिलपितृतीर्थ3-3, बाक़ी संबंधियों को 1-1
तर्पण विधि में देवतीर्थ, प्राजापत्य तीर्थ और पितृतीर्थ: हाथ से जल कैसे दें
इन्फ़ोग्राफ़िक: तर्पण में हाथ का कौन सा हिस्सा (Storyshala)

जनेऊ की तीन स्थितियाँ: सामान्य रूप से बाएँ कंधे पर और दाहिने हाथ के नीचे को सव्य कहते हैं। माला की तरह गले में सीधा लटकाने को निवीत (कंठी) कहते हैं। दाहिने कंधे पर और बाएँ हाथ के नीचे को अपसव्य कहते हैं। जिनके पास जनेऊ नहीं है, वे गमछा (उत्तरीय) इसी तरह रखकर तर्पण करें, यह नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 92) में लिखा है।

अवसर के हिसाब से तर्पण: रोज़ स्नान के बाद का नित्य तर्पण; ब्रह्मयज्ञ के बाद का तर्पण; और श्राद्ध के अंग के रूप में किया जाने वाला तर्पण। विधि लगभग एक ही है, फ़र्क तिल और श्राद्ध के बाक़ी कर्मों का है।

एक सावधानी: कई जगह “श्राद्ध के 12 प्रकार” लिखे मिलते हैं। वे श्राद्ध के प्रकार हैं, तर्पण के नहीं। दोनों को मिलाएँ नहीं।

Pitru Paksha Tarpan Vidhi: तर्पण के मंत्र और पूरी शास्त्रीय विधि

यह गीता प्रेस की नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 89 से 100) की पूरी विधि है। पितृ पक्ष, अमावस्या या जिस दिन समय हो, इसे करें। हर हिस्से की दिशा और नियम ऊपर की तालिका में हैं।

1. पवित्री और संकल्प: गायत्री मंत्र से शिखा बाँधें, तिलक लगाएँ, कुश की पवित्री पहनें। हाथ में तीन कुश, जौ, अक्षत और जल लेकर संकल्प करें: “अद्य श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये।”

2. आवाहन: तांबे के पात्र में जल और चावल डालें, तीन कुश पूर्व की ओर नोक करके रखें, पात्र दाहिने हाथ में लेकर बाएँ से ढकें और पढ़ें:

ब्रह्मादयः सुराः सर्वे ऋषयः सनकादयः।
आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदरवर्तिनः॥

3. देव तर्पण (पूर्व, सव्य, दाहिना घुटना ज़मीन पर, 1-1 अंजलि, देवतीर्थ): हर नाम के बाद एक अंजलि:

ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्। ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्।

नदी में तर्पण करें, तो दोनों हाथ मिलाकर जल भरें और गाय के सींग जितना ऊँचा उठाकर नदी के जल में ही अंजलि डालें।

4. ऋषि तर्पण (उसी तरह, 1-1 अंजलि):

ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ॐ पुलहस्तृप्यताम्। ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्।

5. दिव्य मनुष्य तर्पण (उत्तर, निवीत, सीधे बैठकर, जल में जौ, कुश उत्तर की ओर, 2-2 अंजलि, प्राजापत्य तीर्थ):

ॐ सनकस्तृप्यताम् (2)। ॐ सनन्दनस्तृप्यताम् (2)। ॐ सनातनस्तृप्यताम् (2)। ॐ कपिलस्तृप्यताम् (2)। ॐ आसुरिस्तृप्यताम् (2)। ॐ वोढुस्तृप्यताम् (2)। ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम् (2)।

6. दिव्य पितृ तर्पण (दक्षिण, अपसव्य, बायाँ घुटना ज़मीन पर, जल में काले तिल, कुश मोड़कर, 3-3 अंजलि, पितृतीर्थ):

ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः (3)। ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः (3)। ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः (3)। ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः (3)। ॐ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्यः स्वधा नमः (3)। ॐ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्यः स्वधा नमः (3)। ॐ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं तेभ्यः स्वधा नमः (3)।

7. यम तर्पण (पितृतीर्थ से, दक्षिण की ओर, 3-3 अंजलि):

ॐ यमाय नमः (3)। ॐ धर्मराजाय नमः (3)। ॐ मृत्यवे नमः (3)। ॐ अन्तकाय नमः (3)। ॐ वैवस्वताय नमः (3)। ॐ कालाय नमः (3)। ॐ सर्वभूतक्षयाय नमः (3)। ॐ औदुम्बराय नमः (3)। ॐ दध्नाय नमः (3)। ॐ नीलाय नमः (3)। ॐ परमेष्ठिने नमः (3)। ॐ वृकोदराय नमः (3)। ॐ चित्राय नमः (3)। ॐ चित्रगुप्ताय नमः (3)।

(ये चौदह नाम मत्स्य पुराण 102.23 से 24 में हैं।)

8. मनुष्य पितृ तर्पण: हाथ जोड़कर यजुर्वेद (19.70 और 19.58) के मंत्रों से आवाहन करें:

ॐ उशन्तस्त्वा नि धीमह्युशन्तः समिधीमहि। उशन्नुशत आ वह पितॄन् हविषे अत्तवे॥
आ यन्तु नः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः। अस्मिन् यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधि ब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥

शुद्ध उच्चारण न हो सके तो “ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्” बोलें। फिर तीन तीन अंजलि:

किसके लिएवाक्य
पिता(गोत्र) गोत्रः अस्मत्पिता (नाम) शर्मा वसुरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः (3)
दादा(गोत्र) गोत्रः अस्मत्पितामहः (नाम) शर्मा रुद्ररूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः (3)
परदादा(गोत्र) गोत्रः अस्मत्प्रपितामहः (नाम) शर्मा आदित्यरूपस्तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्मै स्वधा नमः (3)
माता(गोत्र) गोत्रा अस्मन्माता (नाम) देवी वसुरूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः (3)
दादी(गोत्र) गोत्रा अस्मत्पितामही (नाम) देवी रुद्ररूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः (3)
परदादी(गोत्र) गोत्रा अस्मत्प्रपितामही (नाम) देवी आदित्यरूपा तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः (3)
सौतेली माँ (यदि दिवंगत)(गोत्र) गोत्रा अस्मत्सापत्नमाता (नाम) देवी तृप्यतामिदं तिलोदकं तस्यै स्वधा नमः (3)

कर्मकाण्ड भास्कर में माता के लिए “गायत्रीरूपा”, दादी के लिए “सावित्रीरूपा” और परदादी के लिए “लक्ष्मीरूपा” बोला जाता है। यह परंपरा का अंतर है; अपने परिवार में जो चलता हो, वही बोलें।

इसके बाद पितृतीर्थ से जलधारा छोड़ते हुए ये मंत्र पढ़े जाते हैं (जिन्हें वेद मंत्र न आते हों, वे किसी जानकार से पढ़वा सकते हैं या छोड़ भी सकते हैं, ऐसा किताब में ही लिखा है): उदीरतामवर… (यजु. 19.49), अङ्गिरसो नः पितरो… (19.50), आ यन्तु नः पितरः… (19.58), ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतम्। स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्॥ (2.34), पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः… (19.36), ये चेह पितरो… (19.67), मधु वाता ऋतायते… (13.27 से 29), और अंत में “ॐ मधु मधु मधु तृप्यध्वम् तृप्यध्वम् तृप्यध्वम्”।

9. द्वितीय गोत्र तर्पण (ननिहाल): इसी तरह नाना (अस्मन्मातामहः, वसुरूप), परनाना (अस्मत्प्रमातामहः, रुद्ररूप), बूढ़े परनाना (अस्मद्वृद्धप्रमातामहः, आदित्यरूप), नानी, परनानी और बूढ़ी परनानी को तीन तीन अंजलि, उनके अपने गोत्र के साथ।

10. पत्नी आदि का तर्पण: पत्नी, बेटा, बेटी, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, बुआ, मौसी, बहन, सास, ससुर, गुरु, गुरुपत्नी, शिष्य और मित्र, जो भी दिवंगत हों, उन्हें उनके गोत्र और नाम से एक एक अंजलि। कर्मकाण्ड भास्कर में पति (अस्मद् पतिः) के लिए भी यही वाक्य है, यानी पत्नी अपने दिवंगत पति का तर्पण कर सकती है।

11. सभी जीवों के लिए (सव्य, पूर्व की ओर, देवतीर्थ से):

देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसाः। पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥
जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः। तृप्तिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥

12. भूले बिसरे पितरों के लिए (अपसव्य, दक्षिण की ओर, पितृतीर्थ से):

नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः। तेषामाप्यायनायैतद्दीयते सलिलं मया॥
येऽबान्धवा बान्धवाश्च येऽन्यजन्मनि बान्धवाः। ते तृप्तिमखिला यान्तु यश्चास्मत्तोऽभिवाञ्छति॥ (पद्म पुराण)
ये मे कुले लुप्तपिण्डाः पुत्रदारविवर्जिताः। तेषां हि दत्तमक्षय्यमिदमस्तु तिलोदकम्॥
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥

अर्थ: जो नरकों और कष्टों में हैं, जो इस जन्म या पिछले जन्मों के बंधु हैं या बंधु नहीं हैं, जिनके कुल में पिंड देने वाला कोई नहीं रहा, और करोड़ों पीढ़ियों के सभी पितर, सब इस जल से तृप्त हों।

13. वस्त्र निष्पीडन: गमछे को चार तह करके उसमें तिल और जल डालें और जल के बाहर अपनी बायीं ओर ज़मीन पर निचोड़ते हुए पढ़ें: “ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृताः। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥” (देवी भागवत)। यह उन पितरों के लिए है जो बिना संतान के चले गए। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार घर में किसी पुरुष का वार्षिक श्राद्ध हो, तो उस दिन वस्त्र निष्पीडन नहीं करना चाहिए।

14. भीष्म तर्पण: पितृतीर्थ से: “भीष्मः शान्तनवो वीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः। आभिरद्भिरवाप्नोतु पुत्रपौत्रोचितां क्रियाम्॥” भीष्म पितामह ने विवाह नहीं किया था, इसलिए हर तर्पण करने वाला उन्हें भी जल देता है।

15. सूर्य को अर्घ्य: पात्र धोकर, सव्य होकर, जल में फूल और चंदन डालकर: “नमो विवस्वते ब्रह्मन् भास्वते विष्णुतेजसे। जगत्सवित्रे शुचये सवित्रे कर्मदायिने॥” फिर दसों दिशाओं को नमस्कार करें।

16. समर्पण: “अनेन यथाशक्तिकृतेन देवर्षिमनुष्यपितृतर्पणाख्येन कर्मणा भगवान् पितृस्वरूपी जनार्दनवासुदेवः प्रीयतां न मम। ॐ तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तु।” और अंत में तीन बार “ॐ विष्णवे नमः”।

पितृ पक्ष में तर्पण कैसे करें?

नदी में खड़े होकर लोटे से जल अर्पित करते व्यक्ति
नदी में तर्पण करते समय अंजलि सीधे नदी के जल में डाली जाती है
  • रोज़ और तिथि पर: पितृ पक्ष के सोलह दिन रोज़ तर्पण करें, और जिस दिन अपने पितर की तिथि हो, उस दिन पूरा श्राद्ध करें।
  • तिल ज़रूर: पितृ पक्ष में जल में काले तिल डालें।
  • समय: तर्पण सुबह स्नान के बाद करें। श्राद्ध का मुख्य समय दोपहर का कुतुप मुहूर्त (लगभग 11:45 से 12:35) और अपराह्न काल माना जाता है।
  • क्रम: पहले अपने कुल (पिता की ओर के) पितर, फिर ननिहाल, फिर बाक़ी संबंधी।
  • घर या नदी: घर में थाली या परात में तर्पण करें; नदी पर हों, तो जल में खड़े होकर या किनारे बैठकर अंजलि सीधे नदी में डालें।
  • जटिल कर्म: पिंडदान और पूरा श्राद्ध पहली बार कर रहे हों, तो कुल पुरोहित या किसी जानकार की मदद लें।

घर पर तर्पण करें या नदी पर?

घर परनदी या तीर्थ पर
जल कहाँ गिरेथाली या परात में, बाद में पेड़ पौधे की जड़ मेंसीधे नदी के जल में
अंजलि कैसेबैठकर, थाली के ऊपरदोनों हाथ मिलाकर, गाय के सींग जितना ऊँचा उठाकर जल में छोड़ें (नित्यकर्म पूजाप्रकाश)
तिलपितृ पक्ष, अमावस्या, संक्रांति, ग्रहण और श्राद्ध के दिनतीर्थ पर पितृकर्म में तिल का प्रयोग होता है
किसके लिए आसानरोज़ के तर्पण के लिएपितृ पक्ष, अमावस्या, गया और काशी जैसे तीर्थ

दोनों जगह विधि वही है। रोज़ का तर्पण घर पर ही सबसे व्यावहारिक है। नदी पर हों तो पूजा का सामान, फूल या प्लास्टिक पानी में न डालें, केवल जल और तिल।

हर अमावस्या पर तर्पण

पितृ पक्ष के बाहर भी हर महीने की अमावस्या पितरों का दिन मानी जाती है। नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार अमावस्या को घर में भी तिल वाला तर्पण करना चाहिए। जो लोग रोज़ तर्पण नहीं कर पाते, वे कम से कम हर अमावस्या को ऊपर की छोटी विधि से तर्पण करें, और उस दिन किसी ज़रूरतमंद को भोजन दें। हर महीने की अमावस्या की तारीख़ Drik Panchang की अमावस्या सूची या किसी भी पंचांग में देख सकते हैं।

श्राद्ध की पूरी विधि (कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार)

कर्मकाण्ड भास्कर (पृष्ठ 297 से 318) में श्राद्ध को पंचयज्ञ सहित करने का क्रम दिया गया है:

  1. तैयारी: घर साफ़ करें। पूजा की वेदी पर दीपक, कलश, यम के लिए चावल की छोटी ढेरी और पितरों के आवाहन के लिए तिल की छोटी ढेरी रखें।
  2. षट्कर्म और संकल्प: आचमन, शरीर और आसन की शुद्धि के बाद श्राद्ध का संकल्प: “… नामाहं … नामकमृतात्मनः … पितृणाद् आनृण्यार्थं सर्वेषां पितृणां शान्तितुष्टिनिमित्तं पंचयज्ञसहितं श्राद्धकर्म अहं करिष्ये।” (मैं पितृ ऋण से मुक्ति और सभी पितरों की शांति के लिए पंचयज्ञ सहित श्राद्ध करूँगा।)
  3. यम पूजन और पितृ आवाहन: “ॐ यमाय नमः” और “ॐ पितृभ्यो नमः। आवाहयामि, स्थापयामि, ध्यायामि।”
  4. तर्पण: ऊपर दी गई छह तर्पणों वाली पूरी विधि।
  5. ब्रह्मयज्ञ: सब परिजन बैठकर कम से कम पाँच मिनट गायत्री मंत्र का मन में जप करें, और उसका पुण्य दिवंगत आत्मा को अर्पित करें।
  6. देवयज्ञ: अपनी कोई एक बुरी आदत कुछ समय या हमेशा के लिए छोड़ने का संकल्प लें, और उसका पुण्य पितरों को अर्पित करें।
  7. पितृयज्ञ (पिंडदान): नीचे विधि दी है।
  8. भूतयज्ञ (पंचबलि): गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं और चींटियों के लिए भोजन के पाँच भाग।
  9. मनुष्ययज्ञ: ब्राह्मण, बुज़ुर्ग, कन्या या ज़रूरतमंद को भोजन और सामर्थ्य के अनुसार दान।
  10. नैवेद्य और समापन: दो थालियों में भोजन सजाएँ: पितरों का नैवेद्य किसी बुज़ुर्ग या पुरोहित को, देवों का नैवेद्य किसी कन्या को खिलाएँ। रात को श्राद्ध के स्थान पर दीपक रखें।

पूरा श्राद्ध न हो सके तो, सांकल्पिक श्राद्ध: नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 162) के अनुसार समय की कमी या किसी कारण से वार्षिक श्राद्ध पूरा न हो सके, तो सांकल्पिक श्राद्ध किया जा सकता है: पूर्व की ओर मुँह करके संकल्प, फिर पंचबलि, फिर अपसव्य होकर हाथ में तिल और जल लेकर भोजन पितरों को अर्पित करने का संकल्प, और अंत में यह प्रार्थना:

अन्नहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यद्भवेत्।
तत्सर्वमच्छिद्रमस्तु पित्रादीनां प्रसादतः॥

अर्थ: इसमें अन्न, क्रिया या विधि की जो भी कमी रह गई हो, पितरों की कृपा से वह सब पूर्ण हो जाए।

पिंडदान क्या है और कैसे करें?

पिंडदान में जल की जगह अन्न के पिंड (गोले) अर्पित किए जाते हैं। कर्मकाण्ड भास्कर कहती है कि जैसे तर्पण में जल से श्रद्धा दी जाती है, वैसे ही पिंडदान में अन्न से।

  • पिंड कैसे बनाएँ: जौ या गेहूँ के आटे में तिल, शहद, घी और दूध मिलाकर लगभग 50 ग्राम के पिंड बनाएँ।
  • कैसे रखें: पत्तल पर कुश बिछाते हुए पढ़ें: “ॐ कुशोऽसि कुश पुत्रोऽसि ब्रह्मणा निर्मितः पुरा। त्वय्यर्चितेऽर्चितः सोऽस्तु यस्याहं नाम कीर्तये॥” फिर दक्षिण की ओर मुँह करके, पिंड दाहिने हाथ में लेकर पितृतीर्थ से पत्तल पर रखें।
  • कितने पिंड: कर्मकाण्ड भास्कर में बारह पिंड हैं: छह तर्पण वर्गों के लिए छह, सातवाँ दिवंगत आत्मा के लिए, और पाँच उनके लिए जो निःसंतान गए, जिनका कुल समाप्त हो गया, जो गर्भ में ही चले गए, जो आग में जलकर मरे, और इस या पिछले जन्म के बंधु। एक व्यक्ति के लिए: “(गोत्र) गोत्रस्य अस्मद् (नाम) नाम्नो अक्षयतृप्त्यर्थं इदं पिण्डं तस्मै स्वधा।”
  • समर्पण की प्रार्थना:
ॐ आब्रह्मणो ये पितृवंशजाता मातुस्तथा वंशभवा मदीयाः।
वंशद्वये ये मम दासभूता भृत्यास्तथैवाश्रितसेवकाश्च॥
मित्राणि शिष्याः पशवश्च वृक्षाः दृष्टाश्च स्पृष्टाश्च कृतोपकाराः।
जन्मान्तरे ये मम संगताश्च तेषां स्वधा पिण्डमहं ददामि॥

अर्थ: पिता और माता के वंश के सभी लोग, दोनों वंशों के सेवक और आश्रित, मित्र, शिष्य, पशु, पेड़, और वे सब जिन्होंने कभी मेरा उपकार किया, या जो पिछले जन्मों में मेरे साथ थे, उन सबको मैं स्वधा के साथ यह पिंड देता हूँ।

  • पिंड पर दूध, दही, शहद: पिंडों पर क्रम से दूध, दही और शहद चढ़ाते हुए “ॐ दुग्धम् दुग्धम् दुग्धम् तृप्यध्वम्”, फिर दधि और मधु के लिए यही बोलें।
  • बाद में पिंड का क्या करें: पिंड गाय को खिलाएँ, पक्षियों के लिए किसी साफ़ जगह रखें, या मछलियों को डालें।

तीर्थों पर पिंडदान: गरुड़ पुराण गया में पिंडदान की बहुत महिमा बताता है। गया (बिहार) के अलावा काशी, प्रयागराज, हरिद्वार, बद्रीनाथ (ब्रह्मकपाल), उज्जैन, नाशिक और पुष्कर भी पितृकर्म के प्रसिद्ध तीर्थ हैं। हर तीर्थ की अपनी स्थानीय विधि है, जो वहाँ के पंडे या पुरोहित कराते हैं।

पंचबलि: गाय, कुत्ता, कौआ, देवता और चींटी

केले के पत्ते पर रखा भोजन खाते दो कौए
श्राद्ध पर कौओं को भोजन देना काकबलि कहलाता है (प्रतीकात्मक चित्र)

श्राद्ध के भोजन से पाँच भाग निकालकर पत्तों पर रखे जाते हैं। नित्यकर्म पूजाप्रकाश (पृष्ठ 153 से 154) के मंत्र:

बलिकहाँमंत्र
गोबलि (गाय)पत्ते पर, सव्यॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः। प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः॥ इदं गोभ्यो न मम।
श्वानबलि (कुत्ता)पत्ते पर, जनेऊ कंठीद्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवौ। ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ॥ इदं श्वभ्यां न मम।
काकबलि (कौआ)ज़मीन पर, अपसव्यॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा। वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम्॥ इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
देवादिबलिपत्ते पर, सव्यॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः। प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम्॥ इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
पिपीलिकादिबलि (चींटी)पत्ते परपिपीलिकाः कीटपतङ्गकाद्या बुभुक्षिताः कर्मनिबन्धबद्धाः। तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु॥ इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

मंत्र याद न हों तो: किताब में ही लिखा है कि केवल “गोभ्यो नमः”, “श्वभ्यां नमः”, “वायसेभ्यो नमः” जैसे नाम मंत्र बोलकर भी बलि दी जा सकती है। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार पंचबलि में उड़द की दाल के बड़े और दही रखने की परंपरा है।

सर्वपितृ अमावस्या (महालय अमावस्या)

अँधेरे में जलता मिट्टी का दीया
सर्वपितृ अमावस्या की शाम पितरों के लिए दीपक जलाने की परंपरा

पितृ पक्ष का आख़िरी दिन सबसे महत्वपूर्ण है। 2027 में यह बुधवार, 29 सितंबर को है।

  • किसके लिए: अमावस्या को दिवंगत लोगों के लिए, जिनकी मृत्यु तिथि याद नहीं उनके लिए, और जिनकी तिथि पर श्राद्ध छूट गया उनके लिए। इस दिन सभी पितरों का एक साथ श्राद्ध होता है।
  • क्या करें: सुबह तर्पण, दोपहर कुतुप मुहूर्त (दिल्ली में 11:47 से 12:35) में श्राद्ध और पिंडदान, पंचबलि, ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन और दान, शाम को दीपक।
  • पितृ मोक्ष का संकल्प: कर्मकाण्ड भास्कर (पृष्ठ 388) पितृ अमावस्या पर विसर्जन से पहले यह संकल्प बताती है कि मैं ईश्वर, प्रकृति, पितरों, परिजनों और आश्रितों के उपकारों के ऋण से मुक्ति के लिए पूरा पुरुषार्थ करूँगा।
  • जिनकी तिथि याद है: उनका श्राद्ध अपनी तिथि पर ही करना अच्छा है; अमावस्या का श्राद्ध उसके साथ और भी किया जा सकता है।

पूर्वी भारत में इसी दिन महालया होता है, और अगले दिन से शारदीय नवरात्रि शुरू होती है (2027 में घटस्थापना गुरुवार, 30 सितंबर को)। नवरात्रि की पूजा विधि यहाँ है: दुर्गा पूजा विधि।

माता की ओर के पितर: नाना नानी का तर्पण

तर्पण केवल पिता की ओर के पितरों का नहीं होता। दोनों किताबों में द्वितीय गोत्र तर्पण अलग से है, जिसमें नाना, परनाना, बूढ़े परनाना, नानी, परनानी और बूढ़ी परनानी को उनके (ननिहाल के) गोत्र के साथ तीन तीन अंजलि दी जाती है। कर्मकाण्ड भास्कर के अनुसार तर्पण में अपने परिवार, माता के परिवार और दादी के परिवार की तीन तीन पीढ़ियाँ आती हैं।

एक सुझाव: पितृ पक्ष से पहले परिवार के बुज़ुर्गों से बैठकर पूर्वजों के नाम, गोत्र और मृत्यु तिथियाँ एक कॉपी में लिख लें। यही आपका पारिवारिक वंशवृक्ष है, जो अगली पीढ़ी के भी काम आएगा।

तर्पण और श्राद्ध कौन कर सकता है? क्या महिलाएँ भी कर सकती हैं?

रोज़ का तर्पण हर गृहस्थ का कर्तव्य बताया गया है (मनुस्मृति का पितृयज्ञ), इसलिए घर का कोई भी सदस्य इसे कर सकता है। श्राद्ध परंपरा में सबसे पहले पुत्र करता है; पुत्र न हो तो पौत्र, प्रपौत्र, पत्नी, बेटी, भाई, भतीजा या परिवार का कोई और सदस्य कर सकता है। कोई भी न हो, तो शिष्य या मित्र भी श्राद्ध करा सकते हैं।

इस पर परंपराओं में अलग अलग मत हैं, इसलिए किसी एक मत को सबके लिए नियम नहीं बनाया जा सकता। किताबों और शास्त्रों में जो मिलता है:

  • कर्मकाण्ड भास्कर के तर्पण में पति (अस्मद् पतिः) के लिए भी वाक्य दिया गया है, यानी पत्नी द्वारा पति का तर्पण इसकी विधि में शामिल है।
  • नित्यकर्म पूजाप्रकाश कहती है कि जिनके पास जनेऊ नहीं, वे गमछे या उत्तरीय से तर्पण करें। जनेऊ न होने से तर्पण का अधिकार नहीं जाता।
  • गरुड़ पुराण (7.15) बताता है कि दूसरे के दिए श्राद्ध से भी प्रेत को सद्गति मिली। यानी पुत्र न हो, तो परिवार का कोई और भी श्राद्ध कर सकता है।
  • गया की परंपरा में सीता जी द्वारा पिंडदान की कथा प्रसिद्ध है।

बहुत से परिवारों में पुत्र न हो तो पत्नी, बेटी या बहू श्राद्ध और तर्पण करती हैं। अपने परिवार की परंपरा और कुल पुरोहित की सलाह से तय करें।

पितृ पक्ष में भोजन और आचरण के नियम

  • श्राद्ध का भोजन: सात्विक और घर का बना। खीर, पूड़ी, मौसमी सब्ज़ी, उड़द की दाल के बड़े और दही आम हैं। जो पकवान दिवंगत व्यक्ति को पसंद था, वह बनाने की भी परंपरा है।
  • जो नहीं खाया जाता (प्रचलित परंपरा): मांस, मछली, अंडा, शराब। बहुत से परिवार प्याज़ और लहसुन भी नहीं खाते। कई परिवारों में मसूर की दाल और बासी भोजन भी श्राद्ध में नहीं बनता। ये नियम परिवार और क्षेत्र के हिसाब से बदलते हैं।
  • आचरण: क्रोध, झगड़ा, झूठ और किसी का अपमान न करें। श्राद्ध का भाव श्रद्धा है, दिखावा नहीं।
  • खाने से पहले: श्राद्ध के दिन पहले पंचबलि और ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन, फिर परिवार भोजन करे।

पितृ पक्ष में दान और सेवा

  • अन्नदान: भूखे को भोजन, सबसे बड़ा दान माना गया है।
  • वस्त्र, दक्षिणा, उपयोगी सामान: सामर्थ्य के अनुसार।
  • जीवों को भोजन: गाय, कुत्ता, कौआ और चींटी (पंचबलि)।
  • किसे दें: नित्यकर्म पूजाप्रकाश कहती है कि दान सोच समझकर सत्पात्र (योग्य व्यक्ति) को देना चाहिए, और दया से दीन दुखियों को दिया हुआ भी फल देता है।
  • कर्ज़ लेकर नहीं: दान और श्राद्ध अपनी सामर्थ्य में करें। श्रद्धा से दी गई थोड़ी चीज़ भी पूरी मानी गई है।

किसी वृद्धाश्रम, अनाथालय या अस्पताल में दिवंगत माता पिता के नाम से भोजन या दवा का दान भी पितरों के प्रति श्रद्धा का सुंदर तरीका है।

पूरी विधि न हो सके तो क्या करें?

स्थितिक्या करें (स्रोत)
रोज़ समय नहींऊपर की 5 मिनट की छोटी विधि; रोज़ तर्पण से नित्य श्राद्ध की पूर्ति (नित्यकर्म, पृ. 157)
संस्कृत मंत्र नहीं आते“ॐ आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्तु जलाञ्जलिम्” और केवल नाम गोत्र वाला वाक्य (नित्यकर्म, पृ. 94)
वेद मंत्र नहीं आतेकिसी जानकार से पढ़वाएँ, या छोड़ दें (नित्यकर्म, पृ. 94)
जनेऊ नहींगमछे से (नित्यकर्म, पृ. 92)
पूरा श्राद्ध संभव नहींसांकल्पिक श्राद्ध और पंचबलि (नित्यकर्म, पृ. 162)
पंचबलि के मंत्र याद नहीं“गोभ्यो नमः” जैसे नाम मंत्र (नित्यकर्म, पृ. 153)
कुछ भी विधि न हो सकेकम से कम पाँच मिनट गायत्री जप और उसका पुण्य पितरों को अर्पित (कर्मकाण्ड भास्कर, पृ. 314)
तिथि याद नहीं या छूट गईसर्वपितृ अमावस्या
घर से दूर हैंजहाँ हैं, वहीं स्नान के बाद तर्पण; तीर्थ जाना ज़रूरी नहीं

पितृ पक्ष से जुड़ी आम ग़लतफ़हमियाँ

  1. श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान एक ही हैं: नहीं। तर्पण जल से, पिंडदान अन्न से, और श्राद्ध इन सबको मिलाकर पूरा कर्म है।
  2. हर तर्पण एक ही दिशा और एक ही तरह से होता है: नहीं। देवता पूर्व, दिव्य मनुष्य उत्तर और पितर दक्षिण की ओर, और अंजलि 1, 2 और 3 की।
  3. तर्पण केवल गया या नदी पर होता है: नहीं। घर में थाली या परात में भी होता है; किताबों में घर में तर्पण के नियम दिए गए हैं।
  4. हर दिन तिल डालें: नहीं। घर में सामान्य दिनों में तिल नहीं, केवल श्राद्ध, अमावस्या, संक्रांति और ग्रहण पर।
  5. हर बीमारी, घाटा या परेशानी पितृ दोष है: किसी भी परेशानी को सीधे पितृ दोष कहकर डराना ठीक नहीं। डॉक्टर, वकील या जानकार की सलाह की जगह केवल पूजा का भरोसा न करें, और डर दिखाकर बड़ी रक़म माँगने वालों से सावधान रहें।
  6. श्राद्ध केवल महँगा हो तो सफल: नहीं। कर्मकाण्ड भास्कर साफ़ कहती है कि यह विधि सबसे ग़रीब व्यक्ति भी कर सकता है; श्रद्धा मुख्य है।

संक्षेप में

पितृ पक्ष हमें याद दिलाता है कि हम अकेले नहीं, एक लंबी परंपरा की कड़ी हैं। तर्पण इसका सबसे सरल रूप है: रोज़ पाँच मिनट, एक लोटा जल, और पितरों का नाम। पितृ पक्ष में इसके साथ श्राद्ध, पिंडदान, पंचबलि और दान जुड़ जाते हैं। विधि अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय पंचांग के अनुसार चुनें। पर सबसे ज़रूरी है वह भाव, जो कर्मकाण्ड भास्कर बताती है: पितरों के उपकार याद करना, उनकी अच्छी बातें आगे बढ़ाना, और उनके अधूरे छोड़े काम पूरे करना।

विधि घर में रखने के लिए गीता प्रेस की नित्यकर्म पूजाप्रकाश और गरुड़ पुराण सारोद्धार दोनों सस्ती और प्रामाणिक किताबें हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पितृ पक्ष 2027 कब से कब तक है?

बुधवार 15 सितंबर 2027 (पूर्णिमा श्राद्ध) से बुधवार 29 सितंबर 2027 (सर्वपितृ अमावस्या) तक। प्रतिपदा का पहला श्राद्ध 16 सितंबर को है।

पितृ पक्ष कितने दिन का होता है?

पूर्णिमा श्राद्ध मिलाकर लगभग 16 दिन। किसी साल कोई तिथि घटने या बढ़ने से एक दिन कम या ज़्यादा हो सकता है।

क्या रोज़ पितरों को जल दे सकते हैं?

हाँ, और शास्त्र यही कहते हैं। नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार गृहस्थ को रोज़ तर्पण करना चाहिए, और रोज़ तर्पण से नित्य श्राद्ध भी पूरा हो जाता है। घर में रोज़ सादे जल से तर्पण करें।

रोज़ के तर्पण और पितृ पक्ष के तर्पण में क्या अंतर है?

विधि वही है। रोज़ के तर्पण में घर में तिल नहीं डाले जाते, और छोटी विधि भी चल जाती है। पितृ पक्ष में काले तिल डाले जाते हैं, पूरी विधि की जाती है, और तिथि के दिन श्राद्ध, पिंडदान और पंचबलि भी होते हैं।

तर्पण में काले तिल और कुश क्यों?

परंपरा में काले तिल पितरों के लिए पवित्र माने गए हैं, इसलिए पितृ तर्पण “तिलोदक” (तिल मिले जल) से होता है। कुश को पवित्र करने वाला माना जाता है; नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार बिना कुश के केवल हाथ से पितृ तर्पण नहीं करना चाहिए।

तर्पण कितने प्रकार के होते हैं?

छह: देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मनुष्य तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण और मनुष्य पितृ तर्पण। मनुष्य पितृ तर्पण में अपने कुल, ननिहाल और बाक़ी संबंधियों का तर्पण अलग अलग होता है।

क्या तर्पण घर पर कर सकते हैं?

हाँ। घर में एक थाली या परात में जल गिराते हुए तर्पण करें और बाद में वह जल किसी पेड़ पौधे में डाल दें। नदी या तीर्थ जाना ज़रूरी नहीं।

पिता जीवित हों तो तर्पण कैसे करें?

इस पर धर्मग्रंथों में मतभेद है। प्रचलित परंपरा में जिनके पिता जीवित हैं, वे देव और ऋषि तर्पण करते हैं, और अपने कुल के पितरों का तर्पण पिता करते हैं। यम और भीष्म तर्पण को कुछ ग्रंथ (जैसे निर्णयसिंधु) जीवित पिता वाले के लिए भी ठीक मानते हैं, कुछ नहीं। माता के देहांत जैसी स्थिति में क्या करना है, यह अपने कुल पुरोहित से पूछें।

पूर्वजों का नाम या गोत्र याद न हो तो क्या करें?

नाम याद न हो, तो “आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं … तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः” श्लोक से सभी पितरों को तीन अंजलि दें। गोत्र न पता हो, तो बहुत से क्षेत्रों में “कश्यप” गोत्र बोलने की परंपरा है, क्योंकि सब कश्यप ऋषि की संतान माने जाते हैं।

मृत्यु तिथि याद न हो तो किस दिन श्राद्ध करें?

सर्वपितृ अमावस्या को, जो 2027 में बुधवार 29 सितंबर है। अगर देहांत की अंग्रेज़ी तारीख़ याद है, तो पंचांग या Drik Panchang के श्राद्ध तिथि कैलकुलेटर से तिथि निकाल सकते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या और मातृ नवमी में क्या अंतर है?

मातृ नवमी (2027 में 24 सितंबर) पर माता और दिवंगत सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध होता है। सर्वपितृ अमावस्या पर सभी पितरों का, खासकर उनका जिनकी तिथि याद नहीं।

क्या श्राद्ध और पिंडदान दोनों ज़रूरी हैं?

पूरे श्राद्ध में तर्पण और पिंडदान दोनों होते हैं। पिंडदान संभव न हो, तो तर्पण, पंचबलि और भोजन दान के साथ सांकल्पिक श्राद्ध किया जा सकता है।

श्राद्ध की तिथि छूट जाए तो क्या करें?

सर्वपितृ अमावस्या को श्राद्ध कर लें। यह दिन इसीलिए है।

क्या तर्पण के लिए नदी या तीर्थ जाना ज़रूरी है?

नहीं। घर पर तर्पण पूरी तरह मान्य है। तीर्थ पर, खासकर गया में, पिंडदान की अलग महिमा गरुड़ पुराण में बताई गई है, पर वह ज़रूरी शर्त नहीं।

तर्पण किस समय करना चाहिए?

सुबह स्नान के बाद, आम तौर पर दोपहर से पहले। श्राद्ध का मुख्य समय दोपहर का कुतुप मुहूर्त और अपराह्न काल है।

श्राद्ध के 12 प्रकार कौन से हैं?

अलग अलग ग्रंथों में यह सूची थोड़ी बदलती है। सबसे प्रचलित सूची है: नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, सपिंडन, पार्वण, गोष्ठी, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा और पुष्टि श्राद्ध। स्कंद पुराण में भी बारह श्राद्ध गिनाए गए हैं, कुछ नामों के अंतर के साथ। ये श्राद्ध के प्रकार हैं; तर्पण के प्रकार छह हैं।

पितृ पक्ष में नए कपड़े, बाल कटवाना या शुभ काम कर सकते हैं?

बहुत से परिवारों में पितृ पक्ष में शादी, गृह प्रवेश, नई ख़रीदारी और बाल कटवाने से बचा जाता है, क्योंकि यह शोक और स्मरण का समय माना जाता है। यह परंपरा है, शास्त्र का कड़ा नियम नहीं; अपने परिवार की रीति मानें।

तर्पण में “स्वधा” क्यों बोलते हैं?

देवताओं को आहुति “स्वाहा” से और पितरों को “स्वधा” से दी जाती है। नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार पारस्कर गृह्यसूत्र के भाष्य में तर्पण में “स्वधा नमः” बोलने का विधान है।

स्रोत

  • नित्यकर्म पूजाप्रकाश, गीता प्रेस गोरखपुर: पंचमहायज्ञ (पृ. 83 से 84), तर्पण (पितृयज्ञ) पृ. 87 से 100, बलिवैश्वदेव और पंचबलि पृ. 149 से 154, नित्य श्राद्ध और सांकल्पिक श्राद्ध पृ. 156 से 162।
  • कर्मकाण्ड भास्कर, शान्तिकुञ्ज: मरणोत्तर संस्कार (श्राद्ध तर्पण) पृ. 295 से 321, पितृ अमावस्या पृ. 388।
  • गरुड़ पुराण सारोद्धार, गीता प्रेस: अध्याय 7 (श्लोक 9 से 15) और अध्याय 13 (श्लोक 112 से 120)।
  • मनुस्मृति 3.68 से 70; यजुर्वेद 19.49, 19.58, 19.70, 2.34; ऋग्वेद 10.15; भगवद्गीता 1.42; मत्स्य पुराण 102.23 से 24 (नित्यकर्म पूजाप्रकाश में दिए संदर्भ)।
  • पितृ पक्ष 2027 की तिथियाँ और मुहूर्त: Drik Panchang, नई दिल्ली, 26 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए।
  • दो लोक कथाएँ (कर्ण, और सीता जी और फल्गु नदी) लोक परंपरा के रूप में दी गई हैं।

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