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Top 50 Chanakya Niti in Hindi: आचार्य चाणक्य के अनमोल वचन

Chanakya Niti in Hindi: आचार्य चाणक्य ऐसे महान व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और बुद्धि के बल पर भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। वे कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ और प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं। सदियों पहले कही गई उनकी नीतियाँ आज भी उतनी ही काम की हैं। इस लेख में चाणक्य के 100 से ज़्यादा अनमोल वचन एक ही जगह, विषय के अनुसार दिए गए हैं, साथ में उनकी 10 सबसे काम की सीख विस्तार से।
आचार्य चाणक्य कौन थे?
आचार्य चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है, लगभग चौथी सदी ईसा पूर्व में हुए। वे प्राचीन विश्वविद्यालय तक्षशिला में आचार्य थे। उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य का मार्गदर्शन करके नंद वंश को हटाया और मौर्य साम्राज्य की नींव रखी। राजनीति और अर्थव्यवस्था पर लिखा गया प्रसिद्ध ग्रंथ अर्थशास्त्र उन्हीं का माना जाता है।
चाणक्य नीति (जिसे चाणक्य नीति दर्पण भी कहते हैं) उनके नाम से प्रसिद्ध श्लोकों का संग्रह है, जो सत्रह अध्यायों में बँटा है। इसमें जीवन, परिवार, मित्रता, धन, शिक्षा और व्यवहार के बारे में सीधी और व्यावहारिक बातें कही गई हैं।
चाणक्य की 10 सबसे काम की सीख
मूर्ख लोगों से कभी विवाद न करें
चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख लोगों से कभी बहस नहीं करनी चाहिए। मूर्ख के पास समझदारी नहीं होती, इसलिए उससे विवाद में नुकसान आपका ही होगा। ऐसे समय चुप रहिए और अपने विवेक से काम लीजिए।
अपनी कमज़ोरी किसी को न बताएँ
समय के साथ हम कई गहरे रिश्तों में बँध जाते हैं और उनमें अपनी कमज़ोरियाँ बता देते हैं, जो बाद में दूसरों तक भी पहुँच जाती हैं। हर इंसान की कोई न कोई कमज़ोरी होती है। चाणक्य कहते हैं कि अपनी कमज़ोरी को अपने मन में ही रखिए।
आपका एक दोष आपके सारे गुणों को ढक सकता है
भले ही आपमें बहुत से गुण हों और समाज में बड़ी इज़्ज़त हो, पर एक बड़ा दोष सब कुछ बिगाड़ सकता है। इसलिए खुद में झाँककर देखिए कि कोई ऐसा दोष तो नहीं, और हो तो उसे छोड़िए, वरना मेहनत से कमाई इज़्ज़त एक पल में मिट्टी में मिल सकती है।
धन को सोच समझकर ख़र्च करें
बहुत से लोग दिन भर मेहनत से कमाते हैं और शाम को व्यर्थ के शौक़ में उड़ा देते हैं। चाणक्य की यह बात याद रखिए: कुबेर भी अगर अपनी आय से ज़्यादा ख़र्च करेगा तो कंगाल हो जाएगा। धन कमाइए, बचाइए, और ज़रूरत पर ही ख़र्च कीजिए, क्योंकि समय कब पलट जाए, कोई नहीं जानता।
बदनामी से डरें
चाणक्य कहते हैं कि अपमान भरे जीवन से मृत्यु बेहतर है, क्योंकि मृत्यु का दुख एक पल का है, पर अपमान रोज़ चुभता है। ज़िंदगी में कोई ऐसा काम मत कीजिए जिससे उम्र भर बदनामी झेलनी पड़े। एक बार नाम ख़राब हो जाए, तो लोगों की नज़रों में पहले जैसी जगह वापस नहीं मिलती।
आलस्य को त्याग दें
सफल और असफल लोगों में सबसे बड़ा फ़र्क़ अक्सर आलस्य का होता है। जो काम एक व्यक्ति टालता रहता है, वही काम दूसरा मन लगाकर पूरा कर देता है। जीवन बेहतर बनाना है तो आलस्य छोड़कर परिश्रम करना सीखिए। चाणक्य के अनुसार आलसी मनुष्य का न वर्तमान होता है, न भविष्य।
जो आपकी बात ध्यान से न सुने, उस पर भरोसा न करें
कई लोग आपके साथ बैठते हैं, बातें करते हैं, पर जब आप कोई ज़रूरी बात कहते हैं तो उसे अनसुना कर देते हैं। ऐसे लोगों पर भरोसा करने से बचिए, और उन्हें सिर्फ़ वही बातें बताइए जो आप किसी से भी कह सकते हों।
अपने से बहुत कम या बहुत ज़्यादा हैसियत वालों से दोस्ती न करें
चाणक्य कहते हैं कि बराबरी की मित्रता ही टिकती है। जो आपसे बहुत कम हैसियत के हैं, वे अक्सर मदद की उम्मीद और फ़ायदे की नज़र से जुड़ते हैं। और जो बहुत ऊपर हैं, उनके साथ रहकर आप तुलना और हीनभावना में घिर सकते हैं। इसलिए मित्र अपने बराबर का चुनिए।
वर्तमान में जीना सीखें
चाणक्य कहते हैं कि बीते कल पर पछतावा और आने वाले कल की चिंता, दोनों बेकार हैं। समझदार व्यक्ति वर्तमान में जीता है। आपके पास न बीता हुआ कल है, न आने वाला, आपके पास सिर्फ़ आज है।
ख़ुश रहना है तो ज़रूरत से ज़्यादा मोह से दूर रहें
चाणक्य कहते हैं कि जिसे किसी से ज़रूरत से ज़्यादा मोह होता है, वह डर और चिंता में जीता है। बहुत से दुखों की जड़ यही मोह है। रिश्तों में प्रेम रखिए, पर ऐसा मोह नहीं जो आपको अपने लिए, अपने काम और अपनी तरक़्क़ी के लिए समय ही न निकालने दे।
एक ज़रूरी बात: चाणक्य नीति लगभग दो हज़ार साल से भी पुरानी है। इसके कुछ वचन, जैसे स्त्रियों, जातियों या कुल के बारे में, उस समय के समाज की सोच दिखाते हैं, उन्हें उसी संदर्भ में पढ़िए। पर विद्या, मेहनत, धन, मित्रता और व्यवहार पर चाणक्य की ज़्यादातर बातें आज भी उतनी ही सच्ची हैं।
चाणक्य के 100+ अनमोल वचन, विषय के अनुसार
विद्या और ज्ञान
1. “मनुष्य के सुनने पर बहुत कुछ निर्भर करता है। जैसी बातें वह सुनता है, उसके मन पर वैसा ही प्रभाव होता है। श्रवण शक्ति ही मनुष्य के नजरिए को बदलती है, सुनकर ही धर्म का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, सुनकर ही वह मोक्ष को प्राप्त करने की प्रेरणा पाता है अर्थात सब कुछ मनुष्य के सुनने पर निर्भर करता है।”
2. “विद्या को कामधेनु गाय के समान गुणवान माना गया है। यह अनायास फल देने वाली होती है। यह विदेश में एक भाई के समान सहारा देती है। यह एक प्रकार का ऐसा गुप्त धन है जिसका सदैव संचय करते रहना चाहिए। विद्या ही सर्वश्रेष्ठ आभूषण है, मित्र है, सखा है, बंधु है।”
3. “मनुष्य जीवन सीमित है लेकिन इसमें बहुत सारी समस्याएँ हैं। बहुत-सी बाधाएँ हैं, परंतु इसके बावजूद भी विद्वान पुरुष सार ग्रहण करते हैं। जिस प्रकार, शास्त्र अनगिनत हैं और विद्या प्राप्त करने की कोई सीमा नहीं है उसी प्रकार केवल सार ग्रहण करना ही विद्वानों का कार्य है। बिलकुल वैसे ही, जैसे हंस जल से केवल दूध ग्रहण कर लेते हैं।”
4. “यदि विष में भी अमृत है तो ऐसे विष का सेवन कर लेना चाहिए। यदि अपवित्र स्थान पर भी स्वर्ण गिरा हुआ है तो उसे उठा लेना चाहिए। नीच व्यक्ति के पास यदि विद्या है, तो उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। अगर दरिद्र परिवार से भी अपने कुल गोत्र से सुशील लड़की है तो उससे विवाह कर लेना चाहिए।”
5. “यदि अपना कमाया हुआ धन आप दूसरों को सौंप देंगे और कोई भी पुस्तक बिना ज्ञान अर्जन किए, बिना उसे पढ़े ही अपने पास रखे रहने देंगे, तो ये दोनों ही समय पड़ने पर काम में नहीं आएंगे अर्थात बिना पढ़ी गई पुस्तक की विद्या और दूसरों के हाथ में सौंपा गया अपना धन समय पड़ने पर, काम नहीं आते।”

6. “मनुष्य कितना ही बलवान, मनमोहक और कितने ही कुलीन परिवार से उत्पन्न क्यों ना हुआ हो, यदि वह विद्या हीन है, तो वह बिल्कुल वैसा ही है जैसे कोई फूल, बिना सुगंध के हो अर्थात विद्याहीन मनुष्य का कोई महत्त्व नहीं है।”

7. “श्रम और संचय बेहद आवश्यक है क्योंकि एक-एक बूंद संग्रह करके घड़ा भरा जा सकता है। उसी प्रकार व्यक्ति एक-एक बूंद का ज्ञान संग्रह करके विद्वान और संपन्न हो सकता है।”
8. “पानी पर तेल, एक नीच आदमी को बताया हुआ राज, एक लायक व्यक्ति को दिया हुआ दान और एक बुद्धिमान व्यक्ति को पढाया हुआ शास्त्रों का ज्ञान अपने स्वभाव के कारण तेजी से फैलते है।”
9. “जिसके पास में विद्या है वह शक्तिशाली है। निर्बुद्ध पुरुष के पास क्या शक्ति हो सकती है एक छोटा खरगोश भी चतुराई से मदमस्त हाथी को तालाब में गिरा देता है।”
मित्र, शत्रु और संगति
10. “मूर्ख व्यक्ति से हमेशा दूर रहना चाहिए। क्योंकि वह दो पैरों वाले जानवर के समान है। उसके साथ व्यवहार से हमेशा आप मुश्किल में पड़ सकते हैं। वह कभी भी आपको किसी मुश्किल में डाल सकता है कभी भी कुछ भी बोल सकता है। इसलिए मूर्खों का संग कभी भी नहीं करना चाहिए।”
11. “लोगों की प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर उन्हें वश में किया जा सकता है। लालची व्यक्ति को धन से वश में किया जा सकता है। अहंकारी व्यक्ति को हाथ जोड़कर वश में किया जा सकता है। मूर्ख व्यक्ति को मनमानी करने की छूट देकर और विद्वान को सच बोलकर वश में किया जा सकता है यानी मनुष्य की प्रवृत्ति के अनुसार व्यवहार करके उन्हें अपने अनुकूल बनाया जा सकता है।”
12. “जिस प्रकार मछली केवल देखकर, कछुवी ध्यान लगाकर और पक्षी केवल स्पर्श करके ही अपने बच्चों को पालते हैं, उसी प्रकार सज्जनों की संगति से ही सब लोग सुख पाते हैं और विकास की ओर अग्रसर होते हैं।”
13. “विपरीत स्वभाव वाले दो व्यक्तियों में कभी भी आपस में दोस्ती नहीं हो सकती। यदि ऐसा होता है तो यह मात्र दिखावा है। क्योंकि सांप की नेवले से, बकरी की बाघ से, हाथी की चींटी से और शेरनी की कुत्ते से, दोस्ती कभी भी नहीं हो सकती। उसी प्रकार सज्जन और दुर्जन में भी दोस्ती होना असंभव है। यदि ऐसा होता है या आपको दिखाई देता है, तो यह केवल दिखावा भर है।”
14. “संगत का असर अवश्य होता है। चाहे वह अच्छा हो या बुरा हो। उसी प्रकार जैसे आपके दोस्त हैं वैसे ही आपका भी व्यवहार बनता जाता है। समय पाकर आपके व्यवहार में भी वे सभी गुण या अवगुण आ जाते हैं जो आपके दोस्तों में हैं। इसलिए सदैव सोच समझकर दोस्त बनाने चाहिए।”
15. “ऐसे लोगों से कभी भी मित्रता नहीं करनी चाहिए, जिनमें आजीविका, भय, लज्जा, चतुराई और त्याग ये पांच प्रकार के गुण न हों, ऐसे लोगों से मित्रता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि ऐसी मित्रता खतरनाक साबित हो सकती है।”
16. “सांप के दांत में विष होता है। मक्खी के सिर में और बिच्छू की पूंछ में विष भरा रहता है परंतु कुटिल और दुष्ट व्यक्ति के सारे शरीर में ही विष व्याप्त रहता है इसलिए दुष्ट व्यक्ति से सदैव बचना चाहिए क्योंकि यह सर्वाधिक विषैला होता है।”
17. “मित्र चार प्रकार के होते हैं। परदेस में विद्या मित्र होती है। घर में स्त्री मित्र होती है। रोगियों के लिए औषधि मित्र होती है और मर गए व्यक्ति के लिए उसका धर्म और किए हुए कर्म ही मित्र का काम करते हैं।”
18. “सज्जनों की संगति मिले और अच्छी बातें करने को मिले, यही संसार रूपी वृक्ष के दो ऐसे फल हैं जो जीवन को सार्थक बनाते हैं।”
19. “ऐसा व्यक्ति, जो सामने तो आपकी प्रशंसा करता है, मधुर व्यवहार करता है और आपके मन को भाने वाली बातें करता है, प्रशंसा करता है, लेकिन मौका देख कर पीठ पीछे आप की बुराइयाँ करता है आपके काम बिगाड़ देता है, ऐसे मित्र का भूलकर भी साथ नहीं देना चाहिए। ऐसे व्यक्ति को मित्र मानना सर्वाधिक खतरनाक है। क्योंकि ऐसे मित्र दुश्मन से भी अधिक दुखदाई एवं खतरनाक होते हैं।”
20. “स्वार्थ के बल पर की हुई दोस्ती, हमेशा दुश्मनी का कारण बन जाती है। इसलिए विवेकी पुरुष को चाहिए कि वह हमेशा दोस्त बनाने से पहले उसे जांच परख ले तथा ख़ूब सोच विचार कर ले क्योंकि एक बार यदि दोस्ती गाढ़ी हो जाती है तो उसके बाद उसके परिणाम और दुष्परिणाम सामने आते हैं।”
21. “शत्रु को पराजित करने के लिए पहले हमला नहीं करना चाहिए बल्कि पहले उससे शांत तरीके से व्यवहार करना चाहिए और यदि वह विनम्रता से नहीं माने तो बल प्रयोग करना चाहिए।”
22. “यदि हम किसी से कुछ पाना चाहते है तो उससे ऐसे शब्द बोले जिससे वह प्रसन्न हो जाए, उसी प्रकार जैसे एक शिकारी मधुर गीत गाता है जब वह हिरन पर बाण चलाना चाहता है।”

23. “यदि आप शेर की गुफा में जाते हो तो आप को हाथी के माथे का मणि मिल सकता है। लेकिन यदि आप लोमड़ी जहाँ रहती है वहाँ जाते हो तो बछड़े की पूँछ या गधे की हड्डी के अलावा कुछ नहीं मिलेगा।”
24. “एक शक्तिशाली आदमी से उसकी बात मानकर समझौता करे, एक दुष्ट का प्रतिकार करे और जिनकी शक्ति आपकी शक्ति के बराबर है उनसे समझौता विनम्रता से या कठोरता से करे।”

25. “वे नीच लोग जो दूसरो की गुप्त खामियों को उजागर करते हुए फिरते है, उसी तरह नष्ट हो जाते है जिस तरह कोई साँप चींटियों के टीलों में जा कर मर जाता है।”
26. “एक बुरे मित्र पर तो कभी विश्वास ना करे। एक अच्छे मित्र पर भी विश्वास ना करें। क्योंकि यदि ऐसे लोग आपसे रुष्ट होते है तो आप के सभी राज से पर्दा खोल देंगे।”
27. “एक दुर्जन और एक सर्प में यह अंतर है कि साँप तभी डंक मारेगा जब उसकी जान को ख़तरा हो लेकिन दुर्जन पग-पग पर हानि पहुँचाने की कोशिश करेगा।”
धन, लक्ष्मी और संतोष
28. “संतान के बिना घर सूना होता है। भाइयों के बिना मनुष्य की राह सूनी होती है। मूर्ख का दिलो-दिमाग़ सूना होता है और निर्धन का तो सब कुछ सूना ही होता है अर्थात इस धरती पर निर्धन होना सबसे बड़ा अभिशाप है।”
29. “अपनी इच्छाओं के अनुरूप, किसी को भी सुख नहीं मिलता। संसार में सब कुछ विधि के विधान के अधीन है। सर्वत्र कामदेव का साम्राज्य है इसलिए मनुष्य को जो मिले, उसी में संतोष कर स्वयं को सुखी मानना चाहिए।”
30. “ऐसा व्यक्ति, जो सदैव मैले कुचैले वस्त्र धारण करता है, दांत साफ़ नहीं रखता, नित्य स्नान नहीं करता, बहुत अधिक भोजन करता है, कटु वचन बोलता है और सूर्योदय और सूर्यास्त के समय तक निद्रा मग्न रहता है, ऐसे व्यक्ति का साथ लक्ष्मी छोड़ देती है।”
31. “मनुष्य की इन 4 चीजों की भूख़ कभी नहीं मिट सकती। धन संपदा, जीवन, स्त्री और भोजन। इनका अधिक से अधिक भोग मनुष्य करना चाहता है, उसको जितना भी मिले, वह कम ही लगता है।”
32. “जहाँ मूर्खों की पूजा नहीं होती, जहाँ धन धान्य का भंडार सुरक्षित रहता है, जहाँ पति पत्नी में आपस में कलह क्लेश नहीं होता, ऐसी जगह पर साक्षात लक्ष्मी निवास करती है।”
33. “ऐसा धन, जो धर्म को त्याग करने से मिले, दुश्मन की शरण में जाने पर मिले या बहुत अधिक पीड़ा पाने पर मिले ऐसा धन, ना ही मिले तो ठीक।”
34. “निम्न श्रेणी के लोग केवल धन संपदा की इच्छा रखते हैं। मध्यम श्रेणी के लोग धन के साथ-साथ इज़्ज़त भी चाहते हैं। उच्च श्रेणी के लोग केवल प्रतिष्ठा, इज़्ज़त और मान चाहते हैं और इसे ही वे असल संपत्ति मानते हैं। इसलिए यह बात निश्चित है कि धन-संपत्ति से बढ़कर इज़्ज़त और प्रतिष्ठा है।”
35. “जिसे दौलत, अनाज और विद्या अर्जित करने में और भोजन करने में शर्म नहीं आती वह सुखी रहता है।”
परिवार, पत्नी और संतान
36. “अपनी पुत्री का विवाह हमेशा अपने से ऊंचे कुल में करना चाहिए। पुत्र को हर अवस्था में उच्च शिक्षा दिलवानी चाहिए। शत्रु को हमेशा उलझन में फंसा कर रखना चाहिए। मित्रो को धार्मिक कार्यों की तरफ़ उन्मुख करना चाहिए। योग्य व्यक्ति ये सब कार्य करके अपना जीवन सुखी बनाते हैं।”
37. “नीचे कुल की सेवा करना, गंदा खराब भोजन करना, क्लेश करने वाली स्त्री, बेवकूफ़ बेटा, विधवा स्त्री और गंदा पड़ोस, यह सब मनुष्य के लिए सदैव हानिकारक होते हैं और हमेशा उसे दुखी और मानसिक रूप से चिंतित रखते हैं। इन सब के कारण मनुष्य दारुण दुख पाता है।”
38. “संसार के दुखों से मनुष्य को तीन ही स्थानों पर कुछ आराम महसूस होता है वह हैं, अपनी संतान के पास, अपनी पत्नी के पास और सज्जन पुरुषों के साथ।:।”
39. “जिस धर्म में दया ना हो, ऐसे धर्म का त्याग उचित है। जो गुरु ज्ञानवान ना हो, ऐसे गुरु का त्याग उचित है। क्रूर, लड़ाकू और क्लेश करने वाली पत्नी का त्याग उचित है। स्नेह ना करने वाले भाइयों का त्याग उचित है, क्योंकि इन सब से दूर ना रहने पर व्यक्ति का जीवन नर्क के समान होता है।”
40. “जीवन में पांच व्यक्ति पिता के समान माने गए हैं। यज्ञोपवीत संस्कार कराने वाला, विद्या देने वाला, संकट में जान की रक्षा करने वाला, जन्मदाता और अन्नदाता। इस संसार में इन पांच व्यक्तियों का हमेशा ऋणी रहना चाहिए।”
41. “सर्वोत्तम पत्नी के क्या लक्षण है? ऐसी स्त्री, जो पवित्र रहती है, जो चतुराई से काम लेती है, पति के समक्ष प्यार प्रकट करती है, सच बोलती है और रति क्रीड़ा में दक्ष है। ऐसी स्त्री को अपनाना सर्वोत्तम है। ऐसी स्त्री ही पतिव्रता कहलाती है।”
42. “जिस व्यक्ति की पत्नी दुष्ट होती है, मित्र कुटिल होते हैं, बात-बात में जवाब देने वाले नौकर होते हैं, जिसके घर में विषैला सांप रहता है ऐसे व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है अर्थात ऐसा व्यक्ति कभी भी संकट में पड़ सकता है।”
43. “जिस व्यक्ति का पुत्र उसके वश में हो, पत्नी साथ निभाने वाली हो, कटु वचन ना बोलने वाली और पतिव्रता हो तथा परिवार के सदस्य संतोषी हो, जितना मिल जाए, उसी में संतोष करके निर्वाह कर लेते हो, ऐसे परिवार को स्वर्ग के समान सुख देने वाला बताया गया है और यही परिवार सुखी और उत्तम माना गया है।”

44. “संतान कच्ची मिट्टी के समान होती है, जैसा आप उसे आकार देना चाहेंगे, वैसा ही आप उसे आकार दे सकते हैं।”
45. “5 वर्ष तक अपने पुत्र को लाड़ दुलार करना चाहिए। 10 वर्ष तक उससे कठोरता का व्यवहार करना चाहिए और उसे जीवन के नियम कायदे समझाने चाहिए, उसे अनुशासन का पाठ पढ़ाना चाहिए। लेकिन जब वह 16 साल का हो जाए, तो उसके साथ मित्रता का व्यवहार करना चाहिए।”
46. “जो व्यक्ति पहले से ही इस बात का अनुमान लगा लेता है कि उसके परिवार के लिए क्या बेहतर है, क्या सही है, क्या ग़लत है, क्या शुभ है क्या अशुभ है और इस अनुमान के आधार पर ही वह निर्णय लेता है। वही व्यक्ति हमेशा सुखी रहता है और उसे दुखों का सामना नहीं करना पड़ता है। हर विषय पर बारीकी से विश्लेषण करके अपने परिवार के हित में निर्णय करता है। वही परिवारिक व्यक्ति कहलाता है।”
47. “जो व्यक्ति जैसा सेवन करता है, वैसे ही उसकी संतान पर प्रभाव होता है। सोना आग खाने से और चमकता है जबकि दीपक अंधेरे का सेवन करता है और कालिख को जन्म देता है।”
48. “जिस तरह सारा वन केवल एक ही पुष्प एवं सुगंध भरे वृक्ष से महक जाता है उसी तरह एक ही गुणवान पुत्र पूरे कुल का नाम बढ़ाता है।”
49. “सैकड़ों गुणरहित पुत्रों से अच्छा एक गुणी पुत्र है क्योंकि एक चन्द्रमा ही रात्रि के अन्धकार को भगाता है, असंख्य तारे यह काम नहीं करते।”

कर्म, समय और सफलता
50. “मनुष्य को अपने कर्मों का फल अवश्य मिलता है, क्योंकि उसके कर्मों के द्वारा ही उसकी नियति निर्मित हो जाती है। कर्मों के कारण ही वह मनुष्य योनि में पैदा होता है या संसार में भटकता रहता है। कर्मों के द्वारा ही वह मुक्त भी हो सकता है इसलिए मनुष्य को अपने कर्मों पर ध्यान देना चाहिए।”
51. “अपने मन की बात को कभी भी किसी से साझा नहीं करना चाहिए, हमेशा अपने मन की बात अपने ही मन में रखनी चाहिए और बाद में गुप्त ढंग से उस कार्य को अंजाम देना चाहिए। इसी से व्यक्ति को सफलता प्राप्त हो सकती है। गुप्त विचार को लोगों के साथ साझा करने पर आप कभी भी योजना किए गए कार्य में सफलता नहीं पा सकते।”
52. “अपनी शक्ति के जरिए, अपने सामर्थ्य के अनुसार मनुष्य कोई भी काम कर सकता है और उसके लिए कोई भी काम दुर्लभ नहीं है। व्यापारी के लिए कोई भी देश दूर नहीं होता, वह कहीं भी जाकर व्यापार कर सकता है। विद्वान के लिए कोई भी देश परदेश नहीं होता और जो मीठा बोलने वाले होते हैं, उनके लिए कोई पराया नहीं होता वे मीठा बोल कर सब को अपने वश में कर ही लेते हैं।”
53. “मनुष्य के लिए बेहद आवश्यक है कि वह बराबर प्रश्नों का उत्तर सोचता रहे मेरा समय कैसा है? मेरा मित्र कौन है? मेरा देश कौन-सा है? मैं क्या हूँ? मेरा हानि लाभ क्या है? मुझ में क्या शक्ति है? इन सवालों के बार-बार जवाब हमें लेकर सबक लेते रहना चाहिए।”
54. “भय से उस समय तक डरना चाहिए जब तक कि उससे सामना ना हो। लेकिन यदि भय सामने आ जाए तो निडर होकर उसका सामना करना चाहिए। यही पुरुष की सार्थकता है।”
55. “श्रेष्ठ कार्य करते हुए एक पल का भी जीवन सार्थक माना जाता है जबकि आचरण के विरुद्ध किए गए 100 साल का जीवन भी बेकार है।”
56. “जो मनुष्य परोपकार में संलग्न रहता है, उसके सभी कष्ट स्वतः ही मिट जाते हैं। उसे जीवन में हर क़दम पर सफलता व सुख संपत्ति प्राप्त होती है।”
57. “समय अपनी गति से निरंतर चलता रहता है और ना किसी के रोके यह रुक सका है और ना ही रुकेगा। इसलिए मनुष्य को समय का मूल्य पहचानना चाहिए क्योंकि समय की कद्र करने वाला व्यक्ति ही सफल हो सकता है।”
58. “प्रत्येक काम को करने से पहले, स्वयं से तीन सवाल करने चाहिए। यह कार्य मैं क्यों कर रहा हूँ? इस काम का क्या फल मुझे मिलेगा? और क्या इस कार्य में सफलता निश्चित है अथवा नहीं? यह सब बातें सोचने के बाद ही किसी भी कार्य को शुरू करना चाहिए।”
59. “बीत चुकी बात पर व्यर्थ सोच विचार करके पश्चाताप करते रहने में समय व्यतीत करना मूर्खों का काम है। इनसे कुछ लाभ हासिल नहीं होता। व्यक्ति को भूत व भविष्य की चिंता किए बिना वर्तमान पर ही विचार और चिंतन करना चाहिए।”
60. “इस दुनिया में महान वही है, जो स्वयं अपने बलबूते पर खड़ा है। दूसरों के सहारे जीवन जीने वाला व्यक्ति हमेशा छोटा ही रहता है, बिल्कुल वैसे ही, जैसे चंद्रमा सूर्य पर निर्भर है। इस कारण दिन में सूर्य के उदय होने पर चंद्रमा अपना तेज खो देता है।”
61. “हाथी का शरीर कितना विशाल है लेकिन एक छोटे से अंकुश से नियंत्रित हो जाता है। एक दिया घने अन्धकार का नाश करता है, क्या अँधेरे से दिया बड़ा है। एक कड़कती हुई बिजली एक पहाड़ को तोड़ देती है, क्या बिजली पहाड़ जितनी विशाल है। जी नहीं, वही बड़ा है जिसकी शक्ति छा जाती है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता की आकार कितना है।”
62. “वह चीज जो दूर दिखाई देती है, जो असंभव दिखाई देती है, जो हमारी पहुँच से बाहर दिखाई देती है, वह भी आसानी से हासिल हो सकती है यदि हम तप करते है। क्यों की तप से ऊपर कुछ नहीं।”
गुण, स्वभाव और व्यवहार
63. “अंधे कई प्रकार के होते हैं। कुछ लोग जन्म से अंधे होते हैं और आंखों से देखने में असमर्थ होते हैं। कुछ अंधे ऐसे भी होते हैं जिनके आंखें तो होती हैं, लेकिन उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता जैसे, कामवासना में अंधे हो गए व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। लालची व्यक्ति को लोभ में पड़कर कोई दोष नहीं दिखाई देता। इस कारण ऐसे लोगों को भी अंधे की श्रेणी में रखा गया है क्योंकि कामांध और मदांध व्यक्ति आँख रहते हुए भी अंधे ही हैं।”
64. “सोने की परीक्षा काटकर, घिसकर, पीटकर और तपा कर की जाती है और यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह खरा है या खोटा है। उसी प्रकार शील, त्याग, गुण और आचार आदि से मनुष्य को परखा जाता है कि वास्तव में वह क्या है?”
65. “कोयल देखने में सुंदर नहीं होती परंतु उसकी वाणी सबको मधुर लगती है और यही उसकी खूबसूरती है। उसी प्रकार स्त्री की सर्वोच्च सुंदरता उसका पतिव्रत धर्म है। पुरुष का सौंदर्य उसकी विद्या, उसके गुण और उसका क्षमा करने का स्वभाव होता है। कहने का अर्थ यह है कि किसी व्यक्ति के गुण ही शोभायमान होते हैं और यही उसका सबसे बड़ा सौंदर्य है।”
66. “अत्यंत सुंदर होने के कारण ही सीता का हरण हुआ था। अत्यंत गर्व के कारण ही रावण मारा गया था। अत्यधिक दान करने के कारण ही बलि को बंधन में रहना पड़ा था। इसलिए यह अटल तथ्य है कि अति हमेशा वर्जित है यानी हर किसी चीज की अति नुकसानदेह होती है।”
67. “सज्जन के गुण किसी भी दशा में समाप्त नहीं होते। जिस प्रकार सुगंधित चंदन वृक्ष, कट जाने पर भी अपनी सुगंध नहीं छोड़ते। हाथी बूढ़ा होने पर भी चंचल रहता है। गन्ने को कोल्हू में पेरे जाने पर भी वह मिठास नहीं छोड़ते। सोना आग में तपने के बावजूद भी अपनी चमक नहीं खोता। बिल्कुल उसी प्रकार सज्जन पुरुष (खानदानी व्यक्ति) किसी भी दशा में अपने गुणों का त्याग नहीं करते।”
68. “अपमान से भरी ज़िन्दगी से तो मृत्यु ही बेहतर है क्योंकि मरने की पीड़ा तो क्षणभर की होती है लेकिन अपमान की पीड़ा तो जीवन भर पल-पल सताती रहती है।”
69. “कामवासना के समान कोई दूसरा रोग नहीं है। अज्ञानता के समान कोई शत्रु नहीं है। क्रोध से बढ़कर कोई दूसरी अग्नि नहीं है। ज्ञान से बढ़कर कोई दूसरा गुरु नहीं है यह चारों सत्य अटल हैं।”
70. “केतकी में सांप निवास करते हैं। कुमुदनी कीचड़ में पैदा होती है। गुलाब के फूल में कांटे होते हैं फिर भी ये अपनी सुगंध के ही एक गुण के कारण (इतने अधिक दुर्गुण होने के बावजूद) सबके प्रिय हैं। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य का एक ही गुण उसके सभी दोषों को दूर कर देता है।”
71. “बिना बुलावे के किसी के घर जाना, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पड़ना भी अधम कार्य माने गए हैं।”
72. “दूर और पास का सम्बंध भावों से बंधा हुआ है। हर समय दूर रहने वाला व्यक्ति दूर रहकर भी पास होता है और हर समय पास रहने वाला व्यक्ति पास रहकर भी दूर ही रहता है।”
73. “मीठे वचन बोलने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे कभी भी कोई नुक़सान नहीं है बल्कि मीठे वचन सुनने से सभी जीव प्रसन्न ही होते हैं।”
74. “यजमान से दक्षिणा प्राप्त करके ब्राह्मण, गुरु से विद्या प्राप्त कर विद्यार्थी और जंगल में आग लगने पर हिरण उसे छोड़ कर चले जाते हैं। यह दुनिया स्वार्थ से भरी है सभी अपना-अपना मतलब पूरा होते ही सम्बंध विच्छेद कर देते हैं।”
75. “किसी भी व्यक्ति के ख़ानदान के बारे में, उसके व्यवहार से पता लगता है। देश का पता बोली से लगता है। प्रेम का पता आदर से और शरीर का पता भोजन से लगता है।”
76. “प्रत्येक जीव का अपना-अपना ही स्वभाव होता है और उसी के अनुरूप उसको ख़ुशी मिलती है। ब्राह्मण उत्तम भोजन पाकर प्रसन्न हो जाता है। बादल गरजने पर प्रसन्न हो जाते हैं। सज्जन, दूसरों को सुखी देखकर प्रसन्न होते हैं परंतु दुष्ट व कुटिल व्यक्ति हमेशा दूसरों को मुसीबत में देखकर ही प्रसन्न होते हैं। इसलिए हर एक व्यक्ति का अपना-अपना स्वभाव है, उसको वह कभी भी नहीं बदल सकता।”
77. “क्रोध करना, कड़वे वचन बोलना, अहंकार और घमंड करना, अपनों से दुश्मनी रखना ये चार लक्षण नरक वासियों के ही होते हैं। ऐसे लोग पृथ्वी पर राक्षस के समान हैं। हे प्रभु। इनसे हमारी रक्षा करें।”
78. “जो व्यक्ति गुणों से रहित है लेकिन जिसकी लोग सराहना करते है वह दुनिया में काबिल माना जा सकता है। लेकिन जो आदमी ख़ुद की ही डींगे हाँकता है वह अपने आप को दूसरे की नज़रों में गिराता है भले ही वह स्वर्ग का राजा इंद्र ही क्यों न हो।”
79. “जो दूसरे की पत्नी को अपनी माता मानता है, दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला, दूसरे के सुख दुःख को अपने सुख दुःख। उसी को सही दृष्टि प्राप्त है और वही विद्वान है।”
80. “अपने निकट सम्बंधियों का अपमान करने से जान जाती है। दूसरों का अपमान करने से दौलत जाती है। राजा का अपमान करने से सब कुछ जाता है। एक ब्राह्मण का अपमान करने से कुल का नाश हो जाता है।”
धर्म, आत्मा और जीवन का सत्य
81. “जिस व्यक्ति के पास विद्या नहीं है, तप नहीं है, दान वीरता नहीं है, शील, गुण और धर्म नहीं है वह इस धरती पर भार है। क्योंकि वह हिरण की तरह हमेशा घास चरने में ही लगा रहता है। वह निरर्थक जीवन जीता है और भोजन करने और भौतिक सुख में लिप्त जानवर की भांति ही मर जाता है।”
82. “जो मनुष्य जन्म लेकर भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों में से किसी एक को भी प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील नहीं रहता और ना ही किसी एक की प्राप्ति के लिए कार्य करता है या प्रयास करता है, उस व्यक्ति का जन्म लेना अकारण ही साबित होता है। ऐसा मनुष्य मानव शरीर लेकर भी केवल मरने के लिए ही पैदा होता है।”
83. “जब तक मनुष्य शरीर स्वस्थ है, उसे किसी प्रकार का रोग नहीं है और मृत्यु उसके नज़दीक नहीं है, तब तक वह अपने हित और पुण्य आदि कर्म करके अपना यह जीवन संवार सकता है क्योंकि प्राणों का अंत हो जाने पर वह कुछ भी करने में असमर्थ रहेगा। इसलिए मनुष्य को उस समय का समुचित उपयोग करते हुए धर्म कार्य अवश्य करने चाहिए।”
84. “यदि इस पृथ्वी पर कुछ स्थाई है तो वह है सत्य। सच के अलावा बाक़ी सब कुछ मिथ्या है। सारी पृथ्वी, सारी सृष्टि, केवल और केवल सत्य पर ही आधारित है। मनुष्य को सदा सच का ही सहारा लेना चाहिए। वह केवल सच के बल पर ही जीवन के हर क्षेत्र में विजय पा सकता है। झूठ का सहारा लेकर वह कभी भी आगे बढ़ नहीं सकता।”
85. “आत्मा को शरीर से अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि शरीर में ही आत्मा का वास होता है। आत्मा को केवल चिंतन के द्वारा जाना जा सकता है, समझा जा सकता है। जिस प्रकार फूल में ख़ुशबू, तिलों में तेल, लकड़ी में अग्नि, दूध में घी और गन्ने में गुड़ समाया रहता है, वह बाहर से दिखाई नहीं देता। उसी प्रकार शरीर में आत्मा वास करती है लेकिन दिखाई नहीं देती। इसे केवल चिंतन के द्वारा ही समझा जा सकता है।”
86. “यदि मनुष्य को संसार सागर से पार जाना है और मुक्ति चाहिए, तो उसे हर प्रकार के व्यसनों को छोड़ देना चाहिए और काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ इत्यादि सभी बुराइयों का त्याग कर देना चाहिए। ईश्वर की प्राप्ति का एक ही रास्ता है, जो पवित्रता और सत्य का है। ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को दया, सरलता, पवित्रता, सच्चाई और क्षमा का रास्ता अपनाना चाहिए। इस रास्ते पर चलने से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है।”
87. “मनुष्य को जब परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, उसके मन से अभिमान नष्ट हो जाता है, तो वह मोह माया से परे हो जाता है। ऐसी स्थिति में वह जहाँ कहीं भी बैठे, वहीं समाधिस्थ हो सकता है। अर्थात ऐसा मनुष्य, जो परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वह किसी भी अवस्था में जीवन यापन कर सकता है।”
88. “मनुष्य को अपने पांच ज्ञानेंद्रियाँ आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा और 5 कर्मेंद्रियों हाथ, पैर, मुख, लिंग, गुदा इनको वश में रखना चाहिए। रूप, रस, गन्ध और स्पर्श पर जिसने विजय प्राप्त कर ली वह अपने इसी कार्य के द्वारा संसार को वश में रख सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ से सदैव दूर रहना चाहिए और संयमित होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।”
89. “अपने परिवार की रक्षा के लिए स्वयं का बलिदान कर देना चाहिए, गाँव की रक्षा करने के लिए अपने परिवार का भी बलिदान दे देना चाहिए और देश की रक्षा करने के लिए पूरे गाँव को भी बलिदान करने में संकोच नहीं करना चाहिए।”
90. “तीर्थ स्थानों पर जाकर, स्नान करते वक्त, पापों का प्रायश्चित करके मन को शुद्ध किया जा सकता है। लेकिन यदि मन में पाप ही पाप भरे हुए हैं, तो सैकड़ों तीर्थ स्थानों पर जाकर स्नान करके प्रायश्चित करने पर भी मनुष्य का मन पवित्र नहीं हो सकता। बिलकुल वैसे ही जैसे कि शराब का पात्र जला दिए जाने पर भी शुद्ध नहीं माना जा सकता।”
91. “ऐसे मनुष्य का जीवन व्यर्थ है, जो भजन कीर्तन में लिप्त नहीं होता। श्री हरि की आराधना नहीं करता, राधा के प्रेम का गुणगान नहीं करता और पवित्र गीता को न ही पढ़ता है, ना सुनता है।”
92. “हमेशा धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए क्योंकि धर्म ही सबसे बड़ी सम्पदा है, जो परलोक में भी साथ चलती है। शरीर नाशवान है। उसका एक ना एक दिन अंत होना ही है। इसलिए मनुष्य को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह आगे बढ़कर धार्मिक कार्यों में लिप्त हो।”
93. “वैरागी मनुष्य धन को तिनके के समान मानता है। इंद्रिय विजेता के सामने कितनी ही सौंदर्यवान स्त्री क्यों ना आ जाए उसे वह रिझा नहीं सकती। तपस्वी के तप में कितनी ही बाधाएँ क्यों ना आ जाए वह तप से नहीं डिगता। यह सब कुछ संयम के बल पर ही संभव है क्योंकि जिस व्यक्ति ने मन पर काबू पा लिया, वह सब कुछ पा लेता है और वही सबसे बड़ा विजेता है।”
94. “इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, जो सदा सुखी रहे। प्रत्येक व्यक्ति कभी ना कभी बीमार होता है। किसी ना किसी दुख के अधीन जीवन व्यतीत करता है। ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है, जो संसार में सदा सुख से रह सके अर्थात इस जीवन में सुख और दुख हर व्यक्ति के जीवन के साथ जुड़ा हुआ है।”
95. “यह दुनिया वास्तव में एक रैन बसेरा है। यहाँ लोग आपस में मिलते हैं साथ रहते हैं और फिर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ जाते हैं। बिलकुल वैसे ही, जैसे कि सभी प्रकार के पक्षी रात भर एक ही वृक्ष पर बैठते हैं, विश्राम करते हैं, लेकिन सुबह होते ही अपनी-अपनी दिशाओं में उड़ जाते हैं।”
पशु पक्षियों से सीखिए
96. “काम कोई भी हो, उसे पूरी शक्ति लगाकर पूरा करने की कोशिश करनी चाहिए और यह सीख सिंह से लेनी चाहिए। छोटा हो या बड़ा वह पूरी शक्ति लगाकर शिकार करता है।”
97. “संकोच से मैथुन करना, निरंतर संग्रह करना, सदैव चौकन्ना रहना, किसी पर भी विश्वास न करना यह बातें कौवे से सीखनी चाहिए।”
98. “बहुत अधिक भूख लगने पर भी थोड़े में ही संतुष्ट रहना, गहरी निद्रा में भी रहते हुए चौकन्ना रहना और झटपट जाग जाना, स्वामी भक्ति और बहादूरी, सज्जनों को ये गुण कुत्ते से सीखने चाहिए।”
99. “बहुत अधिक थक जाने पर भी बोझ ढोते रहना, गर्मी सर्दी का ख़्याल ना करना, सदैव संतोष रखना, ये तीन गुण गधे से सीखने चाहिए।”
इनसे सावधान रहिए
100. “जिस देश में आदर सत्कार ना हो, आजीविका का कोई साधन ना हो, भाई बंधु या मित्र ना हों। विद्या पाने का कोई साधन ना हो, ऐसे स्थान पर कभी भी नहीं रहना चाहिए। ऐसे स्थान पर रहने वाला व्यक्ति हमेशा दुःख प्राप्त करता है।”
101. “हथियार रखने वालों का, तीखे नाखूनों व सींग वाले जानवरों का, कुलटा स्त्रियों और राजकुल के लोगों पर कभी भी विश्वास नहीं करना चाहिए क्योंकि इन पर विश्वास करने पर एक न एक दिन धोखा, छल, कपट और विश्वासघात अवश्य मिलता है।”
102. “जो व्यक्ति राजा से, अग्नि से, धर्म गुरु से और स्त्री से बहुत परिचय बढ़ाता है वह विनाश को प्राप्त होता है। जो व्यक्ति इनसे पूर्ण रूप से अलिप्त रहता है, उसे अपना भला करने का कोई अवसर नहीं मिलता। इसलिए इनसे सुरक्षित अंतर रखकर सम्बन्ध रखना चाहिए।”
103. “वे लोग जो इस दुनिया में सुखी है। जो अपने सम्बंधियों के प्रति उदार है। अनजाने लोगों के प्रति सहृदय है। अच्छे लोगों के प्रति प्रेम भाव रखते है। नीच लोगों से धूर्तता पूर्ण व्यवहार करते है। विद्वानों से कुछ नहीं छुपाते। दुश्मनों के सामने साहस दिखाते है। बड़ो के प्रति विनम्र और पत्नी के प्रति सख्त है।”
104. “हाथी से हज़ार गज की दूरी रखे। घोड़े से सौ गज की। सींग वाले जानवर से दस गज की लेकिन दुष्ट जहाँ हो उस जगह से ही निकल जाए।”
105. “साँप, राजा, बाघ, डंक मारने वाला कीड़ा, छोटा बच्चा, दूसरों का कुत्ता एवं मूर्ख व्यक्ति को कभी भी नींद से न जगाएं।”
चाणक्य नीति से जुड़े सवाल (FAQ)
चाणक्य का असली नाम क्या था?
चाणक्य का असली नाम विष्णुगुप्त माना जाता है। उन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है।
चाणक्य नीति में कितने अध्याय हैं?
चाणक्य नीति (चाणक्य नीति दर्पण) सत्रह अध्यायों में बँटी है।
चाणक्य नीति और अर्थशास्त्र में क्या अंतर है?
अर्थशास्त्र राज्य चलाने, अर्थव्यवस्था, कूटनीति और कानून पर लिखा गया एक बड़ा ग्रंथ है। चाणक्य नीति आम जीवन के व्यवहार, परिवार, मित्रता और नैतिकता से जुड़े छोटे छोटे सूत्रों का संग्रह है।
चाणक्य नीति की किताब कहाँ मिलेगी?
चाणक्य नीति मूल श्लोकों और हिंदी अर्थ के साथ कई प्रकाशकों से मिलती है। आप इसे किसी पुस्तक भंडार से या Amazon पर चाणक्य नीति की किताब देख सकते हैं।
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तो यह थे आचार्य चाणक्य के अनमोल वचन। आपको चाणक्य की कौन सी नीति सबसे ज़्यादा काम की लगी, कमेंट करके ज़रूर बताइए।
अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया
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