Kanik Neeti Saar Full in Hindi

आज की इस आर्टिकल (Kanik Neeti Saar Full in Hindi) में हम Kanik Niti के बारें में जानेंगे। कनिक धृतराष्ट्र के प्रमुख मंत्रीयों में से एक थे। वे प्रतिभावान और विद्वान राजनीतिज्ञ थे।

धृतराष्ट्र और महामंत्री कनिक का एक संवाद महाभारत के संभव-पर्व में आता है। उस संवाद में, महामंत्री कनिक धृतराष्ट्र को राजनीति के कई उच्चतम सिद्धांतों का उपदेश करते हैं। कनिक का यह उपदेश, ‘कनिकनीति’ नाम से प्रसिद्ध है। उन्ही अमर सिद्धांतो को यहाँ पर प्रस्तुत किया गया है।

Kanik Neeti Saar Full in Hindi

Kanik Neeti Saar Full in Hindi

Kanik Neeti Saar Full in Hindi

इनमे से कुछ नीति आपसे में शेयर करुंग तो चलिए शुरू करते है पहली नीति से

राजा को अपना शक्तिबल निरंतर बढ़ाना चाहिए। उसे सज़ा देने के लिए भी, नित्य तैयार रहना चाहिए। ऐसे राजा से उसके प्रजाजन तथा उसके शत्रु हमेशा डरकर रहते हैं।

राजा को अपनी ग़लतियों पर सदैव नज़र रखनी चाहिए। वह यथाशक्ति प्रयास करें कि उससे कोई ग़लती ना हो। वह अपने शत्रुओं की ग़लतियों पर कड़ी नज़र रखें और उनका उपयोग अपने लाभ के लिए करें।

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किसी काम को हाथ में लेने से पहले, राजा उसके सकारात्मक और नकारात्मक परिणामों का विचार करें। इसके बाद, हाथ में लिए हुए कार्य को राजा अवश्य पूरा करें। जैसे पैरे में चुभा हुआ काँटा अगर थोड़ा भी अंदर रह जाए, तो क्लेशदायक घाव पैदा करता है, वैसे ही आधा- अधूरा छोड़ा हुआ काम राजा की प्रतिष्ठा में बाधा लाता है।

दुष्ट शत्रु का विनाश करना, हमेशा सराहनीय होता है। अगर शत्रु बलशाली है, तो कुछ समय तक राजा उसे वैसे ही सहन करें, जैसे कोई पानी से भरे हुए घड़े का बोझ सहन करता है। किंतु, जैसे ही बलशाली शत्रु पर कोई आपदा आएँ, राजा उसपर आक्रमण कर के, उसका सर्वनाश कर दें।

शत्रु कितना भी कमज़ोर हों, उसका उपहास नहीं करना चाहिए। एक छोटिसि चिंगारी भी, पूरे वन को भस्म करने की क्षमता रखती है। इसलिए शत्रु को तुच्छ समझना उचित नहीं है। तुच्छ शत्रु भी, सामथर्यवान मित्रों से समझौता करके बलशाली राजा को परास्त कर सकता है।

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जब राजा को चारों ओर से निंदा मिले, तो उसे बहरा बन जाना चाहिए और उसके बुरे समय में, दूसरों के दोषों के प्रति उसे अंधा बन जाना चाहिए। किंतु, ऐसे समय में भी, वह वन में सोए हुए हिरन के झुंड की तरह चौकन्ना रहें।

शत्रु को परास्त करने के चार तरीक़े हैं। या तो शत्रु के साथ समझौता किया जाए (साम), या तो उसे पैसे देकर ख़रीद लिया जाए (दाम), या तो बल से उसे कष्ट पहुंचाया जाए (दंड), या फिर शत्रु के मित्रों के संग मित्रता करके अथवा उसके विश्वासु लोगों को तोड़कर उसकी शक्ति क्षीण कीया जाए (भेद)।

दो पक्ष समान तरीक़े से शक्तिशाली हो, तो जो पक्ष ज़्यादा उद्यमी होकर कार्य करता है, उसकी समृद्धि निश्चित रूप से होती है।

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राजा को उसके ग़ुस्से का प्रदर्शन किसी के सामने नहीं करना चाहिए। क्रोध आने के बावजूद, राजा चेहरे पर हँसी रखें, तथा सब से, हँसमुख होकर व्यवहार करें। क्रोध में अंधा होकर, राजा किसी का उपहास न करें। शत्रु को नुक़सान पहुँचाने के बाद तथा नुक़सान पहुँचाते समय, राजा उसे मीठे वचन ही बोले। इस प्रकार, शत्रु को हानि पहुँचाने के बाद, राजा को उसके साथ दिखावटी कोमल व्यवहार करना चाहिए। यहाँ तक कि ऐसे

शत्रु के साथ अश्रु भी ढालने चाहिए, उसे थोड़ी संपदा भी देनी चाहिए।जो लोग सदाचारिओं जैसा भेष बनाकर, दुष्कर्म करते हैं, ऐसे लोगों का सदाचार उनके पापों को वैसे ही ढक देता है, जैसे काले बादल किसी पर्वत को ढक देते हैं।

भिक्षुकों को, नास्तिकों को और चोरों को राज्य में आश्रय नहीं देना चाहिए। पैसों के लोभ में, ये लोग शत्रु के साथ सबसे पहले हाथ मिलाते हैं। शत्रु के साथ हाथ मिलानेवाले ऐसे लोगों को, राजा इतना कठोर दंड दें, जैसे धारदार दाँत किसी चीज़ को काँट लेते हैं। शिक्षा इतनी कठोर हो, कि फिर ऐसे लोग उनकी हरकतें ना दोहराएँ।

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राजा की वाणी हमेशा कोमल रहें, किंतु उसका हृदय एक छुरे की तरह धारदार हो। अत्यंत कठोर और क्रूर कार्य करने की मनषा होने के पश्चात भी, वह अपने चेहरे पर प्रसन्नता बनाए रखें।

जिस राजा को समृद्धि पाने की इच्छा है, उसे, विनम्रता से रहना, शपथ लेना, समझौता करना, दूसरों को प्रेरित करना, और किसी के चरण छूकर उसका सन्मान बढ़ाना, ये कलाएँ भलीभाँति आनी चाहिए।

अगर राजा को ऐसा लगे कि वह कर्तव्यों से पतित हो चुका है, तो उसे ख़ुद को फिर से ऊपर उठाना चाहिए। कर्तव्यों से नीचे गिरना बुरा है, किंतु नीचे गिरकर ख़ुद को न संभलना, ज़्यादा बुरा है। ऐसी अवस्था में, संदेह और चिंता त्यागकर, विनम्रता और एकाग्रता से ज्ञानी लोगों का परामर्श सून लेना चाहिए। किसी विपत्ति से जो ना गुज़रा हो, वह यशस्वी नहीं हो सकता। यह बात यशस्वी लोगों के जीवन से राजा सिख सकता है।

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जो राजा शत्रु के साथ समझौता करने के बाद, संपूर्ण निश्चिन्त हो जाता है, वह पेड़ की डाली पर सोए हुए उस मनुष्य की तरह है, जो उठने के बाद, नीचे गिर जाता है।अपने गुप्तचरों की आँखों से दुनिया का निरीक्षण करते हुए, राजा को इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि वह अपनी योजनाएँ शत्रु के गुप्तचरों के सामने प्रदर्शित न करें।

राजा के पास किसी काम से कोई ऐसा व्यक्ति आए, जिसकी मदद बाद में राजा को चाहिए हो, तो ऐसे व्यक्ति का काम राजा को पूर्ण रूप से नहीं करना चाहिए। उस काम का छोटासा भाग वह अधूरा छोड़ दें। ताकि जब राजा को उस व्यक्ति की ज़रूरत हो, तो वह व्यक्ति राजा की सेवा में उपस्थित हो जाए।

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जिस राजा को अपना देश कुशलमंगल चाहिए, वह मित्र और साथी बड़े ध्यान से चुने। वह युद्ध सोच-समझकर करें। शत्रु तथा मित्रों को राजा की योजनाओं का तब तक पता न चले, जब तक वे या तो शुरू नहीं होती, या तो ख़त्म नहीं होती।

जिस शत्रु को युद्ध में परास्त करके अधीन किया हुआ है, ऐसे शत्रु पर विश्वास करना, ऐसे केंकडे के बराबर है, जो ख़ुद की इच्छा से प्रजनन की क्रिया करके मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।

राजा भविष्य की आपदाएँ पहले ही आँककर, उनसे झूझने की समुचित तैयारी करें। कठिन परिस्थितियों के लिए वर्तमान में ही संसाधन इकट्ठे करें। भविष्य और भाग्य को उचित यज्ञों और मंत्रों का आश्रय लेकर बदला जा सकता है।

राजा अपना समय कभी व्यर्थ न गँवाएँ। समय और स्थान के बारे में अतिशय सतर्कता ही, सबसे बड़ी समृद्धि लाती है।

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S.K. Choudhary

नमस्कार दोस्तों, हमारे इस ब्लॉग में आपका स्वागत है, मेरा नाम है S.K. Choudhary (ऐस. के. चौधरी) और मैं एक ब्लॉगर और यूटूबर हूँ। में एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता हूँ और मेरा highest एजुकेशन MBA Finance है। मुझे पढ़ने और पढ़ाने का शोख है इसलिए में पार्ट टाइम मैं ब्लॉग लिखता हूँ और यूट्यूब के लिए बुक समरी और मोटिवेशनल वीडियो बनता हूँ।

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