Top 10 Bhagwat Geeta Shlok in Hindi: इस लेख में श्रीमद्भगवद्गीता के 10 सबसे प्रसिद्ध श्लोक और उनके साथ 19 और लोकप्रिय श्लोक दिए गए हैं, हर श्लोक का सही संस्कृत पाठ, अध्याय और श्लोक संख्या, और सरल हिंदी अर्थ के साथ।

श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत के भीष्म पर्व का हिस्सा है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में जब अर्जुन मोह और दुविधा में पड़कर हथियार रख देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें कर्म, ज्ञान और भक्ति का जो उपदेश देते हैं, वही गीता है।
Bhagwat Geeta Ke Shlok No. 1
दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय। बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
(अध्याय 2, श्लोक 49)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं, हे धनंजय, समबुद्धि (बुद्धियोग) की तुलना में फल की इच्छा से किया गया कर्म बहुत नीचा है। इसलिए तुम समबुद्धि की शरण लो। जो लोग केवल फल के लिए कर्म करते हैं, वे दीन (कृपण) हैं।
Bhagwat Geeta Shlok No. 2
कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्॥
(अध्याय 2, श्लोक 51)
अर्थ: समबुद्धि से युक्त ज्ञानी लोग कर्मों से पैदा होने वाले फल की इच्छा छोड़ देते हैं। इस तरह वे जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त होकर उस परम पद को पा लेते हैं जो हर दुख से परे है।
Geeta ka Shlok No. 3
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
(अध्याय 2, श्लोक 23)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन, आत्मा को न कोई शस्त्र काट सकता है, न आग जला सकती है, न पानी गीला कर सकता है और न हवा सुखा सकती है। आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है।
Geeta Shlok No. 4
हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
(अध्याय 2, श्लोक 37)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं, हे कुंतीपुत्र, अगर तुम युद्ध में वीरगति पाओगे तो स्वर्ग मिलेगा, और जीत गए तो पृथ्वी का राज भोगोगे। इसलिए निश्चय करके उठो और युद्ध करो। यानी अपने कर्तव्य से पीछे हटना किसी हाल में ठीक नहीं।
Geeta Shlok in Hindi No. 5
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
(अध्याय 4, श्लोक 8)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं, सज्जनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए और धर्म की फिर से स्थापना के लिए मैं हर युग में प्रकट होता हूँ।
Gita Slokas in Hindi No. 6
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
(अध्याय 2, श्लोक 47)
अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने पर है, उसके फल पर कभी नहीं। इसलिए फल को कर्म करने का कारण मत बनाओ, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।
यह श्रीमद्भगवद्गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है और कर्मयोग का मूल आधार है।
Sanskrit Shlok in Hindi No. 7
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
(अध्याय 2, श्लोक 62)
अर्थ: विषयों (चीज़ों और भोगों) के बारे में लगातार सोचते रहने से मनुष्य को उनसे लगाव हो जाता है। लगाव से उन्हें पाने की कामना पैदा होती है, और कामना में रुकावट आने पर क्रोध पैदा होता है।
Top 10 Bhagwat Geeta Shlok in Hindi No. 8
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
(अध्याय 2, श्लोक 63)
अर्थ: क्रोध से मोह (भ्रम) पैदा होता है, मोह से याददाश्त भटक जाती है, याददाश्त भटकने से बुद्धि नष्ट होती है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का पतन हो जाता है।
Bhagwad Geeta Shlok in Hindi No. 9
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(अध्याय 3, श्लोक 21)
अर्थ: श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो उदाहरण पेश करता है, सारी दुनिया उसी पर चलती है। इसलिए बड़े पद पर बैठे व्यक्ति की ज़िम्मेदारी भी बड़ी होती है।
Geeta slokas with hindi meaning No. 10
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
(अध्याय 4, श्लोक 39)
अर्थ: श्रद्धा रखने वाला, लगन से जुटा रहने वाला और इंद्रियों पर संयम रखने वाला मनुष्य ज्ञान प्राप्त करता है, और ज्ञान पाकर जल्दी ही परम शांति को पा लेता है।
Bonus Bhagwad Geeta Shlok
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
(अध्याय 18, श्लोक 66)
अर्थ: श्रीकृष्ण कहते हैं, सब धर्मों (हर दूसरे आश्रय) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
गीता के 19 और प्रसिद्ध श्लोक, अर्थ सहित
ऊपर के 10 श्लोकों के अलावा गीता के ये श्लोक भी बहुत प्रसिद्ध हैं और अक्सर पढ़े और याद किए जाते हैं।
अध्याय 2, श्लोक 6: न चैतद्विद्मः
न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः। यानेव हत्वा न जिजीविषामस्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
अर्थ: अर्जुन कहते हैं, हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए क्या बेहतर है, हम उन्हें जीतें या वे हमें जीतें। जिन धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हम जीना भी नहीं चाहेंगे, वही हमारे सामने युद्ध में खड़े हैं।
अध्याय 2, श्लोक 7: कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्॥
अर्थ: अर्जुन कहते हैं, कायरता के दोष ने मेरे स्वभाव को दबा दिया है और मैं धर्म के बारे में उलझ गया हूँ। जो मेरे लिए निश्चित रूप से कल्याणकारी हो, वह मुझे बताइए। मैं आपका शिष्य हूँ, आपकी शरण में आया हूँ, मुझे उपदेश दीजिए।
अध्याय 2, श्लोक 48: योगस्थः कुरु
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
अर्थ: हे धनंजय, आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता में समान भाव रखते हुए योग में स्थित होकर कर्म करो। यही समभाव (समत्व) योग कहलाता है।
अध्याय 2, श्लोक 52: यदा ते
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥
अर्थ: जब तुम्हारी बुद्धि मोह के दलदल को पार कर जाएगी, तब तुम सुने हुए और सुनने योग्य सभी भोगों से विरक्त हो जाओगे।
अध्याय 2, श्लोक 53: श्रुतिविप्रतिपन्ना ते
श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
अर्थ: तरह तरह की बातें सुनकर भटकी हुई तुम्हारी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर हो जाएगी, तब तुम योग को प्राप्त हो जाओगे।
अध्याय 2, श्लोक 55: प्रजहाति यदा
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
अर्थ: हे पार्थ, जब मनुष्य मन की सभी कामनाओं को पूरी तरह त्याग देता है और अपने आप में ही संतुष्ट रहता है, तब उसे स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धि वाला) कहा जाता है।
अध्याय 3, श्लोक 5: न हि
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्। कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
अर्थ: कोई भी मनुष्य एक पल के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता, क्योंकि प्रकृति से पैदा हुए गुण हर किसी से कर्म करवाते ही हैं।
अध्याय 3, श्लोक 22: न मे
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥
अर्थ: हे पार्थ, तीनों लोकों में मेरे लिए न कोई कर्तव्य बाक़ी है और न कुछ पाने योग्य वस्तु, जो मुझे न मिली हो। फिर भी मैं कर्म करता ही रहता हूँ।
अध्याय 3, श्लोक 27: प्रकृतेः क्रियमाणानि
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
अर्थ: सारे कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, पर अहंकार से भ्रमित मनुष्य सोचता है कि मैं ही करने वाला हूँ।
अध्याय 4, श्लोक 5: बहूनि मे
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
अर्थ: हे अर्जुन, मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं। मैं उन सबको जानता हूँ, पर तुम नहीं जानते।
अध्याय 4, श्लोक 6: अजोऽपि सन्नव्ययात्मा
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥
अर्थ: मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ, सभी प्राणियों का ईश्वर हूँ, फिर भी अपनी प्रकृति को अपने वश में रखकर अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
अध्याय 4, श्लोक 7: यदा यदा
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
अर्थ: हे भारत, जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब तब मैं स्वयं प्रकट होता हूँ।
अध्याय 6, श्लोक 1: अनाश्रितः कर्मफलं
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
अर्थ: जो व्यक्ति कर्म के फल का सहारा लिए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही सच्चा संन्यासी और योगी है। केवल अग्नि (यज्ञ) छोड़ देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला संन्यासी नहीं होता।
अध्याय 6, श्लोक 5: उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
अर्थ: मनुष्य को अपने द्वारा ही अपना उद्धार करना चाहिए, खुद को नीचे नहीं गिराना चाहिए। क्योंकि मनुष्य खुद ही अपना मित्र है और खुद ही अपना शत्रु।
अध्याय 7, श्लोक 13: त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥
अर्थ: सत्व, रज और तम, इन तीन गुणों के भावों से मोहित यह सारा संसार मुझे नहीं पहचान पाता, जो इन गुणों से परे और अविनाशी हूँ।
अध्याय 9, श्लोक 8: प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥
अर्थ: अपनी प्रकृति को वश में करके मैं प्रकृति के अधीन इन सभी प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार बार बार रचता हूँ।
अध्याय 9, श्लोक 17: पिताहमस्य जगतो
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥
अर्थ: इस जगत का पिता, माता, धारण करने वाला और पितामह मैं ही हूँ। जानने योग्य, पवित्र ओंकार और ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ।
अध्याय 9, श्लोक 18: गतिर्भर्ता प्रभुः
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥
अर्थ: सबका लक्ष्य, पालन करने वाला, स्वामी, साक्षी, निवास, शरण, बिना स्वार्थ के हित करने वाला मित्र, सृष्टि और प्रलय का कारण, आधार, भंडार और अविनाशी बीज मैं ही हूँ।
अध्याय 9, श्लोक 19: तपाम्यहमहं वर्षं
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥
अर्थ: हे अर्जुन, सूर्य बनकर मैं ही तपता हूँ, मैं ही वर्षा को रोकता और बरसाता हूँ। अमृत और मृत्यु, सत और असत भी मैं ही हूँ।
गीता के श्लोकों से जुड़े सवाल (FAQ)
भगवद्गीता में कितने श्लोक और अध्याय हैं?
श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं।
गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कौन सा है?
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” (अध्याय 2, श्लोक 47) गीता का सबसे प्रसिद्ध श्लोक माना जाता है। “यदा यदा हि धर्मस्य” (4.7) और “परित्राणाय साधूनां” (4.8) भी बहुत प्रसिद्ध हैं।
गीता किसने किसको सुनाई?
गीता का उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध से पहले अर्जुन को दिया था। संजय ने यह पूरा संवाद धृतराष्ट्र को सुनाया था।
छात्रों के लिए गीता के श्लोक कौन से हैं?
छात्रों के लिए पढ़ाई, एकाग्रता और मेहनत से जुड़े गीता के 15 श्लोक हमने Geeta Shlok for Students में अलग से दिए हैं।
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तो यह थे श्रीमद्भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक, अर्थ सहित। आपको गीता का कौन सा श्लोक सबसे प्रिय है, कमेंट करके ज़रूर बताइए।
अपना बहुमूल्य समय देने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया
श्रीमद्भगवद्गीता की किताबें
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