गोवर्धन पूजा 2026: पूरी कथा, पूजा विधि, शुभ मुहूर्त, अन्नकूट और परिक्रमा

Govardhan puja katha: श्रीकृष्ण छोटी उँगली पर गोवर्धन पर्वत उठाए हुए, नीचे राधा, बलराम, ग्वाले और गायें, ऊपर ऐरावत पर इंद्र
श्रीकृष्ण ने छोटी उँगली पर गोवर्धन उठाया, बलराम लाठी से सहारा दे रहे हैं और ऊपर ऐरावत पर इंद्र। कांगड़ा शैली का चित्र, लगभग 1780 से 1790 (Cleveland Museum of Art, CC0)

Govardhan puja katha यानी गोवर्धन पूजा की कथा, श्रीकृष्ण के गोवर्धन पर्वत उठाकर ब्रज को बचाने की कथा है। गोवर्धन पूजा कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को, यानी दिवाली के अगले दिन (कुछ सालों में एक दिन बाद) मनाई जाती है। इसे अन्नकूट पूजा भी कहते हैं। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) और गायों की पूजा होती है, और भगवान को अनेक तरह के पकवानों का भोग, यानी अन्नकूट, लगाया जाता है। इंद्र की मूसलधार वर्षा से ब्रज को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी उँगली पर उठा लिया था, और यह त्योहार उसी की याद में मनाया जाता है।

इस पेज पर गोवर्धन पूजा 2026 की तारीख़ और मुहूर्त, छोटी कथा और पूरी कथा, 56 भोग की कथा, गोबर से गोवर्धन बनाने और घर पर पूजा का पूरा क्रम, पूजा सामग्री, अन्नकूट में क्या बनाएँ, गोवर्धन परिक्रमा की जानकारी, मंत्र और अक्सर पूछे जाने वाले सवाल, सब एक जगह दिए गए हैं।

विषय सूची

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

गोवर्धन पूजा मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को है।

बातजानकारी
गोवर्धन पूजा की तारीख़मंगलवार, 10 नवंबर 2026
प्रातःकाल पूजा मुहूर्तसुबह 6:40 से 8:50 बजे तक (2 घंटे 10 मिनट)
प्रतिपदा तिथि शुरू9 नवंबर 2026, दोपहर 12:31 बजे
प्रतिपदा तिथि समाप्त10 नवंबर 2026, दोपहर 2:00 बजे
दूसरे नामअन्नकूट पूजा, बलि प्रतिपदा, गुजराती नववर्ष (बेसतु वरस)
किसकी पूजाश्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) और गाय
मुख्य भोगअन्नकूट: अनेक सब्ज़ियाँ, कढ़ी चावल, पूरी, मिठाइयाँ, 56 भोग

ऊपर के समय Drik Panchang के अनुसार नई दिल्ली के हैं। दूसरे शहरों में सूर्योदय के हिसाब से समय कुछ मिनट आगे पीछे होगा।

2026 में दिवाली के ठीक अगले दिन क्यों नहीं? दिवाली 8 नवंबर को है, पर 9 नवंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि है, और प्रतिपदा दोपहर 12:31 बजे शुरू होती है। सूर्योदय के समय की तिथि (उदया तिथि) के हिसाब से प्रतिपदा 10 नवंबर को है, इसलिए गोवर्धन पूजा 10 नवंबर को है। कुछ कैलेंडर में 9 नवंबर भी लिखा मिल सकता है, इसलिए अपने क्षेत्र का पंचांग एक बार देख लें।

बहुत से घरों में गोबर के गोवर्धन की पूजा दोपहर या शाम को भी होती है। मुहूर्त का ध्यान रखें, पर जहाँ घर की परंपरा अलग हो, वहाँ बड़ों की रीति को मानें।

गोवर्धन पूजा क्यों मनाते हैं?

  • प्रकृति की पूजा: श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को सिखाया कि जो पर्वत, गायें, वन और नदियाँ हमें अन्न, जल, घास और जीवन देते हैं, उनका सम्मान करो। गोवर्धन पूजा असल में प्रकृति के प्रति धन्यवाद का त्योहार है।
  • अहंकार पर विजय: इंद्र को अपनी शक्ति का घमंड हो गया था। श्रीकृष्ण ने गोवर्धन उठाकर ब्रज की रक्षा की और इंद्र का घमंड तोड़ा।
  • गौ सेवा: “गोवर्धन” का अर्थ है गायों का पालन और वृद्धि करने वाला। इस दिन गायों और बैलों को नहलाकर, सजाकर उनकी पूजा की जाती है।
  • नई फ़सल का धन्यवाद: कार्तिक में खरीफ़ की नई फ़सल घर आती है। अन्नकूट में उसी नए अनाज और सब्ज़ियों से बने पकवान भगवान को अर्पित किए जाते हैं।
Gau puja: सजी हुई गायों के सामने दीपक वाली थाली लिए पूजा करती महिला
गोवर्धन पूजा पर गायों को सजाकर उनकी पूजा की जाती है (प्रतीकात्मक चित्र)

गोवर्धन पूजा की कथा (छोटी कथा)

जिनके पास समय कम है, उनके लिए Govardhan puja katha का छोटा रूप:

ब्रज में हर साल वर्षा के देवता इंद्र की पूजा होती थी। बालक कृष्ण ने नंद बाबा से कहा कि हमारी गायें गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं, वही हमें घास, जल और जीवन देता है, इसलिए पूजा गोवर्धन की होनी चाहिए। ब्रजवासियों ने इंद्र की जगह गोवर्धन की पूजा की और अन्नकूट का भोग लगाया।

इंद्र को यह अपना अपमान लगा, और उसने क्रोध में ब्रज पर सात दिन तक मूसलधार वर्षा कराई। तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उँगली पर छाते की तरह उठा लिया, और सारे ब्रजवासी और गायें सात दिन तक उसके नीचे सुरक्षित रहे। इंद्र का घमंड टूटा, उसने श्रीकृष्ण से क्षमा माँगी, और तभी से हर साल गोवर्धन पूजा होने लगी।

Govardhan Puja Katha: पूरी कथा (श्रीकृष्ण, इंद्र और गोवर्धन)

यह कथा श्रीमद्भागवत पुराण के दशम स्कंध में विस्तार से आती है। विष्णु पुराण और हरिवंश में भी इसका वर्णन है।

ब्रजवासी इंद्र की पूजा की तैयारी में

द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण गोकुल और वृंदावन में नंद बाबा और यशोदा मैया के घर पले बढ़े। ब्रज के लोग ग्वाले थे, उनकी आजीविका गायों पर चलती थी।

एक बार कृष्ण ने देखा कि पूरे ब्रज में बड़े उत्साह से किसी पूजा की तैयारी हो रही है। तरह तरह के पकवान बन रहे हैं, घर सजाए जा रहे हैं। कृष्ण ने नंद बाबा से पूछा: “बाबा, यह किसकी पूजा की तैयारी है, और इससे क्या फल मिलता है?”

नंद बाबा ने बताया: “बेटा, यह देवराज इंद्र की पूजा है। इंद्र वर्षा के देवता हैं। उनकी कृपा से बारिश होती है, जिससे घास उगती है, हमारी गायें चरती हैं और खेतों में अन्न होता है। इसलिए हम हर साल उनकी पूजा करते हैं।”

कृष्ण का प्रश्न: पूजा किसकी होनी चाहिए

कृष्ण ने कहा: “बाबा, हम तो ग्वाले हैं। हमारा धन हमारी गायें हैं, और गायें गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं। वहीं की घास खाती हैं, वहीं के झरनों का पानी पीती हैं। बादल भी इसी पर्वत से टकराकर बरसते हैं। जो हमारा सीधे पालन करता है, पूजा तो उसकी होनी चाहिए। इसलिए इस बार इंद्र की नहीं, गोवर्धन पर्वत, गायों और ब्राह्मणों की पूजा कीजिए।”

कृष्ण की बात सबको ठीक लगी। नंद बाबा और ब्रज के बड़े बुज़ुर्गों ने तय किया कि इस बार गोवर्धन की पूजा होगी।

पहला अन्नकूट: गोवर्धन ने स्वयं भोग स्वीकार किया

Annakut: मंदिर में चावल का ऊँचा ढेर और उसके चारों ओर कटोरियों में तरह तरह के व्यंजन और दीपक
अन्नकूट: भगवान को अनेक पकवानों का भोग, जो पर्वत की तरह सजाया जाता है (प्रतीकात्मक चित्र)

ब्रजवासी इंद्र की पूजा के लिए बनाए सारे पकवान लेकर गोवर्धन पर्वत के पास पहुँचे। उन्होंने पर्वत की पूजा की, गायों को सजाकर उन्हें घास खिलाई, और पकवानों का एक पहाड़ जैसा ढेर लगाकर भोग अर्पित किया। अन्न के इसी ढेर को “अन्नकूट” कहा गया, यानी अन्न का पर्वत।

तभी श्रीकृष्ण ने एक विशाल दिव्य रूप धारण किया और कहा: “मैं ही गोवर्धन हूँ।” उस रूप में उन्होंने ब्रजवासियों का भोग प्रेम से ग्रहण किया। सब ब्रजवासी आनंद से भर गए, और उन्होंने गोवर्धन की परिक्रमा की।

इंद्र का क्रोध और सात दिन की वर्षा

जब इंद्र को पता चला कि ब्रज में उसकी पूजा बंद कर दी गई है, तो उसे बहुत क्रोध आया। उसने सोचा: “एक छोटे से बालक की बात मानकर इन ग्वालों ने मेरा अपमान किया है।”

इंद्र ने प्रलय करने वाले संवर्तक मेघों को आज्ञा दी कि ब्रज पर इतनी वर्षा करो कि सब बह जाए। देखते ही देखते आकाश काले बादलों से भर गया। बिजली कड़कने लगी, तेज़ आँधी चलने लगी, और मूसलधार बारिश के साथ ओले गिरने लगे। ब्रज में पानी भरने लगा। गायें और ग्वाले ठंड और डर से काँपने लगे, और सब दौड़कर कृष्ण के पास पहुँचे: “कान्हा, अब हमें बचाओ।”

श्रीकृष्ण ने उँगली पर उठाया गोवर्धन

कृष्ण समझ गए कि यह इंद्र का क्रोध है। उन्होंने कहा: “डरो मत। जिस गोवर्धन की हमने पूजा की है, वही हमारी रक्षा करेगा।”

यह कहकर श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को एक हाथ से उखाड़कर ऊपर उठा लिया, जैसे कोई बच्चा खेल खेल में कुकुरमुत्ता उठा लेता है। लोक में प्रसिद्ध है कि उन्होंने पर्वत को अपने बाएँ हाथ की सबसे छोटी उँगली पर उठाया था। भागवत के अनुसार उस समय कृष्ण की उम्र सिर्फ़ सात साल थी।

कृष्ण ने सब ब्रजवासियों से कहा: “अपनी गायों, बछड़ों और सामान के साथ पर्वत के नीचे आ जाओ।” सारा ब्रज उस विशाल छाते के नीचे आ गया। न बारिश की एक बूँद उन तक पहुँची, न आँधी।

इंद्र लगातार सात दिन और सात रात बारिश कराता रहा, और श्रीकृष्ण सात दिन तक बिना हिले, बिना कुछ खाए पिए, पर्वत उठाए खड़े रहे। ब्रजवासी उन्हें देखकर हैरान भी थे और निश्चिंत भी।

इंद्र का घमंड टूटा: कृष्ण बने “गोविंद”

सात दिन बाद इंद्र समझ गया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, स्वयं भगवान हैं। उसने बादलों को वापस बुला लिया। आसमान साफ़ हो गया और सूरज निकल आया। कृष्ण ने सब ब्रजवासियों को बाहर आने को कहा और गोवर्धन पर्वत को फिर उसकी जगह रख दिया।

इंद्र लज्जित होकर कामधेनु गाय (सुरभि) के साथ श्रीकृष्ण के पास आया और हाथ जोड़कर क्षमा माँगी। सुरभि गाय ने अपने दूध से और इंद्र ने ऐरावत हाथी की सूँड़ से लाए आकाश गंगा के जल से श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, और उन्हें “गोविंद” नाम दिया, यानी गायों के स्वामी और रक्षक।

तभी से कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट की परंपरा चली आ रही है। श्रीकृष्ण को इसी घटना से गिरिधारी और गोवर्धनधारी भी कहा जाता है।

गोवर्धन पूजा की कथा की सीख

  • जो प्रकृति हमें अन्न, जल और जीवन देती है, उसका सम्मान ही सच्ची पूजा है।
  • शक्ति और पद का घमंड, चाहे देवता का हो, एक दिन टूटता है।
  • संकट में सब मिलकर एक साथ खड़े हों, तो बड़ी से बड़ी मुसीबत टल जाती है। मान्यता है कि ग्वालों ने भी अपनी लाठियाँ पर्वत के नीचे लगाकर सहारा दिया था।

56 भोग की कथा: अन्नकूट में 56 व्यंजन क्यों?

गोवर्धन पूजा पर श्रीकृष्ण को 56 भोग (छप्पन भोग) लगाने की परंपरा है। इसके पीछे एक प्यारी लोक मान्यता है।

यशोदा मैया बाल कृष्ण को दिन में आठ बार (आठों पहर) कुछ न कुछ खिलाती थीं। जब कृष्ण ने सात दिन तक गोवर्धन उठाए रखा, तो इन सात दिनों में उन्होंने कुछ नहीं खाया। आठवें दिन जब वर्षा रुकी, तो ब्रजवासियों और यशोदा मैया ने सात दिनों के आठ आठ भोग, यानी 7 × 8 = 56 व्यंजन बनाकर कान्हा को प्रेम से खिलाए। तभी से छप्पन भोग की परंपरा मानी जाती है।

छप्पन भोग में मीठे, नमकीन, खट्टे, कड़वे, तीखे और कसैले, छहों रसों के व्यंजन होते हैं। घर पर 56 व्यंजन न बना सकें तो कोई बात नहीं, श्रद्धा से बनाया गया एक या कुछ पकवान भी उतना ही स्वीकार माना जाता है।

गोवर्धन पूजा विधि: घर पर पूजा का पूरा क्रम

Govardhan puja vidhi: आँगन में गोबर से बने गोवर्धन जी, फूलों और दीयों से सजे, पास में थाली लिए महिलाएँ
घर के आँगन में गोबर से गोवर्धन जी बनाकर फूल, रुई और दीयों से सजाए जाते हैं (प्रतीकात्मक चित्र)
  1. स्नान और तैयारी: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ़ कपड़े पहनें। आँगन या घर के बाहर की जगह साफ़ करें।
  2. गोबर से गोवर्धन बनाएँ: ताज़े गोबर से गोवर्धन जी की आकृति बनाएँ। ज़्यादातर घरों में यह लेटे हुए पुरुष के आकार की बनती है, कई जगह पर्वत के आकार की। साथ में गोबर से गायें, बछड़े, ग्वाले और श्रीकृष्ण की छोटी आकृतियाँ भी बनाई जाती हैं।
  3. नाभि का दीपक: गोवर्धन जी की नाभि की जगह एक गड्ढा बनाकर उसमें मिट्टी का दीया या कटोरी रखें। पूजा के समय इसमें दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे डाले जाते हैं।
  4. सजावट: गोवर्धन जी को फूलों, रुई, खील, गन्ने के छोटे टुकड़ों, दूब और रोली अक्षत से सजाएँ। चारों ओर छोटे दीये रखें।
  5. संकल्प और गणेश पूजा: हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर पूजा का संकल्प लें, और पहले गणेश जी की पूजा करें।
  6. गोवर्धन पूजा: गोवर्धन जी को रोली, अक्षत, फूल, खील बताशे, धूप और दीप अर्पित करें। नाभि वाले दीये में दूध, दही, गंगाजल, शहद और बताशे डालें।
  7. अन्नकूट का भोग: घर में बने अन्नकूट के पकवान, कढ़ी चावल, पूरी, सब्ज़ी और मिठाई का भोग लगाएँ। भोग में तुलसी दल रखें।
  8. कथा: ऊपर दी गई गोवर्धन पूजा की कथा पढ़ें या परिवार को सुनाएँ।
  9. परिक्रमा: परिवार के सब लोग गोवर्धन जी की 7 परिक्रमा करें। परिक्रमा करते समय हाथ में लोटा लेकर धीरे धीरे जल गिराते जाते हैं, और कई घरों में साथ साथ जौ के दाने भी बोते जाते हैं।
  10. गौ पूजा: गायों और बैलों को नहलाकर, उनके सींगों पर रंग लगाकर, माला पहनाकर तिलक करें। उन्हें गुड़, रोटी और हरा चारा खिलाएँ।
  11. आरती: “श्री गोवर्धन महाराज” की आरती और श्रीकृष्ण की आरती करें।
  12. प्रसाद: अन्नकूट का प्रसाद परिवार, पड़ोसियों और ज़रूरतमंदों में बाँटें।

पूजा का तरीका हर क्षेत्र और परिवार में थोड़ा अलग होता है। शहर में गोबर न मिले तो मिट्टी या आटे से छोटा गोवर्धन बना सकते हैं, या श्रीकृष्ण के गोवर्धनधारी रूप के चित्र की पूजा कर सकते हैं।

गोवर्धन पूजा सामग्री सूची

  • गोबर (गोवर्धन बनाने के लिए), या मिट्टी या आटा
  • श्रीकृष्ण की गोवर्धनधारी मूर्ति या चित्र
  • रोली, अक्षत (साबुत चावल), हल्दी और कलावा
  • फूल और फूलों की माला, दूब, रुई
  • खील, बताशे, गन्ने के टुकड़े
  • दूध, दही, गंगाजल, शहद (नाभि के दीये के लिए)
  • मिट्टी के दीये, घी या तेल, रुई की बाती
  • धूप, अगरबत्ती और कपूर
  • जल से भरा लोटा और थोड़े जौ (परिक्रमा के लिए)
  • अन्नकूट के पकवान, मिठाई, फल और तुलसी दल
  • गायों के लिए गुड़, रोटी, हरा चारा, रंग और माला

अन्नकूट क्या है और इसमें क्या बनाएँ

अन्नकूट का अर्थ है “अन्न का कूट”, यानी अन्न का पर्वत। इस दिन तरह तरह के पकवान बनाकर उन्हें पर्वत की तरह सजाया जाता है और भगवान को अर्पित किया जाता है। मंदिरों में चावल का ऊँचा ढेर बनाकर उसके चारों ओर सैकड़ों व्यंजन सजाए जाते हैं।

घर के अन्नकूट में आम तौर पर बनता है:

  • अन्नकूट की सब्ज़ी: कई मौसमी सब्ज़ियों को मिलाकर बनी एक सब्ज़ी, जैसे आलू, शकरकंद, कद्दू, गोभी, मटर, गाजर, मूली, बैंगन, अरबी और पालक
  • कढ़ी और चावल: उत्तर भारत के कई घरों में अन्नकूट का मुख्य भोग
  • बाजरा: राजस्थान और ब्रज में बाजरे की खिचड़ी या बाजरे की रोटी
  • पूरी, खीर और हलवा
  • मिठाइयाँ: लड्डू, पेड़ा, बताशे, खील और पान

राजस्थान के नाथद्वारा में श्रीनाथजी के मंदिर का अन्नकूट बहुत प्रसिद्ध है। वहाँ भोग के बाद आसपास के गाँवों के आदिवासी लोग अन्नकूट का प्रसाद “लूटते” हैं, और यह परंपरा सदियों पुरानी है।

गोवर्धन पर्वत और परिक्रमा

असली गोवर्धन पर्वत (गिरिराज जी) उत्तर प्रदेश के मथुरा ज़िले में, मथुरा शहर से लगभग 22 किलोमीटर दूर है। गोवर्धन पूजा के दिन यहाँ लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं।

  • परिक्रमा की लंबाई: गोवर्धन की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (सात कोस) की है। पैदल परिक्रमा में आम तौर पर 5 से 7 घंटे लगते हैं।
  • कहाँ से शुरू: ज़्यादातर लोग मानसी गंगा या दानघाटी मंदिर से परिक्रमा शुरू करते हैं और वहीं पूरी करते हैं।
  • रास्ते के मुख्य स्थान: मानसी गंगा, दानघाटी, राधा कुंड, श्याम कुंड, कुसुम सरोवर, जतीपुरा का मुखारविंद और पूँछरी का लौठा।
  • नियम: परिक्रमा नंगे पैर करने की परंपरा है, और पर्वत हमेशा अपनी दाईं ओर रहे। कुछ भक्त दंडवत परिक्रमा (लेटकर प्रणाम करते हुए) करते हैं, जिसमें कई दिन लगते हैं।
  • मान्यता: कथा है कि पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण गोवर्धन पर्वत रोज़ तिल भर घटता है। इसीलिए भक्त इसे बहुत सम्मान से देखते हैं और परिक्रमा में इसकी स्वच्छता का ध्यान रखते हैं।

देश में गोवर्धन पूजा के अलग रूप

  • उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश: गोबर से गोवर्धन बनाकर पूजा, अन्नकूट और गौ पूजा।
  • महाराष्ट्र और कर्नाटक: इस दिन बलि प्रतिपदा (पाडवा) मनाई जाती है, जो राजा बलि की याद में है। पति पत्नी के लिए “दिवाली पाडवा” का ख़ास महत्व है।
  • गुजरात: इसी दिन से गुजराती नया साल (बेसतु वरस) शुरू होता है, और मंदिरों में बड़ा अन्नकूट होता है।
  • कुछ उत्तर भारतीय राज्य: कई जगह दिवाली के बाद वाले दिन कारीगर और कारख़ाने विश्वकर्मा पूजा भी करते हैं।

गोवर्धन पूजा के मंत्र

गोवर्धन जी की प्रार्थना:

गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक। विष्णुबाहु कृतोच्छ्राय गवां कोटिप्रदो भव॥

अर्थ: हे पृथ्वी को धारण करने वाले गोवर्धन, गोकुल की रक्षा करने वाले, भगवान विष्णु (श्रीकृष्ण) की भुजा से ऊपर उठाए गए पर्वत, आप हमें करोड़ों गायें (अपार समृद्धि) देने वाले हों।

गौ पूजा का मंत्र:

लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता। घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु॥

अर्थ: जो लक्ष्मी लोकपालों के बीच गाय के रूप में रहती हैं और यज्ञ के लिए घी देती हैं, वे मेरे पाप दूर करें।

श्रीकृष्ण का मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

दिवाली के पाँच दिन (2026)

दिनत्योहारतारीख़
पहलाधनतेरसशुक्रवार, 6 नवंबर
दूसराछोटी दिवाली (नरक चतुर्दशी)7 या 8 नवंबर (पंचांगों में मतभेद)
तीसरादिवाली, लक्ष्मी पूजारविवार, 8 नवंबर
चौथागोवर्धन पूजा (अन्नकूट)मंगलवार, 10 नवंबर
पाँचवाँभाई दूजबुधवार, 11 नवंबर

दिवाली की रात लक्ष्मी पूजा का पूरा क्रम यहाँ पढ़िए: दिवाली लक्ष्मी पूजा विधि 2026।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

गोवर्धन पूजा 2026 कब है?

गोवर्धन पूजा मंगलवार, 10 नवंबर 2026 को है। प्रतिपदा तिथि 9 नवंबर दोपहर 12:31 बजे शुरू होकर 10 नवंबर दोपहर 2:00 बजे ख़त्म होगी। सुबह की पूजा का मुहूर्त 6:40 से 8:50 बजे तक है (नई दिल्ली)।

2026 में गोवर्धन पूजा दिवाली के अगले दिन क्यों नहीं है?

9 नवंबर को सूर्योदय के समय अमावस्या तिथि है और प्रतिपदा दोपहर में शुरू होती है। उदया तिथि के हिसाब से प्रतिपदा 10 नवंबर को है, इसलिए दिवाली (8 नवंबर) और गोवर्धन पूजा के बीच एक दिन का अंतर है।

गोवर्धन पूजा की कथा क्या है?

ब्रजवासियों ने कृष्ण के कहने पर इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा की। क्रोधित इंद्र ने सात दिन तक मूसलधार वर्षा कराई, तब श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उँगली पर उठाकर सारे ब्रज और गायों की रक्षा की। इंद्र ने हार मानकर क्षमा माँगी।

गोवर्धन पूजा में क्या किया जाता है?

गोबर से गोवर्धन जी बनाकर उनकी पूजा, अन्नकूट का भोग, 7 परिक्रमा, गायों की पूजा, कथा और आरती। मंदिरों में बड़े अन्नकूट का आयोजन होता है।

अन्नकूट का क्या मतलब है?

अन्नकूट यानी “अन्न का पर्वत”। इस दिन अनेक तरह के पकवान बनाकर पर्वत की तरह सजाए जाते हैं और भगवान को भोग लगाया जाता है, फिर प्रसाद सबमें बाँटा जाता है।

गोवर्धन पूजा पर 56 भोग क्यों लगाते हैं?

मान्यता है कि कृष्ण दिन में आठ बार भोजन करते थे और सात दिन तक गोवर्धन उठाए रहने में उन्होंने कुछ नहीं खाया। इसलिए सात दिन के आठ आठ भोग, यानी 56 व्यंजन बनाकर उन्हें खिलाए गए।

शहर में गोबर न हो तो गोवर्धन पूजा कैसे करें?

मिट्टी या आटे से छोटा गोवर्धन बना सकते हैं, या श्रीकृष्ण के गोवर्धनधारी चित्र की पूजा करके अन्नकूट का भोग लगा सकते हैं। श्रद्धा सबसे ज़रूरी है।

गोवर्धन परिक्रमा कितने किलोमीटर की है?

मथुरा ज़िले में गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा लगभग 21 किलोमीटर (सात कोस) की है। पैदल पूरी करने में आम तौर पर 5 से 7 घंटे लगते हैं।

श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत कितने दिन उठाया था?

सात दिन और सात रात। भागवत पुराण के अनुसार उस समय कृष्ण सिर्फ़ सात साल के थे।

ये भी पढ़ें

गोवर्धन पूजा के दिन परिवार को Govardhan puja katha सुनाने के लिए इस पेज को सेव कर लीजिए। आपके घर में गोवर्धन जी किस आकार में बनाए जाते हैं, कमेंट में ज़रूर बताइए।

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