पंचदेव पूजन विधि मंत्र सहित: घर पर ऐसे करें पंचदेवता पूजा, संपूर्ण विधि

Panchdev puja vidhi: लाल कपड़े से ढकी चौकी पर अक्षत के ढेर, फूल, जलता दीपक और कलश
पंचदेव पूजा की चौकी: अक्षत पर देवताओं का आवाहन, बगल में दीपक और कलश (प्रतीकात्मक चित्र)

Panchdev puja vidhi यानी पंचदेव पूजन में पाँच देवताओं, भगवान विष्णु, भगवान शिव, श्री गणेश, सूर्यदेव और माँ दुर्गा, की एक साथ पूजा की जाती है। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रतिदिन पंचदेव पूजा अवश्य करनी चाहिए। इस पेज पर पंचदेवता पूजा की संपूर्ण विधि मंत्र सहित दी गई है: पूजा से पहले की तैयारी, सामग्री कहाँ रखें, गणेश स्मरण, संकल्प, घंटा, शंख और कलश पूजन, पाँचों देवों के ध्यान मंत्र अर्थ सहित, और आवाहन से क्षमा याचना तक षोडशोपचार के सभी मंत्र।

पूरी विधि और मंत्र गीता प्रेस, गोरखपुर की “नित्यकर्म पूजाप्रकाश” (देवपूजा प्रकरण, पंचदेव पूजन विधि) से लिए गए हैं, और गणेश, गौरी वंदना के मंत्र पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की “कर्मकाण्ड भास्कर” से मिलाए गए हैं। हर मंत्र के साथ उसका काम आसान हिंदी में लिखा है, ताकि घर पर कोई भी व्यक्ति बिना पंडित के यह पूजा कर सके।

छोटा जवाब: पंचदेव पूजा का क्रम है: आचमन और आसन शुद्धि, गणेश स्मरण, संकल्प, घंटा पूजन, शंख पूजन, प्रोक्षण, कलश पूजन, पाँचों देवों का ध्यान, पुष्पांजलि और आवाहन, फिर आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन, फूल, तुलसी, धूप, दीप, नैवेद्य, फल, ताम्बूल, दक्षिणा, आरती, शंख भ्रामण, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि, नमस्कार, चरणामृत, क्षमा याचना और प्रसाद। हर उपचार में नाम मंत्र है: “ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः”। मंत्र न आएँ तो सिर्फ़ नाम मंत्र से, और वह भी न हो सके तो बिना मंत्र के जल और चंदन चढ़ाकर भी पूजा की जा सकती है।

विषय सूची

पंचदेव पूजा: एक नज़र में

बातजानकारी
पंचदेव कौनविष्णु, शिव, गणेश, सूर्य और दुर्गा (देवी)
कब करेंप्रतिदिन, सुबह स्नान के बाद (गृहस्थ के नित्यकर्म का हिस्सा)
मुख किस ओरपूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठें
पूजा का प्रकारषोडशोपचार (16 उपचार), समय कम हो तो पंचोपचार या नाम मंत्र से
मुख्य नाम मंत्रॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः
पंचायतन में मुख्य देवजिस देवता को बीच में रखें, उसी के नाम का पंचायतन (जैसे विष्णु पंचायतन)
लगने वाला समयपूरी विधि 40 से 60 मिनट, आसान विधि 10 से 15 मिनट
स्रोतनित्यकर्म पूजाप्रकाश (गीता प्रेस), कर्मकाण्ड भास्कर

पंचदेव कौन कौन से हैं और इनकी पूजा क्यों

देवतास्वरूपध्यान मंत्र का नाम मंत्रप्रिय सामग्री
भगवान विष्णुशंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए, पीताम्बरधारीॐ विष्णवे नमःतुलसीदल
भगवान शिवचाँदी के पर्वत जैसे गौर, पाँच मुख, तीन नेत्रॐ शिवाय नमःबिल्वपत्र
श्री गणेशगजमुख, लम्बोदर, सिद्धि देने वाले पार्वतीपुत्रॐ श्रीगणेशाय नमःदूर्वा
सूर्यदेवलाल कमल पर बैठे, हाथों में कमल और अभय मुद्राॐ श्रीसूर्याय नमःलाल फूल, अर्घ्य
माँ दुर्गासिंह पर सवार, चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष, बाणॐ श्रीदुर्गायै नमःलाल फूल

पंचदेव पूजा की परंपरा को पंचायतन पूजा भी कहते हैं। इसमें एक देवता को मुख्य मानकर बीच में रखते हैं और बाक़ी चार को चारों कोनों में। इस तरह एक ही पूजा में पाँचों प्रमुख देवताओं का सम्मान हो जाता है, और घर के हर सदस्य के इष्ट देव भी इसमें आ जाते हैं।

नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार प्रतिदिन पंचदेव पूजा अवश्य करनी चाहिए। यदि वेद के मंत्र अभ्यास में न हों तो आगम (पुराण) के मंत्रों से, यदि वे भी न आएँ तो नाम मंत्र से, और यदि यह भी संभव न हो तो बिना मंत्र के ही जल, चंदन आदि चढ़ाकर पूजा करनी चाहिए। यानी भाव सबसे ज़रूरी है।

पंचायतन: किस देवता को कहाँ रखें

पंचायतन में देवताओं के स्थान का नियम है, और इसी नियम से इन्हें स्थापित करना चाहिए। नित्यकर्म पूजाप्रकाश में दिया गया नक्शा:

विष्णु पंचायतन (घरों में सबसे प्रचलित):

बाएँबीचदाएँ
शिवगणेश
विष्णु
देवी (दुर्गा)सूर्य

बाक़ी चार पंचायतन:

पंचायतनबीच मेंऊपर बाएँऊपर दाएँनीचे बाएँनीचे दाएँनाम मंत्र
गणेश पंचायतनगणेशविष्णुशिवदेवीसूर्यॐ गणेशविष्णुशिवदुर्गासूर्येभ्यो नमः
शिव पंचायतनशिवविष्णुसूर्यदेवीगणेशॐ शिवविष्णुसूर्यदुर्गागणेशेभ्यो नमः
देवी पंचायतनदुर्गाविष्णुशिवसूर्यगणेशॐ दुर्गाविष्णुशिवसूर्यगणेशेभ्यो नमः
सूर्य पंचायतनसूर्यशिवगणेशदेवीविष्णुॐ सूर्यशिवगणेशदुर्गाविष्णुभ्यो नमः

यदि पंचदेवों की मूर्तियाँ न हों, तो चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर पाँच जगह अक्षत (चावल) के छोटे ढेर बनाएँ और उन्हीं पर इनका आवाहन करें।

पंचदेव पूजा सामग्री सूची

सामग्रीकिस काम में
जल से भरा कलश (उदकुम्भ), लोटाआचमन, स्नान, अर्घ्य
शंख और घंटाशंख पूजन, प्रोक्षण, शंख भ्रामण
पंचपात्र और आचमनीआचमन
चंदन (केसर और कपूर के साथ घिसा), रोली, कुमकुम, हल्दीतिलक, चंदन
अक्षत (केसर या रोली से हल्का रंगा)आवाहन, आसन
फूल और मालापुष्प, पुष्पांजलि
तुलसीदल (विष्णु), बिल्वपत्र (शिव), दूर्वा (गणेश)विशेष पत्र
पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर)पंचामृत स्नान
वस्त्र, यज्ञोपवीत (जनेऊ) या मौलीवस्त्र और यज्ञोपवीत
धूप, अगरबत्तीधूप
घी का दीपक और तेल का दीपकदीप
कपूरआरती
नैवेद्य (मिठाई), मौसमी फलभोग
पान, सुपारी, इलायची, लौंगताम्बूल
दक्षिणा (सिक्का)दक्षिणा
आसन (ऊनी या कुश का)बैठने के लिए

घर पर पूजा का सामान न हो, तो पूजा थाली सेट और पंचपात्र आचमनी जैसी चीज़ें आसानी से मिल जाती हैं। पूरी किताब पढ़नी हो तो गीता प्रेस की नित्यकर्म पूजाप्रकाश घर में रखने लायक है।

पंचदेव पूजा सामग्री: पीतल की थाली में रोली, हल्दी, चावल, फूल, पत्ते, सुपारी और दीपक
पंचदेव पूजा की थाली: रोली, हल्दी, अक्षत, फूल, पत्ते, सुपारी और दीपक (प्रतीकात्मक चित्र)

पूजा सामग्री रखने का सही क्रम

पूजन की किस वस्तु को किधर रखना है, इसका भी शास्त्र में निर्देश है। पूर्व की ओर मुख करके बैठें, तब:

दिशा (आपके हिसाब से)क्या रखें
बायीं ओरसुगंधित जल से भरा कलश (जलपात्र), घंटा, धूपदानी, तेल का दीपक
दायीं ओरघी का दीपक, सुगंधित जल से भरा शंख
सामनेकेसर और कपूर के साथ घिसा गाढ़ा चंदन, फूल आदि
भगवान के आगेचौकोर जल का घेरा डालकर उस पर नैवेद्य

ध्यान रखें: फूल हाथ में और चंदन ताँबे के पात्र में न रखें। चंदन पतला न हो, गाढ़ा घिसा हुआ चढ़ाएँ।

पूजा से पहले की तैयारी

1. मंदिर में प्रवेश

यदि घर में पूजा का अलग कमरा या मंदिर हो, तो प्रवेश से पहले दरवाज़े पर ही आचमन कर लें और तीन बार ताली बजाएँ, फिर विनम्रता से मंदिर में प्रवेश करें। ताली बजाने से पहले यह विनियोग और मंत्र पढ़ें:

विनियोग: अपसर्पन्त्विति मन्त्रस्य वामदेव ऋषिः, शिवो देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भूतादिविघ्नोत्सादने विनियोगः।

ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूतले स्थिताः।
ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया॥

अर्थ: जो भी विघ्न करने वाली शक्तियाँ यहाँ हैं, वे भगवान शिव की आज्ञा से दूर हो जाएँ। फिर देवताओं का ध्यान करके साष्टांग प्रणाम करें।

2. आसन की शुद्धि

आसन पर बैठकर उस पर जल छिड़कें और यह पढ़ें:

विनियोग: ॐ पृथ्वीति मन्त्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः, सुतलं छन्दः, कूर्मो देवता, आसनपवित्रकरणे विनियोगः।

ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।
त्वं च धारय मां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥

अर्थ: हे पृथ्वी माता, आपने सारे लोकों को धारण किया है और आपको भगवान विष्णु ने धारण किया है। आप मुझे भी धारण करें और मेरे आसन को पवित्र करें।

3. पूजा की बाहरी तैयारी

  • ताज़ा जल कपड़े से छानकर कलश में भरें। बासी जल पूजा में वर्जित है, पर गंगाजल या तीर्थ जल बासी नहीं माना जाता।
  • आचमनी से शंख में जल डालकर उसे उसकी पीठ (स्टैंड) पर रखें। शंख को जल में डुबाना और सीधे ज़मीन पर रखना मना है। शंख में चंदन और फूल डाल दें।
  • कलश के जल को सुगंधित करने के लिए कपूर और केसर के साथ घिसा चंदन मिला दें, या पवित्र इत्र डाल दें।
  • अक्षत को केसर या रोली से हल्का रंग लें।

4. मानस पूजा (भीतरी तैयारी)

शास्त्रों में बाहरी पूजा से पहले मानस पूजा का बहुत महत्व बताया गया है। मन से भगवान को अर्पित किया गया एक फूल भी करोड़ों बाहरी फूलों के बराबर माना गया है। मानस पूजा से चित्त एकाग्र होता है और बाहरी पूजा में भी मन लगता है। आँखें बंद करके ये छह मंत्र बोलें:

मंत्रअर्थ
ॐ लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि।प्रभो, मैं पृथ्वी रूप गंध (चंदन) आपको अर्पित करता हूँ।
ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि।मैं आकाश रूप फूल आपको अर्पित करता हूँ।
ॐ यं वाय्वात्मकं धूपं परिकल्पयामि।मैं वायु के रूप में धूप आपको देता हूँ।
ॐ रं वह्न्यात्मकं दीपं दर्शयामि।मैं अग्नि के रूप में दीपक आपको देता हूँ।
ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि।मैं अमृत जैसा नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।
ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि।मैं संसार के सभी उपचार आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।

Panchdev Puja Vidhi: पंचदेव पूजन की संपूर्ण विधि मंत्र सहित

चरण 1: गणेश स्मरण

हाथ में फूल और अक्षत लेकर सबसे पहले भगवान गणेश का स्मरण करें:

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते॥

अर्थ: सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाश, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन, गणेश जी के इन बारह नामों को जो पढ़ता या सुनता है, उसे पढ़ाई की शुरुआत, विवाह, गृह प्रवेश, यात्रा, संघर्ष और संकट में कोई विघ्न नहीं आता।

फिर सभी देवताओं को नमस्कार करें:

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः। लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः। उमामहेश्वराभ्यां नमः। वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः। शचीपुरन्दराभ्यां नमः। मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः। इष्टदेवताभ्यो नमः। कुलदेवताभ्यो नमः। ग्रामदेवताभ्यो नमः। वास्तुदेवताभ्यो नमः। स्थानदेवताभ्यो नमः। एतत्कर्मप्रधानदेवताभ्यो नमः। सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः। सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः।

अर्थ: श्री गणेश, लक्ष्मी नारायण, उमा महेश्वर, सरस्वती ब्रह्मा, इंद्राणी इंद्र, माता पिता के चरण कमल, इष्टदेव, कुलदेव, ग्रामदेव, वास्तुदेव, स्थानदेव, इस कर्म के प्रधान देव, सभी देवता और सभी ब्राह्मणों को नमस्कार।

चरण 2: पूजन का संकल्प

दाहिने हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प करें। दो तरह के संकल्प हैं:

(क) निष्काम संकल्प (बिना किसी कामना के, केवल भगवान की प्रसन्नता के लिए):

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः अद्य ….. अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गार्चनं करिष्ये।

(ख) सकाम संकल्प (सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए):

….. सर्वाभीष्टस्वर्गापवर्गफलप्राप्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गार्चनं करिष्ये।

खाली जगह (…..) पर अपना नाम और गोत्र बोलें, जैसे “अद्य रामकुमार कश्यपगोत्रः अहं”। फिर जल भूमि पर छोड़ दें। पूरे विस्तृत संकल्प (संवत, मास, तिथि सहित) का प्रारूप हमारे गौरी गणेश पूजन विधि वाले लेख में दिया है।

अर्थ: “मैं (नाम) परमेश्वर की प्रसन्नता के लिए विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य और दुर्गा की पूजा करूँगा।”

चरण 3: घंटा पूजन

घंटे को चंदन और फूल से सजाकर यह प्रार्थना करें:

आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं च रक्षसाम्।
कुरु घण्टे वरं नादं देवतास्थानसंनिधौ॥

अर्थ: हे घंटा, देवताओं के आगमन और राक्षसी शक्तियों को भगाने के लिए देवस्थान के पास सुंदर नाद करो।

प्रार्थना के बाद घंटा बजाएँ और उसकी जगह रख दें। फिर “घण्टास्थिताय गरुडाय नमः” कहकर घंटे पर बने गरुड़ देव की भी पूजा करें।

चरण 4: शंख पूजन

शंख में दो कुश या दूब, तुलसी और फूल डालकर “ॐ” कहते हुए उसे सुगंधित जल से भरें। इस जल को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करें। फिर इस मंत्र से शंख में तीर्थों का आवाहन करें:

पृथिव्यां यानि तीर्थानि स्थावराणि चराणि च।
तानि तीर्थानि शङ्खेऽस्मिन् विशन्तु ब्रह्मशासनात्॥

अर्थ: पृथ्वी पर जितने भी स्थिर और चल तीर्थ हैं, वे ब्रह्मा जी की आज्ञा से इस शंख में प्रवेश करें।

फिर “शङ्खाय नमः, चन्दनं समर्पयामि” कहकर चंदन लगाएँ और “शङ्खाय नमः, पुष्पं समर्पयामि” कहकर फूल चढ़ाएँ। अब शंख को प्रणाम करें:

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे।
निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: हे पांचजन्य, आप प्राचीन काल में समुद्र से उत्पन्न हुए, भगवान विष्णु ने आपको हाथ में धारण किया, आपको नमस्कार है।

चरण 5: प्रोक्षण (पवित्रीकरण)

शंख में रखी पवित्री (कुश) से यह मंत्र पढ़ते हुए अपने ऊपर और पूजा सामग्री पर जल छिड़कें:

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः॥

अर्थ: कोई पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में हो, जो कमलनयन भगवान विष्णु का स्मरण करता है, वह बाहर और भीतर से पवित्र हो जाता है।

चरण 6: उदकुम्भ (कलश) पूजन

सुगंधित जल से भरे कलश की “उदकुम्भाय नमः” मंत्र से चंदन और फूल से पूजा करें और उसमें तीर्थों का आवाहन करें:

ॐ कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः।
मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः॥
अङ्गैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः।
अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा॥
सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः।
आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः॥
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥

अर्थ: कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण हैं। इसके पेट में सारे समुद्र, सात द्वीपों वाली पृथ्वी और चारों वेद हैं। गायत्री, सावित्री, शांति और पुष्टि देने वाली शक्तियाँ भी यहीं हैं। सारे समुद्र, नदियाँ और तीर्थ पापों का नाश करने के लिए देव पूजा में पधारें। हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी, आप इस जल में निवास करें।

(शुद्ध गंगाजल हो तो उसमें किसी और तीर्थ जल की आवश्यकता नहीं है।)

अब कलश की प्रार्थना करें:

देवदानवसंवादे मथ्यमाने महोदधौ।
उत्पन्नोऽसि तदा कुम्भ विधृतो विष्णुना स्वयम्॥
त्वत्तोये सर्वतीर्थानि देवाः सर्वे त्वयि स्थिताः।
त्वयि तिष्ठन्ति भूतानि त्वयि प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥
शिवः स्वयं त्वमेवासि विष्णुस्त्वं च प्रजापतिः।
आदित्या वसवो रुद्रा विश्वेदेवाः सपैतृकाः॥
त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि यतः कामफलप्रदाः।
त्वत्प्रसादादिमं यज्ञं कर्तुमीहे जलोद्भव।
सांनिध्यं कुरु मे देव प्रसन्नो भव सर्वदा॥

अर्थ: हे कुम्भ, देवों और दानवों के समुद्र मंथन के समय आप उत्पन्न हुए और स्वयं भगवान विष्णु ने आपको धारण किया। आपके जल में सारे तीर्थ और सारे देवता हैं। आप ही शिव, विष्णु और प्रजापति हैं। आपकी कृपा से मैं यह पूजा करना चाहता हूँ, आप सदा मेरे पास रहें और प्रसन्न रहें।

संक्षेप में: समय कम हो तो केवल अंतिम श्लोक “त्वयि तिष्ठन्ति सर्वेऽपि…” पढ़कर प्रार्थना कर सकते हैं।

चरण 7: पंचदेवों का ध्यान (अर्थ सहित)

अब पाँचों देवताओं का एक एक करके ध्यान करें। हर ध्यान के बाद अक्षत और फूल चढ़ाएँ।

1. भगवान विष्णु का ध्यान

उद्यत्कोटिदिवाकराभमनिशं शङ्खं गदां पङ्कजं
चक्रं बिभ्रतमिन्दिरावसुमतीसंशोभिपार्श्वद्वयम्।
कोटीराङ्गदहारकुण्डलधरं पीताम्बरं कौस्तुभैः
दीप्तं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्सचिह्नं भजे॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ विष्णवे नमः।

अर्थ: उगते हुए करोड़ों सूर्यों जैसी आभा वाले, चारों हाथों में शंख, गदा, पद्म और चक्र धारण किए, दोनों ओर लक्ष्मी और पृथ्वी देवी से सुशोभित, मुकुट, बाजूबंद, हार और कुंडल पहने, पीताम्बरधारी, कौस्तुभ मणि से दमकते और वक्षस्थल पर श्रीवत्स चिह्न वाले भगवान विष्णु का मैं निरंतर ध्यान करता हूँ।

2. भगवान शिव का ध्यान

ध्यायेन्नित्यं महेशं रजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलाङ्गं परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समन्तात् स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्वबीजं निखिलभयहरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ शिवाय नमः।

अर्थ: चाँदी के पर्वत जैसी श्वेत कांति वाले, सुंदर चंद्रमा को आभूषण की तरह धारण करने वाले, रत्नों के गहनों से दमकते, हाथों में परशु, मृग, वर और अभय मुद्रा लिए, प्रसन्न, कमल के आसन पर बैठे, देवताओं से घिरकर स्तुति पाने वाले, बाघ की खाल पहनने वाले, विश्व के आदि और बीज, सब भय हरने वाले, पाँच मुख और तीन नेत्र वाले महेश्वर का प्रतिदिन ध्यान करें।

3. श्री गणेश का ध्यान

खर्वं स्थूलतनुं गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं
प्रस्यन्दन्मदगन्धलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्।
दन्ताघातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकरं
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम्॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीगणेशाय नमः।

अर्थ: जो नाटे और मोटे शरीर वाले हैं, जिनका गजराज जैसा मुख और लम्बा उदर है, जो सुंदर हैं, जिनके गंडस्थल पर मद की सुगंध के लोभी भौंरे मंडराते हैं, जो सिंदूर जैसी शोभा धारण करते हैं, कामनाओं को पूरा करने वाले और सिद्धि देने वाले उन पार्वतीपुत्र गणेश जी की मैं वंदना करता हूँ।

4. सूर्यदेव का ध्यान

रक्ताम्बुजासनमशेषगुणैकसिन्धुं
भानुं समस्तजगतामधिपं भजामि।
पद्मद्वयाभयवरान् दधतं कराब्जैः
माणिक्यमौलिमरुणाङ्गरुचिं त्रिनेत्रम्॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीसूर्याय नमः।

अर्थ: लाल कमल के आसन पर बैठे, सारे गुणों के सागर, अपने हाथों में दो कमल, अभय और वर मुद्रा धारण करने वाले, माणिक्य का मुकुट पहने, लाल आभा वाले, तीन नेत्रों वाले, सारे जगत के स्वामी भगवान सूर्य का मैं ध्यान करता हूँ।

5. माँ दुर्गा का ध्यान

सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः
शङ्खं चक्रधनुःशरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता।
आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा
दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला॥

ध्यानार्थे अक्षतपुष्पाणि समर्पयामि ॐ श्रीदुर्गायै नमः।

अर्थ: जो सिंह पर विराजमान हैं, जिनके मस्तक पर चंद्रमा का मुकुट है, जो मरकत मणि जैसी कांति वाली चार भुजाओं में शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, तीन नेत्रों से सुशोभित हैं, बाजूबंद, हार, कंगन, खनकती करधनी और रुनझुन करते नूपुर पहने हैं और जिनके कानों में रत्नजड़ित कुंडल चमकते हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करें।

चरण 8: पुष्पांजलि और आवाहन

हाथ में फूल लेकर आवाहन के लिए पुष्पांजलि दें:

ॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।

फिर ऊपर बताए पंचायतन के क्रम से (मूर्ति न हो तो अक्षत के ढेरों पर) देवताओं का आवाहन करें:

आगच्छन्तु सुरश्रेष्ठा भवन्त्वत्र स्थिराः समे।
यावत् पूजां करिष्यामि तावत् तिष्ठन्तु संनिधौ॥

ॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, आवाहनार्थे पुष्पं समर्पयामि।

अर्थ: हे श्रेष्ठ देवताओं, आप सब यहाँ पधारें और स्थिर हों। जब तक मैं पूजा करूँ, तब तक आप यहीं विराजें।

ज़रूरी नियम: जो मूर्ति पहले से प्रतिष्ठित है, उसमें, और शालग्राम, बाणलिंग (नर्मदेश्वर), अग्नि और जल में आवाहन नहीं किया जाता। इनके लिए आवाहन की जगह केवल पुष्पांजलि दें।

चरण 9 से 30: षोडशोपचार पूजन के सभी मंत्र

अब हर उपचार का श्लोक पढ़ें, फिर नाम मंत्र बोलकर वह वस्तु चढ़ाएँ। हर नाम मंत्र में शुरुआत “ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः” से होती है (दूसरा पंचायतन हो तो उसका नाम मंत्र बोलें)।

9. आसन:

अनेकरत्नसंयुक्तं नानामणिगणान्वितम्।
कार्तस्वरमयं दिव्यमासनं परिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आसनार्थे तुलसीदलं समर्पयामि। (आसन के लिए तुलसीदल चढ़ाएँ।)

10. पाद्य (पैर धोने का जल):

गङ्गादिसर्वतीर्थेभ्य आनीतं तोयमुत्तमम्।
पाद्यार्थं सम्प्रदास्यामि गृह्णन्तु परमेश्वराः॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पादयोः पाद्यं समर्पयामि। (जल चढ़ाएँ।)

11. अर्घ्य:

गन्धपुष्पाक्षतैर्युक्तमर्घ्यं सम्पादितं मया।
गृह्णन्त्वर्घ्यं महादेवाः प्रसन्नाश्च भवन्तु मे॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि। (चंदन, फूल और अक्षत मिला जल चढ़ाएँ।)

12. आचमन:

कर्पूरेण सुगन्धेन वासितं स्वादु शीतलम्।
तोयमाचमनीयार्थं गृह्णन्तु परमेश्वराः॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आचमनीयं जलं समर्पयामि। (कपूर से सुगंधित ठंडा जल चढ़ाएँ।)

13. स्नान:

मन्दाकिन्याः समानीतैः कर्पूरागुरुवासितैः।
स्नानं कुर्वन्तु देवेशा जलैरेभिः सुगन्धिभिः॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, स्नानीयं जलं समर्पयामि। (शुद्ध जल से स्नान कराएँ।) फिर स्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि कहकर आचमन का जल दें।

14. पंचामृत स्नान:

पयो दधि घृतं चैव मधु च शर्करान्वितम्।
पञ्चामृतं मयाऽऽनीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि। (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर मिले पंचामृत से स्नान कराएँ।)

15. गंधोदक स्नान:

मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विमिश्रितम्।
इदं गन्धोदकं स्नानं कुङ्कुमाक्तं नु गृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, गन्धोदकं समर्पयामि। (मलय चंदन से सुगंधित जल से स्नान कराएँ।)

16. शुद्धोदक स्नान:

मलयाचलसम्भूतचन्दनागरुमिश्रितम्।
सलिलं देवदेवेश शुद्धस्नानाय गृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि। फिर शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि कहकर आचमन का जल दें।

17. वस्त्र और उपवस्त्र:

शीतवातोष्णसंत्राणे लोकलज्जानिवारणे।
देहालङ्करणे वस्त्रे भवद्भ्यो वाससी शुभे॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, वस्त्रमुपवस्त्रं च समर्पयामि। फिर वस्त्रोपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। (वस्त्र न हो तो मौली चढ़ाएँ।)

18. यज्ञोपवीत:

नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्।
उपवीतं मया दत्तं गृह्णन्तु परमेश्वराः॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, यज्ञोपवीतं समर्पयामि। फिर यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि।

19. चंदन:

श्रीखण्डं चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम्।
विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, चन्दनानुलेपनं समर्पयामि। (सुगंधित चंदन लगाएँ।)

20. पुष्प और पुष्पमाला:

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि भक्तितः।
मयाऽऽहृतानि पुष्पाणि पूजार्थं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, पुष्पाणि (पुष्पमालाम्) समर्पयामि।

21. तुलसीदल और मंजरी:

तुलसीं हेमरूपां च रत्नरूपां च मञ्जरीम्।
भवमोक्षप्रदां रम्यामर्पयामि हरिप्रियाम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, तुलसीदलं मञ्जरीं च समर्पयामि।

अब भगवान के आगे चौकोर जल का घेरा डालकर उसमें नैवेद्य की चीज़ें रखें, फिर धूप और दीप दिखाएँ।

22. धूप:

वनस्पतिरसोद्भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः।
आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, धूपमाघ्रापयामि। (धूप दिखाएँ।)

23. दीप:

साज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया।
दीपं गृह्णन्तु देवेशास्त्रैलोक्यतिमिरापहम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, दीपं दर्शयामि। (दीपक दिखाएँ, फिर हाथ धो लें।)

24. नैवेद्य (भोग):

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि च।
आहारं भक्ष्यभोज्यं च नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, नैवेद्यं निवेदयामि।

फिर बोलें: नैवेद्यान्ते ध्यानं ध्यानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि। उत्तरापोशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं च जलं समर्पयामि।

नैवेद्य देने के बाद ऐसे ध्यान करें मानो भगवान भोग लगा रहे हैं। फिर आचमन, हाथ धोने और मुख धोने के लिए जल दें।

25. ऋतुफल:

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव।
तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि। फिर मध्ये आचमनीयम् उत्तरापोऽशनं च जलं समर्पयामि।

26. ताम्बूल (पान):

पूगीफलं महद् दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम्।
एलालवंगसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि। (सुपारी, इलायची और लौंग के साथ पान चढ़ाएँ।)

27. दक्षिणा:

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः।
अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, दक्षिणां समर्पयामि।

28. आरती:

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्।
आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मां वरदो भव॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, आरार्तिकं समर्पयामि। (कपूर से आरती करें और आरती के बाद थोड़ा जल गिरा दें। आप अपने इष्ट देव की प्रचलित आरती भी गा सकते हैं।)

शंख भ्रामण: जल से भरे शंख को पाँच बार भगवान के चारों ओर घुमाएँ:

शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि।
अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यां व्यपोहति॥

फिर शंख को उसकी जगह रखें, भगवान का अँगोछा भी घुमा दें। दोनों हथेलियों से आरती लें, हाथ धो लें, और शंख का जल अपने ऊपर और उपस्थित लोगों पर छिड़क दें।

29. प्रदक्षिणा:

यह मंत्र पढ़ते हुए चार बार परिक्रमा करें (जगह न हो तो अपने आसन पर ही चार बार घूम जाएँ):

यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, प्रदक्षिणां समर्पयामि।

अर्थ: पिछले जन्मों में किए गए जो भी पाप हैं, वे प्रदक्षिणा के हर कदम के साथ नष्ट हो जाएँ।

30. मंत्र पुष्पांजलि और नमस्कार:

श्रद्धया सिक्तया भक्त्या हार्दप्रेम्णा समर्पितः।
मन्त्रपुष्पाञ्जलिश्चायं कृपया प्रतिगृह्यताम्॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि। (भगवान के सामने पुष्पांजलि अर्पित करें।)

नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे।
सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणे नमः॥

ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः, प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान् समर्पयामि। (प्रार्थना करते हुए नमस्कार करें।)

पूजा का समापन

भक्तों को शतांश: इसके बाद विष्वक्सेन, शुक आदि भक्तों के नाम पर नैवेद्य का थोड़ा सा हिस्सा (निर्माल्य) जल में दे दें। शास्त्र कहता है कि भगवान और भक्त में अंतर नहीं होता, इसलिए इन संतों का नाम लेना ही उत्तम है।

चरणामृत पान: चरणामृत पात्र में लेकर ग्रहण करें और थोड़ा सिर पर भी लगा लें:

अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।
विष्णुपादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते॥

क्षमा याचना: पूजा में हुई किसी भी भूल के लिए श्रद्धा से क्षमा माँगें:

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम।
तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष मां परमेश्वर॥

अर्थ: हे जनार्दन, मेरी पूजा मंत्र, क्रिया और भक्ति से हीन हो सकती है, फिर भी उसे पूर्ण मानें। मैं आवाहन, विसर्जन और पूजा की विधि ठीक से नहीं जानता, मुझे क्षमा करें। आपके सिवा मेरी कोई शरण नहीं, करुणा करके मेरी रक्षा करें।

प्रसाद ग्रहण: भगवान पर चढ़े फूल को सिर पर धारण करें और बचे चंदन को प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। अंत में यह बोलकर पूरा कर्म भगवान को समर्पित कर दें:

ॐ तत्सद् ब्रह्मार्पणमस्तु। ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः, ॐ विष्णवे नमः।

10 मिनट की आसान पंचदेव पूजा (नाम मंत्र से)

जिन्हें श्लोक पढ़ने में कठिनाई हो, वे शास्त्र की अनुमति के अनुसार केवल नाम मंत्र से षोडशोपचार पूजा कर सकते हैं:

क्रमक्या करेंबोलें
1पवित्रीकरण और आचमनॐ अपवित्रः पवित्रो वा… या तीन बार “ॐ पुण्डरीकाक्षः पुनातु”
2गणेश स्मरणॐ श्रीगणेशाय नमः
3संकल्प“मैं (नाम) पंचदेवों की पूजा करता हूँ”
4ध्यान और आवाहनॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, ध्यायामि, आवाहयामि
5जल, स्नानॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः, स्नानं समर्पयामि
6चंदन, रोली, अक्षत…गन्धाक्षतान् समर्पयामि
7फूल, तुलसी, बिल्वपत्र, दूर्वा…पुष्पाणि समर्पयामि
8धूप, दीप…धूपं दीपं दर्शयामि
9नैवेद्य, फल…नैवेद्यं निवेदयामि
10आरती और नमस्कार…आरार्तिकं समर्पयामि, नमस्करोमि
11क्षमा प्रार्थनाआवाहनं न जानामि…

यदि कोई सामग्री न हो, तो उसे मन से अर्पित कर सकते हैं, जैसे “पुष्पाणि मनसा परिकल्प्य समर्पयामि” (फूल मन से कल्पना करके अर्पित करता हूँ)।

किसी एक देवता की पूजा इसी विधि से कैसे करें

नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार किसी भी एक देवता की पूजा इन्हीं मंत्रों से की जा सकती है, केवल नाम मंत्र बदलना होता है:

  • पंचदेव पूजा में पाँच देवों के लिए बहुवचन है (“गृह्णन्तु परमेश्वराः”)। एक देवता के लिए एकवचन करें (“गृहाण परमेश्वर”)।
  • देवी की पूजा में पुल्लिंग की जगह स्त्रीलिंग करें, जैसे “ॐ दुर्गायै नमः”।
  • नाम मंत्र में उस देवता का नाम लें, जैसे “ॐ नमः शिवाय, पाद्यं समर्पयामि”।

पंचदेव पूजा के नियम (शास्त्रों से)

नियमक्या करें
फूल धोनाफूल को जल में डुबाकर धोना मना है, केवल जल छिड़क दें
फूल चढ़ाने का ढंगफूल, फल और पत्ते जैसे उगते हैं वैसे ही चढ़ाएँ, यानी मुख ऊपर की ओर
दूर्वा और तुलसीइनका मुख अपनी ओर रखकर चढ़ाएँ
बिल्वपत्रनीचे की ओर मुख करके चढ़ाएँ
फूल चढ़ाने की उँगलियाँदाहिने हाथ की हथेली ऊपर करके मध्यमा, अनामिका और अँगूठे से
चढ़े फूल उतारनाअँगूठे और तर्जनी से उतारें
जलबासी जल वर्जित, पर गंगाजल या तीर्थ जल बासी नहीं होता
शंखजल में न डुबाएँ, सीधे ज़मीन पर न रखें
चंदनपतला न हो, ताँबे के पात्र में न रखें
फूलहाथ में रखकर न चढ़ाएँ (थाली या पात्र में रखें)
आवाहनप्रतिष्ठित मूर्ति, शालग्राम, बाणलिंग, अग्नि और जल में नहीं

किस देवता की कितनी परिक्रमा: शास्त्र का वचन है “एका चण्ड्या रवेः सप्त तिस्रः कार्या विनायके। हरेश्चतस्रः कर्तव्याः शिवस्यार्धप्रदक्षिणा॥”

देवतापरिक्रमा
देवी (चंडी, दुर्गा)1
सूर्य7
गणेश3
विष्णु4
शिवआधी (जलधारी को लाँघते नहीं)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पंचदेव कौन कौन से हैं?

भगवान विष्णु, भगवान शिव, श्री गणेश, सूर्यदेव और माँ दुर्गा (देवी), ये पाँच देवता पंचदेव कहलाते हैं।

पंचदेव पूजा का मुख्य मंत्र क्या है?

सभी पाँच देवों के लिए नाम मंत्र है “ॐ विष्णुशिवगणेशसूर्यदुर्गाभ्यो नमः”, और विष्णु पंचायतन की षोडशोपचार पूजा में “ॐ विष्णुपञ्चायतनदेवताभ्यो नमः”।

पंचायतन में देवताओं को कैसे रखें?

विष्णु पंचायतन में विष्णु बीच में, ऊपर बाएँ शिव, ऊपर दाएँ गणेश, नीचे बाएँ देवी और नीचे दाएँ सूर्य। दूसरे पंचायतनों का क्रम ऊपर की तालिका में दिया है।

क्या पंचदेव पूजा रोज़ करनी चाहिए?

हाँ, नित्यकर्म पूजाप्रकाश के अनुसार प्रतिदिन पंचदेव पूजा अवश्य करनी चाहिए। समय कम हो तो नाम मंत्र से 10 मिनट की पूजा भी की जा सकती है।

मूर्ति न हो तो पंचदेव पूजा कैसे करें?

चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर पाँच जगह अक्षत के छोटे ढेर बनाएँ और पंचायतन के क्रम से उन्हीं पर पाँचों देवों का आवाहन करें।

मंत्र न आते हों तो क्या करें?

शास्त्र कहता है कि वेद मंत्र न आएँ तो पुराण के श्लोक से, वे भी न आएँ तो नाम मंत्र से, और यह भी न हो तो बिना मंत्र के जल और चंदन चढ़ाकर पूजा करें। भाव सबसे ज़रूरी है।

पंचदेव पूजा में कितना समय लगता है?

पूरी षोडशोपचार विधि में लगभग 40 से 60 मिनट, और नाम मंत्र वाली आसान पूजा में 10 से 15 मिनट।

मानस पूजा क्या है?

बाहरी सामग्री चढ़ाने से पहले मन में भगवान को गंध, फूल, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करना। शास्त्रों में इसे बाहरी पूजा से कहीं अधिक फल देने वाली बताया गया है।

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आप अपने घर में कौन सा पंचायतन रखते हैं, विष्णु, शिव, गणेश, सूर्य या देवी, कमेंट में ज़रूर बताइए। हमारे वीडियो देखने के लिए SanatanSci YouTube चैनल से जुड़िए।

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