रहीम के दोहे अर्थ सहित: 65 प्रसिद्ध दोहे, NCERT कक्षा 6, 7 और 9 वाले दोहे भी (Rahim Ke Dohe)

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Rahim ke dohe यानी अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना के दोहे, जो चार सौ साल से ज़्यादा पुराने होकर भी आज के रिश्तों, दोस्ती, पैसे और मान सम्मान पर उतने ही सही बैठते हैं। इस लेख में रहीम के 65 प्रसिद्ध दोहे हैं, हर एक का सरल हिंदी अर्थ और एक लाइन की सीख के साथ। दोहे विषय के हिसाब से रखे गए हैं (प्रेम, दोस्ती, विनम्रता, समय, दान, वाणी, सम्मान और भक्ति), ताकि आप अपनी ज़रूरत का दोहा जल्दी ढूँढ सकें।

स्कूल के बच्चों के लिए अलग से बताया गया है कि NCERT की कक्षा 6, 7 और 9 की किताबों में रहीम के कौन से दोहे आते हैं, ब्रज भाषा के कठिन शब्दों का अर्थ क्या है, और परीक्षा में किसी दोहे की व्याख्या कैसे लिखें।

बातजानकारी
पूरा नामअब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना (ख़ानज़ादा मिर्ज़ा ख़ान अब्दुर्रहीम)
जन्म1556 ई., लाहौर
मृत्यु1627 ई., 71 वर्ष की आयु में; मक़बरा दिल्ली में
पिताबैरम ख़ाँ, अकबर के संरक्षक
दरबारअकबर के नवरत्नों में से एक
भाषादोहे मुख्य रूप से ब्रज और अवधी में; फ़ारसी, अरबी, संस्कृत के भी विद्वान
दोहों में अपना नाम“रहिमन” या “रहीम”

विषय सूची

रहीम के 10 सबसे प्रसिद्ध दोहे (एक नज़र में)

ये वे दोहे हैं जो सबसे ज़्यादा पढ़े, सुने और परीक्षा में पूछे जाते हैं। हर दोहे का पूरा अर्थ नीचे उसकी संख्या पर मिलेगा।

दोहे की पहली पंक्तिएक लाइन में अर्थसंख्या
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकायप्रेम का रिश्ता टूटकर जुड़े, तो गाँठ रह जाती है1
रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सूनइज़्ज़त, चमक और पानी के बिना सब बेकार53
रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारिछोटी चीज़ को भी कम मत समझो, सुई का काम तलवार नहीं करती16
तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पानसज्जन अपनी संपत्ति दूसरों के भले के लिए जोड़ते हैं38
बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोयबात एक बार बिगड़ जाए तो फटे दूध की तरह नहीं सुधरती30
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंगअच्छे स्वभाव वाले पर बुरी संगत का असर नहीं होता10
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जायसब कुछ समय से होता है, पछताने से कुछ नहीं बदलता26
रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेरबुरे दिनों में धीरज रखो, अच्छे दिन आते देर नहीं लगती27
एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जायएक काम पर पूरा ध्यान दो, सब एक साथ साधोगे तो सब बिगड़ेगा61
रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पतालबिना सोचे बोली गई बात की सज़ा सिर को भुगतनी पड़ती है46

NCERT की किताबों में रहीम के कौन से दोहे आते हैं?

रहीम के दोहे कई कक्षाओं की हिंदी किताबों में हैं। नीचे की सूची हिंदी साहित्य की वेबसाइट हिंदवी के NCERT वाले वर्गीकरण के आधार पर है। किताबें समय समय पर बदलती हैं, इसलिए एक बार अपनी किताब से मिला लें।

कक्षादोहे (इस लेख में संख्या)
कक्षा 6धागा प्रेम का (1), संपत्ति सगे (9), देखि बड़ेन को (16), बिपदाहू भली (28), तरुवर फल (38), जिह्वा बावरी (46), पानी राखिये (53)
कक्षा 7संपत्ति सगे (9), धरती की सी रीत (32), थोथे बादर (33), जाल परे जल (37), तरुवर फल (38)
कक्षा 9 (11 दोहे)धागा प्रेम का (1), देखि बड़ेन को (16), धनि रहीम जल पंक (23), बिगरी बात (30), चित्रकूट में रमि रहे (31), नाद रीझि (40), निज संपति बिना (41), निज मन की बिथा (49), दीरघ दोहा (52), पानी राखिये (53), एकै साधे (61)

प्रेम और रिश्तों पर रहीम के दोहे

1. रहिमन धागा प्रेम का

रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय।
टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय॥

अर्थ: रहीम कहते हैं कि प्रेम का धागा (रिश्ता) झटके से मत तोड़ो। एक बार टूट जाए, तो वह पहले जैसा नहीं जुड़ता, और अगर जुड़ भी जाए तो बीच में गाँठ पड़ जाती है।

सीख: ग़ुस्से में एक कड़वी बात रिश्ते में ऐसी गाँठ डाल देती है जो माफ़ी के बाद भी महसूस होती है, इसलिए रिश्ते सँभालकर रखिए।

रहिमन धागा प्रेम का: रस्सी में पड़ी गाँठ, जैसे टूटे रिश्ते में रह जाती है
टूटा धागा जुड़ भी जाए, तो गाँठ रह जाती है

2. टूटे सुजन मनाइए

टूटे सुजन मनाइए, जौ टूटे सौ बार।
रहिमन फिरि फिरि पोहिए, टूटे मुक्ताहार॥

अर्थ: अच्छे लोग (सज्जन) अगर रूठ जाएँ, तो उन्हें मनाते रहना चाहिए, चाहे वे सौ बार रूठें। जैसे मोतियों का हार टूट जाए, तो हम बार बार मोती पिरोते हैं, क्योंकि मोती क़ीमती हैं।

सीख: अच्छे दोस्त और अच्छे रिश्तेदार मोती जैसे हैं, उन्हें मनाने में अहं मत आने दीजिए।

3. जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग जोय।
मँड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय॥

अर्थ: दुनिया देखती है कि गन्ने में जहाँ गाँठ होती है, वहाँ रस नहीं होता। यानी जिस रिश्ते में मन की गाँठ पड़ जाए, वहाँ प्रेम नहीं रहता। पर विवाह के मंडप के नीचे जो गाँठ (गठबंधन) बँधती है, उसमें हर गाँठ में रस (प्रेम) होता है।

सीख: मन में गाँठ रखना रिश्ते को सुखा देता है; जो बंधन प्रेम से बाँधा जाए, वही मीठा होता है।

4. जे सुलगे ते बुझि गए

जे सुलगे ते बुझि गए, बुझे ते सुलगे नाहिं।
रहिमन दाहे प्रेम के, बुझि बुझि कै सुलगाहिं॥

अर्थ: आग में जो चीज़ें सुलगीं, वे बुझ गईं, और बुझी हुई चीज़ें फिर नहीं सुलगतीं। लेकिन प्रेम में जले लोग बुझ बुझकर भी बार बार सुलग उठते हैं।

सीख: सच्चा प्रेम दूरी और समय से ख़त्म नहीं होता, वह फिर फिर जाग उठता है।

5. कहि रहीम इक दीप तें

कहि रहीम इक दीप तें, प्रगट सबै दुति होय।
तन सनेह कैसे दुरै, दृग दीपक जरु दोय॥

अर्थ: एक दीपक जलने से ही घर की सारी चीज़ें दिखने लगती हैं। तो जब आँखों के रूप में दो दीपक जल रहे हों, तब मन का प्रेम कैसे छिप सकता है?

सीख: मन का प्रेम आँखों में दिख ही जाता है, उसे शब्दों की ज़रूरत नहीं होती।

6. एक उदर दो चोंच है

एक उदर दो चोंच है, पंछी एक कुरंड।
कहि रहीम कैसे जिए, जुदे जुदे दो पिंड॥

अर्थ: कुरंड नाम के पक्षी का एक ही पेट होता है पर दो चोंचें। रहीम पूछते हैं कि ऐसे पक्षी के दो हिस्से अलग अलग शरीर बनकर कैसे जी सकते हैं? यानी जिनका जीवन एक है (जैसे पति पत्नी), वे अलग होकर नहीं जी सकते।

सीख: जीवनसाथी एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों का सुख दुख एक ही पेट जैसा साझा है।

7. नैन सलोने अधर मधु

नैन सलोने अधर मधु, कहि रहीम घटि कौन।
मीठो भावै लोन पर, अरु मीठे पर लौन॥

अर्थ: आँखें सलोनी (नमक जैसी सुंदर) हैं और होंठ मधु जैसे मीठे। इनमें कौन कम है? नमकीन खाने के बाद मीठा अच्छा लगता है और मीठे के बाद नमकीन। दोनों मिलकर ही सुंदरता पूरी होती है।

सीख: अलग अलग गुण एक दूसरे को पूरा करते हैं, इसलिए तुलना की जगह दोनों की क़द्र कीजिए।

8. आवत काज रहीम कहि

आवत काज रहीम कहि, गाढ़े बंधु सनेह।
जीरन होत न पेड़ ज्यौं, थामे बरै बरेह॥

अर्थ: मुश्किल समय में अपने लोगों (भाई बंधु) का गहरा प्रेम ही काम आता है। जैसे बरगद का पेड़ बूढ़ा होकर भी नहीं गिरता, क्योंकि उसकी लटकती जड़ें (बरोह) उसे थामे रहती हैं।

सीख: परिवार और सच्चे रिश्ते बरगद की बरोह जैसे हैं, बुढ़ापे और संकट में यही सहारा देते हैं।

सच्चे मित्र और संगति पर रहीम के दोहे

9. कहि रहीम संपत्ति सगे

कहि रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहु रीत।
बिपति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत॥

अर्थ: जब तक हमारे पास धन संपत्ति है, तब तक तरह तरह से बहुत लोग सगे बन जाते हैं। लेकिन सच्चे मित्र वही हैं जो मुसीबत की कसौटी पर खरे उतरें।

सीख: दोस्त की पहचान अच्छे दिनों में नहीं, बुरे दिनों में होती है।

10. जो रहीम उत्तम प्रकृति

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करि सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लपटे रहत भुजंग॥

अर्थ: जिसका स्वभाव अच्छा है, उसका बुरी संगत कुछ नहीं बिगाड़ सकती। चंदन के पेड़ से साँप लिपटे रहते हैं, फिर भी चंदन में ज़हर नहीं फैलता।

सीख: अपने स्वभाव और संस्कार मज़बूत हों, तो माहौल आपको नहीं बदल सकता।

11. कदली, सीप, भुजंग मुख

कदली, सीप, भुजंग-मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन॥

अर्थ: स्वाति नक्षत्र की एक ही बूँद केले (कदली) में गिरे तो कपूर बनती है, सीप में गिरे तो मोती, और साँप के मुँह में गिरे तो ज़हर। जैसी संगत में बैठोगे, वैसा ही फल मिलेगा।

सीख: आप किनके साथ समय बिताते हैं, वही तय करता है कि आप क्या बनेंगे।

12. कहु रहीम कैसे निभै

कहु रहीम कैसे निभै, बेर केर को संग।
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग॥

अर्थ: बेर (काँटेदार झाड़ी) और केले का साथ कैसे निभ सकता है? बेर तो अपनी मस्ती में हिलता डुलता है, पर उसके काँटों से केले के कोमल पत्ते फट जाते हैं।

सीख: स्वभाव से बिल्कुल उलटे और चुभने वाले लोगों का साथ कोमल मन वाले को ही नुक़सान देता है।

13. रहिमन ओछे नरन सों

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भली ना प्रीति।
काटे चाटे स्वान के, दोउ भाँति बिपरीति॥

अर्थ: नीच (ओछे) लोगों से न दुश्मनी अच्छी, न दोस्ती। जैसे कुत्ता काटे तो भी बुरा और चाटे तो भी बुरा, दोनों तरह से नुक़सान ही है।

सीख: कुछ लोगों से दूरी ही सबसे अच्छा रिश्ता है।

14. रहिमन छोटे नरन सों

रहिमन छोटे नरन सों, होत बड़ो नहीं काम।
मढ़ो दमामो ना बने, सौ चूहे के चाम॥

अर्थ: छोटी सोच वाले लोगों से बड़ा काम नहीं होता। सौ चूहों की खाल जोड़ दो, तब भी उससे नगाड़ा (दमामा) नहीं मढ़ा जा सकता।

सीख: बड़े काम के लिए बड़ी सोच वाले साथी चुनिए, गिनती से काम नहीं बनता।

बड़प्पन और विनम्रता पर रहीम के दोहे

15. बड़े बड़ाई ना करैं

बड़े बड़ाई ना करैं, बड़ो न बोलैं बोल।
रहिमन हीरा कब कहै, लाख टका मेरो मोल॥

अर्थ: जो सच में बड़े होते हैं, वे अपनी बड़ाई ख़ुद नहीं करते और बड़बोले नहीं होते। हीरा कभी नहीं कहता कि मेरा मोल लाख टके का है।

सीख: काम बोलता है; अपनी तारीफ़ ख़ुद करने से क़ीमत घटती है, बढ़ती नहीं।

16. रहिमन देखि बड़ेन को

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिये डारि।
जहाँ काम आवे सुई, कहा करे तलवारि॥

अर्थ: बड़ी चीज़ों को देखकर छोटी चीज़ों को फेंक नहीं देना चाहिए। जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार क्या कर सकती है?

सीख: हर व्यक्ति और हर चीज़ की अपनी जगह है; किसी को छोटा समझकर अनदेखा मत कीजिए।

17. जो बड़ेन को लघु कहें

जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाँहि।
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं॥

अर्थ: बड़े लोगों को कोई छोटा कह दे, तो वे छोटे नहीं हो जाते। पर्वत उठाने वाले श्रीकृष्ण (गिरधर) को कोई मुरली वाला (मुरलीधर) कहे, तो वे बुरा नहीं मानते।

सीख: जिसका क़द बड़ा है, वह छोटे नाम या ताने से विचलित नहीं होता।

18. ओछो काम बड़े करैं

ओछो काम बड़े करैं तौ न बड़ाई होय।
ज्यों रहीम हनुमंत को, गिरधर कहै न कोय॥

अर्थ: बड़े लोग भी छोटा काम करें तो उनकी बड़ाई नहीं होती। हनुमान जी ने पूरा पर्वत उठा लिया था, फिर भी उन्हें कोई “गिरधर” नहीं कहता।

सीख: नाम और सम्मान काम के तरीके और समय से मिलता है, सिर्फ़ ताक़त से नहीं।

19. छिमा बड़न को चाहिए

छिमा बड़न को चाहिए, छोटेन को उतपात।
का रहिमन हरि को घट्यो, जो भृगु मारी लात॥

अर्थ: बड़ों को क्षमा करना शोभा देता है, छोटे तो उत्पात करते ही हैं। भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु की छाती पर लात मारी थी, तो इससे भगवान का क्या घट गया? उन्होंने क्षमा कर दिया।

सीख: माफ़ करना कमज़ोरी नहीं, बड़प्पन की पहचान है।

20. जो रहीम ओछो बढ़ै

जो रहीम ओछो बढ़ै, तौ अति ही इतराय।
प्यादे सों फरजी भयो, टेढ़ो टेढ़ो जाय॥

अर्थ: ओछा (छोटे मन का) आदमी थोड़ा आगे बढ़ जाए, तो बहुत इतराने लगता है। जैसे शतरंज में प्यादा फ़र्ज़ी (वज़ीर) बन जाए, तो टेढ़ी चाल चलने लगता है।

सीख: तरक़्क़ी मिलने पर विनम्र रहिए, घमंड तरक़्क़ी को छोटा कर देता है।

21. आप न काहू काम के

आप न काहू काम के, डार पात फल फूल।
औरन को रोकत फिरै, रहिमन पेड़ बबूल॥

अर्थ: बबूल के पेड़ की डाल, पत्ते, फल और फूल ख़ुद किसी काम के नहीं, ऊपर से वह अपने काँटों से दूसरों का रास्ता भी रोकता है।

सीख: ख़ुद कुछ न करना और दूसरों के काम में अड़चन डालना, यह बबूल वाला स्वभाव है; इससे बचिए।

22. करत निपुनई गुन बिना

करत निपुनई गुन बिना, रहिमन निपुन हजूर।
मानहु टेरत बिटप चढ़ि, मोहि समान को कूर॥

अर्थ: जो व्यक्ति बिना गुण के, गुणी लोगों के सामने अपनी चतुराई दिखाता है, वह मानो पेड़ पर चढ़कर पुकार रहा है कि “मेरे जैसा मूर्ख कौन है?”

सीख: जानकारों के सामने दिखावा करने से अपनी कमी ही ज़ाहिर होती है; सीखने का भाव रखिए।

23. धनि रहीम जल पंक को

धनि रहीम जल पंक को, लघु जिय पिअत अघाय।
उदधि बड़ाई कौन है, जगत पिआसो जाय॥

अर्थ: कीचड़ वाला थोड़ा सा पानी भी धन्य है, जिससे छोटे जीव पेट भर पानी पी लेते हैं। उस समुद्र की क्या बड़ाई, जिसके पास से सारा संसार प्यासा लौट जाता है?

सीख: बड़ा वह है जो किसी के काम आए, सिर्फ़ आकार या दौलत से कोई बड़ा नहीं होता।

24. सीत हरत, तम हरत नित

सीत हरत, तम हरत नित, भुवन भरत नहिं चूक।
रहिमन तेहि रबि को कहा, जो घटि लखै उलूक॥

अर्थ: सूरज रोज़ ठंड और अंधेरा दूर करता है और बिना चूके सारे संसार को रोशनी से भर देता है। अगर उल्लू को वह कम दिखता है, तो इसमें सूरज का क्या दोष?

सीख: कुछ लोग आपके अच्छे काम को कभी नहीं देखेंगे; इससे आपके काम की क़ीमत कम नहीं होती।

25. रहिमन अब वे बिरछ कहँ

रहिमन अब वे बिरछ कहँ, जिनकी छाँह गँभीर।
बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड़, कुँज, करीर॥

अर्थ: अब वे पेड़ कहाँ रहे जिनकी छाँव घनी होती थी? अब तो बाग़ों में बीच बीच में थूहर, झाड़ियाँ और करील ही दिखते हैं। यानी बड़े दिल वाले, सहारा देने वाले लोग कम हो गए हैं।

सीख: घनी छाँव वाला पेड़ बनिए, जिसके नीचे दूसरों को सहारा मिले।

समय, धैर्य और मुसीबत पर रहीम के दोहे

26. समय पाय फल होत है

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय।
सदा रहे नहिं एक सी, का रहीम पछिताए॥

अर्थ: समय आने पर पेड़ पर फल लगते हैं, और समय आने पर झड़ भी जाते हैं। हालत हमेशा एक जैसी नहीं रहती, तो फिर पछताना किस बात का?

सीख: अच्छा और बुरा, दोनों समय गुज़र जाते हैं; पछतावे में समय मत गँवाइए।

27. रहिमन चुप हो बैठिये

रहिमन चुप हो बैठिये, देखि दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं, बनत न लगिहैं देर॥

अर्थ: जब दिन ख़राब चल रहे हों, तो चुप रहकर धीरज रखना चाहिए। जब अच्छे दिन आएँगे, तो काम बनते देर नहीं लगेगी।

सीख: बुरे वक़्त में शोर और शिकायत की जगह धैर्य और तैयारी रखिए।

28. रहिमन बिपदाहू भली

रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय।
हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोय॥

अर्थ: थोड़े दिनों की विपत्ति भी अच्छी होती है, क्योंकि उसी में पता चलता है कि इस संसार में कौन हमारा हितैषी है और कौन नहीं।

सीख: मुसीबत अपनों और परायों की असली पहचान करा देती है।

29. समय परे ओछे बचन

समय परे ओछे बचन, सब के सहै रहीम।
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम॥

अर्थ: बुरा समय आने पर सबके ओछे वचन सहने पड़ते हैं। भरी सभा में दुःशासन ने द्रौपदी का वस्त्र पकड़ा, और भीम हाथ में गदा लिए भी (समय के बंधन के कारण) चुप रहे।

सीख: कभी कभी सही समय का इंतज़ार करना ही समझदारी होती है।

30. बिगरी बात बनै नहीं

बिगरी बात बनै नहीं, लाख करौ किन कोय।
रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय॥

अर्थ: एक बार बात बिगड़ जाए, तो लाख कोशिश करने पर भी नहीं बनती। जैसे फटे दूध को कितना भी मथो, उससे मक्खन नहीं निकलता।

सीख: बोलने और करने से पहले सोचिए, क्योंकि कुछ नुक़सान वापस नहीं होते।

31. चित्रकूट में रमि रहे

चित्रकूट में रमि रहे, रहिमन अवध-नरेस।
जा पर बिपदा पड़त है, सो आवत यह देस॥

अर्थ: अवध के राजा श्रीराम वनवास के समय चित्रकूट में रहे थे। रहीम कहते हैं कि जिस पर विपत्ति पड़ती है, वही इस प्रदेश में आता है।

सीख: मुसीबत बड़े से बड़े पर भी आती है; श्रीराम ने भी उसे धैर्य से निभाया।

32. धरती की सी रीत है

धरती की-सी रीत है, सीत घाम औ मेह।
जैसी परे सो सहि रहे, त्यों रहीम यह देह॥

अर्थ: धरती ठंड, धूप और बारिश, सब कुछ सह लेती है। उसी तरह मनुष्य के शरीर को भी जैसा समय आए, वैसा सहना चाहिए।

सीख: धरती जैसी सहनशीलता हर मौसम में टिके रहना सिखाती है।

33. थोथे बादर क्वार के

थोथे बादर क्वार के, ज्यों रहीम घहरात।
धनी पुरुष निर्धन भए, करें पाछिली बात॥

अर्थ: क्वार (आश्विन) महीने के खाली बादल बरसते नहीं, बस गरजते हैं। उसी तरह जो अमीर ग़रीब हो जाते हैं, वे अपने पुराने दिनों की बड़ी बड़ी बातें ही करते रहते हैं।

सीख: बीते दिनों की शेख़ी से आज का काम नहीं चलता।

34. ऊगत जाही किरन सों

ऊगत जाही किरन सों अथवत ताही काँति।
त्यौं रहीम सुख दुख सवै, बढ़त एक ही भाँति॥

अर्थ: सूरज जिस लालिमा के साथ उगता है, उसी लालिमा के साथ डूबता है। उसी तरह सुख और दुख भी एक ही तरह बढ़ते और ढलते हैं।

सीख: सुख में अकड़िए नहीं और दुख में टूटिए नहीं; दोनों एक ही चक्र के हिस्से हैं।

35. पावस देखि रहीम मन

पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन।
अब दादुर बक्ता भए, हमको पूछत कौन॥

अर्थ: बरसात आते ही कोयल चुप हो जाती है। वह सोचती है कि अब तो मेंढक बोलने वाले बन गए हैं, हमें कौन पूछेगा?

सीख: जहाँ शोर करने वालों का राज हो, वहाँ समझदार लोग चुप रहना चुनते हैं; सही समय पर बोलिए।

36. असमय परे रहीम कहि

असमय परे रहीम कहि, माँगि जात तजि लाज।
ज्यों लछमन माँगन गए, पारासर के नाज॥

अर्थ: बुरा समय आने पर बड़े लोग भी संकोच छोड़कर माँगने चले जाते हैं, जैसे (कथा के अनुसार) लक्ष्मण पाराशर ऋषि के यहाँ अनाज माँगने गए थे।

सीख: मुसीबत में मदद माँगना शर्म की बात नहीं, समय की ज़रूरत है।

37. जाल परे जल जात बहि

जाल परे जल जात बहि, तजि मीनन को मोह।
रहिमन मछरी नीर को तऊ न छाँड़ति छोह॥

अर्थ: जब नदी में जाल डाला जाता है, तो पानी मछलियों का मोह छोड़कर बह जाता है। फिर भी मछली पानी का प्रेम नहीं छोड़ती और उससे अलग होकर मर जाती है।

सीख: सच्चा प्रेम एकतरफ़ा भी हो सकता है; मछली जैसा प्रेम दुर्लभ है।

दान, परोपकार और धन पर रहीम के दोहे

38. तरुवर फल नहिं खात हैं

तरुवर फल नहिं खात हैं, सरवर पियहिं न पान।
कहि रहीम पर काज हित, संपति सँचहि सुजान॥

अर्थ: पेड़ अपने फल ख़ुद नहीं खाते, और तालाब अपना पानी ख़ुद नहीं पीते। उसी तरह सज्जन लोग दूसरों के भले के लिए धन जोड़ते हैं।

सीख: कमाई का एक हिस्सा दूसरों के काम आए, तभी वह संपत्ति सार्थक है।

39. रहिमन वे नर मर चुके

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।
उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहिं॥

अर्थ: जो लोग किसी से माँगने जाते हैं, वे मरे हुए के समान हैं। लेकिन उनसे भी पहले वे मर चुके हैं, जिनके मुँह से (माँगने वाले को देने के लिए) “हाँ” नहीं निकलता।

सीख: ज़रूरतमंद को ख़ाली हाथ लौटाना माँगने से भी बुरा है।

40. नाद रीझि तन देत मृग

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत।
ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछू न देत॥

अर्थ: संगीत की ध्वनि पर मोहित होकर हिरण अपना शरीर तक दे देता है (शिकारी के पास आ जाता है)। मनुष्य भी प्रसन्न होकर प्रेम सहित धन देता है। लेकिन जो प्रसन्न होकर भी कुछ नहीं देते, वे पशु से भी गए बीते हैं।

सीख: किसी कला या मदद से ख़ुश हुए हों, तो उसकी क़द्र जताइए।

41. रहिमन निज संपति बिना

रहिमन निज संपति बिना, कोउ न बिपति सहाय।
बिनु पानी ज्यों जलज को, नहिं रवि सके बचाय॥

अर्थ: अपनी संपत्ति न हो, तो मुसीबत में कोई सहायक नहीं होता। जैसे तालाब में पानी न रहे, तो सूरज भी कमल (जलज) को सूखने से नहीं बचा सकता, जबकि सूरज कमल का मित्र माना जाता है।

सीख: बुरे दिनों के लिए अपनी बचत ख़ुद कीजिए, दूसरों के भरोसे मत रहिए।

42. दीन सबन को लखत है

दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहिं लखै, दीनबंधु सम होय॥

अर्थ: ग़रीब आदमी आशा से सबकी ओर देखता है, पर ग़रीब की ओर कोई नहीं देखता। जो व्यक्ति ग़रीब की ओर देखे (उसकी मदद करे), वह भगवान (दीनबंधु) के समान है।

सीख: कमज़ोर की मदद करना ही असली पूजा है।

43. कमला थिर न रहीम कहि

कमला थिर न रहीम कहि, लखत अधम जे कोय।
प्रभु की सो अपनी कहै, क्यों न फजीहत होय॥

अर्थ: लक्ष्मी (कमला) किसी के पास स्थिर नहीं रहतीं। जो नीच व्यक्ति प्रभु की लक्ष्मी को अपनी कहकर घमंड करता है, उसकी फ़ज़ीहत क्यों न हो?

सीख: धन आता जाता है; उस पर घमंड करने वाले का अपमान तय है।

44. ए रहीम दर दर फिरहिं

ए रहीम दर दर फिरहिं, माँगि मधुकरी खाहिं।
यारो यारी छोड़िये वे रहीम अब नाहिं॥

अर्थ: माना जाता है कि यह दोहा रहीम ने अपने ग़रीबी के दिनों में लिखा। अब रहीम दर दर फिरकर भिक्षा (मधुकरी) माँगकर खाते हैं। दोस्तो, अब दोस्ती छोड़ दो, वे (अमीर और दानी) रहीम अब नहीं रहे।

सीख: समय सबका बदलता है; जो दोस्ती सिर्फ़ पैसे से थी, वह पैसे के साथ चली जाती है।

45. करम हीन रहिमन लखो

करम हीन रहिमन लखो, धँसो बड़े घर चोर।
चिंतत ही बड़ लाभ के, जागत ह्वै गो भोर॥

अर्थ: एक अभागा चोर बड़े घर में घुस गया, पर वह यही सोचता रहा कि कौन सा बड़ा माल उठाऊँ, और सोचते सोचते सुबह हो गई। वह कुछ नहीं ले सका।

सीख: बहुत बड़े मौक़े के इंतज़ार में सोचते रहना, हाथ आए मौक़े को भी गँवा देता है।

वाणी और मन की बात पर रहीम के दोहे

46. रहिमन जिह्वा बावरी

रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गई सरग पताल।
आपु तो कहि भीतर रही, जूती खात कपाल॥

अर्थ: जीभ बावली है, स्वर्ग पाताल की उल्टी सीधी बातें बोल देती है और ख़ुद तो कहकर मुँह के अंदर चली जाती है, पर जूते सिर (कपाल) को खाने पड़ते हैं।

सीख: बोलने से पहले सोचिए, क्योंकि ज़ुबान की ग़लती का नतीजा पूरे व्यक्ति को भुगतना पड़ता है।

47. अमृत ऐसे वचन में

अमृत ऐसे वचन में, रहिमन रिस की गाँस।
जैसे मिसिरिहु में मिली, निरस बाँस की फाँस॥

अर्थ: अमृत जैसे मीठे वचन में भी अगर ग़ुस्से की गाँठ छिपी हो, तो वह वैसे ही चुभती है जैसे मिश्री में मिली बाँस की सूखी फाँस।

सीख: मीठे शब्दों में छिपा ताना सबसे ज़्यादा चुभता है; मन साफ़ रखकर बोलिए।

48. खीरा सिर ते काटिए

खीरा सिर ते काटिए, मलियत नोन लगाय।
रहिमन करुए मुखन कौ, चहियत इहै सजाय॥

अर्थ: खीरे का कड़वा सिरा काटकर उस पर नमक मला जाता है, तब उसकी कड़वाहट जाती है। रहीम कहते हैं कि कड़वा बोलने वालों के लिए भी यही सज़ा ठीक है।

सीख: कड़वी ज़ुबान वाले को आख़िर में अपमान ही मिलता है।

49. रहिमन निज मन की बिथा

रहिमन निज मन की बिथा, मन ही राखो गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँटि न लैहैं कोय॥

अर्थ: अपने मन का दुख (व्यथा) मन में ही छिपाकर रखो। लोग सुनकर मज़ाक़ उड़ाएँगे (इठलाएँगे), पर उसे बाँटने कोई नहीं आएगा।

सीख: हर किसी के सामने अपना दुख मत खोलिए; भरोसेमंद व्यक्ति चुनकर ही बात कीजिए।

50. रहिमन अँसुवा नयन ढरि

रहिमन अँसुवा नयन ढरि, जिय दुख प्रगट करेइ।
जाहि निकारो गेह ते, कस न भेद कहि देइ॥

अर्थ: आँसू आँखों से बहकर मन का दुख सबके सामने प्रकट कर देते हैं। जिसे घर से निकाल दिया जाए, वह घर का भेद क्यों न खोल दे?

सीख: जिसे अपमानित करके निकाला जाए, वह आपके राज़ खोल सकता है; रिश्ते सम्मान से निभाइए।

51. खैर, ख़ून, खाँसी, खुसी

खैर, ख़ून, खाँसी, खुसी, बैर, प्रीति, मदपान।
रहिमन दाबे ना दबैं, जानत सकल जहान॥

अर्थ: कत्थे का दाग़ (खैर), ख़ून, खाँसी, ख़ुशी, दुश्मनी, प्रेम और नशा, ये चीज़ें छिपाने से नहीं छिपतीं, सारी दुनिया को पता चल ही जाता है।

सीख: जो बात छिप नहीं सकती, उसे छिपाने की जगह सही रास्ता चुनिए।

52. दीरघ दोहा अरथ के

दीरघ दोहा अरथ के, आखर थोरे आहिं।
ज्यों रहीम नट कुंडली, सिमिटि कूदि चढ़ि जाहिं॥

अर्थ: दोहे में अक्षर थोड़े होते हैं, पर अर्थ बहुत गहरा होता है। जैसे नट (कलाबाज़) अपने शरीर को सिकोड़कर कुंडली बनाता है और कूदकर ऊँचाई पर चढ़ जाता है।

सीख: कम शब्दों में बड़ी बात कहना ही असली कला है।

मान सम्मान पर रहीम के दोहे

53. रहिमन पानी राखिये

रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून।
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून॥

अर्थ: पानी को बचाकर रखिए, पानी के बिना सब सूना है। यहाँ “पानी” के तीन अर्थ हैं: मोती के लिए पानी यानी उसकी चमक, मनुष्य के लिए पानी यानी इज़्ज़त (मान), और चूने (आटे) के लिए पानी यानी जल। चमक गई तो मोती बेकार, इज़्ज़त गई तो इंसान, और पानी के बिना चून (आटा) गूँथा नहीं जा सकता।

सीख: इज़्ज़त एक बार गई तो लौटती नहीं, इसलिए उसे मोती की चमक की तरह सँभालिए।

रहिमन पानी राखिये: कमल के पत्ते पर मोती जैसी चमकती पानी की बूँद
मोती का पानी उसकी चमक है, इंसान का पानी उसकी इज़्ज़त

54. आदर घटे नरेस ढिंग

आदर घटे नरेस ढिंग, बसे रहे कछु नाहिं।
जो रहीम कोटिन मिले, धिग जीवन जग माहिं॥

अर्थ: अगर राजा के पास रहने से आदर घटता हो, तो वहाँ रहने का कोई मतलब नहीं। चाहे करोड़ों रुपये मिलें, बिना सम्मान के ऐसे जीवन को धिक्कार है।

सीख: जहाँ आपकी इज़्ज़त न हो, वहाँ बड़ी तनख़्वाह भी छोटा सौदा है।

55. रहिमन मोहि न सुहाय (सोरठा)

रहिमन मोहि न सुहाय, अमी पिआवै मान बिनु।
बरु, विष देय बुलाय, मान सहित मरिबो भलो॥

अर्थ: यह दोहा नहीं, सोरठा है (इसकी पंक्तियाँ उलटे क्रम में होती हैं)। रहीम कहते हैं कि बिना सम्मान के कोई अमृत भी पिलाए, तो मुझे अच्छा नहीं लगता। चाहे सम्मान से बुलाकर कोई ज़हर दे दे, सम्मान के साथ मरना बेहतर है।

सीख: आत्मसम्मान किसी भी सुख सुविधा से बड़ा है।

भक्ति, संतोष और जीवन पर रहीम के दोहे

56. रहिमन गली है साँकरी

रहिमन गली है साँकरी, दूजो ना ठहराहिं।
आपु अहै तो हरि नहीं, हरि तो आपुन नाहिं॥

अर्थ: प्रेम की गली बहुत संकरी है, उसमें दो एक साथ नहीं समा सकते। अगर “मैं” (अहंकार) है, तो भगवान नहीं; और अगर भगवान हैं, तो “मैं” नहीं।

सीख: अहंकार छोड़े बिना प्रेम और भक्ति, दोनों अधूरे हैं।

57. अमर बेलि बिनु मूल की

अमर बेलि बिनु मूल की, प्रतिपालत है ताहि।
रहिमन ऐसे प्रभुहिं तजि, खोजत फिरिए काहि॥

अर्थ: अमरबेल की कोई जड़ नहीं होती, फिर भी भगवान उसका पालन पोषण करते हैं। ऐसे प्रभु को छोड़कर हम और किसे खोजते फिरें?

सीख: जो सबका पालन करता है, उस पर भरोसा रखिए और अपना कर्म करते रहिए।

58. अंजन दियो तो किरकिरी

अंजन दियो तो किरकिरी, सुरमा दियो न जाय।
जिन आँखिन सों हरि लख्यो, रहिमन बलि बलि जाय॥

अर्थ: जिन आँखों से भगवान के दर्शन किए हों, उनमें काजल लगाओ तो किरकिरी लगती है और सुरमा भी नहीं लगाया जाता। रहीम ऐसी आँखों पर बार बार बलिहारी जाते हैं।

सीख: जो मन ईश्वर में रम जाए, उसे दिखावे के सिंगार की ज़रूरत नहीं रहती।

59. बिंदु मों सिंधु समान (सोरठा)

बिंदु मों सिंधु समान, को अचरज कासों कहै।
हेरनहार हेरान, रहिमन अपुने आप तें॥

अर्थ: यह भी सोरठा है। बूँद में सागर समा गया, यह अचरज किससे कहें? जो ढूँढने निकला था, वह ख़ुद ही उसमें खो गया। यानी आत्मा परमात्मा को खोजते खोजते उसी में मिल गई।

सीख: जो भीतर खोजता है, वह बाहर भटकना छोड़ देता है।

60. चाह गई चिंता मिटी

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥

अर्थ: इच्छाएँ ख़त्म हुईं तो चिंता भी मिट गई और मन बेफ़िक्र हो गया। जिन्हें कुछ नहीं चाहिए, वे राजाओं के भी राजा (शाहों के शाह) हैं।

सीख: सुख ज़्यादा पाने में नहीं, कम चाहने में है।

61. एकै साधे सब सधै

एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥

अर्थ: एक काम को पूरे मन से साधने से सब काम सध जाते हैं, और सब एक साथ साधने चलो तो सब बिगड़ जाते हैं। जैसे पेड़ की जड़ को सींचने से ही वह भरपूर फूलता और फलता है।

सीख: पढ़ाई हो या काम, एक समय में एक लक्ष्य पर पूरा ध्यान दीजिए।

62. सदा नगारा कूच का

सदा नगारा कूच का, बाजत आठों जाम।
रहिमन या जग आइ कै, को करि रहा मुकाम॥

अर्थ: इस संसार में कूच (विदा) का नगाड़ा आठों पहर बजता रहता है। इस दुनिया में आकर कौन हमेशा के लिए ठहर पाया है?

सीख: जीवन छोटा है, इसलिए अच्छे काम कल पर मत टालिए।

63. रहिमन बिद्या बुद्धि नहिं

रहिमन बिद्या बुद्धि नहिं, नहीं धरम, जस, दान।
भू पर जनम वृथा धरै, पसु बिनु पूँछ बिषान॥

अर्थ: जिसके पास न विद्या है, न बुद्धि, न धर्म, न यश और न दान की भावना, उसका धरती पर जन्म लेना बेकार है। वह बिना पूँछ और सींग का पशु है।

सीख: पढ़ाई, समझ, अच्छा आचरण और देने का भाव, यही इंसान को इंसान बनाते हैं।

64. जो रहीम गति दीप की

जो रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।
बारे उजियारो लगे, बढ़े अँधेरो होय॥

अर्थ: दीपक और कुल के कपूत (बुरे बेटे) की एक जैसी हालत है। दीपक जलाने (बारने) पर उजाला करता है और बुझने (बढ़ने) पर अँधेरा। कपूत भी बचपन में (बारे) प्यारा लगता है, पर बड़ा होकर कुल का नाम डुबो देता है।

सीख: बच्चों को प्यार के साथ अच्छे संस्कार भी दीजिए, तभी वे बड़े होकर घर का उजाला बनते हैं।

65. रूप, कथा, पद, चारु पट

रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल।
ज्यों ज्यों निरखत सूक्ष्मगति, मोल रहीम बिसाल॥

अर्थ: सुंदर रूप, कथा, कविता का पद, सुंदर वस्त्र, सोना, दोहा और लाल (माणिक), इन्हें जितना बारीकी से देखो, उतना ही इनका मोल बढ़ता जाता है।

सीख: अच्छी चीज़ों को जल्दबाज़ी में नहीं, ध्यान से परखिए; तभी उनकी असली क़ीमत समझ आती है।

रहीम के दोहों के कठिन शब्दों के अर्थ

रहीम के ज़्यादातर दोहे ब्रज भाषा में हैं। ये शब्द बार बार आते हैं:

शब्दअर्थ
रहिमनरहीम (दोहे में कवि का अपना नाम, जिसे “छाप” कहते हैं)
छिटकायझटके से
परिजायपड़ जाती है
सूनसूना, बेकार
ऊबरैउबरता है, बचता है
चूनआटा या चूना
बिथाव्यथा, दुख
गोयछिपाकर
अठिलैहैंइठलाएँगे, मज़ाक़ उड़ाएँगे
तरुवर / सरवरपेड़ / तालाब
सुजानसज्जन, समझदार
पंककीचड़
उदधिसमुद्र
अघायपेट भर, तृप्त होकर
जलजकमल
रविसूरज
मीतमित्र
भुजंगसाँप
छिमाक्षमा
कुंडलीगोल घेरा, कुंडल

परीक्षा में रहीम के दोहे की व्याख्या कैसे लिखें

परीक्षा में दोहे की व्याख्या (संदर्भ सहित व्याख्या) के लिए यह क्रम सबसे आसान है। उदाहरण के लिए दोहा 1 लेते हैं:

  1. संदर्भ: प्रस्तुत दोहा कवि रहीम द्वारा रचित है और हमारी पाठ्यपुस्तक के “रहीम के दोहे” पाठ से लिया गया है।
  2. प्रसंग: इस दोहे में कवि ने प्रेम के रिश्ते की नाज़ुकता के बारे में बताया है।
  3. व्याख्या: कवि कहते हैं कि प्रेम का बंधन एक कोमल धागे की तरह है। इसे झटके से नहीं तोड़ना चाहिए, क्योंकि टूटा हुआ धागा फिर से पहले जैसा नहीं जुड़ता। अगर उसे जोड़ा भी जाए, तो उसमें गाँठ पड़ जाती है। उसी तरह रिश्ते में एक बार दरार आ जाए, तो मेल हो जाने पर भी मन में खटास बनी रहती है।
  4. विशेष: (क) भाषा सरल ब्रज है। (ख) “धागा प्रेम का” में रूपक अलंकार है, क्योंकि प्रेम को धागा बताया गया है। (ग) दोहा छंद है।

एक और बात जो परीक्षा में अक्सर पूछी जाती है: दोहा 53 “रहिमन पानी राखिये” में “पानी” शब्द के तीन अर्थ (चमक, इज़्ज़त और जल) निकलते हैं, इसलिए यहाँ श्लेष अलंकार है।

रहीम का जीवन परिचय (छोटा)

रहीम का जन्म 1556 ई. में लाहौर में हुआ। उनके पिता बैरम ख़ाँ बादशाह हुमायूँ के क़रीबी और किशोर अकबर के संरक्षक थे। 1561 में गुजरात के पाटण में बैरम ख़ाँ की हत्या हो गई, तब रहीम सिर्फ़ पाँच साल के थे। अकबर ने उन्हें अपने बेटे की तरह पाला। बड़े होकर रहीम कुशल सेनापति, प्रशासक और विद्वान बने। 1584 में अकबर ने उन्हें “ख़ान ए ख़ाना” की उपाधि दी, और वे अकबर के दरबार के नवरत्नों में गिने गए।

रहीम कलम और तलवार, दोनों के धनी थे। वे फ़ारसी, अरबी, तुर्की, संस्कृत और हिंदी के जानकार थे। मुसलमान होते हुए भी उनके दोहों में राम, कृष्ण, महाभारत और पुराणों के उदाहरण पूरे सम्मान से आते हैं। वे अपने दान के लिए भी मशहूर थे, पर जीवन के आख़िरी दिनों में उन्होंने ग़रीबी भी देखी (दोहा 44 उसी दौर का माना जाता है)। 1627 में 71 वर्ष की उम्र में उनका देहांत हुआ और उन्हें दिल्ली में उस मक़बरे में दफ़नाया गया, जिसे उन्होंने अपनी पत्नी के लिए बनवाया था।

दिल्ली में हुमायूँ का मक़बरा, जिसके पास निज़ामुद्दीन इलाक़े में रहीम का मक़बरा है
दिल्ली का हुमायूँ का मक़बरा; रहीम का मक़बरा इसी के पास है

रहीम की प्रमुख रचनाएँ: रहीम दोहावली (या रहीम सतसई), बरवै नायिका भेद, मदनाष्टक, शृंगार सोरठा, और ज्योतिष पर ग्रंथ। उन्होंने बाबर की आत्मकथा “बाबरनामा” का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद भी किया। ज़्यादा जानकारी हिंदी विकिपीडिया पर रहीम पर है।

रहीम के नाम से चलने वाले, पर दूसरों के दोहे

इंटरनेट पर कई दोहे रहीम के नाम से चलते हैं, जो असल में कबीर के हैं। परीक्षा में ग़लती न हो, इसलिए:

  • “बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर” कबीर का दोहा है, रहीम का नहीं।
  • “दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय” कबीर का है।
  • “ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय” कबीर का है।
  • “काल करे सो आज कर, आज करे सो अब” कबीर का है।

कबीर के ये और 100 से ज़्यादा दोहे अर्थ सहित यहाँ पढ़ें: कबीर दास के 100 दोहे अर्थ सहित।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

रहीम का पूरा नाम क्या था?

रहीम का पूरा नाम अब्दुर्रहीम ख़ानख़ाना था। “ख़ान ए ख़ाना” उनकी उपाधि थी, जो अकबर ने 1584 में दी थी।

रहीम का सबसे प्रसिद्ध दोहा कौन सा है?

“रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो छिटकाय। टूटे से फिर न मिले, मिले गाँठ परिजाय॥” और “रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून” सबसे प्रसिद्ध दोहे हैं।

रहिमन पानी राखिये में पानी के कितने अर्थ हैं?

तीन अर्थ हैं: मोती के लिए चमक, मनुष्य के लिए इज़्ज़त, और चून (आटे) के लिए जल। एक शब्द के कई अर्थ होने से यहाँ श्लेष अलंकार है।

रहीम के दोहे किस भाषा में हैं?

रहीम के ज़्यादातर दोहे ब्रज भाषा में हैं, कुछ रचनाएँ अवधी में भी हैं। वे फ़ारसी, अरबी, तुर्की और संस्कृत के भी विद्वान थे।

रहीम किसके दरबार में थे?

रहीम मुग़ल बादशाह अकबर के दरबार में थे और उनके नवरत्नों में गिने जाते हैं।

रहीम का जन्म और मृत्यु कब हुई?

रहीम का जन्म 1556 ई. में लाहौर में और मृत्यु 1627 ई. में हुई। उनका मक़बरा दिल्ली में है।

कक्षा 9 में रहीम के कितने दोहे हैं?

हिंदवी के NCERT वर्गीकरण के अनुसार कक्षा 9 की किताब में रहीम के 11 दोहे हैं। उनकी पूरी सूची इस लेख की NCERT वाली तालिका में है। नई किताबों में पाठ बदल सकते हैं, इसलिए अपनी किताब से मिला लें।

रहीम के दोहों से क्या सीख मिलती है?

रहीम के दोहे प्रेम और रिश्तों को सँभालने, सच्चे मित्र की पहचान, विनम्रता, धैर्य, दान और आत्मसम्मान की सीख देते हैं। वे रोज़मर्रा के उदाहरणों (धागा, पानी, सुई, पेड़, दूध) से बड़ी बात कहते हैं।

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rahim ke dohe (रहीम के दोहे) का यह संग्रह अपने बच्चों और दोस्तों के साथ शेयर कीजिए। आपको रहीम का कौन सा दोहा सबसे अच्छा लगता है, कमेंट में ज़रूर लिखिए।

स्रोत: दोहों का पाठ मुख्य रूप से हिंदवी (रेख़्ता फ़ाउंडेशन) से लिया गया है; अलग अलग किताबों में कुछ शब्दों का रूप थोड़ा अलग मिल सकता है। जीवन परिचय हिंदी विकिपीडिया के आधार पर है। फ़ोटो: Pexels (Atlantic Ambience, Suki Lee, miheer tewari)।

नोट: इस लेख में Amazon के affiliate लिंक हैं। इनसे ख़रीदारी करने पर Storyshala को छोटा कमीशन मिलता है, आपके लिए क़ीमत नहीं बदलती।

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