Sanskrit Shlok for Students: अर्थ सहित 45 संस्कृत श्लोक, स्कूल की प्रार्थना सभा के लिए

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Sanskrit shlok for students: स्कूल की प्रार्थना सभा में बैठे विद्यार्थी
स्कूल की सुबह की प्रार्थना सभा में संस्कृत श्लोक बोलने की परंपरा

Sanskrit shlok for students की ज़रूरत सबसे ज़्यादा स्कूल की प्रार्थना सभा (मॉर्निंग असेंबली), संस्कृत की कक्षा, भाषण और निबंध में पड़ती है। इस पेज पर विद्यार्थियों के लिए 45 चुने हुए संस्कृत श्लोक हैं, हर श्लोक के साथ सरल हिंदी अर्थ, वह किस ग्रंथ से है, और उससे मिलने वाली एक लाइन की सीख। श्लोक विषय के हिसाब से बाँटे गए हैं: प्रार्थना, विद्या, गुरु और माता पिता, मेहनत, समय, सत्य और वाणी, परोपकार, अच्छी संगत और आत्मविश्वास।

मुख्य बातें

  • सबसे छोटे और आसान: “सत्यमेव जयते”, “विद्या ददाति विनयम्”, “उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि”।
  • प्रार्थना सभा की शुरुआत: सरस्वती वंदना “या कुन्देन्दु…” या गुरु वंदना “गुरुर्ब्रह्मा…”।
  • समापन: “ॐ सह नाववतु” या “सर्वे भवन्तु सुखिनः”।
  • विद्यार्थी के पाँच लक्षण: “काकचेष्टा बकोध्यानं…” सबसे प्रसिद्ध श्लोक है।
  • नीचे 7 दिन का प्रार्थना सभा प्लान है, जिससे हर दिन एक नया श्लोक बोला जा सके।

विषय सूची

प्रार्थना सभा में श्लोक कैसे बोलें

  1. श्लोक दो बार: पहले एक विद्यार्थी धीरे और साफ़ बोले, फिर सब साथ में दोहराएँ।
  2. अर्थ एक बार: हिंदी अर्थ छोटे वाक्यों में बताएँ।
  3. एक लाइन की सीख: आज इस श्लोक से हम क्या करेंगे, जैसे “आज हम समय पर काम करेंगे”।
  4. उच्चारण: संयुक्त अक्षर (जैसे “विद्या”, “श्रद्धा”) धीरे बोलें; विसर्ग (ः) पर हल्की “ह” की आवाज़ दें, जैसे “रामः” को “रामह”।
  5. पूरा समय: एक श्लोक के लिए लगभग एक मिनट काफ़ी है।

प्रार्थना सभा की शुरुआत के श्लोक

1. सरस्वती वंदना

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना॥
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अर्थ: जो कुंद के फूल, चंद्रमा, बर्फ़ और मोतियों के हार जैसी उजली हैं, जिन्होंने सफ़ेद वस्त्र पहने हैं, जिनके हाथ में वीणा है, जो सफ़ेद कमल पर बैठी हैं, और जिनकी ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी वंदना करते हैं, वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें और मेरी सारी जड़ता (आलस्य और अज्ञान) दूर करें। स्रोत: पारंपरिक सरस्वती स्तुति। सीख: पढ़ाई की शुरुआत मन को शांत करके करें।

2. पढ़ाई शुरू करने का श्लोक

सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा॥

अर्थ: हे वर देने वाली, इच्छा पूरी करने वाली माँ सरस्वती, आपको नमस्कार। मैं पढ़ाई शुरू कर रहा हूँ, मुझे इसमें हमेशा सफलता मिले। स्रोत: पारंपरिक प्रार्थना। सीख: हर दिन पढ़ाई एक छोटे संकल्प से शुरू करें।

3. गुरु वंदना

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही महेश्वर (शिव) हैं। गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को नमस्कार। स्रोत: गुरु गीता में प्रसिद्ध श्लोक। सीख: शिक्षक का सम्मान करें, वे ज्ञान का रास्ता दिखाते हैं।

4. गणेश वंदना

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

अर्थ: हे घुमावदार सूँड़ और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसी चमक वाले गणेश जी, मेरे सभी काम हमेशा बिना रुकावट के पूरे करें। स्रोत: पारंपरिक गणेश स्तुति। सीख: हर अच्छा काम विश्वास के साथ शुरू करें।

5. त्वमेव माता

त्वमेव माता च पिता त्वमेव। त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव। त्वमेव सर्वं मम देव देव॥

अर्थ: हे भगवान, आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता, आप ही भाई और मित्र, आप ही विद्या और धन हैं; आप ही मेरा सब कुछ हैं। स्रोत: पारंपरिक प्रार्थना। सीख: कृतज्ञता से दिन की शुरुआत मन को हल्का रखती है।

6. असतो मा सद्गमय

असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥

अर्थ: मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो। स्रोत: बृहदारण्यक उपनिषद (1.3.28)। सीख: पढ़ाई का असली मक़सद अज्ञान के अँधेरे से निकलना है।

विद्या पर श्लोक

7. विद्या ददाति विनयम्

विद्या ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम्॥

अर्थ: विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन, धन से धर्म (अच्छे काम) और उससे सुख मिलता है। स्रोत: हितोपदेश (प्रस्तावना)। सीख: जितना ज़्यादा जानें, उतने विनम्र बनें।

8. विद्या सबसे बड़ा धन

न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥

अर्थ: विद्या को न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई बँटवारा कर सकते हैं, और न यह बोझ लगती है। ख़र्च करने (दूसरों को सिखाने) पर यह रोज़ बढ़ती है। विद्या सब धनों में सबसे बड़ा धन है। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: जो सीखें, वह दोस्तों को भी सिखाएँ, आपका ज्ञान और बढ़ेगा।

9. विद्यार्थी के पाँच लक्षण

काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥

अर्थ: अच्छे विद्यार्थी के पाँच लक्षण हैं: कौए जैसी कोशिश (बार बार प्रयास), बगुले जैसा ध्यान (एकाग्रता), कुत्ते जैसी नींद (हल्की, जल्दी जागने वाली), कम और सादा भोजन, और पढ़ाई के लिए घर का आराम छोड़ने की तैयारी। स्रोत: पारंपरिक सुभाषित। सीख: पढ़ाई में लगन और एकाग्रता सबसे ज़रूरी है।

Sanskrit shlok for students: काकचेष्टा बकोध्यानं, अच्छे विद्यार्थी के 5 लक्षण
इन्फ़ोग्राफ़िक: अच्छे विद्यार्थी के 5 लक्षण (Storyshala)

10. सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ

सुखार्थिनः कुतो विद्या विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।
सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्॥

अर्थ: जो केवल आराम चाहता है, उसे विद्या कहाँ, और विद्या चाहने वाले को आराम कहाँ। आराम चाहने वाला विद्या छोड़ दे, या विद्या चाहने वाला आराम छोड़ दे। स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: परीक्षा के दिनों में मोबाइल और आराम कम करें।

11. विद्या के बिना सुंदरता अधूरी

रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥

अर्थ: रूप, जवानी और बड़े कुल वाले लोग भी विद्या के बिना वैसे ही नहीं सोहते, जैसे सुंदर पर ख़ुशबू रहित पलाश (किंशुक) के फूल। स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: असली पहचान ज्ञान और गुण से बनती है, दिखावे से नहीं।

12. विद्वान हर जगह पूजा जाता है

विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥

अर्थ: विद्वान होना और राजा होना कभी बराबर नहीं। राजा का सम्मान केवल अपने देश में होता है, विद्वान का हर जगह। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित (चाणक्य के नाम से भी प्रचलित)। सीख: ज्ञान ऐसी पूँजी है जो दुनिया में कहीं भी साथ जाती है।

13. विद्या परदेस की मित्र

विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गृहेषु च।
व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मृतस्य च॥

अर्थ: परदेस में विद्या मित्र है, घर में पत्नी (परिवार), रोगी के लिए दवा मित्र है, और मरने के बाद धर्म (अच्छे कर्म) ही साथ देते हैं। स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: बाहर पढ़ने या काम करने जाएँ तो आपकी विद्या ही आपका सहारा है।

14. किताब में रखी विद्या

पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥

अर्थ: जो विद्या सिर्फ़ किताब में रखी है (याद नहीं), और जो धन दूसरे के हाथ में है, ज़रूरत के समय वह न विद्या काम आती है, न वह धन। स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: केवल नोट्स बनाना काफ़ी नहीं, पढ़ा हुआ समझें और याद करें।

15. ज्ञान के चार हिस्से

आचार्यात् पादमादत्ते पादं शिष्यः स्वमेधया।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः पादं कालक्रमेण च॥

अर्थ: विद्यार्थी ज्ञान का एक चौथाई गुरु से पाता है, एक चौथाई अपनी बुद्धि से, एक चौथाई साथ पढ़ने वालों से, और एक चौथाई समय और अनुभव से। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: केवल शिक्षक पर निर्भर न रहें, ख़ुद सोचें और दोस्तों के साथ चर्चा करें।

16. विद्या के बराबर आँख नहीं

नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः।
नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्॥

अर्थ: विद्या के बराबर कोई आँख नहीं, सत्य के बराबर कोई तप नहीं, आसक्ति के बराबर कोई दुःख नहीं और त्याग के बराबर कोई सुख नहीं। स्रोत: महाभारत, शांति पर्व। सीख: ज्ञान से ही दुनिया को सही तरह देख पाते हैं।

गुरु और माता पिता पर श्लोक

17. मातृदेवो भव

मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव।

अर्थ: माता को देवता मानो, पिता को देवता मानो, गुरु को देवता मानो, अतिथि को देवता मानो। स्रोत: तैत्तिरीय उपनिषद (शिक्षावल्ली 1.11)। यह गुरु का दीक्षांत उपदेश है। सीख: घर और स्कूल दोनों जगह बड़ों का सम्मान करें।

18. प्रणाम करने वाले की चार चीज़ें बढ़ती हैं

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

अर्थ: जो रोज़ बड़ों को प्रणाम करता है और उनकी सेवा करता है, उसकी चार चीज़ें बढ़ती हैं: आयु, विद्या, यश और बल। स्रोत: मनुस्मृति (2.121)। सीख: सुबह घर के बड़ों को प्रणाम करके निकलें।

19. पढ़ाने वाले माता पिता

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥

अर्थ: जो माता पिता बच्चे को पढ़ाते नहीं, वे उसके हित के दुश्मन जैसे हैं; क्योंकि बिना पढ़ा बच्चा सभा में वैसे ही नहीं सोहता, जैसे हंसों के बीच बगुला। स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: माता पिता जो पढ़ाई के लिए कहते हैं, वह आपके भले के लिए है।

मेहनत और आलस्य पर श्लोक

कक्षा में बैठकर पढ़ते छोटे विद्यार्थी
मेहनत और लगन, संस्कृत सुभाषितों का सबसे बड़ा संदेश

20. उद्यमेन हि सिध्यन्ति

उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥

अर्थ: काम मेहनत से पूरे होते हैं, केवल सोचने से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण अपने आप नहीं आते। स्रोत: हितोपदेश (मित्रलाभ)। सीख: केवल योजना नहीं, आज से शुरुआत करें।

21. आलस्य सबसे बड़ा शत्रु

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥

अर्थ: आलस्य मनुष्य के शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है, और मेहनत के बराबर कोई मित्र नहीं, जिसे करके मनुष्य कभी दुखी नहीं होता। स्रोत: भर्तृहरि के नीतिशतक में प्रचलित। सीख: “बाद में करूँगा” की आदत ही सबसे बड़ी रुकावट है।

22. आलसी को विद्या कहाँ

अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम्।
अधनस्य कुतो मित्रममित्रस्य कुतो सुखम्॥

अर्थ: आलसी को विद्या कहाँ, विद्या के बिना धन कहाँ, धन के बिना मित्र कहाँ, और मित्र के बिना सुख कहाँ। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: एक आलस्य आगे की कई चीज़ें छीन लेता है।

23. सफलता के छह गुण

उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत्॥

अर्थ: मेहनत, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम, जहाँ ये छह गुण होते हैं, वहाँ भगवान भी मदद करते हैं। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: भगवान भी उसी की मदद करते हैं जो ख़ुद कोशिश करता है।

24. भाग्य और मेहनत

यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥

अर्थ: जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता, वैसे ही मेहनत के बिना केवल भाग्य से काम सिद्ध नहीं होता। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित (हितोपदेश में भी)। सीख: “क़िस्मत में होगा तो मिलेगा” सोचकर मत बैठिए।

समय पर श्लोक

25. हर क्षण और हर कण का मूल्य

क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्।
क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥

अर्थ: हर क्षण का उपयोग करके विद्या और हर कण बचाकर धन जुटाना चाहिए। क्षण गँवाने वाले को विद्या कहाँ, और कण गँवाने वाले को धन कहाँ। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: रोज़ के 15 मिनट भी बचें, तो साल में बहुत कुछ पढ़ा जा सकता है।

26. बुद्धिमान का समय कैसे बीतता है

काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥

अर्थ: बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्र (अच्छी किताबों) के आनंद में बीतता है, और मूर्खों का बुरी आदतों, नींद या झगड़ों में। स्रोत: हितोपदेश। सीख: ख़ाली समय में क्या करते हैं, उसी से भविष्य बनता है।

सत्य और अच्छी वाणी पर श्लोक

27. सत्यं ब्रूयात्

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥

अर्थ: सच बोलो, प्यार से बोलो; कड़वा सच कठोरता से मत बोलो, और मीठा झूठ भी मत बोलो, यही सनातन धर्म है। स्रोत: मनुस्मृति (4.138)। सीख: सच बोलें, पर ऐसे कि किसी को चोट न पहुँचे।

28. मीठे बोल में कंजूसी क्यों

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः।
तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता॥

अर्थ: मीठे शब्दों से सब प्राणी प्रसन्न होते हैं, इसलिए मीठा ही बोलना चाहिए। बोलने में कंजूसी (ग़रीबी) कैसी! स्रोत: चाणक्य नीति। सीख: “धन्यवाद” और “कृपया” बोलने में कुछ ख़र्च नहीं होता।

29. सत्यमेव जयते

सत्यमेव जयते नानृतम्।

अर्थ: सत्य की ही जीत होती है, झूठ की नहीं। स्रोत: मुण्डक उपनिषद (3.1.6)। यही भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य है, जो राष्ट्रीय चिह्न के नीचे लिखा है। सीख: झूठ से मिली जीत टिकती नहीं।

परोपकार और दया पर श्लोक

30. परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः

परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥

अर्थ: पेड़ दूसरों के लिए फल देते हैं, नदियाँ दूसरों के लिए बहती हैं, गायें दूसरों के लिए दूध देती हैं; यह शरीर भी दूसरों की भलाई के लिए है। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: रोज़ किसी एक की मदद ज़रूर करें।

31. अठारह पुराणों का सार

अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥

अर्थ: अठारह पुराणों में व्यास जी की दो ही बातें हैं: दूसरों की भलाई पुण्य है और दूसरों को दुःख देना पाप। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: अच्छाई का सबसे आसान नियम: किसी को दुःख मत दो।

32. असली गहना

श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुण्डलेन दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन।
विभाति कायः करुणापराणां परोपकारेण न चन्दनेन॥

अर्थ: कान ज्ञान सुनने से सुंदर लगते हैं, कुंडल से नहीं; हाथ दान से, कंगन से नहीं; और दयालु लोगों का शरीर परोपकार से शोभता है, चंदन से नहीं। स्रोत: भर्तृहरि, नीतिशतक। सीख: आपकी असली सुंदरता आपके अच्छे काम हैं।

33. वसुधैव कुटुम्बकम्

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

अर्थ: “यह मेरा है, वह पराया” ऐसा छोटे मन वाले सोचते हैं; बड़े दिल वालों के लिए तो पूरी धरती ही परिवार है। स्रोत: हितोपदेश (महा उपनिषद में भी)। सीख: कक्षा में किसी को अकेला न छोड़ें।

34. अहिंसा परमो धर्मः

अहिंसा परमो धर्मः।

अर्थ: किसी को चोट न पहुँचाना सबसे बड़ा धर्म है। स्रोत: महाभारत में अनेक स्थानों पर। सीख: शब्दों से भी किसी को चोट न पहुँचाएँ।

अच्छी संगत पर श्लोक

35. सत्संगति क्या नहीं करती

जाड्यं धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं सत्सङ्गतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥

अर्थ: अच्छी संगत बुद्धि की जड़ता दूर करती है, वाणी में सच भरती है, सम्मान बढ़ाती है, बुराई हटाती है, मन को प्रसन्न करती है और चारों दिशाओं में यश फैलाती है। बताओ, अच्छी संगत मनुष्य के लिए क्या नहीं करती! स्रोत: भर्तृहरि, नीतिशतक। सीख: दोस्त सोच समझकर चुनें।

36. साधु संगति सबसे शीतल

चन्दनं शीतलं लोके चन्दनादपि चन्द्रमाः।
चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः॥

अर्थ: दुनिया में चंदन ठंडक देता है, चंदन से ज़्यादा चंद्रमा, और इन दोनों से भी ज़्यादा ठंडक अच्छे लोगों की संगत देती है। स्रोत: प्रसिद्ध सुभाषित। सीख: परेशान हों, तो अच्छे दोस्त या बड़ों से बात करें।

आत्मविश्वास, स्वास्थ्य और साहस पर श्लोक

पुस्तकालय में किताब पढ़ती विद्यार्थी
विद्या ही ऐसा धन है जो बाँटने से बढ़ता है

37. उत्साह सबसे बड़ा बल

उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।
सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥

अर्थ: उत्साह बड़ा बलवान है, उत्साह से बढ़कर कोई बल नहीं। उत्साही व्यक्ति के लिए दुनिया में कुछ भी कठिन नहीं। स्रोत: वाल्मीकि रामायण, किष्किंधाकाण्ड (लक्ष्मण का श्रीराम से कथन)। सीख: हार के बाद भी उत्साह बनाए रखें।

38. बुद्धि ही बल

बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्।

अर्थ: जिसके पास बुद्धि है, असली बल उसी के पास है; बुद्धिहीन के पास बल कहाँ। (इसी के उदाहरण में पंचतंत्र की चतुर खरगोश और शेर की कथा है।) स्रोत: पंचतंत्र। सीख: मुश्किल में घबराएँ नहीं, दिमाग़ से रास्ता निकालें।

39. शरीर ही पहला साधन

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।

अर्थ: हर अच्छे काम का पहला साधन शरीर ही है, इसलिए शरीर को स्वस्थ रखना ज़रूरी है। स्रोत: कालिदास, कुमारसंभव (5.33)। सीख: पढ़ाई के साथ खेल, नींद और अच्छा खाना भी ज़रूरी है।

40. धर्म की रक्षा

धर्मो रक्षति रक्षितः।

अर्थ: जो धर्म (सही आचरण) की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। स्रोत: मनुस्मृति (8.15)। सीख: सही काम करने वाले का साथ सही काम ही देता है।

गीता के 5 श्लोक, विद्यार्थियों के लिए

भगवद्गीता के विद्यार्थियों के लिए 15 श्लोक अर्थ सहित हमारे अलग लेख में हैं: Geeta Shlok for Students। यहाँ पाँच सबसे काम के:

41. कर्मण्येवाधिकारस्ते

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल पर नहीं। फल के लिए कर्म मत करो, और कर्म न करने में भी तुम्हारी आसक्ति न हो। स्रोत: भगवद्गीता (2.47)। सीख: मेहनत पर ध्यान दें, नंबर अपने आप आएँगे।

42. ज्ञान से पवित्र कुछ नहीं

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

अर्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र कुछ नहीं है। जो लगन से अभ्यास करता है, उसे समय के साथ यह ज्ञान अपने भीतर मिल जाता है। स्रोत: भगवद्गीता (4.38)। सीख: ज्ञान धीरे धीरे, अभ्यास से आता है।

43. श्रद्धावान को ज्ञान

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

अर्थ: श्रद्धा रखने वाला, लगन वाला और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने वाला ज्ञान पाता है, और ज्ञान पाकर जल्दी ही परम शांति पाता है। स्रोत: भगवद्गीता (4.39)। सीख: विषय पर भरोसा और ध्यान, दोनों चाहिए।

44. अपना उद्धार ख़ुद करो

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

अर्थ: मनुष्य अपना उद्धार ख़ुद करे, अपने आप को नीचे न गिराए। मनुष्य ख़ुद ही अपना मित्र है और ख़ुद ही अपना शत्रु। स्रोत: भगवद्गीता (6.5)। सीख: अपनी सफलता की ज़िम्मेदारी ख़ुद लें।

45. संतुलित दिनचर्या

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

अर्थ: जिसका खाना और घूमना संतुलित है, काम में मेहनत संतुलित है, और सोना और जागना संतुलित है, उसका योग (जीवन) दुःख दूर करने वाला होता है। स्रोत: भगवद्गीता (6.17)। सीख: परीक्षा में भी नींद और खाना न छोड़ें।

प्रार्थना सभा के अंत के श्लोक (शांति पाठ)

नदी किनारे वेद पाठशाला के विद्यार्थी
गुरुकुल परंपरा में पढ़ाई की शुरुआत और अंत शांति पाठ से होता है

सह नाववतु:

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

अर्थ: भगवान हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ रक्षा करें, हमें साथ पोषण दें, हम साथ मिलकर शक्ति पाएँ, हमारी पढ़ाई तेजस्वी हो, और हम कभी एक दूसरे से द्वेष न करें। स्रोत: तैत्तिरीय उपनिषद और कठ उपनिषद का शांति पाठ। सीख: कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थी एक टीम हैं।

सर्वे भवन्तु सुखिनः:

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥

अर्थ: सब सुखी हों, सब रोग से मुक्त हों, सब अच्छा देखें, और किसी को भी दुःख न मिले। स्रोत: पारंपरिक मंगल प्रार्थना। सीख: अपने साथ दूसरों के भले की भी कामना करें।

प्रार्थना सभा के लिए 7 दिन का प्लान

दिनशुरुआतआज का श्लोकसीख
सोमवारसरस्वती वंदनाविद्या ददाति विनयम् (7)ज्ञान से विनम्रता
मंगलवारगुरु वंदनाउद्यमेन हि सिध्यन्ति (20)मेहनत से सफलता
बुधवारगणेश वंदनाकाकचेष्टा बकोध्यानं (9)अच्छे विद्यार्थी के लक्षण
गुरुवारगुरु वंदनामातृदेवो भव (17)बड़ों का सम्मान
शुक्रवारसरस्वती वंदनासत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् (27)सच और मीठी वाणी
शनिवारअसतो मा सद्गमयपरोपकाराय फलन्ति वृक्षाः (30)दूसरों की मदद
हर दिन अंत मेंसह नाववतु या सर्वे भवन्तु सुखिनःसबका भला

अगले हफ़्ते बाक़ी श्लोक बारी बारी से लें; 45 श्लोकों से लगभग दो महीने का नया प्लान बन जाता है।

छोटे संस्कृत सूक्ति वाक्य (एक लाइन)

सूक्तिअर्थस्रोत
सत्यमेव जयतेसत्य की ही जीत होती हैमुण्डक उपनिषद
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्विद्या सबसे बड़ा धन हैसुभाषित
अहिंसा परमो धर्मःअहिंसा सबसे बड़ा धर्म हैमहाभारत
वसुधैव कुटुम्बकम्पूरी धरती एक परिवार हैमहा उपनिषद, हितोपदेश
धर्मो रक्षति रक्षितःधर्म की रक्षा करने वाले की धर्म रक्षा करता हैमनुस्मृति
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्शरीर ही हर अच्छे काम का पहला साधन हैकुमारसंभव
योगः कर्मसु कौशलम्काम में कुशलता ही योग हैभगवद्गीता 2.50
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताःजहाँ स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता बसते हैंमनुस्मृति 3.56
बुद्धिर्यस्य बलं तस्यबुद्धि वाले के पास ही बल हैपंचतंत्र
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणिमेहनत से ही काम पूरे होते हैंहितोपदेश

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

प्रार्थना सभा के लिए सबसे आसान संस्कृत श्लोक कौन सा है?

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥” छोटा है, बोलने में आसान है और अर्थ हर बच्चा समझ लेता है। छोटे बच्चों के लिए “सत्यमेव जयते” या “मातृदेवो भव” भी अच्छे हैं।

विद्यार्थियों के लिए सबसे प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक कौन सा है?

“काकचेष्टा बकोध्यानं श्वाननिद्रा तथैव च। अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥” जिसमें अच्छे विद्यार्थी के पाँच लक्षण बताए गए हैं। दूसरा सबसे प्रसिद्ध है “विद्या ददाति विनयम्”।

विद्या पर संस्कृत श्लोक कौन से हैं?

“विद्या ददाति विनयम्” (हितोपदेश), “न चोरहार्यं न च राजहार्यं” (सुभाषित), “विद्या मित्रं प्रवासेषु” (चाणक्य नीति), “नास्ति विद्यासमं चक्षुः” (महाभारत) और “पुस्तकस्था तु या विद्या” (चाणक्य नीति)। सबके अर्थ ऊपर हैं।

गुरु पर संस्कृत श्लोक कौन सा बोलें?

“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥” शिक्षक दिवस पर यह सबसे ज़्यादा बोला जाता है। साथ में “आचार्यात् पादमादत्ते” श्लोक भी अच्छा है।

माता पिता पर संस्कृत श्लोक?

“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव।” (तैत्तिरीय उपनिषद) और “अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥” (मनुस्मृति)।

समय पर संस्कृत श्लोक कौन सा है?

“क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत्। क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥” यानी हर क्षण का उपयोग विद्या के लिए करो।

मेहनत पर संस्कृत श्लोक?

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति” (हितोपदेश), “आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः” और “उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः”।

संस्कृत श्लोक का शुद्ध उच्चारण कैसे करें?

धीरे बोलें और श्लोक को दो हिस्सों में बाँटें (आधे श्लोक के बाद हल्का रुकें)। संयुक्त अक्षर साफ़ बोलें, विसर्ग (ः) पर हल्की “ह” की आवाज़ दें, और “ञ्च”, “ङ्ग” जैसे अक्षरों में नाक से आवाज़ निकालें। पहले किसी शिक्षक से एक बार सुन लें।

क्या ये श्लोक सच में उन्हीं ग्रंथों के हैं?

जहाँ श्लोक किसी ग्रंथ में मिलता है, वहाँ उसका नाम दिया है (जैसे मनुस्मृति, हितोपदेश, गीता)। कुछ श्लोक “सुभाषित” यानी पारंपरिक अच्छी उक्तियाँ हैं, जो अलग अलग संग्रहों में मिलती हैं; उन्हें सुभाषित ही लिखा है। चाणक्य नीति के श्लोकों की संख्या अलग किताबों में अलग होती है, इसलिए उनके अध्याय नंबर नहीं दिए।

छोटी कक्षा के बच्चों के लिए कौन से श्लोक?

“सत्यमेव जयते”, “मातृदेवो भव”, “वक्रतुण्ड महाकाय”, “सरस्वति नमस्तुभ्यं” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः”। ये छोटे हैं और जल्दी याद हो जाते हैं।

भाषण या निबंध में कौन सा श्लोक लिखें?

विषय के हिसाब से: शिक्षा पर “विद्या ददाति विनयम्”, पर्यावरण पर “परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः”, एकता पर “वसुधैव कुटुम्बकम्”, स्वास्थ्य पर “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”, और मेहनत पर “उद्यमेन हि सिध्यन्ति”।

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