
फ़ेस वैल्यू क्या है? किसी शेयर की फ़ेस वैल्यू (Face Value), जिसे पार वैल्यू या नॉमिनल वैल्यू भी कहते हैं, वह क़ीमत है जो कंपनी ख़ुद अपने हर शेयर के लिए काग़ज़ पर तय करती है। यह कंपनी के मूल दस्तावेज़ (मेमोरेंडम ऑफ़ एसोसिएशन) में लिखी होती है और पहले शेयर सर्टिफ़िकेट पर छपी होती थी, इसीलिए इसे “फ़ेस” वैल्यू कहते हैं। भारत में ज़्यादातर कंपनियों की फ़ेस वैल्यू ₹1, ₹2, ₹5 या ₹10 होती है।
छोटा जवाब: फ़ेस वैल्यू शेयर की हिसाब किताब वाली क़ीमत है, बाज़ार की क़ीमत नहीं। शेयर बाज़ार में ₹2 फ़ेस वैल्यू वाला शेयर ₹1,500 में भी बिक सकता है। आम निवेशक के लिए फ़ेस वैल्यू तीन जगह काम आती है: डिविडेंड का प्रतिशत समझने में, स्टॉक स्प्लिट और बोनस समझने में, और कंपनी की शेयर पूंजी समझने में। शेयर सस्ता है या महँगा, यह फ़ेस वैल्यू से तय नहीं होता।
मुख्य बातें
- फ़ेस वैल्यू कंपनी की तय की गई काग़ज़ी क़ीमत है, आम तौर पर ₹1, ₹2, ₹5 या ₹10।
- बाज़ार भाव से इसका सीधा रिश्ता नहीं: ₹2 फ़ेस वैल्यू का शेयर ₹1,500 का भी हो सकता है।
- डिविडेंड % फ़ेस वैल्यू पर गिना जाता है, इसलिए हमेशा रुपये में डिविडेंड और यील्ड देखें।
- स्टॉक स्प्लिट में फ़ेस वैल्यू घटती है, बोनस में वही रहती है, कंसॉलिडेशन में बढ़ती है।
- शेयर अच्छा है या नहीं, यह कमाई, क़र्ज़ और P/E से तय होता है, फ़ेस वैल्यू से नहीं।
विषय सूची
फ़ेस वैल्यू को एक उदाहरण से समझें
मान लीजिए “सुरभि फ़ूड्स” नाम की एक काल्पनिक कंपनी ने 1 करोड़ शेयर जारी किए, हर शेयर की फ़ेस वैल्यू ₹10 रखी।
- कंपनी की शेयर पूंजी = 1 करोड़ शेयर × ₹10 = ₹10 करोड़।
- कंपनी IPO में शेयर ₹150 में बेचती है। तो हर शेयर पर ₹10 “शेयर पूंजी” में और बाक़ी ₹140 सिक्योरिटीज़ प्रीमियम में जाएँगे।
- पाँच साल बाद बाज़ार में यही शेयर ₹650 का हो जाता है, लेकिन फ़ेस वैल्यू अब भी ₹10 ही है।
यानी फ़ेस वैल्यू कंपनी के खाते की एक स्थिर इकाई है, जबकि बाज़ार भाव कंपनी के प्रदर्शन और निवेशकों की माँग से बदलता है।
फ़ेस वैल्यू, बुक वैल्यू और मार्केट प्राइस में अंतर

| बिंदु | फ़ेस वैल्यू | बुक वैल्यू | मार्केट प्राइस |
|---|---|---|---|
| मतलब | कंपनी द्वारा तय की गई काग़ज़ी क़ीमत | प्रति शेयर कंपनी की नेटवर्थ | बाज़ार में आज का भाव |
| कौन तय करता है | कंपनी (मेमोरेंडम में) | बैलेंस शीट से हिसाब | ख़रीदार और विक्रेता |
| कितनी बार बदलती है | बहुत कम, केवल स्प्लिट या कंसॉलिडेशन पर | हर तिमाही या साल के नतीजों के साथ | हर पल, बाज़ार के समय में |
| फ़ॉर्मूला | तय रक़म | (कुल संपत्ति − कुल देनदारी) ÷ कुल शेयर | माँग और आपूर्ति |
| किस काम आती है | डिविडेंड %, शेयर पूंजी, स्प्लिट | P/B अनुपात, कंपनी कितनी मज़बूत | ख़रीद बिक्री, मार्केट कैप |
बुक वैल्यू को विस्तार से समझने के लिए पढ़ें: शेयर की बुक वैल्यू क्या है।
ध्यान दें: कंपनी का मार्केट कैप मार्केट प्राइस से गिना जाता है (मार्केट प्राइस × कुल शेयर), फ़ेस वैल्यू से नहीं।
फ़ेस वैल्यू क्यों ज़रूरी है: 5 काम की बातें
1. डिविडेंड का प्रतिशत फ़ेस वैल्यू पर होता है
कंपनियाँ अक्सर डिविडेंड को फ़ेस वैल्यू के प्रतिशत में बताती हैं। यहीं सबसे ज़्यादा ग़लतफ़हमी होती है।
उदाहरण: किसी शेयर की फ़ेस वैल्यू ₹2 है और कंपनी 250% डिविडेंड घोषित करती है।
- डिविडेंड प्रति शेयर = ₹2 × 250% = ₹5
- अगर शेयर का बाज़ार भाव ₹500 है, तो आपकी असल कमाई (डिविडेंड यील्ड) = ₹5 ÷ ₹500 × 100 = केवल 1%
यानी “250% डिविडेंड” सुनकर यह न समझें कि आपके निवेश पर 250% कमाई होगी। हमेशा प्रति शेयर रुपये में डिविडेंड और डिविडेंड यील्ड देखें। डिविडेंड आपके डीमैट से जुड़े बैंक खाते में आता है और यह आपकी आय में जुड़कर टैक्स स्लैब के हिसाब से टैक्स होता है।

2. स्टॉक स्प्लिट में फ़ेस वैल्यू घटती है
स्टॉक स्प्लिट में कंपनी एक शेयर को कई शेयरों में बाँट देती है। फ़ेस वैल्यू उसी अनुपात में घटती है, शेयरों की संख्या बढ़ती है और भाव लगभग उसी अनुपात में कम हो जाता है। आपके कुल निवेश की क़ीमत लगभग वही रहती है।
असली उदाहरण: HDFC बैंक ने 2019 में अपने ₹2 फ़ेस वैल्यू वाले एक शेयर को ₹1 फ़ेस वैल्यू वाले दो शेयरों में बाँटा। इसकी रिकॉर्ड डेट 20 सितंबर 2019 थी। जिनके पास 100 शेयर थे, उनके पास 200 शेयर हो गए।
विस्तार से: स्टॉक स्प्लिट क्या है।
3. बोनस शेयर में फ़ेस वैल्यू नहीं बदलती
बोनस में कंपनी अपने रिज़र्व से मुफ़्त अतिरिक्त शेयर देती है। फ़ेस वैल्यू वही रहती है, केवल शेयरों की संख्या बढ़ती है और भाव उसी अनुपात में घटता है।
4. कंसॉलिडेशन (रिवर्स स्प्लिट) में फ़ेस वैल्यू बढ़ती है
कभी कभी कंपनी कई शेयरों को मिलाकर एक कर देती है, जैसे 10 पुराने शेयर का 1 नया शेयर। तब ₹10 फ़ेस वैल्यू ₹100 हो जाती है और शेयरों की संख्या घट जाती है।
| कदम (शुरुआत: 100 शेयर, फ़ेस वैल्यू ₹10, भाव ₹600) | शेयर | फ़ेस वैल्यू | भाव (लगभग) | कुल क़ीमत |
|---|---|---|---|---|
| स्टॉक स्प्लिट 1:5 | 500 | ₹2 | ₹120 | ₹60,000 |
| बोनस 1:1 | 200 | ₹10 | ₹300 | ₹60,000 |
| कंसॉलिडेशन 10:1 | 10 | ₹100 | ₹6,000 | ₹60,000 |
असल बाज़ार में भाव ठीक इसी अनुपात में नहीं रहता, क्योंकि ख़बर के बाद माँग बदल सकती है, पर हिसाब यही है।

5. शेयर पूंजी और सिक्योरिटीज़ प्रीमियम
- शेयर पूंजी = फ़ेस वैल्यू × कुल जारी शेयर। यह आँकड़ा कंपनी की बैलेंस शीट में “Equity Share Capital” के नाम से दिखता है।
- अगर कंपनी फ़ेस वैल्यू से ज़्यादा क़ीमत पर शेयर जारी करती है, तो अतिरिक्त रक़म सिक्योरिटीज़ प्रीमियम खाते में जाती है।
- कंपनी अधिनियम 2013 के तहत कंपनी आम तौर पर फ़ेस वैल्यू से कम क़ीमत (डिस्काउंट) पर शेयर जारी नहीं कर सकती, कर्मचारियों को दिए जाने वाले स्वेट इक्विटी शेयर जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर।
फ़ेस वैल्यू कितनी होनी चाहिए?
कई लोग पूछते हैं कि अच्छे शेयर की फ़ेस वैल्यू कितनी होनी चाहिए। सीधा जवाब: फ़ेस वैल्यू का कोई “सही” या “अच्छा” स्तर नहीं होता। यह कंपनी की अपनी सुविधा से तय की गई हिसाब की इकाई है।
- भारत में आम तौर पर फ़ेस वैल्यू ₹1, ₹2, ₹5 या ₹10 होती है। ये सभी सामान्य हैं।
- ₹1 फ़ेस वैल्यू वाली कंपनी, ₹10 फ़ेस वैल्यू वाली कंपनी से न बेहतर है, न कमज़ोर।
- फ़ेस वैल्यू तुलना केवल डिविडेंड का प्रतिशत समझने में काम आती है: दो कंपनियों का “100% डिविडेंड” अलग अलग रक़म हो सकता है, अगर उनकी फ़ेस वैल्यू अलग है।
- शेयर अच्छा है या नहीं, यह कंपनी की कमाई, क़र्ज़, ग्रोथ और भाव (P/E, P/B) से तय करें, जो नीचे की चेकलिस्ट में है।
IPO में फ़ेस वैल्यू
IPO के विज्ञापन और आवेदन फ़ॉर्म में इश्यू प्राइस के साथ फ़ेस वैल्यू भी लिखी होती है, जैसे “फ़ेस वैल्यू ₹10, प्राइस बैंड ₹140 से ₹150″। SEBI के IPO नियमों में यह व्यवस्था रही है कि इश्यू प्राइस ₹500 से कम हो तो फ़ेस वैल्यू ₹10 रखी जाती है, और ₹500 या उससे ज़्यादा हो तो ₹10 से कम (पर ₹1 से कम नहीं) रखी जा सकती है; कुछ सरकारी कंपनियों को इसमें छूट है। किसी ख़ास IPO के लिए उसके ऑफ़र डॉक्यूमेंट (RHP) में दी गई फ़ेस वैल्यू ही अंतिम मानें।
IPO में ध्यान रखें: इश्यू प्राइस और फ़ेस वैल्यू का अंतर प्रीमियम है। “फ़ेस वैल्यू ₹10 और प्राइस ₹150” का मतलब यह नहीं कि शेयर 15 गुना महँगा है। महँगा या सस्ता कंपनी की कमाई, P/E और ग्रोथ से तय होता है।
बॉन्ड में फ़ेस वैल्यू का मतलब अलग है
शेयर में फ़ेस वैल्यू का निवेशक के लिए सीमित उपयोग है, लेकिन बॉन्ड या डिबेंचर में फ़ेस वैल्यू बहुत अहम है:
- बॉन्ड पर ब्याज (कूपन) फ़ेस वैल्यू पर गिना जाता है।
- परिपक्वता (मैच्योरिटी) पर आम तौर पर फ़ेस वैल्यू की रक़म वापस मिलती है।
- बाज़ार में बॉन्ड फ़ेस वैल्यू से ऊपर (प्रीमियम) या नीचे (डिस्काउंट) बिक सकता है, जिससे असली कमाई (यील्ड) बदलती है।
उदाहरण: ₹1,000 फ़ेस वैल्यू और 8% कूपन वाला बॉन्ड हर साल ₹80 ब्याज देगा, चाहे आपने उसे बाज़ार में ₹950 में ख़रीदा हो या ₹1,050 में।
किसी कंपनी की फ़ेस वैल्यू कहाँ देखें
- NSE की वेबसाइट या ऐप: कंपनी का नाम खोजें, उसके क्वोट पेज पर “Face Value” लिखा मिलता है।
- BSE की वेबसाइट: कंपनी के पेज पर सिक्योरिटी की जानकारी में।
- आपके ब्रोकर का ऐप: ज़्यादातर ऐप में कंपनी के “फ़ंडामेंटल्स” या “ओवरव्यू” सेक्शन में।
- कंपनी की सालाना रिपोर्ट: बैलेंस शीट के “Share Capital” नोट में लिखा होता है “X शेयर, ₹Y प्रति शेयर”।
- कॉर्पोरेट एक्शन के बाद: स्प्लिट या कंसॉलिडेशन के बाद फ़ेस वैल्यू बदलती है, इसलिए पुरानी वेबसाइट या ब्लॉग की जगह एक्सचेंज की ताज़ा जानकारी देखें।
फ़ेस वैल्यू से जुड़ी 5 आम ग़लतफ़हमियाँ
- “कम फ़ेस वैल्यू = सस्ता शेयर”: ग़लत। ₹1 फ़ेस वैल्यू वाला शेयर ₹3,000 का और ₹10 फ़ेस वैल्यू वाला ₹50 का हो सकता है।
- “शेयर फ़ेस वैल्यू से नीचे गया तो ज़रूर ख़रीदें”: ग़लत। भाव फ़ेस वैल्यू से नीचे जाना अक्सर कमज़ोर कारोबार या भारी घाटे का संकेत होता है। ऐसे शेयर को पहले ठीक से जाँचें।
- “100% डिविडेंड = पैसा दोगुना”: ग़लत। यह फ़ेस वैल्यू का 100% है, बाज़ार भाव का नहीं।
- “फ़ेस वैल्यू से कंपनी की क़ीमत पता चलती है”: ग़लत। कंपनी की क़ीमत मार्केट कैप और कमाई से समझी जाती है।
- “स्प्लिट से अमीर हो गए”: ग़लत। स्प्लिट में शेयर ज़्यादा और भाव कम होता है, कुल निवेश लगभग वही रहता है।
शेयर चुनते समय फ़ेस वैल्यू की जगह क्या देखें
फ़ेस वैल्यू केवल पृष्ठभूमि की जानकारी है। शेयर को परखने के लिए ये देखें:
- ☐ कंपनी की बिक्री और मुनाफ़ा पिछले कई साल में बढ़ा या नहीं
- ☐ P/E अनुपात (भाव ÷ प्रति शेयर कमाई) अपने सेक्टर की दूसरी कंपनियों से तुलना में
- ☐ P/B अनुपात (भाव ÷ बुक वैल्यू), ख़ासकर बैंक और फ़ाइनेंस कंपनियों में
- ☐ क़र्ज़ कितना है और कंपनी उसे चुका पा रही है या नहीं
- ☐ डिविडेंड यील्ड रुपये के हिसाब से, प्रतिशत के झाँसे से नहीं
- ☐ प्रबंधन और प्रमोटर पर भरोसा, गिरवी रखे गए प्रमोटर शेयर
यह सब विस्तार से: फ़ंडामेंटल एनालिसिस क्या है।
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अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
फ़ेस वैल्यू क्या है, आसान भाषा में?
फ़ेस वैल्यू वह क़ीमत है जो कंपनी अपने हर शेयर के लिए काग़ज़ पर तय करती है, जैसे ₹1, ₹2, ₹5 या ₹10। यह शेयर का बाज़ार भाव नहीं है, बल्कि शेयर पूंजी और डिविडेंड के हिसाब का आधार है।
फ़ेस वैल्यू और मार्केट वैल्यू में क्या अंतर है?
फ़ेस वैल्यू कंपनी तय करती है और बहुत कम बदलती है। मार्केट वैल्यू बाज़ार में ख़रीदार और विक्रेता तय करते हैं और यह हर पल बदलती है।
डिविडेंड फ़ेस वैल्यू पर कैसे गिनते हैं?
डिविडेंड प्रति शेयर = फ़ेस वैल्यू × डिविडेंड प्रतिशत। जैसे ₹2 फ़ेस वैल्यू पर 250% डिविडेंड = ₹5 प्रति शेयर। अपनी असल कमाई समझने के लिए ₹5 को बाज़ार भाव से भाग दें।
शेयर की फ़ेस वैल्यू कितनी होनी चाहिए?
फ़ेस वैल्यू का कोई सही या अच्छा स्तर नहीं होता। भारत में ₹1, ₹2, ₹5 और ₹10 आम हैं, और इससे शेयर की गुणवत्ता तय नहीं होती।
क्या कम फ़ेस वैल्यू वाला शेयर अच्छा होता है?
नहीं। फ़ेस वैल्यू से शेयर अच्छा या बुरा तय नहीं होता। कंपनी की कमाई, क़र्ज़, ग्रोथ और भाव (P/E) देखें।
स्टॉक स्प्लिट में फ़ेस वैल्यू का क्या होता है?
स्प्लिट के अनुपात में फ़ेस वैल्यू घटती है और शेयरों की संख्या बढ़ती है। जैसे 1:5 स्प्लिट में ₹10 फ़ेस वैल्यू ₹2 हो जाती है और 100 शेयर 500 हो जाते हैं।
बोनस शेयर में फ़ेस वैल्यू बदलती है क्या?
नहीं। बोनस में फ़ेस वैल्यू वही रहती है, केवल शेयरों की संख्या बढ़ती है और भाव उसी अनुपात में घटता है।
क्या शेयर का भाव फ़ेस वैल्यू से नीचे जा सकता है?
हाँ, बाज़ार भाव फ़ेस वैल्यू से नीचे जा सकता है। यह अक्सर कंपनी की कमज़ोर हालत का संकेत होता है, इसलिए ऐसे शेयर में सावधानी रखें।
किसी कंपनी की फ़ेस वैल्यू कैसे पता करें?
NSE या BSE की वेबसाइट पर कंपनी के पेज पर, अपने ब्रोकर ऐप के ओवरव्यू सेक्शन में, या कंपनी की सालाना रिपोर्ट के शेयर पूंजी वाले नोट में।
स्रोत (15 अक्टूबर 2026 को जाँचे गए)
- HDFC बैंक स्टॉक स्प्लिट: BSE पर बैंक की सूचना और NSE F&O सर्कुलर
- IPO में फ़ेस वैल्यू का नियम: SEBI ICDR 2009, रेगुलेशन 31 का पाठ और ICMAI अध्ययन सामग्री
- SEBI: निवेशक जानकारी
- NSE इंडिया और BSE इंडिया
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- शेयर बायबैक क्या है
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ज़रूरी सूचना: यह लेख केवल सामान्य जानकारी के लिए है, निवेश सलाह नहीं। उदाहरण में दी गई कंपनी और आँकड़े काल्पनिक हैं, केवल समझाने के लिए। शेयर बाज़ार में निवेश जोखिम के अधीन है, इसलिए कोई भी फ़ैसला लेने से पहले कंपनी की आधिकारिक जानकारी पढ़ें या SEBI में पंजीकृत सलाहकार से बात करें।
नोट: इस लेख में Amazon के affiliate लिंक हैं। इनसे ख़रीदारी करने पर Storyshala को छोटा कमीशन मिलता है, आपके लिए क़ीमत नहीं बदलती।





